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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

५३- हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति

२२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५१

| ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्नेयं शक्ता तपस्विनी।<br>शार्वं धारयितुं तेजो वराकी मुच्यतां त्वियम्॥ ८ | तब सुरपतिने कहा—यह बेचारी तपस्विनी शिवका तेज धारण करनेमें समर्थ नहीं है; इसे छोड़ दो॥५-८॥ |
| ततस्तु कुटिला क्रुद्धा ब्रह्माणं प्राह नारद।<br>तथा यतिष्ये भगवन् यथा शार्वं सुदुर्द्धरम्॥ ९<br><br>धारयिष्याम्यहं तेजस्तथैव शृणु सत्तम।<br>तपसाहं सुतप्तेन समाराध्य जनार्दनम्॥ १०<br><br>यथा हरस्य मूर्धानं नमयिष्ये पितामह।<br>तथा देव करिष्यामि सत्यं सत्यं मयोदितम्॥ ११ | नारद! उसके बाद कुपित होकर कुटिलाने ब्रह्मासे कहा—भगवन्! शङ्करके दुर्धरणीय तेजको जैसे धारण कर सकूँ, मैं वैसा उपाय करूँगी। सत्तम! आप सुनें, कठिनतर तपस्यासे जनार्दन भगवान्‌की उत्तम उपासना करके मैं उनके तेजको वैसे ही धारण करूँगी जिससे शङ्करका सिर नत कर दूँ। पितामह देव! मैंने जो कहा है वह सत्य है, सत्य है; मैं वैसा ही करूँगी॥ ९-११॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः पितामहः क्रुद्धः कुटिलां प्राह दारुणाम्।<br>भगवानादिकृद् ब्रह्मा सर्वेशोऽपि महामुने॥ १२ | **पुलस्त्यजी बोले—**महामुने! उसके बाद आदिकर्ता सबके उपास्य पितामह भगवान् ब्रह्माने उग्र स्वभाववाली कुटिलासे कुपित होकर कहा—॥ १२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>यस्मान्मद्वचनं पापे न क्षान्तं कुटिले त्वया।<br>तस्मान्मच्छापनिर्दग्धा सर्वा आपो भविष्यसि॥ १३ | **ब्रह्माने कहा—**पापिनी कुटिले! जिस कारण तुमने मेरे वचनको सहन नहीं किया, उसी कारण मेरे शापसे तुम निर्दग्ध होकर पूर्णतः जलमयी हो जाओगी। |
| इत्येवं ब्रह्मणा शप्ता हिमवद्दुहिता मुने।<br>आपोमयी ब्रह्मलोकं प्लावयामास वेगिनी॥ १४<br><br>तामुद्वृत्तजलां दृष्ट्वा प्रबबन्ध पितामहः।<br>ऋक्सामार्थर्वयजुर्भिर्वाङ्मयैर्बन्धनैर्दृढम् ॥ १५<br><br>सा बद्धा संस्थिता ब्रह्मन् तत्रैव गिरिकन्यका।<br>आपोमयी प्लावयन्ती ब्रह्मणो विमला जटाः॥ १६ | मुने! इस प्रकार ब्रह्मासे अभिशप्त हिमालय-पुत्री (कुटिला) जलमयी होकर (अपने) वेगसे ब्रह्मलोकको जलसे आप्लावित करने लगी। पितामहने उसके उमड़कर बहते हुए जलकी धाराको देखकर ऋक्, साम, अथर्व और यजुष्‌की स्तुतियोंका पाठ करके उसे स्तुतिद्वारा दृढ़तापूर्वक बाँध दिया। ब्रह्मन्! जलमयी वह पर्वतपुत्री ब्रह्माकी विमल जटाको भिगोती हुई वहीं बद्ध (अवरुद्ध) हो गयी॥ १३-१६॥ |
| या सा रागवती नाम सापि नीता सुरैर्दिवम्।<br>ब्रह्मणे तां निवेद्यैव तामप्याह प्रजापतिः॥ १७ | जो रागवती (रागिणी) नामवाली थी उसे भी देवतागण स्वर्गमें ले गये और उन्होंने ब्रह्माको उसे समर्पित कर दिया। उससे भी ब्रह्माने उसी प्रकार कहा। |
| सापि क्रुद्धाऽब्रवीन्नूनं तथा तप्स्ये महत्तपः।<br>यथा मन्नामसंयुक्तो महिषघ्नो भविष्यति॥ १८ | उसने भी क्रुद्ध होकर कहा—मैं निश्चय ही ऐसी कठिन तपस्या करूँगी, जिससे मेरे नामसे सम्बद्ध पुत्र महिषको मारनेवाला होगा। |
| तामप्यथाशपद् ब्रह्मा सन्ध्या पापे भविष्यसि।<br>या मदवाक्यमलङ्घ्यं वै सुरैर्लङ्घयसे बलात्॥ १९ | ब्रह्माने उसे भी शाप दिया—पापे! देवोंसे भी अनुपेष्य मेरे वचनको अहंकारवश न माननेसे तुम 'सन्ध्या' हो जाओगी। |
