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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३०- बलिका प्रह्लादको संतुष्ट करना, अदितिके गर्भसे वामनका प्राकट्य; ब्रह्माद्वारा स्तुति, वामनका बलिके यज्ञमें जाना

१२८
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय २७
विश्वभव ऊर्ध्वकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृतार्चे
अनन्तकर्म वंश प्राग्वंश विश्वपातस्त्वमेव ।
वरार्थिनां वरदोऽसि त्वम्।
चतुर्भिborder... wait
चतुर्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च।
हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तुभ्यं होत्रात्मने नमः॥ १
संसारकी रक्षा करनेवाले, पवित्र, विश्वभव - विश्वकी
सृष्टि करनेवाले, ऊर्ध्वकर्म (उत्तमकर्मा), अमृत
(कभी भी मृत्युको न प्राप्त होनेवाले), दिवस्पति,
वाचस्पति, घृतार्चि, अनन्तकर्म, वंश, प्राग्वंश, विश्वपा
(विश्वका पालन करनेवाले) तथा वरद-वर चाहनेवालोंके
लिये वरदानी हैं। चार (आश्रावय), चार (अस्तु
श्रौषड्), दो (यज) तथा पाँच (ये यजामहे) और
पुनः दो (वषट्) अक्षरों - इस प्रकार ४+४+२+५+२=१७
अक्षरोंसे - जिसके लिये अग्निहोत्र किया जाता है, उन
आप होत्रात्माको नमस्कार है ॥ १॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या
और प्रभुसे प्रार्थना
लोमहर्षण उवाच
नारायणस्तु भगवान्छ्रुत्वैवं परमं स्तवम्।
ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्॥ १
उवाच वचनं सम्यक् तुष्टः पुष्टपदाक्षरम्।
श्रीमान् प्रीतमना देवो यद्वदेत् प्रभुरीश्वरः॥ २
वरं वृणुध्वं भद्रं वो वरदोऽस्मि सुरोत्तमाः।
कश्यप उवाच
प्रीतोऽसि नः सुरश्रेष्ठ सर्वेषामेव निश्चयः॥ ३
वासवस्याborder
वासवस्यानुजो भ्राता ज्ञातीनां नन्दिवर्धनः।
अदित्या अपि च श्रीमान् भगवानस्तु वै सुतः॥ ४
अदितिर्देवमाता च एतमेवार्थमुत्तमम्।
पुत्रार्थं वरदं प्राह भगवन्तं वरार्थिनी॥ ५
लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी द्विजश्रेष्ठ
कश्यपने विष्णुकी उत्तम स्तुति की; उसे सुनकर प्रसन्न
होकर सामर्थ्यशाली एवं ऐश्वर्यसम्पन्न नारायणने अत्यन्त
संतुष्ट होकर प्रसन्न मनसे सुसंस्कृत शब्दों एवं अक्षरोंवाला
समयानुकूल उचित वचन कहा - श्रेष्ठ देवताओ! वर
माँगो। तुम सबका कल्याण हो; मैं तुम लोगोंको
(इच्छित) वर दूँगा॥ २ १/२ ॥
कश्यपने कहा - सुरश्रेष्ठ! यदि आप हम सबपर
प्रसन्न हैं तो हम सभीका यह निश्चय है कि श्रीमान्
भगवान् आप स्वयं इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिके
कुटुम्बियोंके आनन्द बढ़ानेवाले पुत्र बनें। वरकी याचना
करनेवाली देवमाता अदितिने भी वरदानी भगवान्से
पुत्रकी प्राप्तिके लिये अपने इस उत्तम अभिप्रायको
प्रकट किया - कहा ॥ ३-५॥

अध्याय २७ ] भगवान् नारायणसे देवों और कश्यपकी प्रार्थना, अदितिकी तपस्या और प्रभुसे प्रार्थना १२९
देवा ऊचुः
निःश्रेयसार्थं सर्वेषां दैवतानां महेश्वर।
त्राता भर्त्ता च दाता च शरणं भव नः सदा ॥ ६
ततस्तानब्रवीद्विष्णुर्देवान् कश्यपमेव च।
सर्वेषामेव युष्माकं ये भविष्यन्ति शत्रवः।
