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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३५- कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन

१४६ श्रीवामनपुराण [ अध्यायः ३१
दृष्टिर्ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः।
तारका रोमकूपाणि रोमेशु च महर्षयः ॥ ५१
बाहवो विदिशस्तस्य दिशः श्रोत्रे महात्मनः।
अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५२
प्रसादे चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः।
सत्यमस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥ ५३
ग्रीवाऽदितिर्देवमाता विद्यास्तद्गलयास्तथा।
स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै भ्रुवौ ॥ ५४
मुखे वैश्वानरश्चास्य वृषणौ तु प्रजापतिः।
हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः ॥ ५५
पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसन्धिषु।
वक्षःस्थले तथा रुद्रो धैर्ये चास्य महार्णवः ॥ ५६
उदरे चास्य गन्धर्वा मरुतश्च महाबलाः।
लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः ॥ ५७
सर्वज्योतींषि यानीह तपश्च परमं महत्।
तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भूतमूत्तमम् ॥ ५८
तनौ कुक्षिषु वेदाश्च जानुनी च महामखाः।
इष्टयः पशवश्चास्य द्विजानां चेष्टितानि च ॥ ५९
तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महात्मनः।
उपसर्पन्ति ते दैत्याः पतङ्गा इव पावकम् ॥ ६०
चिक्षुरस्तु महादैत्यः पादाङ्गुष्ठं गृहीतवान्।
दन्ताभ्यां तस्य वै ग्रीवामङ्गुष्ठेनाहनद्धरिः ॥ ६१
प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः।
कृत्वा रूपं महाकायं संजहाराशु मेदिनीम् ॥ ६२
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे।
नभो विक्रममाणस्य सक्थिदेशे स्थितावुभौ ॥ ६३
परं विक्रममाणस्य जानुमूले प्रभाकरौ।
विष्णोरास्तां स्थितस्यैतौ देवपालनकर्मणि ॥ ६४
जित्वा लोकत्रयं तांश्च हत्वा चासुरपुंगवान्।
पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुविक्रमः ॥ ६५
समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभुके केश,
तारकाएँ उनके रोमकूप एवं महर्षिगण रोमोंमें स्थित थे।
विदिशाएँ उनकी बाँहें, दिशाएँ उन महात्माके कर्ण,
दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एवं वायु उन महात्माके
नासिका-स्थानपर थे। उनके प्रसादमें (मधुर हास्यछटामें)
चन्द्रदेव तथा मनमें धर्म आश्रित थे। सत्य उनकी वाणी
तथा जिह्वा सरस्वतीदेवी थीं ॥ ५०-५३ ॥
देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी
वलियाँ, स्वर्गद्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एवं पूषा
उनकी भौंहें थे। वैश्वानर उनके मुख तथा प्रजापति वृषण
थे। परंब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुंस्त्व
थे। उनकी पीठमें वसु देवता, सभी सन्धियोंमें मरुद्गण,
वक्षःस्थलमें रुद्र तथा उनके धैर्यमें महार्णव आश्रित थे।
उनके उदरमें गन्धर्व एवं महाबली मरुद्गण स्थित थे।
लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एवं सभी विद्याएँ उनकी
कटिमें स्थित थीं ॥ ५४-५७ ॥
समस्त ज्योतियाँ एवं परम महत् तप उन
देवाधिदेवके उत्तम तेज थे। उनके शरीर एवं कुक्षियोंमें
वेद थे तथा बड़े-बड़े यज्ञ इष्टियाँ थीं, पशु एवं
ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ उनकी दोनों जानुएँ थीं। उन
महात्मा विष्णुके सर्वदेवमय रूपको देखकर वे दैत्य
उनके निकट उसी प्रकार जाते थे, जिस प्रकार अग्निके
निकट पतंगे जाते हैं। महादैत्य चिक्षुरने दाँतोंसे उनके
पैरके अँगूठेको दबोच लिया। फिर भगवान्ने अँगूठेसे
उसकी ग्रीवापर प्रहार किया और - ॥ ५८-६१ ॥
अपने पैरों एवं हाथोंके तलवोंसे समस्त असुरोंको
रगड़ डाला तथा विराट् शरीर धारण करके शीघ्र ही
उन्होंने पृथ्वीको उनसे छीन लिया। भूमिको नापते
समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनोंके मध्य स्थित थे तथा
आकाशके नापते समय उनके सक्थिप्रदेश (जाँघ)-में
स्थित हो गये एवं परम (ऊर्ध्व) लोकका अतिक्रमण
