वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५९- ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना
| २६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| जलेश्वरीं कुक्कुटिकां सुदामां लोहमेखलाम्।<br>वपुष्मत्युल्मुकाक्षी च कोकनामा महाशनी।<br>रौद्रा कर्कटिका तुण्डा श्वेततीर्थो ददौ त्विमाः॥ १०१<br>एतानि भूतानि गणांश्च मातरो<br>दृष्ट्वा महात्मा विनतातनूजः।<br>ददौ मयूरं स्वसुतं महाजवं<br>तथारुणस्ताम्रचूडं च पुत्रम्॥ १०२<br>शक्तिं हुताशोऽद्रिसुता च वस्त्रं<br>दण्डं गुरुःसा कुटिला कमण्डलुम्।<br>मालां हरिः शूलधरः पताकां<br>कण्ठे च हारं मघवानुरस्तः॥ १०३<br>गणैर्वृतो मातृभिरन्वयातो<br>मयूरसंस्थो वरशक्तिपाणिः।<br>सैन्याधिपत्ये स कृतो भवेन<br>रराज सूर्येव महावपुष्मान्॥ १०४ | श्वेततीर्थने तो जलेश्वरी, कुक्कुटिका, सुदामा, लोहमेखला, वपुष्मती, उल्मुकाक्षी, कोकनामा, महाशनी, रौद्रा, कर्कटिका और तुण्डा—इन अनुचरियोंको दिया। इन भूतों, गणों और मातृकाओंको देखकर विनता-पुत्र महात्मा गरुड़ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूरको समर्पित किया और अरुणने अपने पुत्र ताम्रचूडको प्रदान कर दिया। अग्निने शक्ति, पार्वती ने वस्त्र, बृहस्पतिने दण्ड, उस कुटिलाने कमण्डलु, विष्णुने माला, शङ्करने पताका तथा इन्द्रने अपने हृदयका हार कार्तिकेयके कण्ठमें अर्पित कर दिया। गणोंसे युक्त, मातृकाओंसे अनुसरित, मयूरपर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्तिको हाथमें लिये हुए महाशरीरधारी वे कुमार (कार्तिकेय) शङ्करके द्वारा सैन्याधिपतिके पदपर अभिषिक्त होकर (और उपहार पाकर) सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे॥ १०१-१०४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५७॥
अट्टावनवाँ अध्याय
सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, तारक-विजयके लिये प्रस्थान, पातालकेतुका वृत्तान्त, तारक महिषासुर-वध तथा सुचक्राक्षको वर
| पुलस्त्य उवाच<br>सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो दैवतैरथ।<br>प्रणिपत्य भवं भक्त्या गिरिजां पावकं शुचिम्॥ १<br><br>षट् कृत्तिकाश्च शिरसा प्रणम्य कुटिलामपि।<br>ब्रह्माणं च नमस्कृत्य इदं वचनमब्रवीत्॥ २ | पुलस्त्यजी बोले— जब शङ्कर एवं देवताओंने देवताओंके सेनापतिके पदपर कुमार कार्तिकेयका अभिषेक किया तब उक्त पदपर अभिषिक्त कुमारने भक्तिपूर्वक शङ्कर, पार्वती और पवित्र अग्निको प्रणाम किया। उसके बाद छः कृत्तिकाओं एवं कुटिलाको भी सिर झुकाकर प्रणाम करके ब्रह्माको नमस्कार कर यह वचन कहा॥ १-२॥ |
