वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५०- कुरुक्षेत्रके पृथूदकतीर्थके सन्दर्भमें अक्षय-तृतीयाके महत्त्वकी कथा
| १९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४६ |
| :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्य दक्षिणपार्श्वे तु वापीतस्य महात्मनः।<br>लिङ्गं त्रैलोक्यविख्यातं सर्वपापहरं शिवम्॥ २७<br>कङ्कालरूपिणा चापि रुद्रेण सुमहात्मना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम्॥ २८<br>भुक्तिदं मुक्तिदं प्रोक्तं सर्वकिल्बिषनाशनम्।<br>लिङ्गस्य दर्शनाच्चैव अग्निष्टोमफलं लभेत्॥ २९<br>तस्य पश्चिमदिग्भागे लिङ्गं सिद्धप्रतिष्ठितम्।<br>सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥ ३० | उसके निकट दक्षिण भागमें महात्मा वापीतके द्वारा संस्थापित सभी पापोंका हरण करनेवाला कल्याणकर्ता लिङ्ग है जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। कंकालके रूपमें रहनेवाले महात्मा भगवान् रुद्रने भी समस्त पापोंका नाश करनेवाला महालिङ्ग प्रतिष्ठित किया है। महात्मा रुद्रद्वारा प्रतिष्ठापित वह लिङ्ग भुक्ति एवं मुक्तिका देनेवाला तथा सभी पापोंको नष्ट करनेवाला है। उस लिङ्गका दर्शन करनेसे ही अग्निष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति हो जाती है। उसकी पश्चिम दिशामें सिद्धोंद्वारा प्रतिष्ठित सिद्धेश्वर नामसे विख्यात लिङ्ग है। वह सर्वसिद्धिप्रदाता है॥ २७-३०॥ |
| तस्य दक्षिणदिग्भागे मृकण्डेन महात्मना।<br>तत्र प्रतिष्ठितं लिङ्गं दर्शनात् सिद्धिदायकम्॥ ३१<br>तस्य पूर्वे च दिग्भागे आदित्येन महात्मना।<br>प्रतिष्ठितं लिङ्गवरं सर्वकिल्बिषनाशनम्॥ ३२<br>चित्राङ्गदस्तु गन्धर्वो रम्भा चाप्सरसां वरा।<br>परस्परं सानुरागौ स्थाणुदर्शनकाङ्क्षिणौ॥ ३३<br>दृष्ट्वा स्थाणुं पूजयित्वा सानुरागौ परस्परम्।<br>आराध्य वरदं देवं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम्॥ ३४ | उसकी दक्षिण दिशामें महात्मा मृकण्डने (शिव) लिङ्गकी स्थापना की है। उस लिङ्गके दर्शन करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। उसके पूर्व भागमें महात्मा आदित्यने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ लिङ्गको प्रतिष्ठापित किया है। अप्सराओंमें श्रेष्ठ रम्भा और चित्राङ्गद नामके गन्धर्व—इन दोनोंने परस्परमें प्रेमपूर्वक स्थाणु भगवान्के दर्शन किये; फिर उनका पूजन किया और तब वरदानी देवकी स्थापनाकर आराधना की। (उनसे स्थापित लिङ्गोंका नाम हुआ चित्राङ्गद और रम्भेश्वर)॥ ३१-३४॥ |
| चित्राङ्गदेश्वरं दृष्ट्वा तथा रम्भेश्वरं द्विज।<br>सुभगो दर्शनीयश्च कुले जन्म समाप्नुयात्॥ ३५<br>तस्य दक्षिणतो लिङ्गं वज्रिणा स्थापितं पुरा।<br>तस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ३६<br>पराशरेण मुनिना तथैवाराध्य शंकरम्।<br>प्राप्तं कवित्वं परमं दर्शनाच्छंकरस्य च॥ ३७<br>वेदव्यासेन मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं ब्रह्मज्ञानं प्राप्तं देवप्रसादतः॥ ३८ | द्विज! चित्राङ्गदेश्वर एवं रम्भेश्वरका दर्शन करके मनुष्य सुन्दर और दर्शनीय (रूपवाला) हो जाता है एवं सत्कुलमें जन्म ग्रहण करता है। उसके दक्षिण भागमें इन्द्रने प्राचीन कालमें लिङ्गकी स्थापना की थी। इन्द्रद्वारा प्रतिष्ठापित लिङ्गके प्रसादसे मनुष्य मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार पराशर मुनिने शंकरकी आराधना की और भगवान् शंकरके दर्शनसे उत्कृष्ट कवित्वको प्राप्त किया। वेदव्यास मुनिने परमेश्वर (शंकर)-की आराधना की और उनकी कृपासे सर्वज्ञता तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया॥ ३५-३८॥ |
| स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे वायुना जगदायुना।<br>प्रतिष्ठितं महालिङ्गं दर्शनात् पापनाशनम्॥ ३९<br>तस्यापि दक्षिणे भागे लिङ्गं हिमवतेश्वरम्।<br>प्रतिष्ठितं पुण्यकृतां दर्शनात् सिद्धिकारकम्॥ ४० | स्थाणुके पश्चिम भागमें जगत्के प्राण-स्वरूप (जगत्प्राण) वायुने महालिङ्गको प्रतिष्ठित किया है, जो दर्शनमात्रसे ही पापका विनाश कर देता है। उसके भी दक्षिण भागमें हिमवतेश्वर लिङ्ग प्रतिष्ठित है। पुण्यात्माओंने उसे प्रतिष्ठित किया है। उसका दर्शन सिद्धि देनेवाला है। |