| सापि जाता मुनिश्रेष्ठ संध्या रागवती ततः।<br>प्रतीच्छत् कृत्तिकायोगं शैलेयी विग्रहं दृढम्॥ २० | मुनिश्रेष्ठ! उसके बाद वह शैलतनया रागवती भी सन्ध्या हो गयी और स्वस्थ शरीर धारण कर कृत्तिकायोगकी प्रतीक्षा करने लगी॥ १७-२०॥ |
| ततो गते कन्यके द्वे ज्ञात्वा मेना तपस्विनी।<br>तपसो वारयामास उमेत्येवाब्रवीच्च सा॥ २१ | (इस प्रकार) दो कन्याओंको चली गयी जानकर तपस्विनी मेनाने (तृतीय कन्या कालीको) तपस्या |

| अध्याय ५१ ] | मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन | २२१ |
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| तदेव माता नामास्याश्चक्रे पितृसुता शुभा।<br>उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम्॥ २२<br><br>ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृषध्वजम्।<br>रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ २३<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम्।<br>इहानयध्वं तां कालीं तपस्यन्तीं हिमालये॥ २४ | करनेसे रोका। उसने 'उ' 'मा' ऐसा कहा। पितरोंकी पुत्री, कल्याणमयी माता (मेना)-ने कन्याका वही दो अक्षरोंसे संयुक्त 'उमा' यह नाम रखा। उमा भी तपोवनमें चली गयी। उसके बाद उसने मनमें शूलपाणि वृषध्वज रुद्रका ध्यानकर कठिन तपस्या की। फिर ब्रह्माने देवताओंसे कहा—देवताओ! तुमलोग हिमालयपर तप करती हुई हिमालयकी पुत्री कालीके पास जाओ और उसे यहाँ लिवा लाओ॥ २१—२४॥ |
| ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुः शैलनन्दिनीम्।<br>तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितुम्॥ २५<br><br>इन्द्रोऽमरगणैः सार्द्धं निर्द्धूतस्तेजसा तया।<br>ब्रह्मणोऽधिकतेजोऽस्य विनिवेद्य प्रतिष्ठितः॥ २६<br><br>ततो ब्रह्माऽब्रवीत् सा हि ध्रुवं शङ्करवल्लभा।<br>यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः॥ २७<br><br>तस्माद् भजध्वं स्वं स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः।<br>सतारकं हि महिषं विद्ध्वं निहतं रणे॥ २८ | उसके बाद देवगण (हिमालयपर) आये और (उन लोगोंने) शैलनन्दिनीको देखा। परंतु उसके तेजसे व्यग्र (व्याकुल) हो जानेके कारण वे उसके निकट न जा सके। देवताओंके साथ इन्द्र भी उसके तेजसे कान्तिहीन-से हो गये। वे ब्रह्मासे उसके तेजका आधिक्य बतलाकर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने कहा—वह निश्चय ही शङ्करकी पत्नी होगी; क्योंकि उसके तेजसे तुम सब आकुल और प्रभाहीन हो गये हो। अतः देवताओ! तुमलोग चिन्ता छोड़कर अपने-अपने स्थानको जाओ। अब समझ लो कि युद्धमें तारकके साथ महिष मारा (ही) गया॥ २५—२८॥ |
| इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः।<br>जग्मुः स्वान्येव धिष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः॥ २९<br><br>उमामपि तपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः।<br>निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो ह्यानयद्गृहान्॥ ३०<br><br>देवोऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम्।<br>विचचार महाशैलान् मेरुप्राग्र्यान् महामतिः॥ ३१<br><br>स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः।<br>तेनार्चितः श्रद्धयाऽसौ तां रात्रिमवसद्धरः॥ ३२ | इस प्रकार ब्रह्माने जब इन्द्रके साथ सभी देवताओंसे कहा तब देवगण चिन्तारहित होकर उसी समय अपने-अपने स्थानपर चले गये। फिर पत्नीसहित पर्वतराज हिमवान् तपश्चर्यामें लगी हुई उमाको भी उस तपश्चर्यासे हटाकर उसे घर ले आये। महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामके उस कठिन (रौद्र) व्रतका आश्रय लेकर मेरु आदि बड़े-बड़े पर्वतोंपर भ्रमण करने लगे। वे कभी पर्वतराज हिमाचलपर गये। हिमालयने उनकी श्रद्धासे पूजा की। उस रात उन्होंने वहीं निवास किया॥ २९—३२॥ |
