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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३- शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति; वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना

अध्याय २ ]
शरदागम होनेपर शंकरजीका मन्दरपर्वतपर जाना और दक्षका यज्ञ
१५
ततो विनिर्जितः शंभुर्मानिना पद्मयोनिना।
तस्थावधोमुखो दीनो ग्राहाक्रान्तो यथा शशी ॥ ३०
पराजिते लोकपतौ देवेन परमेष्ठिना।
क्रोधान्धकारितं रुद्रं पञ्चमोऽथ मुखोऽब्रवीत् ॥ ३१
अहं ते प्रतिजानामि तमोमूर्ते त्रिलोचन।
दिग्वासा वृषभारूढो लोकक्षयकरो भवान् ॥ ३२
इत्युक्तः शंकरः क्रुद्धो वदनं घोरचक्षुषा।
निर्दग्धुकामस्त्वनिशं ददर्श भगवानजः ॥ ३३
ततस्त्रिनेत्रस्य समुद्भवन्ति
वक्त्राणि पञ्चाथ सुदर्शनानि ।
श्वेतं च रक्तं कनकावदातं
नीलं तथा पिङ्गजटं च शुभ्रम् ॥ ३४
वक्त्राणि दृष्ट्वार्कसमानि सद्यः
पैतामहं वक्त्रमुवाच वाक्यम्।
समाहतस्याथ जलस्य बुद्बुदा
भवन्ति किं तेषु पराक्रमोऽस्ति ॥ ३५
तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना।
नखाग्रेण शिरश्छिन्नं ब्राह्मं परुषवादिनम् ॥ ३६
तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत्।
पतते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः ॥ ३७
अथ क्रोधावृतेनापि ब्रह्मणाद्भुतकर्मणा।
सृष्टस्तु पुरुषो धीमान् कवची कुण्डली शरी ॥ ३८
धनुष्पाणिर्महाबाहुर्बाणशक्तिधरोऽव्ययः ।
चतुर्भुजो महातूणी आदित्यसमदर्शनः ॥ ३९
स प्राह गच्छ दुर्बुद्धे मा त्वां शूलिन् निपातये।
भवान् पापसमायुक्तः पापिष्ठं को जिघांसति ॥ ४०
इत्युक्तः शंकरस्तेन पुरुषेण महात्मना ।
त्रपायुक्तो जगामाथ रुद्रो बदरिकाश्रमम् ॥ ४१
नरनारायणस्थानं पर्वते हि हिमाश्रये।
सरस्वती यत्र पुण्या स्यन्दते सरितां वरा ॥ ४२
तत्र गत्वा च तं दृष्ट्वा नारायणमुवाच ह।
भिक्षां प्रयच्छ भगवन् महाकापालिकोऽस्मि भोः ॥ ४३
इत्युक्तो धर्मपुत्रस्तु रुद्रं वचनमब्रवीत् ।
सव्यं भुजं ताडयस्व त्रिशूलेन महेश्वर ॥ ४४
ब्रह्माद्वारा पराजित-से होकर राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान
दीन एवं अधोमुख होकर खड़े हो गये ॥ २७-३० ॥
(ब्रह्माके द्वारा) लोकपति (शंकर)-के पराजित
हो जानेपर क्रोधसे अन्धे हुए रुद्रसे (श्रीब्रह्माजीके)
पाँचवें मुखने कहा - तमोमूर्ति त्रिलोचन ! मैं आपको
जानता हूँ। आप दिगम्बर, वृषारोही एवं लोकोंको नष्ट
करनेवाले (प्रलयंकारी) हैं। इसपर अजन्मा भगवान्
