श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५५७
३० जून, १८८४ | परिच्छेद ८५ | ५५७
हाजरा सच कहता है, भक्तों के लिए ही अवतार है, वह ज्ञानियों के लिए नहीं – वे सोऽहं जो बने हैं!”
श्रीरामकृष्ण और सारी भक्तमण्डली चुपचाप बैठी है। पण्डितजी बातचीत करने लगे।
पण्डितजी – अच्छा, यह निष्ठुर भाव किस तरह दूर हों? हास्य देखता हूँ तो मांसपेशियों (Muscles) की, स्नायुओं (Nerves) की याद आती है। शोक देखता हूँ तो एक स्नायविक क्रिया (Nervous System) की उत्तेजना जान पड़ती है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यही बात नारायण शास्त्री भी कहता था, शास्त्र पढ़ने का यह दोष है कि वह तर्क और विचार में डाल देता है।
पण्डितजी – क्या कोई उपाय नहीं है?
श्रीरामकृष्ण – है, विवेक। एक गाना है, उसमें कहा है कि उसके विवेक नाम के लड़के से तत्त्व की बातें पूछना।
“विवेक, वैराग्य, ईश्वर पर अनुराग, ये ही सब उपाय हैं। विवेक के हुए बिना बात कभी पूरी नहीं उतरती। पण्डित सामाध्यायी ने बहुत कुछ व्याख्या के बाद कहा, ईश्वर नीरस है। एक ने कहा था, मेरे मामा के यहाँ एक गोशाले भर घोड़े हैं। गोशाले में भी कहीं घोड़े रहते हैं!
(सहास्य) “तुम तो गुलाबजामुन बन रहे हो। अभी कुछ दिन रस में पड़े रहो, इससे तुम्हारे लिए भी अच्छा है और दूसरों के लिए भी। बस दो-चार दिन के लिए रहो।”
पण्डितजी – (मुस्कराकर) – गुलाबजामुन जलकर खंगार हो गया है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – नहीं नहीं, अच्छा पका है, उसी की लाली है।
हाजरा – अच्छा भूना गया है, अभी रस और खींचेगा।
श्रीरामकृष्ण – बात यह है कि अधिक शास्त्र पढ़ने की जरूरत नहीं है। ज्यादा पढ़ने पर तर्क और विचार आ जाते हैं। न्यांगटा मुझे सिखलाता था – उपदेश देता था – गीता का दस बार उच्चारण करने से जो फल होता है, वही गीता का सार है। – अर्थात् दस बार ‘गीता-गीता’ कहने से तागी-तागी (त्यागी-त्यागी) निकलता है।
“उपाय विवेक और वैराग्य है, और ईश्वर पर अनुराग। पर कैसा अनुराग? ईश्वर के लिए जो व्याकुल हो रहा है – जैसी व्याकुलता के साथ बछड़े के पीछे गौ दौड़ती है।”
पण्डितजी – वेदों में बिलकुल ऐसा ही है। गौ जैसे बछड़े को पुकारती है, तुम्हें हम उसी तरह पुकारते हैं।
श्रीरामकृष्ण – व्याकुलता के साथ रोओ। और विवेक-वैराग्य प्राप्त करके अगर कोई सर्वस्व का त्याग कर सके तो उनका साक्षात्कार हो सकता है।
“उस व्याकुलता के आने पर उन्माद की अवस्था हो जाती है, ज्ञानमार्ग में रहो चाहे
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भक्तिमार्ग में। दुर्वासा को ज्ञानोन्माद हो गया था।
"संसारियों के ज्ञान और सर्वत्यागियों के ज्ञान में बड़ा अन्तर है। संसारियों का ज्ञान दीपक के प्रकाश के समान है, उससे घर के भीतर के अंश में ही उजाला होता है, उसके द्वारा अपनी देह, घर के काम, इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता। सर्वत्यागी का ज्ञान सूर्य के प्रकाश की भाँति है। उस प्रकाश से घर का भीतर और बाहर सब प्रकाशित हो जाता है, सब देख लिया जाता है। चैतन्य देव का ज्ञान सौर-ज्ञान था – ज्ञानसूर्य का प्रकाश था। और उनके भीतर भक्तिचन्द्र की ठण्डी किरणें भी थीं। ब्रह्मज्ञान और भक्ति-प्रेम, दोनों थे।