| कुमार उवाच<br>नमोऽस्तु भवतां देवा ओं नमोऽस्तु तपोधनाः।<br>युष्मत्प्रसादाज्जेष्यामि शत्रू महिषतारकौ॥ ३ | कुमारने कहा— देवताओ! आपलोगोंको नमस्कार है। तपोधनो! आपलोगोंको ओंकारके साथ नमस्कार ('ॐ नमः') है। आपलोगोंकी अनुकम्पासे मैं महिष एवं तारक दोनों शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध [ २६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शिशुरस्मि न जानामि वक्तुं किंचन देवताः।<br>दीयतां ब्रह्मणा सार्द्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम्॥ ४<br>इत्येवमुक्ते वचने कुमारेण महात्मना।<br>मुखं निरीक्षन्ति सुराः सर्वे विगतसाध्वसाः॥ ५<br>शङ्करोऽपि सुतस्नेहात् समुत्थाय प्रजापतिम्।<br>आदाय दक्षिणे पाणौ स्कन्दान्तिकमुपागतम्॥ ६<br>अथोमा प्राह तनयं पुत्र एहोहि शत्रुहन्।<br>वन्दस्व चरणौ दिव्यौ विष्णोर्लोकनमस्कृतौ॥ ७ | देवताओ! मैं शिशु हूँ, मैं कुछ भी बोलना नहीं जानता। ब्रह्माके सहित आपलोग इस समय मुझे अनुमति दें। महात्मा कुमारके इस प्रकार कहनेपर सभी देवता निडर होकर उनका मुख देखने लगे। भगवान् शङ्कर पुत्रके स्नेहवश उठे और ब्रह्माको अपने दाहिने हाथसे पकड़कर स्कन्दके समीप ले आये। उसके बाद उमाने पुत्रसे कहा—शत्रुको मारनेवाले! आओ! आओ! संसारसे वन्दित विष्णुके दिव्य चरणोंको प्रणाम करो॥ ३-७॥ |
| ततो विहस्याह गुहः कोऽयं मातर्वदस्व माम्।<br>यस्यादरात् प्रणामोऽयं क्रियते मद्विधैर्जनैः॥ ८<br><br>तं माता प्राह वचनं कृते कर्मणि पद्मभूः।<br>वक्ष्यते तव योऽयं हि महात्मा गरुडध्वजः॥ ९<br><br>केवलं त्विह मां देवस्त्वत्पिता प्राह शङ्करः।<br>नान्यः परतोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः॥ १०<br><br>पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम्।<br>तस्थौ कृताञ्जलिपुटस्त्वाज्ञां प्रार्थयतेऽच्युतात्॥ ११<br><br>कृताञ्जलिपुटं स्कन्दं भगवान् भूतभावनः।<br>कृत्वा स्वस्त्ययनं देवो ह्यनुज्ञां प्रददौ ततः॥ १२ | उसके बाद कार्तिकेयने हँसकर कहा—हे माता! मुझे स्पष्ट बतलाओ कि ये कौन हैं, जिन्हें हमारे-जैसे (अन्य) व्यक्ति भी प्रेमपूर्वक प्रणाम करते हैं? माताने उनसे कहा—ये महात्मा गरुडध्वज कौन हैं, यह तुम्हें कार्य कर लेनेपर ब्रह्मा ही बतलायेंगे। तुम्हारे पिता शङ्करदेवने मुझसे केवल यही बतलाया कि इनसे बढ़कर हमलोग या अन्य कोई शरीरधारी नहीं है। पार्वतीके स्पष्टतः कहनेपर कार्तिकेयने जनार्दनको प्रणाम किया एवं दोनों हाथोंको जोड़कर वे खड़े हो गये और भगवान् अच्युतसे आज्ञा माँगने लगे। लोकस्रष्टा भगवान् विष्णुने हाथ जोड़े हुए स्कन्दका स्वस्त्ययन कर उन्हें आज्ञा दी॥ ८-१२॥ |
| नारद उवाच<br>यत्तत् स्वस्त्ययनं पुण्यं कृतवान् गरुडध्वजः।<br>शिखिध्वजाय विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १३ | नारदने कहा— विप्रर्षे! गरुडध्वज विष्णुने मयूरध्वज कार्तिकेयके लिये जिस पवित्र स्वस्त्ययनका पाठ किया, उसे आप मुझसे कहें॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणु स्वस्त्ययनं पुण्यं यत्प्राह भगवान् हरिः।<br>स्कन्दस्य विजयार्थाय महिषस्य वधाय च॥ १४<br><br>स्वस्ति ते कुरुतां ब्रह्मा पद्मयोनी रजोगुणः।<br>स्वस्ति चक्राङ्कितकरो विष्णुस्ते विदधात्वजः॥ १५<br><br>स्वस्ति ते शङ्करो भक्त्या सपत्नीको वृषध्वजः।