वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन
| २३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
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| ततः सुराः महेन्द्रेण ब्रह्मणः सदनं गताः।<br>प्रणम्योचुर्महेशानं जगत् क्षुब्धं तु किं त्विदम्॥ ३२ | तब देवतालोग इन्द्रके साथ ब्रह्मलोक गये और महेशान (ब्रह्मा)-को प्रणाम कर बोले—यह जगत् क्यों अशान्त हो गया है—यह क्या बात है?॥ २९—३२॥ |
| तानुवाच भवो नूनं महामोहनके स्थितः।<br>तेनाक्रान्तास्त्विमे लोका जग्मुः क्षोभं दुरत्ययम्॥ ३३<br><br>इत्युक्त्वा सोऽभवत् तूष्णीं ततोऽप्यूचुः सुरा हरिम्।<br>आगच्छ शक्र गच्छामो यावत् तन्न समाप्यते॥ ३४<br><br>समाप्ते मोहने बालो यः समुत्पत्स्यतेऽव्ययः।<br>स नूनं देवराजस्य पदमैन्द्रं हरिष्यति॥ ३५<br><br>ततोऽमराणां वचनाद् विवेको बलघातिनः।<br>भयाज्ज्ञानं ततो नष्टं भाविकर्मप्रचोदनात्॥ ३६ | (ब्रह्माने) उन देवताओंसे कहा—निश्चय ही महादेव महामोहनक (सूरतलीला)-में स्थित हैं। उन्हींसे आक्रान्त होनेके कारण यह सारा जगत् अत्यन्त क्षुब्ध हो रहा है। इतना कहकर वे चुप हो गये। तब देवताओंने इन्द्रसे कहा—शक्र! जबतक वह (महामोहनक) समाप्त नहीं हो जाता, तभीतक हमलोग उन (महेश्वर)-के पास चलें। मोह समाप्त हो जानेपर उत्पन्न होनेवाला अविनाशी बालक निश्चय ही देवराजके ऐन्द्रपदका हरण कर लेगा। उसके बाद भवितव्यतावश देवताओंके वचनसे बलघाती (इन्द्र)-का विवेक एवं भयके कारण ज्ञान (भी) नष्ट हो गया॥ ३३—३६॥ |
| ततः शक्रः सुरैः सार्धं वह्निना च सहस्त्रदृक्।<br>जगाम मन्दरगिरिं तच्छृङ्गे न्यविशत्ततः॥ ३७<br><br>अशक्ताः सर्व एवैते प्रवेष्टुं तद्भवाजिरम्।<br>चिन्तयित्वा तु सुचिरं पावकं ते व्यसर्जयन्॥ ३८<br><br>स चाभ्येत्य सुरश्रेष्ठो दृष्ट्वा द्वारे च नन्दिनम्।<br>दुष्प्रवेशं च तं मत्वा चिन्तां वह्निः परां गतः॥ ३९<br><br>स तु चिन्तार्णवे मग्नः प्रापश्यच्छम्भुसद्मनः।<br>निष्क्रामन्तीं महापङ्क्तिं हंसानां विमलां तथा॥ ४० | तब हजार आँखवाले इन्द्र अग्नि और देवताओंके साथ मन्दरपर्वतपर गये एवं उस पर्वतकी ऊँची चोटीपर बैठ गये; परंतु वे सभी महादेवके भवनमें प्रवेश न पा सके। अधिक समयतक आपसमें विचार-विमर्श कर उन लोगोंने अग्निदेवको (उनके पास) भेजा। सुरश्रेष्ठ अग्निदेव वहाँ गये और द्वारपर नन्दीको देखकर एवं वहाँ प्रवेश पाना कठिन समझकर चिन्ता-सागरमें डूब गये। शोक-सागरमें डूबे हुए उन्होंने शम्भुके भवनसे निकल रही हंसोंकी विमल लम्बी कतार देखी॥ ३७—४०॥ |
| असावुपाय इत्युक्त्वा हंसरूपो हुताशनः।<br>वञ्चयित्वा प्रतीहारं प्रविवेश हराजिरम्॥ ४१<br><br>प्रविश्य सूक्ष्ममूर्तिश्च शिरोदेशे कपर्दिनः।<br>प्राह प्रहस्य गम्भीरं देवा द्वारि स्थिता इति॥ ४२<br><br>तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय परित्यज्य गिरेः सुताम्।<br>विनिष्क्रान्तोऽजिराच्छर्वो वह्निना सह नारद॥ ४३<br><br>विनिष्क्रान्ते सुरपतौ देवा मुदितमानसाः।<br>शिरोभिरवनीं जग्मुः सेन्द्रार्कशशिपावकाः॥ ४४<br><br>ततः प्रीत्या सुरानाह वदध्वं कार्यमाशु मे।<br>प्रणामावनतानां वो दास्येऽहं वरमुत्तमम्॥ ४५ | यही उपाय है—ऐसा कहकर वे अग्निदेव द्वारपालको भुलावा देकर महादेवके गृहमें हंसरूपमें प्रविष्ट हो गये। प्रवेश करनेके पश्चात् सूक्ष्म शरीर धारण करनेवाले अग्निदेवने महादेवके सिरके पास हँसते हुए गम्भीर स्वरमें कहा—(प्रभो!) देवतालोग दरवाजेपर खड़े हैं। (पुलस्त्यजी बोले) नारदजी! महादेवजी उस बातको सुनकर उसी समय सहसा उठे और हिमालयकी कन्याको छोड़कर अग्निके साथ आँगनसे निकल आये। सुरपति शङ्करके निकल जानेपर इन्द्रसहित चन्द्र, सूर्य और अग्नि आदि सभी देवताओंने हर्षित मनवाले होकर पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। उसके बाद (भगवान् महादेवने) प्रेमपूर्वक देवताओंसे कहा—देवताओ! आपलोग मुझे शीघ्र अपना कार्य बतायें। मैं नम्रतापूर्वक प्रणाम करनेवाले आपलोगोंको उत्तम वर दूँगा॥ ४१—४५॥ |