"अभावमुख चैतन्य और भावमुख चैतन्य। भाव-भक्ति का एक मार्ग है और अभाव (नेति नेति ज्ञान-विचार) का भी एक दूसरा। तुम अभाव की बात कह रहे हो, परन्तु वह बड़ा कठिन है। कहा है, वह जगह ऐसी है कि वहाँ गुरु और शिष्य में भी मुलाकात नहीं होती। जनक के पास शुकदेव ब्रह्मज्ञान के उपदेश के लिए गये। जनक ने कहा, पहले दक्षिणा दे दो, तुम्हें ब्रह्मज्ञान हो जाने पर फिर तुम दक्षिणा थोड़े ही दोगे, क्योंकि तब गुरु और शिष्य में भेद ही नहीं रह जाता।
"भाव और अभाव सभी रास्ते हैं। मत जैसे अनन्त हैं वैसे ही पथ अनन्त हैं। परन्तु एक बात है। कलिकाल के लिए नारदीय भक्ति का ही विधान माना जाता है। इस मार्ग में पहले है भक्ति, भक्ति के पक जाने पर है भाव, भाव से उच्च है महाभाव। और प्रेम सभी जीवों को नहीं होता। यह जिसे हुआ है वह वस्तुलाभ कर चुका हैं।"
पण्डितजी – धर्म की व्याख्या करनी है, तो बहुतसी बातें कहकर समझाना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण – तुम अनावश्यक बातें छोड़कर कहा करो।
(५)
ब्रह्म शक्ति अभेद। सर्वधर्मसमन्वय
श्रीयुत मणि मल्लिक के साथ पण्डितजी बातचीत कर रहे हैं। मणि मल्लिक ब्राह्मसमाजी हैं। ब्राह्मसमाज के दोषों और गुणों पर घोर तर्क कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर बैठे हुए सब सुन रहे हैं और फिर हँस रहे हैं। कभी कभी कह रहे हैं – यह सत्त्व का तम है, वीरों का भाव है, यह सब चाहिए। अन्याय और असत्य देखकर चुप न रहना चाहिए। सोचो कि व्यभिचारिणी स्त्री परमार्थ बिगाड़ने के लिए आ रही है, उस समय ऐसा ही वीरभाव चाहिए। तब कहना चाहिए, 'क्यों री, मेरा परलोक बरबाद करने चली है? अभी तुझे काट डालूँगा।'
फिर हँसकर कह रहे हैं – "मणि मल्लिक का ब्राह्मसमाजी मत बहुत दिनों से है।
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उसके भीतर तुम अपना मत घुसेड़ने की कोशिश न करो। पुराने संस्कार कभी एकाएक छूट सकते हैं? एक हिन्दू बड़ा भक्त था। सदा जगदम्बा की पूजा करता और उनका नाम लेता था। जब मुसलमानों का राज्य हुआ, तब उसे पकड़कर मुसलमानों ने मुसलमान बना लिया और कहा, अब तू मुसलमान हो गया। अब अल्ला का नाम ले, अल्ला का नाम जपा कर। वह आदमी बड़े कष्ट से 'अल्ला-अल्ला' कहने लगा; परन्तु फिर भी कभी-कभी 'जगदम्बा' का नाम निकल ही पड़ता था। तब मुसलमान उसे मारने दौड़ते। वह कहता था, 'दोहाई - शेखजी, मुझे मारना नहीं, मैं तुम्हारे अल्ला का नाम लेने की बड़ी कोशिश कर रहा हूँ, परन्तु करूँ क्या, भीतर जगदम्बा जो समायी हुई हैं, तुम्हारे अल्ला को धक्के मारकर निकाल देती हैं।' (सब हँसते हैं।)
(पण्डितजी से हँसते हुए) "मणि मल्लिक से कुछ कहना मत।
"बात यह है कि रुचि-भेद है, जिसके पेट में जो कुछ फायदा पहुँचाये। अनेक धर्म और अनेक मतों की सृष्टि उन्होंने अधिकारी विशेष के लिए की है। सभी आदमी ब्रह्मज्ञान के अधिकारी नहीं होते। और यही सोचकर उन्होंने साकार-पूजन की व्यवस्था की है। प्रकृति सब की अलग अलग होती है और फिर अधिकार-भेद भी है।"
सब लोग चुप हैं। श्रीरामकृष्ण पण्डितजी से कह रहे हैं, अब जाओ, देवताओं के दर्शन करो और बगीचा घूमकर देख लो।
दिन के पाँच बजे होंगे। पण्डितजी और उनके मित्र उठे। ठाकुरबाड़ी देखने जायेंगे। उनके साथ कोई-कोई भक्त भी गये। कुछ देर बाद मास्टर के साथ टहलते हुए श्रीरामकृष्ण भी गंगाजी के किनारे नहाने के घाट की ओर जा रहे है। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, बाबूराम अब कहता है, लिख-पढ़कर क्या होगा?