शंकर अपने तीसरे घोर नेत्रद्वारा भस्म करनेकी इच्छासे
ब्रह्माके उस मुखको एकटक देखने लगे। तदनन्तर
श्रीशंकरके श्वेत, रक्त, स्वर्णिम, नील एवं पिंगल वर्णके
सुन्दर पाँच मुख समुद्भूत हो गये ॥ ३१-३४ ॥
सूर्यके समान दीप्त (उन) मुखोंको देखकर
पितामहके मुखने कहा - जलमें आघात करनेसे बुद्बुद
तो उत्पन्न होते हैं, पर क्या उनमें कुछ शक्ति भी होती
है? यह सुनकर क्रोधभरे भगवान् शंकरने ब्रह्माके
कठोर भाषण करनेवाले सिरको अपने नखके अग्रभागसे
काट डाला; पर वह कटा हुआ ब्रह्माजीका सिर
शंकरजीके ही वाम हथेलीपर जा गिरा एवं वह कपाल
श्रीशंकरके उस हथेलीसे (इस प्रकार चिपक गया कि
गिरानेपर भी) किसी प्रकार न गिरा। इसपर अद्भुतकर्मी
ब्रह्माजी अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उन्होंने कवच-कुण्डल
एवं शर धारण करनेवाले धनुर्धर विशाल बाहुवाले एक
पुरुषकी रचना की। वह अव्यय, चतुर्भुज बाण, शक्ति
और भारी तरकस धारण किये था तथा सूर्यके समान
तेजस्वी दीख पड़ता था ॥ ३५-३९ ॥
उस नये पुरुषने शिवजीसे कहा - दुर्बुद्धि
शूलधारी शंकर ! तुम शीघ्र (यहाँसे) चले जाओ,
अन्यथा मैं तुम्हें मार डालूँगा। पर तुम पापयुक्त हो;
भला, इतने बड़े पापीको कौन मारना चाहेगा? जब
उस महापुरुषने शंकरसे इस प्रकार कहा, तब शिवजी
लज्जित होकर हिमालय पर्वतपर स्थित बदरिकाश्रमको
चले गये, जहाँ नर-नारायणका स्थान है और जहाँ
नदियोंमें श्रेष्ठ पवित्र सरस्वती नदी बहती है। वहाँ
जाकर और उन नारायणको देखकर शंकरने कहा-
भगवन् ! मैं महाकापालिक हूँ। आप मुझे भिक्षा दें।
ऐसा कहनेपर धर्मपुत्र (नारायण)-ने रुद्रसे कहा-
महेश्वर ! तुम अपने त्रिशूलके द्वारा मेरी बायीं भुजापर
ताड़ना करो ॥ ४०-४४ ॥

| १६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय २ |
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| नारायणवचः श्रुत्वा त्रिशूलेन त्रिलोचनः।<br>सव्यं नारायणभुजं ताडयामास वेगवान्॥ ४५<br>त्रिशूलाभिहतान्मार्गात् तिस्रो धारा विनिर्ययुः।<br>एका गगनमाक्रम्य स्थिता ताराभिमण्डिता॥ ४६<br>द्वितीया न्यपतद् भूमौ तां जग्राह तपोधनः।<br>अत्रिस्तस्मात् समुद्भूतो दुर्वासा शंकरांशतः॥ ४७<br>तृतीया न्यपतद्धारा कपाले रौद्रदर्शने।<br>तस्माच्छिशुः समभवत् संनद्धकवचो युवा॥ ४८<br>श्यामावदातः शरचापपाणि-<br>र्गर्जन्न्यथा प्रावृषि तोयदोऽसौ।<br>इत्थं ब्रुवन् कस्य विशातयामि<br>स्कन्धाच्छिरस्तालफलं यथैव॥ ४९ | शिवजीने नारायणकी बात सुनकर त्रिशूलद्वारा बड़े वेगसे उनकी वाम भुजापर आघात किया। त्रिशूलद्वारा (भुजापर) प्रताड़ित मार्गसे जलकी तीन धाराएँ निकल पड़ीं। एक धारा आकाशमें जाकर ताराओंसे मण्डित आकाशगङ्गा हुई; दूसरी धारा पृथ्वीपर गिरी, जिसे तपोधन अत्रिने (मन्दाकिनीके रूपमें) प्राप्त किया। शंकरके उसी अंशसे दुर्वासाका प्रादुर्भाव हुआ। तीसरी धारा भयानक दिखायी पड़नेवाले कपालपर गिरी, जिससे एक शिशु उत्पन्न हुआ। वह (जन्म लेते ही) कवच बाँधे, श्यामवर्णका युवक था। उसके हाथोंमें धनुष और बाण था। फिर वह वर्षाकालमें मेघ-गर्जनके समान कहने लगा—'मैं किसके स्कन्धसे सिरको तालफलके सदृश काट गिराऊँ?'॥ ४५-४९॥ |
| तं शंकरोऽभ्येत्य वचो बभाषे<br>चरं हि नारायणबाहुजातम्।<br>निपातयैनं नर दुष्टवाक्यं<br>ब्रह्मात्मजं सूर्यशतप्रकाशम्॥ ५०<br>इत्येवमुक्तः स तु शंकरेण<br>आद्यं धनुस्त्वाजगवं प्रसिद्धम्।<br>जग्राह तूणानि तथाऽक्षयाणि<br>युद्धाय वीरः स मतिं चकार॥ ५१<br>ततः प्रयुद्धौ सुभृशं महाबलौ<br>ब्रह्मात्मजो बाहुभवश्च शार्वः।<br>दिव्यं सहस्रं परिवत्सराणां<br>ततो हरोऽभ्येत्य विरञ्चिमूचे॥ ५२<br>जितस्त्वदीयः पुरुषः पितामहं<br>नरेण दिव्याद्भुतकर्मणा बली।<br>महापृषत्कैरभिपत्य ताडित-<br>स्तदद्भुतं चेह दिशो दशैव॥ ५३<br>ब्रह्मा तमीशं वचनं बभाषे<br>नेहास्य जन्मान्यजितस्य शंभो।<br>पराजितश्चेष्यतेऽसौ त्वदीयो<br>नरो मदीयः पुरुषो महात्मा॥ ५४<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं त्रिनेत्र-<br>श्चिक्षेप सूर्ये पुरुषं विरिञ्चेः।<br>नरं नरस्यैव तदा स विग्रहे<br>चिक्षेप धर्मप्रभवस्य देवः॥ ५५ | श्रीनारायणकी बाहुसे उत्पन्न उस पुरुषके समीप जाकर श्रीशंकरने कहा—हे नर! तुम सूर्यके समान प्रकाशमान, पर कटुभाषी, ब्रह्मासे उत्पन्न इस पुरुषको मार डालो। शंकरजीके ऐसा कहनेपर उस वीर नरने प्रसिद्ध आजगव नामका धनुष एवं अक्षय तूणीर ग्रहणकर युद्धका निश्चय किया। उसके बाद ब्रह्मात्मज और नारायणकी भुजासे उत्पन्न दोनों नरोंमें सहस्र दिव्य वर्षोंतक प्रबल युद्ध होता रहा। तत्पश्चात् श्रीशंकरजीने ब्रह्माके पास जाकर कहा—पितामह! यह एक अद्भुत बात है कि दिव्य एवं अद्भुत कर्मवाले (मेरे) नरने दसों दिशाओंमें व्याप्त महान् बाणोंके प्रहारसे ताडित कर आपके पुरुषको जीत लिया। ब्रह्माने उस ईशसे कहा कि इस अजितका जन्म यहाँ दूसरोंद्वारा पराजित होनेके लिये नहीं हुआ है। यदि किसीको पराजित कहा जाना अभीष्ट है तो यह तेरा नर ही है। मेरा पुरुष तो महाबली है—ऐसा कहे जानेपर श्रीशंकरजीने ब्रह्माजीके पुरुषको सूर्यमण्डलमें फेंक दिया तथा उन्हीं शंकरने उस नरको धर्मपुत्र नरके शरीरमें फेंक दिया॥ ५०-५५॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥

अध्याय ३ ] शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति १७
तीसरा अध्याय
शंकरजीका ब्रह्महत्यासे छूटनेके लिये तीर्थोंमें भ्रमण; बदरिकाश्रममें नारायणकी स्तुति;
वाराणसीमें ब्रह्महत्यासे मुक्ति एवं कपाली नाम पड़ना
पुलस्त्य उवाच
ततः करतले रुद्रः कपाले दारुणे स्थिते।
संतापमगमद् ब्रह्मंश्चिन्तया व्याकुलेन्द्रियः॥ १
ततः समागता रौद्रा नीलाञ्जनचयप्रभा।
संरक्तमूर्द्धजा भीमा ब्रह्महत्या हरान्तिकम्॥ २
तामागतां हरो दृष्ट्वा पप्रच्छ विकरालिनीम्।
काऽसि त्वमागता रौद्रे केनाप्यर्थेन तद्वद॥ ३
कपालिनमथोवाच ब्रह्महत्या सुदारुणा।
ब्रह्मवध्याऽस्मि सम्प्राप्ता मां प्रतीच्छ त्रिलोचन ॥ ४
इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्महत्या विवेश ह।
त्रिशूलपाणिनं रुद्रं सम्प्रतापितविग्रहम्॥ ५
ब्रह्महत्याभिभूतश्च शर्वो बदरिकाश्रमम्।
आगच्छन्न ददर्शाथ नरनारायणावृषी ॥ ६
अदृष्ट्वा धर्मतनयौ चिन्ताशोकसमन्वितः ।
जगाम यमुनां स्नातुं साऽपि शुष्कजलाऽभवत् ॥ ७
कालिन्दीं शुष्कसलिलां निरीक्ष्य वृषकेतनः।
प्लक्षजां स्नातुमगमदन्तर्द्धानं च सा गता॥ ८
ततो नु पुष्करारण्यं मागधारण्यमेव च।
सैन्धवारण्यमेवासौ गत्वा स्नातो यथेच्छया ॥ ९
तथैव नैमिषारण्यं धर्मारण्यं तथेश्वरः।
स्नातो नैव च सा रौद्रा ब्रह्महत्या व्यमुञ्चत ॥ १०
सरित्सु तीर्थेषु तथाश्रमेषु
पुण्येषु देवायतनेषु शर्वः।
समायुतो योगयुतोऽपि पापा-
न्नावाप मोक्षं जलध्वजोऽसौ ॥ ११
ततो जगाम निर्विण्णः शंकरः कुरुजाङ्गलम्।
तत्र गत्वा ददर्शार्थ चक्रपाणिं खगध्वजम् ॥ १२
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं शङ्खचक्रगदाधरम्।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हरः स्तोत्रमुदीरयत्॥ १३
पुलस्त्यजी बोले- नारदजी ! तत्पश्चात् शिवजीको
अपने करतलमें भयंकर कपालके सट जानेसे बड़ी
चिन्ता हुई। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं। उन्हें
बड़ा संताप हुआ। उसके बाद कालिखके समान
नीले रंगकी, रक्तवर्णके केशवाली भयंकर ब्रह्महत्या
शंकरके निकट आयी। उस विकराल रूपवाली स्त्रीको
आयी देखकर शंकरजीने पूछा - ओ भयावनी स्त्री !