| अध्याय ५४ ] | भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति | २३९ |
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| देवा ऊचुः<br>यदि तुष्टोऽसि देवानां वरं दातुमिहेच्छसि।<br>तदिदं त्यज्यतां तावन्महामैथुनमीश्वर॥ ४६ | देवताओने कहा— ईश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और हम देवताओंको वर देना चाहते हैं तो आप इस महासुरतलीलाका परित्याग कर दें॥ ४६॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु संत्यक्तो मया भावोऽमरोत्तमाः।<br>ममेदं तेज उद्रिक्तं कश्चिद् देवः प्रतीच्छतु॥ ४७ | ईश्वरने कहा— देवश्रेष्ठो! ऐसा ही होगा। मैंने आसक्ति छोड़ दी। किंतु कोई देवता मेरे इस बढ़े हुए तेज (शुक्र)-को ग्रहण करे॥ ४७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ताः शम्भुना देवाः सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>असीदन्त यथा मग्नाः पङ्के वृन्दारका इव॥ ४८<br><br>सीदत्सु दैवतेष्वेवं हुताशोऽभ्येत्य शङ्करम्।<br>प्रोवाच मुञ्च तेजस्त्वं प्रतीच्छाम्येष शङ्कर॥ ४९<br><br>ततो मुमोच भगवांस्तद्रेतः स्कन्नमेव तु।<br>जलं तृषान्ते वै यद्वत् तैलपानं पिपासितः॥ ५०<br><br>ततः पीते तेजसि वै शार्वे देवेन वह्निना।<br>स्वस्थाः सुराः समामन्त्र्य हरं जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ५१ | पुलस्त्यजी बोले— शम्भुके इस प्रकार कहनेपर (प्रकृत समस्यासे) इन्द्रके साथ चन्द्रमा एवं सूर्य आदि देवता कीचड़में फँसे हुए हाथीके समान दुखी हो गये। देवताओंके इस प्रकार दुखी हो जानेपर अग्निने (साहस कर) शङ्करके पास जाकर कहा—शङ्कर! आप (अपने) तेजको छोड़ें—बाहर करें। मैं उसे ग्रहण करूँगा। उसके बाद भगवान्ने (तेजको) छोड़ दिया और उस त्यक्त रेतस्को जैसे जलका प्यासा व्यक्ति तेल पी जाता है, अग्निदेवने उसी प्रकार (उसे) पी लिया। अग्निदेवद्वारा शङ्करके तेजको इस प्रकार पी लिये जानेपर देवतालोग स्वस्थ हो गये और महादेवसे अनुमति लेकर स्वर्गमें लौट गये॥ ४८—५१॥ |
| सम्प्रायातेषु देवेषु हरोऽपि निजमन्दिरम्।<br>समभ्येत्य महादेवीमिदं वचनमब्रवीत्॥ ५२<br><br>देवि देवैरिहाभ्येत्य यत्नात् प्रेष्य हुताशनम्।<br>नीतः प्रोक्तो निषिद्धस्तु पुत्रोत्पत्तिं तवोदरात्॥ ५३<br><br>साऽपि भर्तुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धा रक्तान्तलोचना।<br>शशाप दैवतान् सर्वान् नष्टपुत्रोद्भवा शिवा॥ ५४<br><br>यस्मान्नेच्छन्ति ते दुष्टा मम पुत्रमथौरसम्।<br>तस्मात् ते न जनिष्यन्ति स्वासु योषित्सु पुत्रकान्॥ ५५ | देवताओंके स्वर्ग चले जानेपर महादेवने भी अपने मन्दिरमें जाकर महादेवीसे यह वचन कहा—देवि! देवोंने यहाँ आकर युक्तिसे अग्निको मेरे निकट भेजकर मुझे बुलाया और तुम्हारी कोखसे पुत्र न जननेके लिये कहा। पुत्र न जननेकी बात पतिसे सुनकर क्रोधसे शिवाकी आँखें लाल हो गयीं और (उन्होंने) समस्त देवताओंको शाप दे दिया; यतः वे दुष्ट मेरे उदरसे पुत्रकी उत्पत्ति नहीं चाहते; अतः वे भी अपनी पत्नियोंसे पुत्र नहीं उत्पन्न करेंगे॥ ५२—५५॥ |