| द्वितीयेऽह्नि गिरीशेन महादेवो निमन्त्रितः।<br>इहैव तिष्ठस्व विभो तपःसाधनकारणात्॥ ३३<br><br>इत्येवमुक्तो गिरिणा हरश्चक्रे मतिं च ताम्।<br>तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा वासं निराश्रयम्॥ ३४<br><br>वसतोऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शूलिनः।<br>तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा॥ ३५<br><br>तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां प्रियां सतीम्।<br>स्वागतेनाभिसम्पूज्य तस्थौ योगरतो हरः॥ ३६ | दूसरे दिन पर्वतराज (हिमालय)-ने महादेवको निमन्त्रित किया (और) कहा—हे विभो! आप तपस्या करनेके लिये यहीं रहें। हिमालयके इस प्रकार कहनेपर शङ्करने भी वही विचार किया और बिना घरका रहना छोड़कर आश्रममें रहने लगे। देवाधिदेव त्रिशूलधारी शङ्करके आश्रममें रहनेपर गिरिराजकी कल्याणी कन्या काली उस स्थानपर आयी। अपनी प्रिया सतीको पुनः हिमतनया उमाके रूपमें उत्पन्न हुई और (अपने) सामने आयी देखकर शङ्करने उनके आनेका अभिनन्दन तो किया, पर वे फिर योगमें लीन हो गये॥ ३३—३६॥ |

| २२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सा चाभ्येत्य वरारोहा कृताञ्जलिपरिग्रहा।<br>ववन्दे चरणौ शैवौ सखीभिः सह भामिनी॥ ३७<br><br>ततस्तु सुचिराच्छर्वः समीक्ष्य गिरिकन्यकाम्।<br>न युक्तं चैवमुक्त्वाऽथ सगणोऽन्तर्दधे ततः॥ ३८<br><br>साऽपि शर्ववचो रौद्रं श्रुत्वा ज्ञानसमन्विता।<br>अन्तर्दुःखेन दह्यन्ती पितरं प्राह पार्वती॥ ३९<br><br>तात यास्ये महारण्ये तप्तुं घोरं महत्तपः।<br>आराधनाय देवस्य शङ्करस्य पिनाकिनः॥ ४०सुन्दर शरीरवाली हिमसुताने वहाँ जानेके बाद दोनों हाथ जोड़कर सहेलियोंके साथ शिवके दोनों चरणोंमें अभिवादन (प्रणाम) किया। उसके बाद शङ्करने देरतक गिरिकन्याको देखा और कहा—यह उचित नहीं है। ऐसा कहकर शङ्कर अपने गणोंके साथ तिरोहित हो गये (छिप गये)। भय उत्पन्न करनेवाले शङ्करके वचनको सुनकर आन्तरिक दुःखसे जलती हुई ज्ञानिनी उन पार्वती ने भी अपने पितासे कहा—तात! पिनाक धारण करनेवाले शङ्करदेवकी आराधना एवं उत्कट तथा महान् तप करनेके लिये मैं विशाल वनमें जाऊँगी॥ ३७–४०॥
तथेत्युक्तं वचः पित्रा पादे तस्यैव विस्तृते।<br>ललिताख्या तपस्तेपे हराराधनकाम्यया॥ ४१<br><br>तस्याः सख्यस्तदा देव्याः परिचर्यां तु कुर्वते।<br>समित्कुशफलं चापि मूलाहरणमादितः॥ ४२<br><br>विनोदनार्थं पार्वत्या मृण्मयः शूलधृग् हरः।<br>कृतस्तु तेजसा युक्तो भद्रमस्त्विति साऽब्रवीत्॥ ४३<br><br>पूजां करोति तस्यैव तं पश्यति मुहुर्मुहुः।<br>ततोऽस्यास्तुष्टिमगच्छच्छ्रद्धया त्रिपुरान्तकृत्॥ ४४पिताने कहा—ठीक है। उसके बाद शङ्करकी आराधनाकी इच्छासे ललिता (पार्वती) उसी (हिमालय) पर्वतकी विस्तृत तलहटीमें तप करने लगीं। उस समय उनकी सहचरियाँ समिधा, कुश, फल-मूल आदि लाकर देवीकी सेवा करने लगीं। (उन सहचरियोंने) पार्वतीके विनोदके लिये तेजस्वी त्रिशूलधारी शङ्करकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी। पार्वती ने भी कहा—सखियो! ठीक है। (फिर तो) वे (पार्वतीजी) उसी मूर्तिकी पूजा करतीं और बार-बार उसे निहारती रहती थीं। उसके बाद उनकी श्रद्धासे त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्कर प्रसन्न हो गये॥ ४१–४४॥