| अध्याय ४६ ] | स्थाणुलिङ्गके समीप असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना और उनके दर्शन-अर्चनका माहात्म्य | १९९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यापि पश्चिमे भागे कार्तवीर्येण स्थापितम्।<br>लिङ्गं पापहरं सद्यो दर्शनात् पुण्यमाप्नुयात्॥ ४१<br><br>तस्याप्युत्तरदिग्भागे सुपार्श्वे स्थापितं पुनः।<br>आराध्य हनुमांश्चाप सिद्धिं देवप्रसादतः॥ ४२ | उसके पश्चिम भागमें कार्तवीर्यने (एक) लिङ्गकी स्थापना की है। (यह लिङ्ग) पापका तत्काल हरण करनेवाला है। (इसके) दर्शन करनेसे पुण्यकी प्राप्ति होती है। उसके भी उत्तरकी ओर बिलकुल निकट स्थानमें (एक) लिङ्गकी स्थापना हुई है; हनुमान्ने उस लिङ्गकी आराधना कर शंकरकी कृपासे सिद्धि प्राप्त की॥ ३९-४२॥ |
| तस्यैव पूर्वदिग्भागे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>आराध्य वरदं देवं चक्रं लब्धं सुदर्शनम्॥ ४३<br><br>तस्यापि पूर्वदिग्भागे मित्रेण वरुणेन च।<br>प्रतिष्ठितौ लिङ्गवरौ सर्वकामप्रदायकौ॥ ४४<br><br>एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तथा।<br>सेवितानि प्रयत्नेन सर्वपापहराणि वै॥ ४५<br><br>स्वर्णलिङ्गस्य पश्चात्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४६<br><br>तथा ह्युत्तरतस्तस्य यावदोधवती नदी।<br>सहस्रमेकं लिङ्गानां देवपश्चिम्रतः स्थितम्॥ ४७ | उसके भी पूर्वी भागमें प्रभावशाली विष्णुने वरदाता महादेवकी आराधना कर सुदर्शनचक्र प्राप्त किया था। उसके भी पूर्वी भागमें मित्र एवं वरुणने सभी अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाले दो लिङ्गोंकी स्थापना की है। ये दोनों लिङ्ग सभी प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले हैं। मुनियों, साध्यों, आदित्यों एवं वसुओंद्धारा इन लिङ्गोंकी उत्साहपूर्वक सेवा की गयी है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने स्वर्णलिङ्गके पीछेकी ओर जिन लिङ्गोंको प्रतिष्ठित किया है, उनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती। उसी प्रकार स्वर्णलिङ्गके उत्तर ओघवती नदीतक पश्चिमकी ओर महादेवके एक हजार लिङ्ग स्थित हैं॥ ४३-४७॥ |
| तस्यापि पूर्वदिग्भागे बालखिल्यैर्महात्मभिः।<br>प्रतिष्ठिता रुद्रकोट्यार्वित्संनिहितं सरः॥ ४८<br><br>दक्षिणेन तु देवस्य गन्धर्वैर्यक्षकिन्नरैः।<br>प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येषां संख्या न विद्यते॥ ४९<br><br>तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च लिङ्गानां वायुरब्रवीत्।<br>असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्राः स्थाणुमाश्रिताः॥ ५०<br><br>एतज्ज्ञात्वा श्रद्दधानः स्थाणुलिङ्गं समाश्रयेत्।<br>यस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम्॥ ५१ | उस (नदी)-के पूर्वी भागमें महात्मा बालखिल्योंने संनिहित सरोवरतक करोड़ों रुद्रोंकी स्थापना की है। गन्धर्वों, यक्षों एवं किन्नरोंने दक्षिण दिशाकी ओर भगवान् शंकरके असंख्य लिङ्गोंकी स्थापना की है। वायुका कहना है कि साढ़े तीन करोड़ लिङ्गोंकी स्थापना हुई है। स्थाणुतीर्थमें अनन्त सहस्र रुद्र-लिङ्ग विद्यमान हैं। मनुष्यको चाहिये कि श्रद्धाके साथ स्थाणु-लिङ्गका आश्रय ले। इससे स्थाणु-लिङ्गकी दयासे मनोवाञ्छित फल मिलता है॥ ४८-५१॥ |
| अकामो वा सकामो वा प्रविष्टः स्थाणुमन्दिरम्।<br>विमुक्तः पातकैर्घोरैः प्राप्नोति परमं पदम्॥ ५२<br><br>चैत्रमासे त्रयोदश्यां दिव्यनक्षत्रयोगतः।<br>शुक्रार्कचन्द्रसंयोगे दिने पुण्यतमे शुभे॥ ५३ | जो मनुष्य निष्काम या सकामभावसे स्थाणु-मन्दिरमें प्रवेश करता है, वह घोर पापोंसे छुटकारा पाकर परम पदको प्राप्त करता है। जब चैत्र महीनेकी त्रयोदशी तिथिमें दिव्य नक्षत्रोंका योग हुआ और उसमें शुक्र, सूर्य, चन्द्रका (शुभ) संयोग हुआ तब |
अध्याय ४७ ]
स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक
२०१
तत्र कृत्वा तपो घोरं धर्मेणावृत्य रोदसी।
प्राप्तवान् ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ८
वेनो राजा समभवत् समस्ते क्षितिमण्डले।