| एवं शप्त्वा सुरान् गौरी शौचशालामुपागमत्।<br>आहूय मालिनीं स्नातुं मतिं चक्रे तपोधना॥ ५६<br><br>मालिनी सुरभिं गृह्य श्लक्ष्णमुद्वर्तनं शुभा।<br>देव्यङ्गममुद्वर्तयते कराभ्यां कनकप्रभम्।<br>तत्स्वेदं पार्वती चैव मेने कीदृग्गुणेन हि॥ ५७<br><br>मालिनी तूर्णमगमद् गृहं स्नानस्य कारणात्।<br>तस्यां गतायां शैलेयी मलाच्चक्रे गजाननम्॥ ५८ | इस तरह देवताओंको शाप देकर तपोधना गौरी शुद्धिशालामें गयीं और मालिनीको बुलाकर स्नान करनेका विचार किया। सुन्दरी मालिनी सुगन्धयुक्त मुलायम उबटन लेकर देवीके सोने-जैसे कान्तिवाले शरीरमें (उसे) दोनों हाथोंसे लगाने लगी। (उबटन लगाते समय पसीनेसे मिला उबटनका मैल देखकर) पार्वतीजी (अपने मनमें) विचार करने लगीं कि (देखूँ कि) इस स्वेदमें क्या गुण है। मालिनी स्नान (कराने)-के लिये शीघ्र स्नानगृहमें (पहले) चली गयी। उसके चले जानेपर शैलपुत्रीने (उस) मैलसे गजवदनको बनाया। |
| २४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
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| चतुर्भुजं पीनवक्षं पुरुषं लक्षणान्वितम्।<br>कृत्वोत्ससर्ज भूम्यां च स्थिता भद्रासने पुनः॥ ५९ | चार भुजावाले, चौड़ी छातीवाले, सुन्दर लक्षणोंसे युक्त पुरुषको बनाकर उसे भूमिपर रख दिया और वे स्वयं पुनः उत्तम आसनपर बैठ गयीं॥ ५६-५९॥ |
| मालिनी तच्छिरःस्नानं ददौ विहसती तदा।<br>ईषद्वद्धासामुमा दृष्ट्वा मालिनीं प्राह नारद॥ ६०<br>किमर्थं भीरु शनकैर्हससि त्वमतीव च।<br>साऽथोवाच हसाम्येवं भवत्यास्तनयः किल॥ ६१<br>भविष्यतीति देवेन प्रोक्तो नन्दी गणाधिपः।<br>तच्छ्रुत्वा मम हासोऽयं संजातोऽद्य कृशोदरि॥ ६२<br>यस्माद् देवैः पुत्रकामः शङ्करो विनिवारितः।<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी सस्नौ तत्र विधानतः॥ ६३ | उस समय मालिनीने हँसते हुए देवीको सिरसे स्नान कराया। नारदजी! मालिनीको मुसकराते हुए देखकर देवीने कहा—भीरु! तुम धीरे-धीरे इतना क्यों हँस रही हो? मालिनीने कहा—मैं इसलिये हँस रही हूँ कि आपको (अवश्य) पुत्र होगा, ऐसा महादेवने गणपति नन्दीसे कहा था। कृशोदरि! उसे सुनकर (स्मरण कर) आज मुझे हँसी आ गयी है; क्योंकि देवताओंने शङ्करको पुत्रके लिये इच्छा करनेसे रोक दिया है। इस बातको सुनकर देवीने (फिर) वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया॥ ६०-६३॥ |
| स्नात्वार्च्य शङ्करं भक्त्या समभ्यागाद् गृहं प्रति।<br>ततः शम्भुः समागत्य तस्मिन् भद्रासने त्वपि॥ ६४<br>स्नातस्तस्य ततोऽधस्तात् स्थितः स मलपूरुषः।<br>उमास्वेदं भवस्वेदं जलभूतिसमन्वितम्॥ ६५<br>तत्सम्पर्कात् समुत्तस्थौ फूत्कृत्य करमुत्तमम्।<br>अपत्यं हि विदित्वा च प्रीतिमान् भुवनेश्वरः॥ ६६<br>तं चादाय हरो नन्दिमुवाच भगनेत्रहा।<br>रुद्रः स्नात्वार्च्य देवादीन् वाग्भिरद्भिः पितॄनपि॥ ६७ | स्नान करनेके बाद भक्तिसे शङ्करकी अर्चना कर देवी घरकी ओर चलीं। उसके बाद महादेवने भी आकर उसी पवित्र आसनपर स्नान किया। उसी आसनके नीचे वह मैलसे बनाया पुरुष पड़ा था। उमाके स्वेद एवं जल तथा भस्मसे युक्त शङ्करके स्वेदका सम्मिश्रण होनेसे वह उत्तम शुण्डसे फूत्कार करते हुए उठा। उसे अपना पुत्र जानकर भुवनेश्वर प्रसन्न हो गये। भगनेत्रको नष्ट करनेवाले महादेवने उसे लेकर नन्दीसे कहा—(यह मेरा पुत्र है)। स्नान करनेके बाद शिवने स्तुतियोंसे देवताओंकी तथा जलसे (नित्य) पितरोंकी भी अर्चना की॥ ६४-६७॥ |
