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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७३

२ अक्टूबर, १८८४परिच्छेद ९५६७३

मणिलाल – केशव बाबू के पितामह रामकमल सेन भक्त थे। तुलसी-कानन में बैठकर नाम-जप करते थे। केशव के पिता प्यारीमोहन भी वैष्णव भक्त थे।

श्रीरामकृष्ण – बाप अगर वैसा न होता तो लड़का कभी इतना भक्त नहीं हो सकता। विजय की अवस्था देखो न।

“विजय का बाप भागवत पढ़ता था तब भावावेश में बेहोश हो जाता था। विजय भी कभी ‘हो हो’ कहता हुआ, उठकर खड़ा हो जाता था।

“आजकल विजय जो कुछ दर्शन कर रहा है, सब ठीक है।

“साकार और निराकार की बात विजय ने कही, जैसे गिरगिट का रंग लाल पीला हर तरह का होता है और फिर कोई भी रंग नहीं रहता, उसी तरह साकार और निराकार हैं।

सरलता तथा ईश्वर-प्राप्ति

“विजय बड़ा सरल है। खूब उदार और सरल हुए बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते।

“कल विजय अधर सेन के यहाँ गया हुआ था। व्यवहार ऐसा था, जैसे अपना मकान हो – सब अपने आदमी हों।

“विषय-बुद्धि के गये बिना कोई उदार और सरल नहीं होता।

“मिट्टी बनायी हुई न हो, तो उसके बरतन नहीं बन सकते। भीतर बालू या कंकड़ के रहने पर बरतन चिटक जाते हैं; इसीलिए कुम्हार पहले मिट्टी बनाता है।

“आईने में गर्द पड़ गयी हो तो उसमें मुँह नहीं दिखायी पड़ता। चित्त-शुद्धि के हुए बिना अपने स्वरूप के दर्शन नहीं होते।

“देखो न, जहाँ अवतार है वहीं सरलता है। नन्द, दशरथ, ये सब सरल थे।

“वेदान्त कहता है, बुद्धि की शुद्धि हुए बिना ईश्वर के जानने की इच्छा नहीं होती। अन्तिम जन्म या अर्जित तपस्या के बिना उदारता या सरलता नहीं आती।”

(६)

श्रीरामकृष्ण की बालक जैसी अवस्था। वेदान्त-विचार

श्रीरामकृष्ण के पैर फूले हुए हैं। इसके लिए वे एक बालक समान चिन्ता कर रहे हैं।

सींती के महेन्द्र कविराज आये और उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण – (प्रिय मुखर्जी आदि भक्तों से) – कल नारायण से मैंने कहा, ‘तू अपने पैर में उँगली गड़ाकर जरा देख तो सही, उँगली का निशान बनता है या नहीं।’ उसने गड़ाकर देखा तो निशान बन गया। तब मेरे जी में जी आया कि मेरे पैरों का फूलना भी कुछ नहीं है। (मुखर्जी से) तुम भी जरा अपने पैर में उसी तरह उँगली गड़ाओं। गड्ढा हुआ ?

६७४ श्रीरामकृष्णवचनामृतँ २ अक्टूबर, १८८४

मुखर्जी – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – अब मेरा जी ठिकाने हुआ।

मणि मल्लिक – आप बहते हुए पानी में नहाया कीजिये। दवा की क्या जरूरत है?

श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, तुम्हारा अभी खून ताज़ा है, तुम्हारी बात ही कुछ और है?

“मुझे बच्चे की अवस्था में रखा है।

“एक दिन घास के जंगल में मुझे किसी कीड़े ने काट लिया। मैंने सुना था, साँप अगर दो बार काटे तो विष निकाल लेता है। इसी ख्याल से बिलों में हाथ डालता फिरता था। एक ने आकर कहा, 'यह आप क्या कर रहे हैं? – साँप जब उसी जगह फिर काटता है, तब विष निकाल लेता है। दूसरी जगह काटने से नहीं होता।'

“मैंने सुना था, शरद् काल की ओस लगाना अच्छा है। उस दिन कलकत्ते से आते हुए गाड़ी में से सिर निकालकर मैंने खूब ओस लगायी। (सब हँसते हैं।)

(सींती के महेन्द्र से) “तुम्हारे सींती के वे पण्डितजी अच्छे हैं। वेदान्तवागीश हैं, मुझे मानते हैं। जब मैंने कहा, तुमने तो खूब अध्ययन किया है – परन्तु 'मैं अमुक पण्डित हूँ', ऐसे अभिमान का त्याग करना, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ।

“उसके साथ वेदान्त की बातें हुईं।

(मास्टर से) “जो शुद्ध आत्मा हैं, वे निर्लिप्त हैं। उनमें माया या अविद्या है। इस माया के भीतर तीन गुण हैं – सत्त्व, रज और तम। जो शुद्ध आत्मा हैं उन्हीं में ये तीनों गुण हैं; किन्तु फिर भी वे निर्लिप्त हैं। आग में अगर आसमानी रंग की बड़ी डाल दो तो उसकी शिखा उसी रंग की दीख पड़ती है। लाल बड़ी छोड़ो तो शिखा भी लाल हो जाती है। परन्तु आग का अपना कोई रंग नहीं है।

“पानी में आसमानी रंग डालो तो आसमानी रंग हो जायेगा और फिटकरी छोड़ो तो वही पानी का रंग रहता है।

“चाण्डाल मांस का भार लिये जा रहा था। उसने आचार्य शंकर को छू लिया। शंकर ने ज्योंही कहा – 'तूने मुझे छू लिया?' चाण्डाल बोला – 'महाराज, न तुम्हें मैंने छुआ और न मुझे तुमने। तुम तो शुद्ध आत्मा हो – निर्लिप्त हो।'

“जड़भरत ने भी ऐसी ही बातें राजा रहूगण से कही थीं।

“शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है और शुद्ध आत्मा को कोई देख नहीं सकता। पानी में नमक घोला हुआ हो तो आँखें नमक को देख नहीं सकतीं।

“जो शुद्ध आत्मा हैं, वही महाकारण – कारण का कारण हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ये इतने हैं। पाँच भूत स्थूल हैं। मन, बुद्धि और अहंकार सूक्ष्म हैं। प्रकृति अथवा आद्याशक्ति सब की कारणरूपिणी है। ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण का कारण है।

“यही शुद्ध आत्मा हमारा स्वरूप है।