<br>पावकः स्वस्ति तुभ्यं च करोतु शिखिवाहन॥ १६<br><br>दिवाकरः स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>सोमः सभौमः सबुधो गुरुश्च।<br>काव्यः सदा स्वस्ति करोतु तुभ्यं<br>शनैश्वरः स्वस्त्ययनं करोतु॥ १७ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्कन्दकी विजय एवं महिषके वधके लिये भगवान् विष्णुद्वारा कहे गये मङ्गलमय स्वस्तिवाचन—स्वस्त्ययनको सुनिये। (विष्णुने जो स्वस्त्ययन-पाठ किया, वह इस प्रकार है—) रजोगुणसे सम्पन्न कमलयोनि ब्रह्मा तुम्हारा कल्याण करें। हाथमें चक्र धारण करनेवाले अजन्मा विष्णु तुम्हारा मङ्गल करें। पत्नीसहित वृषध्वज शङ्कर प्रेमपूर्वक तुम्हारा मङ्गल करें। मयूरवाहन! अग्निदेव तुम्हारा कल्याण करें। सूर्य तुम्हारा मङ्गल करें, भौमसहित सोम तथा बुधसहित बृहस्पति तुम्हारा मङ्गल करें। शुक्र सदैव तुम्हारा मङ्गल करें तथा शनैश्चर तुम्हारा मङ्गल करें॥ १४-१७॥ |
| २६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५८ |
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| मरीचिरत्रिः पुलहः पुलस्त्यः क्रतुर्वसिष्ठो भृगुरङ्गिराश्च।<br>मृकण्डुजस्ते कुरुतां हि स्वस्ति स्वस्ति सदा सप्त महर्षयश्च ॥ १८<br>विश्वेऽश्विनौ साध्यमरुद्गणाग्रयो दिवाकराः शूलधरा महेश्वराः।<br>यक्षाः पिशाचा वसवोऽथ किन्नरास्तेस्वस्ति कुर्वन्त सदोद्यतास्त्वमी ॥ १९<br>नागाः सुपर्णाः सरितः सरांसि तीर्थानि पुण्यायतनाः समुद्राः।<br>महाबला भूतगणा गणेन्द्रास्ते स्वस्ति कुर्वन्तु सदा समुद्यताः ॥ २०<br>स्वस्ति द्विपादिकेभ्यस्ते चतुष्पादेभ्य एव च।<br>स्वस्ति ते बहुपादेभ्यस्त्वपादेभ्योऽप्यनामयम् ॥ २१ | मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, मार्कण्डेय—ये ऋषि तुम्हारा मङ्गल करें। सप्तर्षिगण तुम्हारा सदा मङ्गल करें। विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, साध्य, मरुद्गण, अग्नि, सूर्य, शूलधर, महेश्वर, यक्ष, पिशाच, वसु और किन्नर—ये सब तत्परतासे सदा तुम्हारा मङ्गल करें। नाग, पक्षी, नदियाँ, सरोवर, तीर्थ, पवित्र देवस्थान, समुद्र, महाबलशाली भूतगण तथा विनायकगण सदा तत्पर होकर तुम्हारा मङ्गल करें। दो पैरवालों एवं चार पैरवालोंसे तुम्हारा मङ्गल हो। बहुत पैरवालोंद्वारा तुम्हारा मङ्गल हो एवं बिना पैरवालोंसे तुम्हारी स्वस्थता बनी रहे—तुम नीरोग बने रहो॥ १८-२१॥ |
| प्राचीं दिग् रक्षतां वज्री दक्षिणां दण्डनायकः।<br>पाशी प्रतीचीं रक्षतु लक्ष्मांशः पातु चोत्तराम् ॥ २२<br><br>वह्निर्दक्षिणपूर्वां च कुबेरो दक्षिणापराम्।<br>प्रतीचीमुत्तरां वायुः शिवः पूर्वोत्तराम्पि ॥ २३<br><br>उपरिष्टाद् ध्रुवः पातु अधस्ताच्च धराधरः।<br>मुसली लाङ्गली चक्री धनुष्मानन्तरेषु च ॥ २४<br><br>वाराहोऽम्बुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी।<br>सामवेदध्वनिः श्रीमान् सर्वतः पातु माधवः ॥ २५ | वज्र धारण करनेवाले (इन्द्र) पूर्व दिशाकी, दण्डनायक (यम) दक्षिण दिशाकी, पाशधारी (वरुण) पश्चिम दिशाकी तथा चन्द्रमा उत्तर दिशाकी रक्षा करें। अग्नि अग्नि (पूर्व-दक्षिण)-कोणकी, कुबेर नैर्ऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)-कोणकी, वायुदेव वायव्य (पश्चिम-उत्तर)-कोणकी और शिव ईशान (उत्तर-पूर्व)-कोणकी (रक्षा करें)। ऊपरकी ओर ध्रुव, नीचेकी ओर पृथ्वीको धारण करनेवाले शेषनाग एवं बीचके स्थानोंमें मुसल, हल, चक्र तथा धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णु रक्षा करें। समुद्रमें वाराह, दुर्गम स्थानमें नरसिंह तथा सभी ओरसे सामवेदके ध्वनि-रूप श्रीमान् श्रीलक्ष्मीकान्त माधव तुम्हारी रक्षा करें॥ २२-२५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एवं कृतस्वस्त्ययनो गुहः शक्तिधरोऽग्रणीः।<br>प्रणिपत्य सुरान् सर्वान् समुत्पतत भूतलात् ॥ २६<br>तमन्वेव गणाः सर्वे दत्ता ये मुदितैः सुरैः।<br>अनुजग्मुः कुमारं ते कामरूपा विहङ्गमाः ॥ २७<br>मातरश्च तथा सर्वाः समुत्पेतुर्नभस्तलम्।<br>समं स्कन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥ २८<br>ततः सुदीर्घमध्वानं गत्वा स्कन्दोऽब्रवीद् गणान्।<br>भूम्यां तूर्णं महावीर्याः कुरुध्वमवतारणम् ॥ २९ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकार स्वस्त्ययन सम्पन्न हो जानेपर शक्ति धारण करनेवाले सेनापति कार्तिकेयजी सभी देवताओंको प्रणामकर भूतलसे आकाशकी ओर उड़ चले। प्रसन्न होकर देवताओंने जिन गणोंको गुहके लिये दिया था, उन इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले सभी गणोंने पक्षीका रूप धारण कर कुमारका अनुगमन किया। सभी माताएँ भी पराक्रमी स्कन्दके साथ महान् असुरोंके वधके लिये आकाशमें उड़ चलीं। उसके बाद बहुत दूर जानेपर स्कन्दने गणोंसे कहा—महापराक्रमियो! तुमलोग शीघ्र ही पृथ्वीपर उतर जाओ॥ २६-२९॥ |
अध्याय ५८ ] सेनापतिपदपर नियुक्त कार्तिकेयके लिये ऋषियोंद्वारा स्वस्त्ययन, महिषासुर-वध २६५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| गणा गुहवचः श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम्।<br>आरात् पतन्तस्तद्देशं नादं चक्रुर्भयंकरम्॥ ३०<br>तन्निनादो महीं सर्वामापूर्य च नभस्तलम्।<br>विवेशार्णवरन्ध्रेण पातालं दानवालयम्॥ ३१<br>श्रुतः स महिषेणाथ तारकेण च धीमता।<br>विरोचनेन जम्भेन कुजम्भेनासुरेण च॥ ३२<br>ते श्रुत्वा सहसा नादं वज्रपातोपमं दृढम्।<br>किमेतदिति संचिन्त्य तूर्णं जग्मुस्तदान्धकम्॥ ३३ | गुहकी बात सुनकर सभी गण पृथ्वीपर उतर आये। उतरकर उस स्थानपर उन गणोंने एकाएक भयंकर नाद किया। वह भयंकर नाद सारी पृथ्वी एवं गगनमण्डलमें गूँज गया। फिर तो वह समुद्री छिद्रसे दानवोंके निवासस्थान पाताललोक (-तक)-में पहुँच गया। उसके बाद मतिमान् महिष, तारक, विरोचन, जम्भ तथा कुजम्भ आदि असुरोंने उस ध्वनिको सुना। एकाएक वज्रपातके समान उस भयंकर ध्वनिको सुनकर यह क्या है—यह सोचकर वे सभी शीघ्रतासे अन्धकके पास चले गये॥ ३०—३३॥ |