| जप्त्वा सहस्रनामानमुमापार्श्वमुपागतः।<br>समेत्य देवीं विहसन् शङ्करः शूलधृग् वचः॥ ६८<br>प्राह त्वं पश्य शैलेयि स्वसुतं गुणसंयुतम्।<br>इत्युक्ता पर्वतसुता समेत्यापश्यदद्भुतम्॥ ६९<br>यत्तदङ्गमलाद्दिव्यं कृतं गजमुखं नरम्।<br>ततः प्रीता गिरिसुता तं पुत्रं परिषष्वजे॥ ७०<br>मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय ततः शर्वोऽब्रवीदुमाम्।<br>नायकेन विना देवि तव भूतोऽपि पुत्रकः॥ ७१<br>यस्माज्जातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः।<br>एष विघ्नसहस्राणि सुरादीनां हरिष्यति॥ ७२ | वे सहस्रनामका जप कर उमाके निकट गये। देवीके निकट जाकर शूल धारण करनेवाले शङ्करने हँसते हुए यह वचन कहा—शैलजे! तुम अपने गुणवान् पुत्रको देखो। इस प्रकार कहे जानेपर पार्वती ने जाकर यह आश्चर्य देखा कि उनके शरीरके मलसे अलौकिक सुन्दर हाथीके मुखवाला पुरुष हो गया है। उसके बाद गिरिजाने प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको आलिङ्गित किया। उसके सिरको सूँघकर शम्भुने उमासे कहा—देवि! तुम्हारा यह पुत्र बिना नायकके उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'विनायक' होगा। यह देवादिकोंके सहस्रों विघ्नोंका हरण करेगा॥ ६८-७२॥ |
| अध्याय ५५ ] | देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश | २४१ |
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| पूजयिष्यन्ति चैवास्य लोका देवि चराचराः।<br>इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दत्तवांस्तनयाय हि॥ ७३<br>सहायं तु गणश्रेष्ठं नाम्ना ख्यातं घटोदरम्।<br>तथा मातृगणा घोरा भूता विघ्नकराश्च ये॥ ७४<br>ते सर्वे परमेशेन देव्याः प्रीत्योपपादिताः।<br>देवी च स्वसुतं दृष्ट्वा परां मुदमवाप च॥ ७५<br>रेमेऽथ शम्भुना सार्धं मन्दरे चारुकन्दरे।<br>एवं भूयोऽभवद् देवी इयं कात्यायनी विभो।<br>या जघान महादैत्यौ पुरा शुम्भनिशुम्भकौ॥ ७६<br>एतत् तवोक्तं वचनं शुभाख्यं<br>यथोद्भवं पर्वततो मृडान्याः।<br>स्वर्ग्यं यशस्यं च तथाघहारि<br>आख्यानमूर्जस्करमद्रिपुत्र्याः ॥ ७७ | देवि! सारा चर और अचर जगत् इसकी पूजा करेगा। देवीसे इस प्रकार कहकर उन्होंने पुत्र विनायकके लिये घटोदर नामके श्रेष्ठ गणको दे दिया। फिर देवीके प्रेमसे घोर मातृगणों तथा विघ्नकारी भूतोंको अधीनतामें कार्य करनेवाला बना दिया—परमेशने उन सबकी सृष्टि की। अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवीको भी परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। इसके बाद देवी शम्भुके साथ सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दराचलपर विचरण करने लगीं। विभो! यह देवी फिर कात्यायनी हुईं, जिन्होंने प्राचीन कालमें शुम्भ और निशुम्भ नामके दो महान् दैत्योंका विनाश किया। (पुलस्त्यजी प्रकृत प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि) मृडानी जैसे पर्वतसे उत्पन्न हुईं, उस शुभ आख्यानको मैंने आपसे कहा। पर्वतनन्दिनीका यह आख्यान स्वर्ग एवं यशको देनेवाला, पापका हरण करनेवाला एवं ओजस्वी है॥ ७३–७७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौवनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५४॥
पचपनवाँ अध्याय
देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ-निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड-मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
