श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२ जनवरी, १८८४ | परिच्छेद ७३ | ४२७
२ जनवरी, १८८४ | परिच्छेद ७३ | ४२७
धीरे-धीरे श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे हैं। मणि, हरिपद, राखाल आदि भक्तगण भी उनके साथ रहते हैं। मणि अधिक समय बेलतला में रहते हैं।
साधनाकाल में श्रीरामकृष्ण के दर्शन
श्रीरामकृष्ण – एक दिन दिखाया चारों ओर शिव और शक्ति! शिव और शक्ति का रमण! मनुष्यों, जीव-जन्तुओं, वृक्षों और लताओं – सभी में वही शिव और शक्ति – पुरुष और प्रकृति – सर्वत्र इन्हीं का रमण।
“दूसरे दिन दिखाया कि नर-मुण्डों की राशि लगी हुई है! – पर्वताकार – और कहीं कुछ नहीं! उनके बीच में मैं अकेला बैठा हुआ हूँ।
“और एक बार दिखाया, महासमुद्र, मैं नमक का पुतला होकर उसकी थाह लेने जा रहा हूँ! थाह लेते समय श्रीगुरुकृपा से पत्थर बन गया! देखा, एक जहाज़ आ रहा है, बस उमड़ पड़ा! – श्रीगुरुदेव कर्णधार थे।”
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – और अधिक विचार न करो। उससे अन्त में हानि होती है। उन्हें बुलाते समय किसी एक भाव का सहारा लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, सन्तानभाव या वीरभाव।
“मेरा सन्तानभाव है। इस भाव को देखने पर मायादेवी रास्ता छोड़ देती हैं – शर्म से!
“वीरभाव बहुत कठिन है। शाक्त तथा वैष्णव बाउलों का है। उस भाव में स्थिर रहना बहुत कठिन है। फिर हैं – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य तथा मधुरभाव। मधुरभाव में – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य – सब हैं। (मणि के प्रति) तुम्हें कौन भाव अच्छा लगता है?”
मणि – सभी भाव अच्छे लगते हैं।
श्रीरामकृष्ण – सब भाव सिद्ध स्थिति में अच्छे लगते हैं। उस स्थिति में काम की गन्ध तक नहीं रहेगी। वैष्णव-शास्त्र में चण्डीदास तथा धोबिन की कथा है – उनके प्रेम में काम की गन्ध तक न थी।
“इस स्थिति में प्रकृतिभाव होता है।
“अपने को पुरुष मानने की बुद्धि नहीं रहती। मीराबाई के स्त्री होने के कारण रूप गोस्वामीजी उनसे मिलना नहीं चाहते थे। मीराबाई ने कहला भेजा, ‘श्रीकृष्ण ही एकमात्र पुरुष है; वृन्दावन में सभी लोग उस पुरुष की दासियाँ हैं।’ क्या गोस्वामीजी को पुरुषत्व का अभिमान करना उचित था?
सायंकाल के बाद मणि फिर श्रीरामकृष्ण के चरणों के पास बैठे हैं। समाचार आया है कि श्री केशव सेन की अस्वस्थता बढ़ गयी है। उन्हीं के सम्बन्ध में वार्तालाप के
४२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४
सिलसिले में ब्राह्म समाज की बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – हाँ, जी, उनके यहाँ क्या केवल व्याख्यान ही होते हैं, या ध्यान भी? वे अपनी प्रार्थना को शायद कहते हैं ‘उपासना’।
“केशव ने पहले ईसाई धर्म, ईसाई मत का बहुत चिन्तन किया था – उस समय तथा उससे पूर्व वे देवेन्द्र ठाकुर के यहाँ थे।”
मणि – केशव बाबू यदि पहले-पहल यहाँ आये होते, तो समाजसंस्कार पर माथापच्ची न करते। जातिभेद को उठा देना, विधवा विवाह, असवर्ण विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि सामाजिक कामों में उतने व्यस्त न होते।
श्रीरामकृष्ण – केशव अब काली मानते हैं – चिन्मयी काली – आद्याशक्ति। और माँ माँ कहकर उनके नामगुणों का कीर्तन करते हैं। अच्छा, क्या ब्राह्म समाज बाद में सिर्फ सामाजिक संस्कार की ही एक संस्था बन जायगा?
मणि – इस देश की जमीन वैसी नहीं है। जो ठीक है वही यहाँ पर जड़ पा सकेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सनातन धर्म, ऋषिलोग जो कुछ कह गये हैं वही रह जायगा। तथापि ब्राह्म समाज और उसी प्रकार के सम्प्रदाय भी कुछ-कुछ रहेंगे। सभी ईश्वर की इच्छा से हो रहे हैं, जा रहे हैं।
दोपहर के बाद कलकत्ते से कुछ भक्त आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को अनेक गीत सुनाये थे। उनमें से एक गीत का भावार्थ यह है – ‘माँ, तुमने हमारे मुँह में लाल चुसनी देकर भुला रखा है; हम जब चुसनी फेंककर चिल्लाकर रोयेंगे तब तुम हमारे पास अवश्य ही दौड़कर आओगी।’
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – उन्होंने लाल चुसनी का नया ही गाना गाया।
मणि – जी, आपने केशव सेन से इस लाल चुसनी की बात कही थी।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, और चिदाकाश की बात – और भी कई बातें हुआ करती थीं – और बड़ा आनन्द होता था। गाना – नृत्य सब होता था।
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