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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

९ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६० | ३६१

९ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६० | ३६१

के लिए हठयोगी बाँस की नली पर गुदा-स्थापन करता है। लिंग के द्वारा दूध-घी खींचता रहता है। जिह्वा-सिद्धि का अभ्यास करता है। आसन साधकर कभी कभी शून्य पर चढ़ जाता है। ये सब कार्य वायु के हैं। तमाशा दिखाते हुए किसी ने तालु के अन्दर जीभ घुसेड़ दी थी। बस, उसका शरीर स्थिर हो गया। लोगों ने सोचा, यह मर गया। कितने ही वर्ष वह कब्र में मिट्टी के नीचे पड़ा रहा। कालान्तर में वह कब्र धँस गयी। तब एकाएक उसे चेत हुआ। चेतना के होते ही वह चिल्ला उठा – यह देखो कलाबाजी! यह देखो गिरहबाजी! (सब हँसते हैं।) यह सब साँस की करामात है।

“वेदान्तवादी हठयोग नहीं मानते।

“हठयोग और राजयोग। राजयोग में मन के द्वारा योग होता है। भक्ति के द्वारा, विचार के द्वारा भी योग होता है। यही योग अच्छा है। हठयोग अच्छा नहीं, क्योंकि कलि में प्राण अन्न के अधीन हैं।”

(२)

श्रीरामकृष्ण की तपस्या। श्रीरामकृष्ण के अन्तरंग भक्त और भविष्यत् महातीर्थ। मूर्तिदर्शन

श्रीरामकृष्ण नौबतखाने की बगलवाली राह पर खड़े हुए देख रहे हैं – मणि नौबतखाने के बरामदे में एक ओर बैठे हुए घेरे की आड़ में किसी गहन चिन्ता में डूबे हुए हैं। क्या वे ईश्वर का चिन्तन कर रहे हैं? श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की और गए थे। मुँह धोकर वहीं जाकर खड़े हुए।

श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, यहाँ बैठे हुए हो! तुम्हारा काम जल्दी होगा। कुछ ही दिन करने से कोई कहेगा – 'यह, यह करो।'

चौंककर वे श्रीरामकृष्ण की ओर ताकते रह गये। अभी तक आसन भी नहीं छोड़ा।

श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा समय हो आया है। जब तक अण्डों के फोड़ने का समय नहीं होता, तब तक चिड़िया अण्डे नहीं फोड़ती। जो मार्ग तुम्हें बतलाया गया है, वही तुम्हारे लिए ठीक है।

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने फिर से मार्ग बतला दिया।

श्रीरामकृष्ण – यह नहीं कि सभी को तपस्या अधिक करनी पड़े। परन्तु मुझे तो बड़ा ही कष्ट उठाना पड़ा था। मिट्टी के टीले पर सिर रखकर पड़ा रहता था। न जाने कहाँ दिन पार हो जाता था। केवल 'माँ, माँ' कहकर पुकारता था और रोता था।

मणि श्रीरामकृष्ण के पास लगभग दो साल से आ रहे हैं। वे अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण कभी कभी उन्हें इंग्लिश-मैन कहकर पुकारते थे। उन्होंने कालेज में अध्ययन किया है। विवाह भी किया है।

३६२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ दिसम्बर, १८८३

केशव और दूसरे पण्डितों के व्याख्यान सुनने और अंग्रेजी दर्शन और विज्ञान पढ़ने में उनका खूब जी लगता है। परन्तु जब से वे श्रीरामकृष्ण के पास आए, तब से यूरोपीय पण्डितों के ग्रन्थ और अंग्रेजी अथवा दूसरी भाषाओं के व्याख्यान उन्हें अलोने जान पड़ने लगे। अब दिनरात केवल श्रीरामकृष्ण को देखना और उन्हीं की बातें सुनना चाहते हैं।

आजकल श्रीरामकृष्ण की एक बात वे सदा सोचते रहते हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा हैं, ‘साधना करने से मनुष्य ईश्वर को देख सकता है।’ उन्होंने यह भी कहा है, ‘ईश्वरदर्शन ही मनुष्यजीवन का उद्देश्य है।’

श्रीरामकृष्ण – कुछ दिन करने से ही कोई कहेगा – ‘यह, यह करो।’ तुम एकादशी का व्रत करना। तुम लोग अपने आदमी हो, आत्मीय हो। नहीं तो तुम इतना क्यों आओगे? कीर्तन सुनते सुनते राखाल को मैंने देखा था, वह व्रजमण्डल के भीतर था। नरेन्द्र का स्थान बहुत ऊँचा है। और हीरानन्द। उसका कैसा बालकों का – सा भाव है! उसका भाव कैसा मधुर है! उसे भी देखने को जी चाहता है।

“मैंने श्रीगौरांग के सांगोपांगों को देखा था; भाव में नहीं, इन्हीं आँखों से! पहले ऐसी अवस्था थी कि सादी दृष्टि से सब दर्शन होते थे! अब तो भाव में होते हैं।

“सादी दृष्टि से श्रीगौरांग के सब सांगोपांगों को देखा था। उसमें शायद तुम्हें भी देखा था। और शायद बलराम को भी।

“किसी को देखकर झट उठकर क्यों खड़ा हो जाता हूँ, जानते हो? आत्मीयों को दीर्घकाल के बाद देखने से ऐसा ही होता है।

“माँ से रो-रोकर कहता था, माँ, भक्तों के लिए मेरा जी निकल रहा है; उन्हें शीघ्र मेरे पास ला दे। जो कुछ मैं सोचता था, वही होता था।

“पंचवटी में मैंने तुलसीकानन बनाया था, जप-ध्यान करने के लिए। बड़ी इच्छा हुई कि चारों ओर से बाँस की कमानियों का घेरा लगा दूँ। इसके बाद ही देखा, ज्वार में बहकर कुछ कमानियों का गट्ठा और कुछ रस्सी ठीक पंचवटी के सामने आकर लग गयी है। ठाकुरबाड़ी में एक कहार रहता था। आनन्द से नाचते हुए उसने आकर यह खबर सुनायी।

“जब यह अवस्था हुई तब और पूजा न कर सका। कहा माँ, मुझे कौन देखेगा? माँ, मुझमें ऐसी शक्ति नहीं है कि अपना भार खुद ले सकूँ। और तुम्हारी बात सुनने को जी चाहता है; भक्तों को खिलाने की इच्छा होती है; सामने पड़ जाने पर किसी को कुछ देने को भी इच्छा होती है। माँ, यह सब किस तरह होगा? माँ, तुम एक बड़ा आदमी मेरी सहायता के लिए दो। इसीलिए तो मथुरबाबू ने इतनी सेवा की!

“और भी कहा था, माँ, मेरे तो सब सन्तान होगी नहीं, परन्तु इच्छा होती है कि एक शुद्ध भक्त बालक सदा मेरे साथ रहे। इसी तरह का एक बालक मुझे दो। इसीलिए तो