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| कश्यपस्य दनुर्नाम भार्यासीद् द्विजसत्तम।<br>तस्याः पुत्रत्रयं चासीत् सहस्राक्षाद् बलाधिकम्॥ १<br>ज्येष्ठः शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्चापरोऽसुरः।<br>तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलसमन्वितः॥ २<br>योऽसौ नमुचिरित्येवं ख्यातो दनुसुतोऽसुरः।<br>तं हन्तुमिच्छति हरिः प्रगृह्य कुलिशं करे॥ ३<br>त्रिदिवेशं समायान्तं नमुचिस्तद्भयादथ।<br>प्रविवेश रथं भानोस्ततो नाशकदच्युतः॥ ४ | द्विजसत्तम! कश्यपकी दनु नामकी पत्नी थी। उसके इन्द्रसे अधिक बलशाली तीन पुत्र थे। उनमें बड़ेका नाम था शुम्भ, मझलेका नाम निशुम्भ और महाबलशाली तृतीय पुत्रका नाम नमुचि था। इन्द्रने हाथमें वज्र धारणकर नमुचि नामसे विख्यात (उस) दनुपुत्र असुरको मारना चाहा; तब नमुचि इन्द्रको आते देखकर उनके भयसे सूर्यके रथमें प्रवेश कर गया। इससे इन्द्र उसे मार न सके॥ १–४॥ |
| शक्रस्तेनाथ समयं चक्रे सह महात्मना।<br>अवध्यत्वं वरं प्रादाच्छस्त्रैरस्त्रैश्च नारद॥ ५<br>ततोऽवध्यत्वमाज्ञाय शस्त्रादस्त्राच्च नारद।<br>संत्यज्य भास्कररथं पातालमुपयादथ॥ ६ | नारद! इसके बाद महात्मा इन्द्रने उससे समझौता कर लिया और उसे अस्त्र-शस्त्रोंसे न मारे जानेका वर दे दिया। नारदजी! उसके बाद तो वह (नमुचि) अपनेको अस्त्र-शस्त्रोंसे न मारे जानेवाला जानकर सूर्यके |
| २४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स निमज्जन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम्।<br>ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्येदमब्रवीत्॥ ७<br><br>यदुक्तं देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत्।<br>अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः॥ ८<br><br>मुखनासक्षिकर्णादीन् सम्ममार्ज यथेच्छया।<br>तस्मिञ्छक्रोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः॥ ९ | रथको त्यागकर पाताललोकमें चला गया। उस दानवपतिने जलमें स्नान करते हुए समुद्रके उत्तम फेनको देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा—'देवराज इन्द्रने जो वचन कहा है वह सफल हो। यह फेन मेरा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथोंसे फेन उठाकर अपनी इच्छाके अनुसार उससे अपने मुख, नाक और कर्ण आदिका मार्जन करने लगा। उस (फेन)-में छिपे हुए इन्द्रदेवने वज्रकी सृष्टि की॥ ५–९॥ |
| तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च।<br>समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम्॥ १०<br><br>स वै तीर्थं समासाद्य स्नातः पापाद्वमुच्यत।<br>ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ॥ ११<br><br>उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागतौ।<br>सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः॥ १२<br><br>जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सबलाः सपदानुगाः।<br>शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिषं बलात्॥ १३<br><br>वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च।<br>निधयः पद्मशङ्खाद्या हृतास्त्वाक्रम्य दानवैः॥ १४ | उससे उसकी नाक और मुख भग्न हो गये और वह गिर पड़ा तथा मर गया। प्रतिज्ञाके भङ्ग हो जानेसे इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप लगा। (फिर) वे तीर्थोंमें जाकर स्नान करनेसे पापमुक्त हुए। उसके बाद (नमुचिके मर जानेपर) शुम्भ और निशुम्भ नामके उसके दो वीर भाई अत्यन्त कुपित हुए। वे दोनों बहुत बड़ी तैयारी कर देवताओंको मारनेके लिये चढ़ आये। (फिर तो) वे सभी देवता भी इन्द्रको आगे कर निकल पड़े। उन दोनों दैत्योंने धावा बोलकर सेना और अनुचरोंके साथ देवताओंको पराजित कर दिया। दानवोंने आक्रमणकर इन्द्रके हाथी, यमके महिष, वरुणके मणिमय छत्र, वायुकी गदा तथा पद्म और शङ्ख आदि निधियोंको भी छीन लिया॥ १०–१४॥ |