यह बतलाओ कि तुम कौन हो एवं किसलिये यहाँ
आयी हो ? इसपर उस अत्यन्त दारुण ब्रह्महत्याने
उनसे कहा - मैं ब्रह्महत्या हूँ; हे त्रिलोचन ! आप मुझे
स्वीकार करें- इसलिये यहाँ आयी हूँ ॥ १-४॥
ऐसा कहकर ब्रह्महत्या संतापसे जलते शरीरवाले
त्रिशूलपाणि शिवके शरीरमें समा गयी। ब्रह्महत्यासे
अभिभूत होकर श्रीशंकर बदरिकाश्रममें आये; किंतु वहाँ नर
एवं नारायण ऋषियोंके उन्हें दर्शन नहीं हुए। धर्मके
उन दोनों पुत्रोंको वहाँ न देखकर वे चिन्ता और शोकसे
युक्त हो यमुनाजीमें स्नान करने गये; परंतु उसका जल
भी सूख गया। यमुनाजीको निर्जल देखकर भगवान्
शंकर सरस्वतीमें स्नान करने गये; किंतु वह भी लुप्त
हो गयी ॥ ५-८ ॥
फिर पुष्करारण्य, मागधारण्य और सैन्धवारण्यमें
जाकर उन्होंने बहुत समयतक स्नान किया। उसी प्रकार
वे नैमिषारण्य तथा सिद्धपुरमें भी गये और स्नान किये;
फिर भी उस भयंकर ब्रह्महत्याने उन्हें नहीं छोड़ा।
जीमूतकेतु शंकरने अनेक नदियों, तीर्थों, आश्रमों एवं
पवित्र देवायतनोंकी यात्रा की; पर योगी होनेपर भी वे
पापसे मुक्ति न प्राप्त कर सके। तत्पश्चात् वे खिन्न
होकर कुरुक्षेत्र गये। वहाँ जाकर उन्होंने गरुडध्वज
चक्रपाणि (विष्णु) -को देखा और उन शङ्ख-चक्र-
गदाधारी पुण्डरीकाक्ष (श्रीनारायण) -का दर्शनकर वे
हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे- ॥ ९-१३॥

| १८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३ |
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| हर उवाच | भगवान् शंकर बोले— हे देवताओंके स्वामी! आपको नमस्कार है। गरुडध्वज! आपको प्रणाम है। शङ्ख-चक्र-गदाधारी वासुदेव! आपको नमस्कार है। निर्गुण, अनन्त एवं अतर्कनीय विधाता! आपको नमस्कार है। ज्ञानाज्ञानस्वरूप, स्वयं निराश्रय किंतु सबके आश्रय! आपको नमस्कार है। रजोगुण, सनातन, ब्रह्ममूर्ति! आपको नमस्कार है। नाथ! आपने इस सम्पूर्ण चराचर विश्वकी रचना की है। सत्त्वगुणके आश्रय लोकेश! विष्णुमूर्ति, अधोक्षज, प्रजापालक, महाबाहु, जनार्दन! आपको नमस्कार है। हे तमोमूर्ति! मैं आपके अंशभूत क्रोधसे उत्पन्न हूँ। हे महान् गुणवाले सर्वव्यापी देवेश! आपको नमस्कार है॥ १४–१८॥ |
| नमस्ते देवतानाथ नमस्ते गरुडध्वज।<br>शङ्खचक्रगदापाणे वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ १४ | |
| नमस्ते निर्गुणानन्त अप्रतर्क्याय वेधसे।<br>ज्ञानाज्ञान निरालम्ब सर्वालम्ब नमोऽस्तु ते॥ १५ | |
| रजोयुक्त नमस्तेऽस्तु ब्रह्ममूर्ते सनातन।<br>त्वया सर्वमिदं नाथ जगत्सृष्टं चराचरम्॥ १६ | |
| सत्त्वाधिष्ठित लोकेश विष्णुमूर्ते अधोक्षज।<br>प्रजापाल महाबाहो जनार्दन नमोऽस्तु ते॥ १७ | |