स मातामहदोषेण तेन कालात्मजात्मजः॥ ९
घोषयामास नगरे दुरात्मा वेदनिन्दकः।
न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं कदाचन ॥ १०
अहमेकोऽत्र वै वन्द्यः पूज्योऽहं भवतां सदा।
मया हि पालिता यूयं निवसंध्वं यथासुखम् ॥ ११
तन्मत्तोऽन्यो न देवोऽस्ति युष्माकं यः परायणम्।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनमृषयः सर्व एव ते॥ १२
परस्परं समागम्य राजानं वाक्यमब्रुवन् ।
श्रुतिः प्रमाणं धर्मस्य ततो यज्ञः प्रतिष्ठितः ॥ १३
यज्ञैर्विना नो प्रीयन्ते देवाः स्वर्गनिवासिनः।
अप्रीता न प्रयच्छन्ति वृष्टिं सस्यस्य वृद्धये ॥ १४
तस्माद् यज्ञैश्च देवैश्च धार्यते सचराचरम्।
एतच्छ्रुत्वा क्रोधदृष्टिर्वेनः प्राह पुनः पुनः ॥ १५
न यष्टव्यं न दातव्यमित्याह क्रोधमूर्च्छितः।
ततः क्रोधसमाविष्टा ऋषयः सर्व एव ते ॥ १६
निजघ्नुर्मन्त्रपूतैस्ते कुशैर्वज्रसमन्वितैः।
ततस्त्वराजके लोके तमसा संवृते तदा ॥ १७
दस्युभिः पीड्यमानास्तान् ऋषींस्ते शरणं ययुः ।
ततस्ते ऋषयः सर्वे ममन्थुस्तस्य वै करम् ॥ १८
सव्यं तस्मात् समुत्तस्थौ पुरुषो ह्रस्वदर्शनः।
तमूचुर्ऋषयः सर्वे निषीदतु भवानिति ॥ १९
उसने वहाँ घोर तपस्या की तथा पृथ्वी एवं
आकाशके बीचके स्थानको धर्मसे व्याप्तकर नहीं
लौटनेवाले स्थान उस ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया।
(और इधर) वेन सम्पूर्ण भूमण्डलका राजा हो गया।
अपने नानाके उस दोषके कारण कालकन्या भयाके
उस दुष्टात्मा वेद-निन्दक पुत्रने नगरमें यह घोषणा
करा दी कि कभी भी (कोई) दान न दे, यज्ञ न
करे एवं हवन न करे - (दान, यज्ञ, हवन करना
अपराध माना जायेगा) ॥ ७-१०॥
इस संसारमें एकमात्र मैं ही आपलोगोंका वन्दनीय
और पूजनीय हूँ। आपलोग मुझसे रक्षित रहकर आनन्दपूर्वक
निवास करें। मुझसे भिन्न कोई दूसरा देवता नहीं है,
जो आपलोगोंका उत्तम आश्रय हो सके। वेनके इस
वचनको सुननेके पश्चात् सभी ऋषियोंने आपसमें मिलकर
(निश्चय किया और) राजासे यह वचन कहा - राजन् !
धर्मके विषयमें वेद (-शास्त्र) ही प्रमाण हैं। उन्हींसे
यज्ञ विहित हैं, प्रतिष्ठित हैं- विष्णुरूपमें मान्य हैं।
(उन) यज्ञोंके किये बिना स्वर्गमें रहनेवाले देवता सन्तुष्ट
नहीं होते और बिना सन्तुष्ट हुए वे अन्नकी वृद्धिके
लिये जलकी वृष्टि नहीं करते। अतः विष्णुमय यज्ञों
और देवताओंसे ही चर-अचर समस्त संसारका धारण
और पोषण होता है। यह सुनकर वेन क्रोधसे आँखें
लालकर बार-बार कहने लगा - ॥ ११-१५॥
क्रोधसे झल्लाकर (तिलमिलाकर) उसने 'न यज्ञ
करना होगा और न दान देना होगा' - ऐसा कहा। उसके
बाद ऋषियोंने भी क्रुद्ध होकर मन्त्रद्वारा वज्रमय कुशोंसे
उसे मार डाला। उसके (मर जानेके) बाद (राजासे रहित)
संसारमें अराजकता छा गयी, जिससे सर्वत्र अशान्ति
फैल गयी। चोरों-डाकुओंने लोकजनोंको पीड़ित कर
डाला। दस्युदलोंसे त्रस्त जनवर्ग उन ऋषियोंकी शरणमें
गया, जिस ऋषिवर्गने उस वेनको मार डाला था। उसके
बाद उन सभी ऋषियोंने उसके बायें हाथको मथित
किया। उससे एक पुरुष निकला जो छोटा बौना दीख
रहा था। सभी ऋषियोंने उससे कहा- 'निषीदतु भवान्'
अर्थात् आप बैठें ॥ १६-१९॥
| २०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
|---|
| प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यद् वदिष्यन्ति देवताः।<br>ततस्ता देवताः सर्वा इदं वचनमब्रुवन्॥ ४५<br><br>स्नात्वा स्नात्वा च तीर्थेषु अभिषिञ्चस्व वारिणा।<br>ओजसा चुलुकं यावत् प्रतिकूले सरस्वतीम्॥ ४६<br><br>स्नात्वा मुक्तिमवाप्नोति पुरुषः श्रद्धयान्वितः।<br>एष स्वपोषणपरो देवदूषणतत्परः॥ ४७<br><br>ब्राह्मणैश्च परित्यक्तो नैष शुद्ध्यति कर्हिचित्।<br>तस्मादेनं समुद्दिश्य स्नात्वा तीर्थेषु भक्तितः॥ ४८<br><br>अभिषिञ्चस्व तोयेन ततः पूतो भविष्यति।<br>इत्येतद्वचनं श्रुत्वा कृत्वा तस्याश्रमं ततः॥ ४९<br><br>तीर्थयात्रां ययौ राजा उद्दिश्य जनकं स्वकम्।<br>स तेषु प्लावनं कुर्वंस्तीर्थेषु च दिने दिने॥ ५०<br><br>अभ्यषिञ्चत् स्वपितरं तीर्थतोयेन नित्यशः।<br>एतस्मिन्नेव काले तु सारमेयो जगाम ह॥ ५१<br><br>स्थाणोर्मठे कौलपतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता।<br>परिग्रहस्य द्रव्यस्य परिपालयिता सदा॥ ५२<br><br>प्रियश्च सर्वलोकेषु देवकार्यपरायणः।<br>तस्यैवं वर्त्तमानस्य धर्ममार्गे स्थितस्य च॥ ५३<br><br>कालेन चलिता बुद्धिर्देवद्रव्यस्य नाशने।<br>तेनाधर्मेण युक्तस्य परलोकगतस्य च॥ ५४<br><br>दृष्ट्वा यमोऽब्रवीद् वाक्यं श्वयोनिं व्रज मा चिरम्।<br>तद्वाक्यानन्तरं जातः श्वा वै सौगन्धिके वने॥ ५५<br><br>ततः कालेन महता श्वयूथपरिवारितः।<br>परिभूतः सरमया दुःखेन महता वृतः॥ ५६<br><br>त्यक्त्वा द्वैतवनं पुण्यं सन्निहत्यं ययौ सरः।<br>तस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु स्थाणोरेव प्रसादतः॥ ५७<br><br>अतीव तृषया युक्तः सरस्वत्यां ममज्ज ह।<br>तत्र संप्लुतदेहस्तु विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः॥ ५८ | (परन्तु) देवगण! आपलोग इसके लिये जो प्रायश्चित्त कहेंगे, उसे मैं करूँगा। उसके ऐसा कहनेपर उन सभी देवताओंने यह बात कही—तीर्थमें बार-बार (स्नान करके) तीर्थ-जलद्वारा इसे बार-बार सींचो। सरस्वतीके तटपर 'ओजसतीर्थ'से 'चुलुक'पर्यन्त हर-एक तीर्थमें स्नान करनेवाला श्रद्धालु पुरुष मुक्तिको प्राप्त करता है। यह अपना ही पालन-पोषण करनेमें लगा रहता था एवं देवताओंकी निन्दा करनेमें तत्पर रहता था। ब्राह्मणोंने इसको पाप करनेके कारण त्याग दिया था। यह कभी भी शुद्ध नहीं हो सकता। इसलिये (इसकी यदि शुद्धि चाहते हो तो) इसके उद्देश्यसे तीर्थोंमें जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करके तीर्थ-जलसे इसे अभिषिक्त करो। इससे यह पवित्र हो जायगा। उसके बाद राजा देवताओंके इन वचनोंके सुननेके बाद वहाँ अपने पिताके लिये एक आश्रमका निर्माण कराकर उसके उद्देश्यसे तीर्थयात्रा करने चला गया। वह प्रतिदिन उन तीर्थोंमें स्नान करते हुए तीर्थजलसे अपने पिताको अभिषिक्त करने लगा। इसी समय वहाँ एक कुत्ता आ गया। (कुत्तेका इतिहास इस प्रकार है—) पूर्वकालमें वह कुत्ता स्थाणुतीर्थमें स्थित मठमें देव-द्रव्योंकी रक्षा करनेवाला—दानमें प्राप्त द्रव्यका सदा पालन करनेवाला—सर्वजनप्रिय एवं देवकृत्यमें रत कौलपति नामका महन्त था। इस प्रकार वह अपना जीवनयापन कर रहा था। एक बार धर्ममार्गमें स्थित रहते हुए भी उस कौलपतिकी बुद्धि कुछ समयके बाद धर्ममार्गसे हट गयी। वह देवद्रव्यका नाश (दुरुपयोग) करने लगा। वह अधर्मी (बना) कौलपति जब मरकर परलोकमें गया, तब यमराजने उसे (उसके कर्मविपाकको) देखकर कहा—तुम कुत्तेकी योनिमें जाओ, देर मत करो। उनके कहनेके पश्चात् वह महन्त सौगन्धिक वनमें कुत्तेकी योनिमें उत्पन्न हुआ॥ ४५—५५॥<br><br>उसके बाद बहुत समय व्यतीत होनेतक वह कुत्ता कुत्तोंके झुंडसे घिरा रहता था; फिर भी कुतियासे अपमानित होनेके कारण अत्यन्त दुःखित रहता था। इसलिये वह द्वैतवनको छोड़कर पवित्र सन्निहत्य-सरोवरमें चला गया। उसमें प्रवेश करते ही स्थाणु भगवान्की ही कृपासे अत्यन्त प्यासा होकर उसने सरस्वती नदीमें डुबकी लगायी। उसमें स्नान करनेसे ही वह समस्त पापोंसे विमुक्त हो गया। |
अध्याय ४७ ] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक २०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आहारलोभेन तदा प्रविवेश कुटीरकम्।<br>प्रविशन्तं तदा दृष्ट्वा श्वानं भयसमन्वितः॥ ५९<br>स तं पस्पर्श शनकैः स्थाणुतीर्थे ममज्ज ह।<br>पततः पूर्वतीर्थेषु विप्रुषैः परिषिञ्चतः॥ ६०<br>शुनोऽस्य गात्रसम्भूतैरब्बिन्दुभिः स सिञ्चितः।<br>विरक्तदृष्टिश्च शुनः क्षेपेण च ततः परम्॥ ६१<br>स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यात् स पुत्रेण च तारितः।<br>नियतस्तत्क्षणाज्जातो दिव्यदेहसमन्वितः।<br>प्रणिपत्य तदा स्थाणुं स्तुतिं कर्तुं प्रचक्रमे॥ ६२ | उसके बाद आहारके लोभसे उसने कुटीमें प्रवेश किया। उस कुत्तेको प्रवेश करते देखकर भयभीत होकर उस (वेन)-ने उसका धीरेसे स्पर्श किया। स्पर्श करनेके बाद स्थाणुतीर्थमें उसने स्नान किया। पूर्वतीर्थोंमें स्नान करनेके बाद तीर्थके जलबिन्दुओंसे सिञ्चित करनेवाले पुत्रसे एवं उस कुत्तेके शरीरसे निकले जलबिन्दुओंसे सिञ्चित होने तथा कुत्तेके भयसे स्थाणुतीर्थमें गिर जानेके कारण स्नान हो जानेके माहात्म्यसे उसकी दृष्टि विरक्त हो गयी। पुत्रने स्थाणुतीर्थके माहात्म्यसे अपने पिताका उद्धार कर दिया और संयतेन्द्रिय होकर उसने तत्काल दिव्य देह धारण कर भगवान् स्थाणुको प्रणाम किया और स्तुति करना प्रारम्भ किया॥ ५६—६२॥ |