वटुरूपं समाधाय आषाढी मुञ्जमेखली।<br>यज्ञोपवीती छत्री च मृगाजिनधरस्तथा॥ ४५<br><br>कमण्डलुव्यग्रकरो भस्मारुणितविग्रहः।<br>प्रत्याश्रमं पर्यटन् स तं काल्याश्रममागतः॥ ४६<br><br>तमुत्थाय तदा काली सखीभिः सह नारद।<br>पूजयित्वा यथान्यायं पर्यपृच्छदिदं ततः॥ ४७उसके बाद पलाशका दण्ड, मुञ्जकी मेखला, यज्ञोपवीत, छत्र एवं मृगचर्म, हाथमें कमण्डलु लिये एवं शरीरमें भस्म रमाये हुए वे (शङ्कर) वटुके रूपमें एक-एक आश्रममें घूमते हुए कालीके आश्रममें पहुँचे। नारद! उसके बाद सहचरियोंके साथ कालीने (उनका) प्रत्युत्थान किया और यथोचित पूजन कर उनसे यह पूछा—॥ ४५–४७॥
उमोवाच<br>कस्मादागम्यते भिक्षो कुत्र स्थाने तवाश्रमः।<br>क्व च त्वं प्रतिगन्तासि मम शीघ्रं निवेदय॥ ४८**उमाने कहा (पूछा)—**अये भिक्षुक! आप शीघ्र मुझे बतायें कि आप कहाँसे आ रहे हैं? आपका आश्रम कहाँ है एवं आप कहाँ जायँगे?॥ ४८॥
भिक्षुरुवाच<br>ममाश्रमपदं बाले वाराणस्यां शुचिव्रते।<br>अथातस्तीर्थयात्रायां गमिष्यामि पृथूदकम्॥ ४९**भिक्षुने कहा—**पवित्र व्रतोंवाली बाले! मेरा आश्रम वाराणसीमें है। अब मैं यहाँसे तीर्थयात्रामें पृथूदक जाऊँगा॥ ४९॥
देव्युवाच<br>किं पुण्यं तत्र विप्रेन्द्र लब्धाऽसि त्वं पृथूदके।<br>पथि स्नानेन च फलं केषु किं लब्धवानसि॥ ५०**देवीने कहा—**विप्रेन्द्र! पृथूदकतीर्थमें आपको कौन-सा पुण्य प्राप्त होगा? मार्गमें किन-किन तीर्थोंमें स्नान करनेसे आप कौन-कौन-सा फल प्राप्त कर चुके हैं?॥ ५०॥
अध्याय ५१ ]मेनाकी तीन कन्याओंका जन्म, शिवद्वारा उमाकी परीक्षा एवं मन्दराचलपर गमन२२३
Sanskrit ShlokaHindi Translation
भिक्षुरुवाच<br>मया स्नानं प्रयागे तु कृतं प्रथममेव हि।<br>ततोऽथ तीर्थे कुब्जाम्रे जयन्ते चण्डिकेश्वरे॥ ५१<br>बन्धुवृन्दे च कर्कन्थे तीर्थे कनखले तथा।<br>सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्रायां तु त्रिविष्टपे॥ ५२<br>कोनटे कोटितीर्थे च कुब्जके च कृशोदरि।<br>निष्कामेन कृतं स्नानं ततोऽभ्यागां तवाश्रमम्॥ ५३<br>इहस्थां त्वां समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम्।<br>पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न क्रोधुमर्हसि॥ ५४<br>अहं यत्तपसात्मानं शोषयामि कृशोदरि।<br>बाल्येऽपि संयततनुस्तत्तु श्लाघ्यं द्विजन्मनाम्॥ ५५<br>किमर्थं भवती रौद्रं प्रथमे वयसि स्थिता।<br>तपः समाश्रिता भीरु संशयः प्रतिभाति मे॥ ५६<br>प्रथमे वयसि स्त्रीणां सह भर्त्रा विलासिनि।<br>सुभोगा भोगिताः काले व्रजन्ति स्थिरयौवने॥ ५७<br>तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः।<br>रूपाभिजनमैश्वर्यं तच्च ते विद्यते बहु॥ ५८<br>तत् किमर्थमपास्यैतानलंकाराञ्जटा धृताः।<br>चीनांशुकं परित्यज्य किं त्वं वल्कलधारिणी॥ ५९भिक्षुने कहा— कृशोदरि! मैंने पहले प्रयागमें स्नान किया, उसके बाद कुब्जाम्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर, बन्धुवृन्द, कर्कन्थ, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, भद्रा, त्रिविष्टप, कोनट, कोटितीर्थ और कुब्जकमें निष्कामभावसे स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रममें आया हूँ। यहाँपर स्थित रहनेवाली तुमसे वार्ता करनेके बाद मैं पृथूदकतीर्थमें जाऊँगा। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ, उसपर क्रोध न करना॥ ५१—५४॥<br><br>कृशोदरि! मैं बचपनमें भी शरीरको संयत कर तपस्यासे जो अपनेको सुखा रहा हूँ, वह तो ब्राह्मणोंके लिये प्रशंसनीय है। परंतु भीरु! तुम इस प्रथम अवस्थामें ही क्यों उग्र तप कर रही हो? (इसमें मुझे) शंका हो रही है। अयि स्थिरयौवने! अयि विलासिनि! प्रथम अवस्थामें स्त्रियाँ पतिके साथ सुन्दर भोगोंका भोग करती हैं। पर्वतपुत्रि! चर और अचर सभी प्राणी तपस्यासे संसारमें रूप, उत्तम कुल और सम्पत्ति चाहते हैं, सो तो तुम्हें अधिक-से-अधिक मात्रामें उपलब्ध हैं ही; फिर सौन्दर्य-साधनोंको छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण कर ली है? तुमने रेशमी वस्त्र छोड़कर वल्कल क्यों पहन लिया है?॥ ५५—५९॥
पुलस्त्य उवाच<br>ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः सोमप्रभा सखी।<br>भिक्षवे कथयामास यथावत् सा हि नारद॥ ६०पुलस्त्यजी बोले— नारद! उसके बाद तपस्यामें बढ़ी हुई पार्वतीकी सोमप्रभा नामकी सहचरीने उन भिक्षुसे वस्तुस्थिति कही॥ ६०॥
सोमप्रभोवाच<br>तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना।<br>तं शृणुष्व त्वियं काली हरं भर्तारमिच्छति॥ ६१सोमप्रभाने कहा— द्विजश्रेष्ठ! पार्वती जिस हेतुसे तपस्या कर रही हैं, उसे सुनिये। ये काली (तपस्याके बलसे) शिवको अपना पति बनाना चाहती हैं॥ ६१॥
पुलस्त्य उवाच<br>सोमप्रभाया वचनं श्रुत्वा संकम्प्य वै शिरः।<br>विहस्य च महाहासं भिक्षुराह वचस्त्विदम्॥ ६२पुलस्त्यजी बोले— सोमप्रभाकी बात सुनकर भिक्षुने सिर हिलाते हुए बड़े जोरसे हँसकर यह वचन कहा—॥ ६२॥
भिक्षुरुवाच<br>वदामि ते पार्वति वाक्यमेवं<br>केन प्रदत्ता तव बुद्धिरेशा।<br>कथं करः पल्लवकोमलस्ते<br>समेष्यते शार्वकरं ससर्पम्॥ ६३<br>तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं<br>मृगारिचर्माभिभृतस्तु रुद्रः।<br>त्वं चन्दनाक्ता स च भस्मभूषितो<br>न युक्तरूपं प्रतिभाति मे त्विदम्॥ ६४भिक्षुकने कहा— पार्वती! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ; तुमको यह बुद्धि किसने दी? पल्लवके सदृश तुम्हारा कोमल कर शङ्करके सर्पयुक्त हाथसे कैसे मिलेगा? कहाँ तुम सुन्दर वस्त्र धारण करनेवाली और कहाँ व्याघ्रचर्म धारण करनेवाले ये रुद्र! कहाँ तुम चन्दनसे चर्चित और कहाँ भस्मसे भूषित शङ्कर! अतः मुझे यह मेल अनुरूप नहीं प्रतीत होता॥ ६३-६४॥
२२४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५१

| पुलस्त्य उवाच<br>एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत्।<br>मा मैवं वद भिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः॥ ६५<br><br>शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा।<br>अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः॥ ६६<br><br>यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति।<br>निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः।<br>न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वञ्शशिप्रभे॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— विप्रेन्द्र! भिक्षुकके इस प्रकार कहनेपर पार्वती ने उससे कहा—भिक्षुक! तुम ऐसी बात मत बोलो। शङ्कर सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। वे देवेश चाहे मङ्गलमूर्ति हों या भयङ्कर रूप, धनी हों या निर्धन तथा अलङ्कार-सम्पन्न हों अथवा अलङ्कार-विहीन—वे जैसे-तैसे ही क्यों न हों—पर वे ही मेरे स्वामी होंगे। (सहचरीको निर्देश कर) शशिप्रभे! इसे (भिक्षुकको) मना करो। यह पुनः कुछ कहना चाहता है; क्योंकि इसके ओठ फड़क रहे हैं। देखो, निन्दा करनेवाला व्यक्ति वैसा पापी नहीं होता जैसा कि निन्दाकी बात सुननेवाला होता है॥ ६५—६७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत।<br>ततोऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिवः॥ ६८<br><br>भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः।<br>तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षीन् हिमवद्गृहे॥ ६९<br><br>यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृण्मयश्चेश्वरः कृतः।<br>असौ भद्रेश्वरैत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति॥ ७०<br><br>देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः।<br>पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः॥ ७१ | पुलस्त्यजी (पुनः) बोले— इस प्रकार कहकर वरदायिनी पार्वती ने (ज्यों ही) वहाँ से उठकर जाना चाहा त्यों ही शङ्कर (बनावटी) भिक्षुरूपको छोड़कर अपने वास्तविक रूपमें हो गये। वे अपने वास्तविक रूपमें आनेपर बोले—प्रिये! अपने गृह जाओ। मैं हिमवान् के घर तुम्हारे लिये महर्षियोंको भेजूँगा। रुद्रकी कामना करनेवाली तुमने यहाँ जिन पार्थिव रूपको ईश्वर माना है, वे संसारमें भद्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होंगे। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, उरग एवं मनुष्य जो भी कल्याणकी कामना करनेवाले होंगे, वे सदा उनकी पूजा करेंगे॥ ६८—७१॥ |
| इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने।<br>जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः॥ ७२<br>शङ्करोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम्।<br>पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः॥ ७३<br>ततस्तु देवप्रवरो महेश्वरः<br>पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः।<br>कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो<br>महागिरिं मन्दरमाजगाम्॥ ७४<br>आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभि-<br>रारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टचित्तः क्षणात्।<br>चक्रे दिव्यफलैर्जलैन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः<br>पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु॥ ७५ | मुने! शङ्करके इस प्रकार कहनेपर हिमालय-पुत्री पार्वतीजी आकाशमार्गसे अपने पिताके घर चली गयीं। महातेजस्वी शङ्कर भी पर्वतराजकी कन्याको विदाकर पृथूदक नामके तीर्थमें चले गये और वहाँ जाकर उन्होंने यथाविधि स्नान किया। उसके बाद देवोंमें प्रधान महेश्वर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके पापसे विमुक्त होकर नन्दी, गणों एवं वाहनके सहित महान् मन्दर गिरिपर आ गये। सात ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) तथा अपने गणोंके साथ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्करके आ जानेपर पर्वतश्रेष्ठ मन्दर क्षणभरमें ही प्रसन्नचित्त हो गया। पर्वतराजने दिव्य फलों, मूलों, कन्दों एवं पवित्र जलसे समस्त गणेश्वरोंके साथ भगवान् शङ्करकी पूजा की॥ ७२–७५॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