| तमोमूर्ते अहं ह्येष त्वदंशक्रोधसंभवः।<br>गुणाभियुक्त देवेश सर्वव्यापिन् नमोऽस्तु ते॥ १८ | |
| भूरियं त्वं जगन्नाथ जलाम्बरहुताशनः।<br>वायुर्बुद्धिर्मनश्चापि शर्वरी त्वं नमोऽस्तु ते॥ १९ | जगन्नाथ! आप ही पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि, वायु, बुद्धि, मन एवं रात्रि हैं; आपको नमस्कार है। ईश्वर! आप ही धर्म, यज्ञ, तप, सत्य, अहिंसा, पवित्रता, सरलता, क्षमा, दान, दया, लक्ष्मी एवं ब्रह्मचर्य हैं। हे ईश! आप अङ्गोंसहित चतुर्वेदस्वरूप, वेद्य एवं वेदपारगामी हैं। आप ही उपवेद हैं तथा सभी कुछ आप ही हैं; आपको नमस्कार है। अच्युत! चक्रपाणि! आपको बारंबार नमस्कार है। मीनमूर्तिधारी (मत्स्यावतारी) माधव! आपको नमस्कार है। मैं आपको लोकमें दयालु मानता हूँ। केशव! आप मेरे शरीरमें स्थित ब्रह्महत्यासे उत्पन्न अशुभको नष्ट कर मुझे पाप-बन्धनसे मुक्त करें। बिना विचार किये कार्य करनेवाला मैं दग्ध एवं नष्ट हो गया हूँ। आप साक्षात् तीर्थ हैं, अतः आप मुझे पवित्र करें। आपको बारंबार नमस्कार है॥ १९–२३॥ |
| धर्मो यज्ञस्तपः सत्यमहिंसा शौचमार्जवम्।<br>क्षमा दानं दया लक्ष्मीर्ब्रह्मचर्यं त्वमीश्वर॥ २० | |
| त्वं साङ्गाश्चतुरो वेदास्त्वं वेद्यो वेदपारगः।<br>उपवेदा भवानीश सर्वोऽसि त्वं नमोऽस्तु ते॥ २१ | |
| नमो नमस्तेऽच्युत चक्रपाणे<br>नमोऽस्तु ते माधव मीनमूर्ते।<br>लोके भवान् कारुणिको मतो मे<br>त्रायस्व मां केशव पापबन्धात्॥ २२ | |
| ममाशुभं नाशय विग्रहस्थं<br>यद् ब्रह्महत्याऽभिभवं बभूव।<br>दग्धोऽस्मि नष्टोऽस्म्यसमीक्ष्यकारी<br>पुनीहि तीर्थोऽसि नमो नमस्ते॥ २३ | |
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजीने कहा— भगवान् शंकरद्वारा इस प्रकार स्तुत होनेपर चक्रधारी भगवान् विष्णु शंकरकी ब्रह्महत्याको नष्ट करनेके लिये उनसे वचन बोले— ॥ २४॥ |
| इत्थं स्तुतश्चक्रधरः शंकरेण महात्मना।<br>प्रोवाच भगवान् वाक्यं ब्रह्महत्याक्षयाय हि॥ २४ | |
| हरिरुवाच | भगवान् विष्णु बोले— महेश्वर! आप ब्रह्महत्याको नष्ट करनेवाली मेरी मधुर वाणी सुनें। यह शुभप्रद एवं पुण्यको बढ़ानेवाली है। |
| महेश्वर शृणुष्वेमां मम वाचं कलस्वनाम्।<br>ब्रह्महत्याक्षयकरीं शुभदां पुण्यवर्धनीम्॥ २५ | |
| योऽसौ प्राङ्मण्डले पुण्ये मदंशप्रभवोऽव्ययः।<br>प्रयागे वसते नित्यं योगशायीति विश्रुतः॥ २६ | यहाँसे पूर्व प्रयागमें मेरे अंशसे उत्पन्न 'योगशायी' नामसे विख्यात देवता हैं। वे अव्यय—विकाररहित पुरुष हैं। वहाँ उनका नित्य निवास है। वहींसे उनके दक्षिण चरणसे 'वरणा' नामसे प्रसिद्ध श्रेष्ठ नदी निकली है। वह |
| चरणाद् दक्षिणात्तस्य विनिर्याता सरिद्वरा।<br>विश्रुता वरणेत्येव सर्वपापहरा शुभा॥ २७ | |