| वेन उवाच<br>प्रपद्ये देवमीशानं त्वामजं चन्द्रभूषणम्।<br>महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम्॥ ६३<br>नमस्ते देवदेवेश सर्वशत्रुनिषूदन।<br>देवेश बलिविष्टम्भ देवदैत्यैश्च पूजित॥ ६४<br>विरूपाक्ष सहस्राक्ष त्र्यक्ष यक्षेश्वरप्रिय।<br>सर्वतः पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख॥ ६५<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि।<br>शङ्कुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय॥ ६६ | वेन स्तुति करने लगा— मैं अजन्मा चन्द्रमाके शिरोभूषणवाले, ईशानदेव, महात्मा, सारे संसारका पालन करनेवाले आप महादेवकी शरण ग्रहण करता हूँ। देवदेवेश! समस्त शत्रुओंके निषूदन! देवेश! बलिको निरुद्ध करनेवाले! देवों एवं दैत्योंसे पूजित! आपको नमस्कार है। हे (विरूप आँखवाले) विरूपाक्ष! हे (हजारों आँखोंवाले) सहस्राक्ष! हे तीन नेत्रोंवाले! हे यक्षेश्वरप्रिय! हे चारों ओरसे (हाथ-पैरवाले) पाणिपादयुक्त! हे चारों ओर आँख एवं मुखवाले! आपको नमस्कार है। आप सर्वत्र सुन सकनेवाले और सभी स्थानोंपर व्याप्त हैं। संसारमें आपने सभीको आवृत कर (ढक) रखा है। हे शङ्कुकर्ण! हे महाकर्ण! हे कुम्भकर्ण! हे समुद्र-निवासी! आपको नमस्कार है॥ ६३—६६॥ |
| गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते।<br>शतजिह्व शतावर्त शतोदर शतानन॥ ६७<br>गायन्ति त्वां गायत्रिणो ह्यर्चयन्त्यर्क्रमर्चिणः।<br>ब्रह्माणं त्वा शतक्रतो उद्वंशमिव मेनिरे॥ ६८<br>मूर्त्तौ हि ते महामूर्ते समुद्राम्बुधरास्तथा।<br>देवताः सर्व एवात्र गोष्ठे गाव इवासते॥ ६९<br>शरीरे तव पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम्।<br>नारायणं तथा सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्॥ ७० | हे गजेन्द्रकर्ण! हे गोकर्ण! हे पाणिकर्ण! हे शतजिह्व! हे शतावर्त! हे शतोदर! हे शतानन! आपको नमस्कार है। गायत्रीका जप करनेवाले विद्वान् आपकी ही महिमा गाते हैं। सूर्यकी पूजा करनेवाले सूर्यरूपसे आपकी ही पूजा करते हैं। आपको ही सभी लोग इन्द्रसे श्रेष्ठ वंशवाला ब्रह्मा मानते हैं। महामूर्ते! आपकी मूर्तिमें समुद्र, मेघ और समस्त देवता ऐसे स्थित हैं जैसे गोशालामें गौएँ रहती हैं। मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, नारायण, सूर्य, ब्रह्मा और बृहस्पतिको देख रहा हूँ॥ ६७—७०॥ |
| भगवान् कारणं कार्यं क्रियाकरणमेव तत्।<br>प्रभवः प्रलयश्चैव सदसच्चापि दैवतम्॥ ७१<br>नमो भवाय शर्वाय वरदायोगरूपिणे।<br>अन्धकासुरहन्त्रे च पशूनां पतये नमः॥ ७२ | आप भगवान्, कारण, कार्य, क्रियाके करण, प्रभव, प्रलय, सत्, असत् एवं दैवत हैं। भव, शर्व, वरद, उग्र-रूप धारण करनेवाले, अन्धकासुरको मारनेवाले और पशुओंके पति पशुपतिको नमस्कार है। |
| २०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
| :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलासक्तपाणये ।<br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्न नमोऽस्तु ते ॥ ७३<br>नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।<br>डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ | हे त्रिपुरनाशक! तीन जटावाले, तीन सिरवाले, हाथमें त्रिशूल लिये रहनेवाले त्र्यम्बक एवं त्रिनेत्र (कहलानेवाले) आपको नमस्कार है। हे मुण्ड, चण्ड और अण्डकी उत्पत्तिके हेतु, डिण्डिमपाणि एवं डिण्डिमुण्ड! आपको नमस्कार है॥ ७३-७४॥ |
| नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्काय विकृताय च ।<br>धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ॥ ७५<br>नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।<br>सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपध्वजमालिने ॥ ७६<br>नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।<br>नमो गणेन्द्रनाथाय वृषकन्धाय धन्विने ॥ ७७<br>संक्रन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।<br>नमो हिरण्यवर्णाय नमः कनकवर्चसे ॥ ७८ | हे ऊर्ध्वकेश, ऊर्ध्वदंष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एवं नीलग्रीव! आपको नमस्कार है। अप्रतिरूप, विरूप, शिव, सूर्यमाल, सूर्य एवं स्वरूपध्वजमालीको नमस्कार है। मानातिमानको नमस्कार है। आप पटुतरको नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृषकन्ध एवं धन्वीको नमस्कार है। संक्रन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्णको नमस्कार है। कनकवर्चसको नमस्कार है॥ ७५-७८॥ |
| नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।<br>सर्व्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतशरीरिणे ॥ ७९<br>नमो होत्रे च हन्त्रे च सितोद्रग्रपताकिने ।<br>नमो नम्याय नम्राय नमः कटकटाय च ॥ ८०<br>नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।<br>स्थिताय धावमानाय मुण्डाय कुटिलाय च ॥ ८१<br>नमो नर्त्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।<br>नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादित्रशालिने ॥ ८२ | स्तुत किये गये तथा स्तुतिके योग्य (आप)-को नमस्कार है। स्तुतिमें स्थित, सर्व, सर्वभक्ष एवं सर्वभूतशरीरी आपको नमस्कार है। होता, हन्ता तथा सफेद और ऊँची पताकावालेको नमस्कार है। नमन करनेयोग्य एवं नम्रको नमस्कार है। आप कटकटको नमस्कार है। कृशनाश, शयित, उत्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एवं कुटिलको नमस्कार है। नर्तनशील, लय वाद्यशाली, नाट्यके उपहारके लोभी एवं मुखोंमें बम-बम-जैसे मुँहसे बोले जानेवाले वाद्य-प्रेमीको नमस्कार है॥ ७९-८२॥ |
| नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलातिबलघातिने ।<br>कालनाशाय कालाय संसारक्षयरूपिणे ॥ ८३<br>हिमवद्दुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।<br>उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ८४<br>चितिभस्मप्रियायैव कपालाक्तपाणये ।<br>विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ८५<br>नमो विकृतवक्त्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।<br>पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बिवीणायप्रियाय च ॥ ८६ | ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, बलवान्से भी बलवान्को नष्ट करनेवाले, कालनाश, कालस्वरूप एवं संसारक्षयस्वरूप आपको नमस्कार है। हे हिमालयकी पुत्रीके पति-पार्वतीपति! आप भैरवको नमस्कार है और उग्ररूप आपको नित्य नमस्कार है। दस बाहुओंवाले (शिव)-को नमस्कार है। चिताके भस्मको प्रिय माननेवाले, कपालपाणि, अत्यधिक भयंकर भयरूप (भीष्म) एवं व्रतधर (आप)-को (नमस्कार) है। विकृत मुँहवाले (आप)-को नमस्कार है। पवित्र तेजस्विनी दृष्टिवाले, कच्चे-पक्के फलके गूदेको प्रिय माननेवाले, तुम्बी एवं वीणाको प्रिय माननेवालेको नमस्कार है॥ ८३-८६॥ |
| नमो वृषाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।<br>कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७<br>नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।<br>नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ॥ ८८<br>विभेदभेदभिन्नाय छायायै तपनाय च ।<br>अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ॥ ८९ | वृषाङ्कवृक्षको नमस्कार है। गोवृषाभिरुतको नमस्कार है। कटङ्कट, भीम एवं परसे भी परको नमस्कार है। सर्ववरिष्ठ, वर एवं वरदायीको नमस्कार है। विरक्त एवं रक्तरूप, भावन एवं अक्षमालीको नमस्कार है। विभेद एवं भेदसे भिन्न, छाया, तपन, अघोर तथा घोररूप एवं घोरघोरतर रूपको नमस्कार है। |
अध्याय ४७] स्थाणुतीर्थके सन्दर्भमें राजा वेनका चरित्र, पृथु-जन्म और उनका अभिषेक [२०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च।<br>बहुनेत्रकपालाय एकमूर्ते नमोऽस्तु ते॥ ९०॥ | शिव एवं शान्तको नमस्कार है। शान्ततम, बहुनेत्र एवं कपालधारीको नमस्कार है। हे एकमूर्ति! आपको नमस्कार है॥ ८७—९०॥ |