गंगा के तट पर पण्डितजी के साथ श्रीरामकृष्ण की फिर भेंट हुई। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, 'काली के दर्शन करने नहीं गये? - मैं तो इसीलिए आया हूँ।' पण्डितजी ने कहा, जी हाँ, चलिये, दर्शन करें।
श्रीरामकृष्ण के चेहरे पर प्रसन्नता की झलक है। आँगन के भीतर से काली-मन्दिर जाते हुए कह रहे हैं, एक गाना है। यह कहकर मधुर कण्ठ से गा रहे हैं -
"मेरी माँ काली थोड़े ही है? वह दिगम्बरा मूर्ति काले रूप से ही हृदयपद्म को प्रकाशित कर देती है ...।"
चाँदनी से आँगन में आकर फिर कह रहे हैं - घर में ज्ञानाग्नि प्रज्वलित करके ब्रह्ममयी का स्वरूप देखो।
मन्दिर में आकर श्रीरामकृष्ण ने काली को भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। माता के श्रीचरणों पर जवापुष्प तथा बिल्वदल शोभा दे रहे थे। त्रिनेत्रा भक्तों को स्नेह की दृष्टि से देख रही हैं। हाथों में वर और अभय है। माता बनारसी साड़ी और भाँतिभाँति के अलंकार
५६० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
पहने हुए हैं। श्रीमूर्त्ति के दर्शन कर भूधर के बड़े भाई ने कहा, 'मैं वह कुछ नहीं जानता। इतना ही जानता हूँ कि यह तो चिन्मयी है।'
ईश्वरलाभ और कर्मत्याग। नयी हण्डी
श्रीरामकृष्ण अब लौट रहे हैं। बाबूराम को उन्होंने बुलाया। मास्टर भी साथ हो लिये।
शाम हो गयी है। घर के पश्चिमवाले गोल बरामदे में आकर श्रीरामकृष्ण बैठ गये। भावस्थ हैं, अवस्था अर्ध-बाह्य है। पास ही बाबूराम और मास्टर हैं।
आजकल श्रीरामकृष्ण की सेवा ठीक से नहीं होती। उन्हें तकलीफ रहती है। आजकल राखाल नहीं रहते। कोई कोई हैं, परन्तु वे, श्रीरामकृष्ण को उनकी सभी अवस्थाओं में छू नहीं सकते। श्रीरामकृष्ण भावावस्था में कह रहे हैं – 'छू - ना-रा-छू-' अर्थात् 'इस अवस्था में और किसी को छूने नहीं दे सकता। तू रहे तो अच्छा हो।'
पण्डितजी देवताओं के दर्शन करके श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण पश्चिम के गोल बरामदे से कह रहे हैं, तुम कुछ जलपान कर लो। पण्डितजी ने कहा, अभी मुझे सन्ध्या करनी है। श्रीरामकृष्ण भावावेश में मस्त होकर गाने लगे और उठकर खड़े हो गये।
“गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची, यह सब कौन चाहता है – अगर काली का स्मरण करता हुआ वह अपनी देह त्याग सके? त्रिसन्ध्या की बात लोग कहते हैं, परन्तु वह यह कुछ नहीं चाहता। सन्ध्या खुद उसकी खोज में फिरती रहती है, परन्तु सन्धि कभी नहीं पाती। पूजा, होम, जप और यज्ञ, किसी पर उसका मन लगता ही नहीं।”
श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त होकर कह रहे हैं, सन्ध्या कितने दिन के लिए है? – जब तक ॐ कहते हुए मन लीन न हो जाय।
पण्डितजी – तो जलपान कर लेता हूँ, उसके बाद सन्ध्या करूँगा।
श्रीरामकृष्ण – मैं तुम्हारे बहाव को न रोकूँगा। समय के बिना आये त्याग अच्छा नहीं है। फल बड़ा हो जाता है, तब फूल आप झर जाता है। कच्ची अवस्था में नारियल का पत्ता खींचना न चाहिए। इस तरह तोड़ने से पेड़ खराब हो जाता है।
सुरेन्द्र घर जाने के लिए तैयार हैं। मित्रों को अपनी गाड़ी पर ले जाने के लिए बुला रहे हैं।
सुरेन्द्र – महेन्द्र बाबू चलियेगा?
श्रीरामकृष्ण की अब भी भावावस्था है। अभी तक पूरी प्राकृत अवस्था नहीं आयी। वे उसी अवस्था में सुरेन्द्र से कह रहे हैं – 'तुम्हारा घोड़ा जितना खींच सकें, उससे अधिक लोगों को न बैठाना।' सुरेन्द्र प्रणाम करके चले गये।