करते समय देवताओंकी रक्षा करनेमें स्थित श्रीविष्णुके
जानुमूल (घुटनेके स्थान)-में चन्द्र एवं सूर्य स्थित हो
गये। उरुक्रम (लंबी डगोंवाले) विष्णुने तीनों लोकोंको
जीतकर एवं उन बड़े-बड़े असुरोंका वध कर तीनों
लोक इन्द्रको दे दिये ॥ ६२-६५ ॥

अध्याय ३१] वामनद्वारा तीन पग भूमिकी याचना तथा विराड्रूपसे तीनों लोकोंको तीन पगमें नाप लेना १४७

सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात्।<br>बलेर्दत्तं भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ६६<br>अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः।<br>तत् त्वया सलिलं दत्तं गृहीतं पाणिना मया॥ ६७<br>कल्पप्रमाणं तस्मात् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम्।<br>वैवस्वते तथाऽतीते काले मन्वन्तरे तथा॥ ६८<br>सावर्णि के तु संप्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति।<br>इदानीं भुवनं सर्वं दत्तं शक्राय वै पुरा॥ ६९<br>चतुर्युगव्यवस्था च साधिका ह्येकसप्ततिः।<br>नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्थिनः॥ ७०शक्तिशाली भगवान् विष्णुने पृथ्वीतलके नीचे स्थित सुतल नामक पातालको बलिके लिये दे दिया। तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णुने दैत्येश्वरसे कहा—मैंने तुम्हारे द्वारा दानके लिये दिये हुए जलको अपने हाथमें ग्रहण किया है; अतः तुम्हारी उत्तम आयु कल्पप्रमाणकी होगी तथा वैवस्वत मन्वन्तरका काल व्यतीत होनेपर एवं सावर्णि क मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्रपद प्राप्त करोगे—इन्द्र बनोगे। इस समयके लिये मैंने समस्त भुवनको पहले ही इन्द्रको दे रखा है। इकहत्तर चतुर्युगीके कालसे कुछ अधिक कालतक जो समयकी व्यवस्था है अर्थात् एक मन्वन्तरके कालतक मैं उसके (इन्द्रके) विरोधियोंको अनुशासित करूँगा॥ ६६–७०॥
तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले।<br>सुतलं नाम पातालं समासाद्य वचो मम॥ ७१<br>वसासुर ममादेशं यथावत्परिपालयन्।<br>तत्र देवसुखोपेत प्रासादशतसंकुले॥ ७२<br>प्रोत्फुल्लपद्मसरसि हृदशुद्धसरिद्वरे।<br>सुगन्धी रूपसम्पन्नो वराभरणभूषितः॥ ७३<br>स्रक्चन्दनादिदिग्धाङ्गो नृत्यगीतमनोहरान्।<br>उपभुञ्जन् महाभोगान् विविधान् दानवेश्वर॥ ७४<br>ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः।<br>यावत्सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं गमिष्यसि॥ ७५<br>तावत्त्वं भुङ्क्ष्व संभोगान् सर्वकामसमन्वितान्।<br>यदा सुरैश्च विप्रैश्च विरोधं त्वं करिष्यसि।<br>बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणा घोरदर्शनाः॥ ७६बलि! पूर्वकालमें उसने बड़ी श्रद्धासे मेरी आराधना की थी, अतः तुम मेरे कहनेसे सुतल नामक पातालमें जाकर मेरे आदेशका भलीभाँति पालन करो तथा देवताओंके सुखसे भरे-पूरे सैकड़ों प्रासादोंसे पूर्ण विकसित कमलोंवाले सरोवरों, हृदों एवं शुद्ध श्रेष्ठ सरिताओंवाले उस स्थानपर निवास करो। दानवेश्वर! सुगन्धिसे अनुलिप्त हो तथा श्रेष्ठ आभरणोंसे भूषित एवं माला और चन्दन आदिसे अलंकृत सुन्दर स्वरूपवाले तुम नृत्य और गीतसे युक्त विविध भाँतिके महान् भोगोंका उपभोग करते हुए सैकड़ों स्त्रियोंसे आवृत होकर इतने कालतक मेरी आज्ञासे वहाँ निवास करो। जबतक तुम देवताओं एवं ब्राह्मणोंसे विरोध न करोगे, तबतक समस्त कामनाओंसे युक्त भोगोंको भोगोगे। किंतु जब तुम देवों एवं ब्राह्मणोंके साथ विरोध करोगे तो देखनेमें भयंकर वरुणके पाश तुम्हें बाँध लेंगे॥ ७१–७६॥
बलिरुवाच<br>तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया।<br>किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम्।<br>आप्यायितो येन देव स्मरेयं त्वामहं सदा॥ ७७बलिने पूछा—हे भगवन्! हे देव! आपकी आज्ञासे वहाँ पातालमें निवास करनेवाले मेरे भोगोंका साधन क्या होगा? जिससे तृप्त होकर मैं सदा आपका स्मरण करूँगा॥ ७७॥
श्रीभगवानुवाच<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम्॥ ७८श्रीभगवान्‌ने कहा—अविधिपूर्वक दिये गये दान, श्रोत्रिय ब्राह्मणसे रहित श्राद्ध तथा बिना श्रद्धाके किये गये जो हवन हैं, वे तुम्हारे भाग होंगे।