| ते समेत्यान्धकेनैव समं दानवपुङ्गवाः।<br>मन्त्रयामासुरुद्विग्नास्तं शब्दं प्रति नारद॥ ३४<br>मन्त्रयत्सु च दैत्येषु भूतलात् सूकराननः।<br>पातालकेतुर्दैत्येन्द्रः सम्प्राप्तोऽथ रसातलम्॥ ३५<br>स बाणविद्धो व्यथितः कम्पमानो मुहुर्मुहुः।<br>अब्रवीद् वचनं दीनं समभ्येत्यान्धकासुरम्॥ ३६ | नारदजी! वे सभी असुरश्रेष्ठ व्याकुल होकर अन्धकके साथ ही एकत्र होकर उस शब्दके विषयमें परस्पर विचार-विमर्श करने लगे। उन दैत्योंके विचार करते समय सूकर-जैसे मुखवाला दैत्यश्रेष्ठ पातालकेतु धरातलसे रसातलमें आया। बाणसे विद्ध होनेके कारण व्यथित होकर वह बारम्बार काँपता हुआ अन्धकासुरके पास आकर दैन्य वचन बोला—॥ ३४—३६॥ |
| पातालकेतुरुवाच<br>गतोऽहमासं दैत्येन्द्र गालवस्याश्रमं प्रति।<br>तं विध्वंसयितुं यत्नं समारब्धं बलान्मया॥ ३७<br>यावत्सूकररूपेण प्रविशामि तमाश्रमम्।<br>न जाने तं नरं राजन् येन मे प्रहितः शरः॥ ३८<br>शरसंभिन्नजत्रुश्च भयात् तस्य महाजवः।<br>प्रणष्ट आश्रमात् तस्मात् स च मां पृष्ठतोऽन्वगात्॥ ३९<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषः श्रूयते परमोऽसुर।<br>तिष्ठ तिष्ठेति वदतस्तस्य शूरस्य पृष्ठतः।<br>तद्भयादस्मि जलधिं सम्प्राप्तो दक्षिणार्णवम्॥ ४० | पातालकेतुने कहा— दैत्येश्वर! मैं गालवके आश्रममें गया था और उसको बलपूर्वक नष्ट करनेका उद्योग करने लगा। राजन्! मैंने सूकरके रूपमें जैसे ही उस आश्रममें प्रवेश किया, वैसे ही पता नहीं, किस मानवने मेरे ऊपर बाण छोड़ दिया। बाणसे हँसलीके टूट जानेपर मैं उसके भयके कारण आश्रमसे तुरंत भागा। पर उसने मेरा पीछा किया। असुर! मेरे पीठ-पीछे आ रहे 'रुको-रुको' कहनेवाले उस वीरके घोड़ेकी टापका महान् शब्द सुनायी पड़ रहा था। उसके भयसे मैं जलनिधि दक्षिण समुद्रमें आ गया॥ ३७—४०॥ |
| यावत्पश्यामि तत्रस्थान् नानावेषाकृतीन् नरान्।<br>केचिद् गर्जन्ति घनवत् प्रतिगर्जन्ति चापरे॥ ४१<br>अन्ये चोचुर्वयं नूनं निघ्नामो महिषासुरम्।<br>तारकं घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः॥ ४२ | वहाँ मैंने अनेक प्रकारके पहनावे तथा आकृतिवाले मनुष्योंको देखा। उनमें कुछ तो बादलकी भाँति गर्जन कर रहे थे और कुछ दूसरे उसी प्रकारकी प्रतिध्वनि कर रहे थे। दूसरे कह रहे थे कि हम महिषासुरको निश्चय ही मार डालेंगे और अति तेजस्वी दूसरे लोग कह रहे थे कि आज हम तारकको मारेंगे। |
| तच्छ्रुत्वा सुतरां त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर।<br>महार्णवं परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः॥ ४३<br>धरण्यां विवृतं गर्तं स मामन्वपतद् बली।<br>तद्भयात् सम्परित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः॥ ४४ | असुरेश्वर! उसे सुनकर मुझे बहुत डर हो गया और मैं विशाल समुद्रको छोड़कर भयभीत हो पृथ्वीके नीचे विस्तृत गड्ढे (सुरंग)-के रूपमें बने हुए गुप्त मार्गसे भागा। तब भी उस बलशालीने मेरा पीछा किया। उसके डरसे मैं अपना हिरण्यपुर त्यागकर |