| नमः क्षुद्राय लुब्धाय यज्ञभागप्रियाय च।<br>पञ्चालाय सिताङ्गाय नमो यमनियामिने॥ ९१॥<br>नमश्चित्रोरुघण्टाय घण्टाघण्टनिघण्टिने।<br>सहस्रशतघण्टाय घण्टामालाविभूषिणे॥ ९२॥<br>प्राणसंघट्टगर्वाय नमः किलिकिलिप्रिये।<br>हुंहुंकाराय पाराय हुंहुंकारप्रियाय च॥ ९३॥<br>नमः समसमे नित्यं गृहवृक्षनिकेतने।<br>गर्भमांसशृगालाय तारकाय तराय च॥ ९४॥ | क्षुद्र, लुब्ध, यज्ञभागप्रिय, पञ्चाल एवं सिताङ्गको नमस्कार है। यमके नियमनकर्ताको नमस्कार है। चित्रोरुघण्ट, घण्टाघण्टनिघण्टीको नमस्कार है। सहस्रशतघण्ट एवं घण्टामालाविभूषितको नमस्कार है। प्राणसंघट्टगर्व, किलिकिलिप्रिय, हुंहुंकार, पार एवं हुंहुंकारप्रियको नमस्कार है। समसम, गृहवृक्षनिकेती, गर्भमांसशृगाल, तारक एवं तरको नित्य नमस्कार है॥ ९१—९४॥ |
| नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च।<br>यज्ञवाहाय हव्याय तप्याय तपनाय च॥ ९५॥<br>नमस्तु पयसे तुभ्यं तुण्डानां पतये नमः।<br>अन्नदायान्नपतये नमो नानान्नभोजिने॥ ९६॥<br>नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च।<br>सहस्रोद्यतशूलाय सहस्राभरणाय च॥ ९७॥<br>बालानुचरगोप्त्रे च बाललीलाविलासिने।<br>नमो बालाय वृद्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च॥ ९८॥ | यज्ञ, यजी, हुत, प्रहुत, यज्ञवाह, हव्य, तप्य और तपनको नमस्कार है। पयरूप आपको नमस्कार है। तुण्डोंके पतिको नमस्कार है। अन्नद, अन्नपति एवं अनेक प्रकारके अन्नभोजीको नमस्कार है। हजारों सिरवाले, हजारों चरणवाले, हजारों शूलको उठाये हुए और हजारों आभूषणवालेको नमस्कार है। बालानुचरकी रक्षा करनेवाले, बाललीलामें विलास करनेवाले, बाल, वृद्ध, क्षुब्ध एवं क्षोभणको नमस्कार है॥ ९५—९८॥ |
| गङ्गालुलितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः।<br>नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च॥ ९९॥<br>नग्नप्राणाय चण्डाय कृशाय स्फोटनाय च।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कथ्याय कथनाय च॥ १००॥<br>साङ्ख्याय साङ्ख्यमुख्याय साङ्ख्ययोगमुखाय च।<br>नमो विरथरथ्याय चतुष्पथरथाय च॥ १०१॥<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने।<br>वक्त्रसंधानकेशाय हरिकेश नमोऽस्तु ते।<br>त्र्यम्बिकाम्बिकनाथाय व्यक्ताव्यक्ताय वेधसे॥ १०२॥ | गङ्गालुलितकेश और मुञ्जकेशको नमस्कार है। छः कर्मोंसे संतुष्ट तथा तीन कर्मोंमें लगे रहनेवाले (आप)-को नमस्कार है। नग्नप्राण, चण्ड, कृश, स्फोटन तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके कथ्य और कथनको नमस्कार है। सांख्य, सांख्यमुख्य, सांख्ययोगमुख, विरथरथ्य तथा चतुष्पथरथको नमस्कार है। काले मृगचर्मके उत्तरीयवाले, साँपके जनेऊवाले, वक्त्रसंधानकेश, त्र्यम्बिकाम्बिकनाथ, दृश्य एवं अदृश्य और वेधास्वरूप हे हरिकेश! आपको नमस्कार है॥ ९९—१०२॥ |
| कामकामदकामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे।<br>नमः सर्वद पापघ्न कल्पसंख्याविचारिणे॥ १०३॥<br>महासत्त्व महाबाहो महाबल नमोऽस्तु ते।<br>महामेघ महाप्रख्य महाकाल महाद्युते॥ १०४॥<br>मेघावर्त्त युगावर्त्त चन्द्रार्कपतये नमः।<br>त्वमन्नमन्नभोक्ता च पक्वभुक् पावनोत्तम॥ १०५॥<br>जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजोद्भिदजाश्च ये।<br>त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः॥ १०६॥ | हे काम! हे कामद! हे कामको नष्ट करनेवाले! आप तृप्त और अतृप्तविचारीको नमस्कार है। हे सर्वद! हे पाप दूर करनेवाले! आप कल्पसंख्याविचारीको नमस्कार है। हे महासत्त्व! हे महाबाहु! हे महाबल! हे महामेघ! हे महाप्रख्य! हे महाकाल एवं हे महाद्युति! आपको नमस्कार है। हे मेघावर्त्त! हे युगावर्त्त! आप चन्द्रार्कपतिको नमस्कार है। आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, पक्वभुक् एवं पवित्रोंमें श्रेष्ठ हैं। हे देवदेवेश! आप ही जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—चतुर्विध भूतसमुदाय हैं॥ १०३—१०६॥ |
| २०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ४७ |