| त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः।<br>तदाजग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम्॥ १५<br><br>रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत्।<br>स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिषस्य तु॥ १६<br><br>रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः।<br>अमात्यौ रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ॥ १७<br><br>तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ।<br>यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिषो नाम दानवः॥ १८<br><br>निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते।<br>भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ।<br>किंवीर्यौ किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथ॥ १९ | नारदजी! उन दोनोंने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। तब वे सभी (देवतालोग) पृथ्वीतलपर आ गये तथा उन लोगोंने रक्तबीज नामके एक महान् असुरको देखा और उससे पूछा—आप कौन हैं? उसने उत्तर दिया—विभो! मैं महिषासुरका मन्त्री एक दैत्य हूँ। मैं रक्तबीज नामसे विख्यात महापराक्रमी एवं विशाल भुजाओंवाला (दैत्य) हूँ। सुन्दर, श्रेष्ठ और विशाल भुजाओंवाले चण्ड और मुण्ड नामसे विख्यात, महिषके दो मन्त्री देवीके डरसे जलमें छिप गये हैं। महादेवीने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वतपर हमारे स्वामी महिष नामके दानवको मार डाला है। फिर (देवताओँने पूछा—) आपलोग (हमें) यह बतलावें कि आप दोनों किसके पुत्र हैं तथा आपलोग किस नामसे विख्यात हैं? (और आप दोनों यह भी बतलावें कि) आपलोगोंमें कितना बल एवं प्रभाव है?॥ १५–१९॥ |
| अध्याय ५५ ] | देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश | २४३ |
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| शुम्भनिशुम्भावूचतुः | |
|---|---|
| अहं शुम्भ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तथौरसः।<br>निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा॥ २०<br><br>अनेन बहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः।<br>समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः॥ २१<br><br>तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः।<br>यावत्तां घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारितौ॥ २२<br><br>इत्थं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने।<br>जलवासाद् विनिष्क्रान्तौ चण्डमुण्डौ च दानवौ॥ २३ | शुम्भ और निशुम्भने कहा—(पहले शुम्भ बोला—) मैं दनुका औरस पुत्र हूँ और शुम्भ नामसे प्रसिद्ध हूँ। यह मेरा छोटा भाई है। इसका नाम निशुम्भ है। यह शत्रुसमूहका विनाश करनेवाला (वीर) है। इसने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक अत्यन्त बलशाली वीरोंको भी (बहुत बार चढ़ाई करके) पराजित कर दिया है। अब तुम बतलाओ कि किस देवीने दैत्य महिषासुरको मार दिया है? हम दोनों अपनी सेनाओंको साथ लेकर उस देवीका विनाश करेंगे। मुने! नर्मदाके किनारे इस प्रकार दोनोंके बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामके दोनों दानव जलसे बाहर निकल आये॥ २०–२३॥ |
| ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितौ।<br>ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं तव पुरस्सरः॥ २४<br><br>स चोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः।<br>कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः॥ २५<br><br>एतावाश्रित्य तां दुष्टां महिषघ्नीं न संशयः।<br>अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये॥ २६ | उसके बाद असुरश्रेष्ठ उन दोनोंने रक्तबीजके निकट जाकर मधुर शब्दोंमें पूछा—तुम्हारे सामने यह कौन खड़ा है? उसने उन दोनोंसे कहा—यह देवताओंको कष्ट देनेवाला शुम्भ नामका दैत्य है एवं यह दूसरा इसका छोटा भाई निशुम्भ है। मैं निश्चय ही इन दोनोंकी सहायतासे उस तीनों लोकोंमें रत्नस्वरूपा, (पर) दुष्टासे विवाह करूँगा, जिसने महिषासुरका विनाश किया है॥ २४–२६॥ |
| चण्ड उवाच<br>न सम्यगुक्तं भवता रत्नार्होऽसि न साम्प्रतम्।<br>यः प्रभुः स्यात्स रत्नार्हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम्॥ २७<br>तदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम्।<br>भूयोऽपि तद्विधां जातां कौशिकीं रूपशालिनीम्॥ २८<br>ततः शुम्भो निजं दूतं सुग्रीवं नाम दानवम्।<br>दैत्यं च प्रेषयामास सकाशं विन्ध्यवासिनीम्॥ २९<br>स गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।<br>निशुम्भशुम्भावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः॥ ३० | **चण्डने कहा—**आपका कहना उचित नहीं है; (क्योंकि) आप अभी उस रत्नके योग्य नहीं हैं। राजा ही रत्नके योग्य होता है। अतः शुम्भके लिये ही यह संयोग बैठाइये। उसके बाद उन्होंने शुम्भ और निशुम्भसे उस प्रकार सम्पन्न स्वरूपवाली कौशिकीका वर्णन किया। तब शुम्भने अपने दूत सुग्रीव नामके दानवको विन्ध्यवासिनीके समीप भेजा। वह महान् असुर सुग्रीव वहाँ गया एवं देवीकी बात सुनकर क्रोधसे तिलमिला उठा। फिर उसने आकर निशुम्भ और शुम्भसे कहा॥ २७–३०॥ |
| सुग्रीव उवाच<br>युवयोर्वचनाद् देवीं प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ।<br>गतवानहमद्यैव तामहं वाक्यमब्रुवम्॥ ३१<br>यथा शुम्भोऽतिविख्यातः ककुद्मी दानवेष्वपि।<br>स त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये॥ ३२<br>यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि।<br>रत्नानि सन्ति तावन्ति मम वेश्मनि नित्यशः॥ ३३<br>त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि।<br>तस्माद् भजस्व मां वा त्वं निशुम्भं वा ममानुजम्॥ ३४ | **सुग्रीवने कहा—**दैत्यनायको! आपलोगोंके कथनके अनुसार देवीसे (संवाद) कहनेके लिये मैं गया था। मैंने आज ही जाकर उससे कहा कि भाग्यशालिनि! सुप्रसिद्ध दानवश्रेष्ठ शुम्भने तुमसे कहा है कि मैं तीनों लोकोंका समर्थ स्वामी हूँ। सुन्दरि! स्वर्ग, पृथ्वी एवं पातालके सारे रत्न मेरे घरमें सदा भरे रहते हैं। कृशोदरि! चण्ड और मुण्डने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है। अतः तुम मेरा या मेरे छोटे भाई निशुम्भका वरण करो॥ ३१–३४॥ |
| २४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ |
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| सा चाह मां विहसती शृणु सुग्रीव मद्द्वचः।<br>सत्यमुक्तं त्रिलोकेशः शुम्भो रत्नार्ह एव च॥ ३५<br><br>किं त्वस्ति दुर्विनीताया हृदये मे मनोरथः।<br>यो मां विजयते युद्धे स भर्ता स्यान्महासुर॥ ३६<br><br>मया चोक्ताऽवलिप्ताऽसि यो जयेत् ससुरासुरान्।<br>स त्वां कथं न जयते सा त्वमुत्तिष्ठ भामिनी॥ ३७<br><br>साऽथ मां प्राह किं कुर्मि यदनालोचितः कृतः।<br>मनोरथस्तु तद् गच्छ शुम्भाय त्वं निवेदय॥ ३८<br><br>तयैवमुक्तस्त्वभ्यागां त्वत्सकाशं महासुर।<br>सा चाग्निकोटिसदृशी मत्वैवं कुरु यत्क्षमम्॥ ३९ | (उसके बाद) हँसती हुई उसने मुझसे कहा कि सुग्रीव! मेरी बात सुनो। तुमने यह ठीक कहा है कि तीनों लोकोंका स्वामी शुम्भ रत्नके अर्ह (उपयुक्त) है। परंतु महासुर! मुझ अविनीताके हृदयकी यह अभिलाषा है कि युद्धमें मुझे पराजित करनेवाला ही मेरा पति हो। उत्तरमें (तब) मैंने (उससे) कहा कि तुम्हें घमण्ड हो गया है। भला जिस असुरने सारे देवताओं और राक्षसोंको पराजित कर अपने अधीन कर लिया है वह तुम्हें क्यों नहीं पराजित कर देगा? इसलिये अये क्रोधवाली! तुम उठो—बात मान लो। उसके बाद उसने मुझसे कहा—मैं क्या करूँ? बिना विचार किये ही मैंने इस प्रकारका पण कर लिया है। अतः (तुम) जाकर शुम्भसे मेरी बात कहो। फलतः महासुर! उसके इस प्रकार कहनेपर मैं आपके निकट आ गया हूँ। वह जलती हुई आगकी लौकी भाँति तेजस्विनी है; यह जानकर आप जैसा उचित हो, वैसा कार्य करें॥ ३५-३९॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इति सुग्रीववचनं निशम्य स महासुरः।<br>प्राह दूरस्थितं शुम्भो दानवं धूम्रलोचनम्॥ ४० | **पुलस्त्यजी बोले—**सुग्रीवकी इस बातको सुनकर उस महान् असुर शुम्भने कुछ दूरपर खड़े धूम्रलोचन दानवसे कहा॥ ४०॥ |
| शुम्भ उवाच<br>धूम्राक्ष गच्छ तां दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम्।<br>सापराधां यथा दासीं कृत्वा शीघ्रमिहानय॥ ४१<br><br>यश्चास्याः पक्षकृत् कश्चिद् भविष्यति महाबलः।<br>स हन्तव्योऽविचार्यायैव यदि हि स्यात् पितामहः॥ ४२<br><br>स एवमुक्तः शुम्भेन धूम्राक्षोऽक्षौहिणीशतैः।<br>वृतः षड्भिर्महातेजा विन्ध्यं गिरिमुपाद्रवत्॥ ४३<br><br>स तत्र दृष्ट्वा तां दुर्गां भ्रान्तदृष्टिरुवाच ह।<br>एह्येहि मूढे भर्तारं शुम्भमिच्छस्व कौशिकी।<br>न चेद् बलान्नयिष्यामि केशाकर्षणविह्वलाम्॥ ४४ | **शुम्भने कहा—**धूम्राक्ष! तुम जाओ। उस दुष्टाको अपराधिनी दासीकी तरह केश खींचनेसे व्याकुल बनाकर यहाँ शीघ्र ले आओ। यदि कोई पराक्रमी उसका पक्ष ले तो तुम बिना विचारे उसे मार डालना—चाहे ब्रह्मा ही क्यों न हो। शुम्भके इस प्रकार कहनेपर उस महान् तेजस्वी धूम्राक्षने छः सौ अक्षौहिणी* सेनाके साथ विन्ध्यपर्वतपर चढ़ाई कर दी। किन्तु वहाँ उन दुर्गाको देखकर दृष्टि चौंधिया जानेसे उसने कहा—मूढ़े! आओ, आओ! कौशिकी! तुम शुम्भको अपना पति बनानेकी इच्छा करो; अन्यथा मैं बलपूर्वक तुम्हारे केश पकड़कर तुम्हें घसीटता हुआ व्याकुल-रूपमें (यहाँसे) ले जाऊँगा॥ ४१-४४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>प्रेषितोऽसीह शुम्भेन बलान्नेतुं हि मां किल।<br>तत्र किं ह्यबला कुर्याद् यथेच्छसि तथा कुरु॥ ४५ | **श्रीदेवीने कहा—**शुम्भने तुमको मुझे बलपूर्वक ले जानेके लिये निश्चय ही भेजा है तो इस विषयमें एक अबला क्या करेगी! तुम जैसा चाहो वैसा करो॥ ४५॥ |
* एक अक्षौहिणी सेनामें १०९३५० पैदल सिपाही, ६५६१० घुड़सवार, २१८७० रथी और २१८७० गजारोही रहते हैं।