मुहूर्त्तमपि ते सर्वे न स्थास्यन्ति ममाग्रतः ॥ ७
हत्वाऽसुरगणान् सर्वान् यज्ञभागाग्रभोजिनः।
हव्यादांश्च सुरान् सर्वान् कव्यादांश्च पितृनपि ॥ ८
करिष्ये विबुधश्रेष्ठाः पारमेष्ठ्येन कर्मणा।
यथायातेन मार्गेण निवर्त्तध्वं सुरोत्तमाः ॥ ९
लोमहर्षण उवाच
एवमुक्ते तु देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना।
ततः प्रहृष्टमनसः पूजयन्ति स्म तं प्रभुम् ॥ १०
विश्वेदेवा महात्मानः कश्यपोऽदितिरेव च।
नमस्कृत्य सुरेशाय तस्मै देवाय रंहसा ॥ ११
प्रयाताः प्राग्दिशं सर्वे विपुलं कश्यपाश्रमम्।
ते कश्यपाश्रमं गत्वा कुरुक्षेत्रवनं महत् ॥ १२
प्रसाद्य ह्यदितिं तत्र तपसे तां न्ययोजयन्।
सा चचार तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा॥ १३
तस्या नाम्ना वनं दिव्यं सर्वकामप्रदं शुभम्।
आराधनाय कृष्णस्य वाग्जिता वायुभोजना ॥ १४
दैत्यैर्निराकृतान् दृष्ट्वा तनयानृषिसत्तमाः ।
वृथापुत्राऽहमिति सा निर्वेदात् प्रणयाद्धरिम्।
तुष्टाव वाग्भिरग्र्याभिः परमार्थविबोधिनी ॥ १५
शरण्यं शरणं विष्णुं प्रणता भक्तवत्सलम्।
देवदैत्यमयं चादिमध्यमान्तस्वरूपिणम् ॥ १६
[अदितिके अभिप्रायको जानकर] देवताओंने
कहा - महेश्वर ! सभी देवताओंके परम कल्याणके
लिये आप हम सबकी सदा रक्षा करनेवाले, पालन-
पोषण करनेवाले, दान देनेवाले एवं आश्रय बनें। इसके
बाद भगवान् विष्णुने उन देवताओंसे तथा कश्यपसे
कहा कि आप सभीके जितने भी शत्रु होंगे वे सभी मेरे
सम्मुख क्षणमात्र भी नहीं टिक सकेंगे। देवश्रेष्ठो ! परमेष्ठी
(ब्रह्मा) - के द्वारा विधान किये गये कर्मोंके द्वारा मैं
समस्त असुरोंको मारकर देवताओंको यज्ञभागके सर्व-
प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले अधिकारी एवं हव्यभोक्ता
और पितरोंको कव्यभोक्ता बनाऊँगा। सुरोत्तमो ! अब
आपलोग जिस मार्गसे आये हैं, फिर उसी मार्गसे वापस
लौट जायँ ॥ ६-९ ॥
लोमहर्षणने कहा - प्रभावशाली भगवान् विष्णुने
जब ऐसा कहा तब महात्मा देवगण, कश्यप एवं
अदितिने प्रसन्नचित्तसे उन प्रभुका पूजन किया एवं
देवेश्वरको नमस्कार करनेके बाद पूर्व दिशामें स्थित
कश्यपके विस्तृत आश्रमकी ओर शीघ्रतासे चल पड़े।
जब देवगण कुरुक्षेत्र-वनमें स्थित महान् आश्रममें पहुँचे
तब लोगोंने अदितिको प्रसन्नकर उसे तपस्या करनेके
लिये प्रेरित किया। (फिर) उसने दस हजार वर्षोंतक
वहाँ कठिन तपस्या की ॥ १०-१३ ॥
श्रेष्ठ ऋषियो ! (जिस वनमें अदितिने तप किया)
उस दिव्य वनका नाम उसके नामपर अदितिवन पड़ा।
वह समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला एवं मङ्गलकारी
है। ऋषिश्रेष्ठो ! परम अर्थको जाननेवाली (तत्त्वज्ञा)
अदितिने अपने पुत्रोंको दैत्योंके द्वारा अपमानित देखा;
उसने सोचा कि तब मेरा पुत्रका जनना ही व्यर्थ है;
इसलिये अपनी वाणीको संयतकर; हवा पीकर नम्रतापूर्वक
शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तजनप्रिय, देवताओं
और दैत्योंके मूर्तिस्वरूप, आदि-मध्य और अन्तके
रूपमें रहनेवाले भगवान् श्रीविष्णुकी प्रसन्नताके लिये
उनकी सत्य एवं मधुर वाणियोंसे उत्तम स्तुति करना
