वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
११- सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन
४८
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ८
नारायण उवाच
एवं भविष्यत्यसुर वरमन्यं यमिच्छसि।
तं वृणीष्व महाबाहो प्रदास्याम्यविचारयन् ॥ ६२
प्रह्लाद उवाच
सर्वमेव मया लब्धं त्वत्प्रसादादधोक्षज।
त्वत्पादपङ्कजाभ्यां हि ख्यातिरस्तु सदा मम ॥ ६३
नारायण उवाच
एवमस्त्वपरं चास्तु नित्यमेवाक्षयोऽव्ययः ।
अजरश्चामरश्चापि मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ६४
गच्छस्व दैत्यशार्दूल स्वमावासं क्रियारतः।
न कर्मबन्धो भवतो मच्चित्तस्य भविष्यति ॥ ६५
प्रशासयदसून दैत्यान् राज्यं पालय शाश्वतम् ।
स्वजातिसदृशं दैत्य कुरु धर्ममनुत्तमम् ॥ ६६
पुलस्त्य उवाच
इत्युक्तो लोकनाथेन प्रह्लादो देवमब्रवीत् ।
कथं राज्यं समादास्ये परित्यक्तं जगद्गुरो ॥ ६७
तमुवाच जगत्स्वामी गच्छ त्वं निजमाश्रयम् ।
हितोपदेष्टा दैत्यानां दानवानां तथा भव ॥ ६८
नारायणेनैवमुक्तः स तदा दैत्यनायकः ।
प्रणिपत्य विभुं तुष्टो जगाम नगरं निजम् ॥ ६९
दृष्टः सभाजितश्चापि दानवैरन्धकेन च।
निमन्त्रितश्च राज्याय न प्रत्यैच्छत्स नारद ॥ ७०
राज्यं परित्यज्य महाऽसुरेन्द्रो
नियोजयन् सत्पथि दानवेन्द्रान् ।
ध्यायन् स्मरन् केशवमप्रमेयं
तस्थौ तदा योगविशुद्धदेहः ॥ ७१
एवं पुरा नारद दानवेन्द्रो
नारायणेनोत्तमपूरुषेण ।
पराजितश्चापि विमुच्य राज्यं
तस्थौ मनो धातरि सन्निवेश्य ॥ ७२
नारायणने कहा— प्रह्लाद ! ऐसा ही होगा। पर हे
महाबाहो ! तुम एक और अन्य वर भी, जो तुम चाहो,
माँगो। मैं बिना विचारे ही—बिना देय-अदेयका विचार
किये ही—वह भी तुम्हें दूँगा ॥ ६२ ॥
प्रह्लादने कहा— अधोक्षज ! आपके अनुग्रहसे
मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। आपके चरणकमलोंसे मैं
सदा लगा रहूँ और ऐसी ही मेरी प्रसिद्धि भी हो अर्थात्
मैं आपके भक्तके रूपमें ही चर्चित होऊँ ॥ ६३ ॥
नारायणने कहा— ऐसा ही होगा। इसके अतिरिक्त
मेरे प्रसादसे तुम अक्षय, अविनाशी, अजर और अमर
होगे। दैत्यश्रेष्ठ ! अब तुम अपने घर जाओ और सदा
(धर्म) कार्यमें रत रहो। मुझमें मन लगाये रखनेसे
तुम्हें कर्मबन्धन नहीं होगा। इन दैत्योंपर शासन करते
हुए तुम शाश्वत (सदा बने रहनेवाले) राज्यका पालन
करो। दैत्य ! अपनी जातिके अनुकूल श्रेष्ठ धर्मोका
अनुष्ठान करो ॥ ६४–६६ ॥
पुलस्त्यजी बोले— लोकनाथके ऐसा कहनेपर
प्रह्लादने भगवान्से कहा—जगद्गुरो ! अब मैं छोड़े हुए
राज्यको कैसे ग्रहण करूँ? इसपर भगवान्ने उनसे
कहा—तुम अपने घर जाओ तथा दैत्यों एवं दानवोंको
कल्याणकारी बातोंका उपदेश करो। नारायणके ऐसा
कहनेपर वे दैत्यनायक (प्रह्लाद) परमेश्वरको प्रणाम कर
प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर निवास-स्थानको चले गये।
नारदजी! अन्धक तथा दानवोंने प्रह्लादको देखा एवं
उनका सम्मान किया और उन्हें राज्य स्वीकार करनेके
लिये अनुरोधित किया; किंतु उन्होंने राज्य स्वीकार नहीं
किया। दैत्येश्वर प्रह्लाद राज्यको छोड़ अपने उपदेशोंसे
दानव-श्रेष्ठोंको शुभ मार्गमें नियोजित तथा भगवान्
नारायणका ध्यान और स्मरण करते हुए योगके द्वारा
शुद्ध शरीर होकर विराजित हुए। नारदजी ! इस प्रकार
पहले पुरुषोत्तम नारायणद्वारा पराजित दानवेन्द्र प्रह्लाद
राज्य छोड़कर भगवान् नारायणके ध्यानमें लीन होकर
शान्त एवं सुस्थिर हुए थे ॥ ६७-७२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८ ॥
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन [ ४९
नवाँ अध्याय
अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने।<br>अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम्॥ १ | **नारदजीने कहा—**मुने! प्रह्लादजी सनातन राजधर्मको भलीभाँति जानते थे। ऐसी दशामें उन्होंने नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति।<br>ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे॥ २ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत।<br>देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे॥ ३ | **नारदजीने पूछा—**सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या-क्या किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार करता था ॥ ३ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम्॥ ४<br><br>अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः।<br>अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च॥ ५<br><br>एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत्।<br>शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः॥ ६<br><br>ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामान्धकोऽसुरः।<br>आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था। उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था। फिर अन्धकासुरने देवताओंको जीतनेका उपक्रम (आरम्भ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया—सभी श्रेष्ठ राजाओंको परास्त कर दिया॥ ४—७॥ |
| पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च।<br>तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम्॥ ८<br><br>शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम्।<br>समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ॥ ९<br><br>शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः।<br>आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः॥ १०<br><br>देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा।<br>निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः॥ ११ | उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें (सामन्त बनाकर) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया। फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया। इधर इन्द्र भी देवसेनाको तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले। इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे-पीछे चल पड़े। हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे |
| ५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।<br>मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमरुतां गणाः ।<br>यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२ | निकल पड़ी। सेनाके आगे-आगे बारहोंने आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे। उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाहनपर सवार होकर चल रहे थे॥ ८—१२॥ |
| नारद उवाच<br>रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।<br>एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३ | नारदजीने पूछा— धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक-एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये। इस विषयमें मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है॥ १३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।<br>वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥ १४<br>रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।<br>श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥ १५<br>रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।<br>पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥ १६<br>रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।<br>शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥ १७<br>रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।<br>अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥ १८ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज (इन्द्र)-का वाहन है। हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है। रुद्रके कर्ण-मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि नामक शिशुमार (सूँस) वरुणका वाहन है। अम्बिकाके चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है॥ १४-१८॥ |
| एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।<br>गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।<br>श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥ १९<br>रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्रं हंसवाहनम् ।<br>हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०<br>कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।<br>किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥ २१<br>सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।<br>शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥ २२ | हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं। मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार (पाँच सौ) हंस हैं। आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं। वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं। ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक हैं और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं॥ १९—२२॥ |
| आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।<br>संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥ २३ | इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं संनद्ध (तैयार) होकर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकल पड़े॥ २३॥ |
| नारद उवाच<br>गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।<br>दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २४ | नारदने कहा— मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी यथावत् वर्णन करें॥ २४॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।<br>कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— द्विजोत्तम! (अब) दानवोंके वाहनको सुनो। मैं तत्त्वतः उनका ठीक-ठीक वर्णन करता हूँ। अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ |
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१
अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः ।
कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥ २६
प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः ।
उह्यमानस्तथाष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥ २७
विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः ।
जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसंनिभैः ॥ २८
शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः ।
रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः ।
शम्बरस्य विमानोऽभूदयःशङ्कोर्मृगाधिपः ॥ २९
बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ ।
पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥ ३०
ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः ।
रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥ ३१
नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा ।
स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२
अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा ।
गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥ ३३
पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् ।
परस्परं तु प्रत्यघ्ननन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥ ३४
ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने ।
प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५
शोणितोदा रथावर्त्ता योधसंघट्टवाहिनी ।
गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥ ३६
तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी ।
अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७
गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता ।
वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥ ३८
पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः ।
रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९
आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् ।
समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥ ४०
अश्वोंसे परिचालित होता था। वह हजार अरों-
पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त
बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था। प्रह्लादका दिव्य रथ
सुन्दर एवं सुवर्ण-रजत-मण्डित था। उसमें चन्द्रवर्णवाले
आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे। विरोचनका वाहन हाथी
था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था। जम्भका दिव्य रथ
स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५-२८॥
इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका
हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था। दुन्दुभिका
वाहन विशाल नाग था। शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था
तथा अयःशंकु सिंहपर सवार था। गदा और मुसलधारी
बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर
चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे। फिर अति भयङ्कर
घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। नारदजी! समस्त लोक
पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र
पिताको भी परस्पर एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे।
सुव्रत ! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ
लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥ २९-३२॥
उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर
हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे
आक्रमण करने लगे। इसी प्रकार पादचारी (पैदल)
सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे।
इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर
प्रहार करने लगे। मुने! उसके बाद देवताओं और
असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको
शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी
भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली
एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त
बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥
उस नदीमें तेज धारवाले प्रास (एक प्रकारका
अस्त्र) ही मकर थे, बड़ी-बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं,
उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क
पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही
मानो कलहंस थे। वह नदी शृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी
मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी।
जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक
डूबते और एक-दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा
उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७-४० ॥