१४८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३१

| अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृताः।<br>फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च॥ ७९<br><br>उदकेन विना पूजा विना दर्भेण या क्रिया।<br>आज्येन च विना होमं फलं दास्यन्ति ते बले॥ ८०<br><br>यश्चेदं स्थानमाश्रित्य क्रियाः काश्चित् करिष्यति।<br>न तत्र चासुरो भागो भविष्यति कदाचन॥ ८१<br><br>ज्येष्ठाश्रमे महापुण्ये तथा विष्णुपदे ह्रदे।<br>ये च श्राद्धानि दास्यन्ति व्रतं नियममेव च॥ ८२<br><br>क्रिया कृता च या काचिद् विधिनाऽविधिनापि वा।<br>सर्वं तदक्षयं तस्य भविष्यति न संशयः॥ ८३<br><br>ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे एकादश्यामुपोषितः।<br>द्वादश्यां वामनं दृष्ट्वा स्नात्वा विष्णुपदे ह्रदे।<br>दानं दत्त्वा यथाशक्त्या प्राप्नोति परमं पदम्॥ ८४ | दक्षिणारहित यज्ञ, अविधिपूर्वक किये गये कर्म और व्रतसे रहित अध्ययन तुम्हें फल प्रदान करेंगे। हे बलि! जलके बिना की गयी पूजा, बिना कुशकी की गयी क्रिया और बिना घीके किये गये हवन तुमको फल देंगे। इस स्थानका आश्रय कर जो मनुष्य किन्हीं भी क्रियाओंको करेगा, उसमें कभी भी असुरोंका अधिकार न होगा। अत्यन्त पवित्र ज्येष्ठाश्रम तथा विष्णुपद सरोवरमें जो श्राद्ध, दान, व्रत या नियम-पालन करेगा तथा विधि या अविधिपूर्वक जो कोई क्रिया वहाँ की जायगी, उसके लिये वे सभी निःसंदेह अक्षय फलदायी होगा। जो मनुष्य ज्येष्ठमासके शुक्ल पक्षमें एकादशीके दिन उपवास कर द्वादशीके दिन विष्णुपद नामके सरोवरमें स्नान कर वामनका दर्शन करनेके बाद यथाशक्ति दान देगा, वह परम पदको प्राप्त करेगा॥ ७८-८४॥ |
| लोमहर्षण उवाच<br><br>बलेर्वरमिमं दत्त्वा शक्राय च त्रिविष्टपम्।<br>व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८५<br><br>शशास च यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यमूर्जितः।<br>निःशेषं च तदा कालं बलिः पातालमास्थितः॥ ८६<br><br>इत्येतत् कथितं तस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>शृणुयाद्यो वामनस्य सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ८७<br><br>बलिप्रह्लादसंवादं मन्त्रितं बलिशुक्रयोः।<br>बलेर्विष्णोश्च चरितं ये स्मरिष्यन्ति मानवाः॥ ८८<br><br>नाधयो व्याधयस्तेषां न च मोहाकुलं मनः।<br>भविष्यति द्विजश्रेष्ठाः पुंसस्तस्य कदाचन॥ ८९<br><br>च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टप्राप्तिं वियोगवान्।<br>समाप्नोति महाभागा नरः श्रुत्वा कथामिमाम्॥ ९०<br><br>ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो जयते महीम्।<br>वैश्यो धनसमृद्धिं च शूद्रः सुखमवाप्नुयात्।<br>वामनस्य च माहात्म्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते॥ ९१ | लोमहर्षणजी बोले—भगवान् उस सर्वव्यापी रूपसे बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्ग प्रदानकर अन्तर्हित हो गये। तबसे बलशाली इन्द्र पहलेकी भाँति तीनों लोकोंका शासन करने लगे और बलि सर्वदा पातालमें निवास करने लगे। इस प्रकार उन भगवान् (वामन) विष्णुका उत्तम माहात्म्य कहा गया; जो इसे (वामन-माहात्म्यको) सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजश्रेष्ठो! बलि एवं प्रह्लादके संवाद, बलि एवं शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि एवं विष्णुके चरितका जो मनुष्य स्मरण करेंगे, उन्हें कभी कोई आधि एवं व्याधि न होगी तथा उनका मन भी मोहसे आकुल नहीं होगा। हे महाभागो! इस कथाको सुनकर राज्यच्युत व्यक्ति अपने राज्यको एवं वियोगी मनुष्य अपने प्रियको प्राप्त करता है। (इनको सुननेसे) ब्राह्मणको वेदकी प्राप्ति होती है, क्षत्रिय पृथ्वीकी जय प्राप्त करता है तथा वैश्यको धन-समृद्धि एवं शूद्रको सुखकी प्राप्ति होती है। वामनका माहात्म्य सुननेसे पापोंसे मुक्ति होती है॥ ८५-९१॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३१॥