प्रारम्भ कर दिया ॥ १४-१६ ॥

१३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २७
अदितिरुवाच
नमः कृत्यार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।
नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे ॥ १७
नमः पङ्कजनेत्राय नमः पङ्कजनाभये।
नमः पङ्कजसंभूतिसंभावायात्मयोनये ॥ १८
श्रियः कान्ताय दान्ताय दान्तदृश्याय चक्रिणे।
नमः पद्मासिहस्ताय नमः कनकरेतसे ॥ १९
तथात्मज्ञानयज्ञाय योगिचिन्त्याय योगिने।
निर्गुणाय विशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे ॥ २०
जगच्च तिष्ठते यत्र जगतो यो न दृश्यते।
नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्ङ्गिणे ॥ २१
यं न पश्यन्ति पश्यन्तो जगदप्यखिलं नराः।
अपश्यद्भिर्जगद्यश्च दृश्यते हृदि संस्थितः ॥ २२
बहिर्ज्योतिरलक्ष्यो यो लक्ष्यते ज्योतिषः परः।
यस्मिन्नेव यतश्चैव यस्यैतदखिलं जगत् ॥ २३
तस्मै समस्तजगताममराय नमो नमः।
आद्यः प्रजापतिः सोऽपि पितॄणां परमं पतिः।
पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे ॥ २४
यः प्रवृत्तैर्निवृत्तैश्च कर्मभिस्तु विरज्यते।
स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते ॥ २५
अदिति बोलीं - कृत्यासे उत्पन्न दुःखका नाश
करनेवाले प्रभुको नमस्कार है। कमलकी मालाको
धारण करनेवाले पुष्करमाली भगवान्को नमस्कार है।
परम मङ्गलकारी, कल्याणस्वरूप आदिविधाता प्रभो!
आपको नमस्कार है। कमलनयन! आपको नमस्कार
है। पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। ब्रह्माकी उत्पत्तिके
स्थान, आत्मजन्म! आपको नमस्कार है। प्रभो! आप
लक्ष्मीपति, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, संयमियोंके
द्वारा दर्शन पाने योग्य, हाथमें सुदर्शन चक्र धारण
करनेवाले एवं खड्ग (तलवार) धारण करते हैं;
आपको नमस्कार है। स्वामिन्! आत्मज्ञानके द्वारा यज्ञ
करनेवाले, योगियोंके द्वारा ध्यान करने योग्य, योगकी
साधना करनेवाले योगी, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे
रहित किंतु (दयादि) विशिष्ट गुणोंसे युक्त ब्रह्मरूपी
श्रीहरि भगवान्को नमस्कार है ॥ १७-२० ॥
जिन आप परमेश्वरमें सारा संसार स्थित है, किंतु
जो संसारसे दृश्य नहीं हैं, ऐसे स्थूल तथा अतिसूक्ष्म
आप शार्ङ्गधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्की
अपेक्षा करनेवाले प्राणी जिन आपके दर्शनसे वञ्चित
रहते हैं, आपका वे दर्शन नहीं कर पाते, परंतु जिन्होंने
जगत्की अपेक्षा नहीं की, उन्हें आप उनके हृदयमें
स्थित दीखते हैं। आपकी ज्योति बाहर है एवं अलक्ष्य
है, सर्वोत्तम ज्योति है; यह सारा जगत् आपमें स्थित है,
आपसे उत्पन्न होता है और आपका ही है, जगत्के
देवता उन आपको नमस्कार है। जो आप सबके
आदिमें प्रजापति रहे हैं एवं पितरोंके श्रेष्ठ स्वामी हैं,
देवताओंके स्वामी हैं; उन आप श्रीकृष्णको बार-बार
नमस्कार है ॥ २१-२४ ॥
जो प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंसे विरक्त तथा
स्वर्ग और मोक्षके फलके देनेवाले हैं, उन गदा
धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। जो