| :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्रष्टा चराचरस्यास्य पाता हर्ता तथैव च।<br>त्वामाहुर्ब्रह्म विद्वांसो ब्रह्म ब्रह्मविदां गतिम्॥ १०७<br><br>मनसः परमज्योतिस्त्वं वायुर्ज्योतिषामपि।<br>हंसवृक्षे मधुकरमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः॥ १०८<br><br>यजुर्मयो ऋङ्मयस्त्वामाहुः साममयस्तथा।<br>पठ्यसे स्तुतिभिर्नित्यं वेदोपनिषदां गणैः॥ १०९<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये।<br>त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युतोऽशनिगर्जितम्॥ ११० | आप इस चराचरकी सृष्टि करनेवाले, पालन करनेवाले एवं संहार करनेवाले हैं। विद्वज्जन आपको ब्रह्म एवं ज्ञानियोंकी (कैवल्य) गति कहते हैं। आप मनकी परमज्योति हैं और ज्योतियोंके (धारण करनेवाले) वायु हैं। ब्रह्मवादीजन आपको हंसवृक्षपर रहनेवाला भ्रमर कहते हैं। वे आपको यजुर्मय, ऋङ्मय एवं साममय कहते हैं। वेद और उपनिषदोंके समूह स्तुतियोंद्वारा आपका ही नित्य पाठ करते हैं। आप ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अवर वर्ण, मेघसमूह, विद्युत् तथा मेघगर्जन भी हैं॥ १०७—११०॥ |
| संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च।<br>युगा निमेषाः काष्ठाश्च नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः॥ १११<br><br>वृक्षाणां ककुभोऽसि त्वं गिरीणां हिमवान्गिरिः।<br>व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योनन्तश्च भोगिनाम्॥ ११२<br><br>क्षीरोदोऽस्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च॥ ११३<br><br>त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे।<br>व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ॥ ११४ | आप युग, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, निमेष, काष्ठा तथा कला हैं। आप वृक्षोंमें अर्जुन वृक्ष, पर्वतोंमें हिमालय, पशुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ और साँपोंमें शेषनाग हैं। आप समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रोंमें धनुष, आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य हैं। आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं॥ १११—११४॥ |
| त्वं शरी त्वं गदी चापि खट्वाङ्गी च शरासनी।<br>छेत्ता भेत्ता प्रहर्ताऽसि मन्ता नेता सनातनः॥ ११५<br><br>दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>समुद्राः सरितो गङ्गा पर्वताश्च सरांसि च॥ ११६<br><br>लतावल्ल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः।<br>द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः॥ ११७<br><br>आदिश्चान्तश्च वेदानां गायत्री प्रणवस्तथा।<br>लोहितो हरितो नीलः कृष्णः पीतः सितस्तथा॥ ११८<br><br>कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा।<br>सवर्णश्चाप्यवर्णश्च कर्त्ता हर्त्ता त्वमेव हि॥ ११९ | आप बाण धारण करनेवाले, गदा धारण करनेवाले, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले एवं धनुर्धारी हैं। आप विदारण करनेवाले, प्रहार करनेवाले, अवबोधन (सतर्क) करनेवाले, प्राप्त करानेवाले और सनातन हैं। आप दस लक्षणोंसे संयुक्त धर्म, अर्थ एवं काम तथा समस्त समुद्र, नदियाँ, गङ्गा, पर्वत एवं सरोवर हैं। समस्त लताएँ, वल्लियाँ, तृण, ओषधियाँ; पशु, मृग, पक्षी; पृथ्वी, अप् आदि नवों द्रव्यों; उत्क्षेपण-आक्षेपण आदि पाँच कर्मों; रूप, रस, गन्ध आदि चौबीस गुणोंके आरम्भक भी आप ही हैं। आप ही समयपर फूल एवं फल देनेवाले हैं। आप वेदोंके आदि और अन्त हैं, गायत्री तथा प्रणव भी आप ही हैं। आप ही लोहित, हरित, नील, कृष्ण, पीत, सित, कद्रु, कपिल, कपोत, मेचक, सवर्ण, अवर्ण, कर्ता एवं हर्ता हैं॥ ११५—११९॥ |
| त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः।<br>उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च॥ १२०<br><br>शिक्षाछौत्रं त्रिसौपर्णं यजुषां शतरुद्रियम्।<br>पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम्॥ १२१<br><br>तिन्दुको गिरिजो वृक्षो मुद्गं चाखिलजीवनम्।<br>प्राणाः सत्त्वं रजश्चैव तमश्च प्रतिपत्पतिः॥ १२२ | आप इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, पवन, उपप्लव, चित्रभानु, स्वर्भानु एवं भानु हैं। आप शिक्षा, होत्र, त्रिसौपर्ण, यजुर्वेदका शतरुद्रिय, पवित्रोंमें पवित्र एवं मङ्गलोंमें मङ्गल हैं। आप तिन्दुक, शिलाजतु, वृक्ष, मुद्ग, सबके जीवन, प्राण, सत्त्व, रज, तम तथा प्रतिपत्पति हैं। |