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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२९ मार्च, १८८३ | परिच्छेद २७ | १६९

२९ मार्च, १८८३परिच्छेद २७१६९

ही हो जाएगा।

"एक दूसरे दिन 'निमाई-संन्यास' का अभिनय था। केशव के घर में मैं भी देखने के लिए गया था। केशव के कुछ खुशामदी चेलों ने अभिनय बिगाड़ डाला था। एक ने केशव से कहा 'कलिकाल के चैतन्य तो आप ही हैं'। केशव मेरी ओर देखकर हँसता हुआ कहने लगा, 'तो फिर ये क्या हुए?' मैंने कहा, 'मैं तुम्हारे दासों का दास – रज की रज हूँ।' केशव को नाम और यश की अभिलाषा थी!"

नरेन्द्र आदि नित्यसिद्ध हैं – उनकी जन्मजात भक्ति

श्रीरामकृष्ण (अमृत और त्रैलोक्य से) – नरेन्द्र और राखाल आदि ये जो लड़के हैं, ये नित्यसिद्ध हैं। ये जन्म-जन्मान्तर से ईश्वर के भक्त हैं। अनेक लोगों को बड़ी साधना के बाद कहीं थोड़ीसी भक्ति प्राप्त होती है, परन्तु इन्हें जन्म से ही ईश्वर पर अनुराग है। मानो स्वयम्भू शिव हैं – बैठाये हुए शिव नहीं।

"नित्यसिद्धों का एक दर्जा ही अलग है। सभी चिड़ियों की चोंच टेढ़ी नहीं होती। ये कभी संसार में नहीं फँसते, जैसे प्रह्लाद।

"साधारण मनुष्य साधना करता है, ईश्वर पर भक्ति भी करता है, और संसार में भी फँस जाता है, स्त्री और धन के लिए भी हाथ लपकाता है। मक्खी जैसे फूल पर भी बैठती है, बर्फियों पर भी बैठती है और विष्ठा पर भी बैठती है। (सब स्तब्ध हैं।)

"नित्यसिद्ध तो मधुमक्खी की तरह होते हैं। मधुमक्खियाँ केवल फूल पर बैठती हैं और मधु ही पीती हैं। नित्यसिद्ध रामरस का ही पान करते हैं, विषयरस की ओर नहीं जाते।

"साधना द्वारा जो भक्ति प्राप्त होती है, इनकी वह भक्ति नहीं है। इतना जप, इतना ध्यान करना होगा, इस तरह पूजा करनी होगी, यह सब विधिवादीय भक्ति है। जैसे किसी गाँव में किसी को जाना है, परन्तु रास्ते में धनहे खेत पड़ते हैं, तो मेड़ों से घूमकर उसे जाना पड़ता है। अगर किसी को सामनेवाले गाँव में जाना है, परन्तु रास्ते में नदी पड़ती है, तो टेढ़ा रास्ता चक्कर लगाते हुए ही पार करना पड़ता है।

"रागभक्ति, प्रेमाभक्ति, ईश्वर पर आत्मीयों की-सी प्रीति होने पर फिर कोई विधिनियम नहीं रह जाता। तब का जाना धनहे खेतों की मेड़ों पर का जाना नहीं, किन्तु कटे हुए खेतों से सीधा निकल जाना है। चाहे जिस ओर से सीधे चले जाओ। बाढ़ आने पर फिर नदी के टेढ़े रास्ते से नहीं जाना पड़ता। तब इधर उधर की जमीन और रास्ते पर एक बाँस पानी चढ़ जाता है। तब तो बस सीधे नाव चलाकर पार हो जाओ।

"इस रागभक्ति, अनुराग या प्रेम के बिना ईश्वर नहीं मिलते।"

१७०श्रीरामकृष्णवचनामृत२१ मार्च, १८८३

समाधितत्त्व – सविकल्प और निर्विकल्प

अमृत – महाराज! इस समाधि-अवस्था में भला आपको क्या जान पड़ता है?

श्रीरामकृष्ण – सुना नहीं? भौंरे की चिन्ता करते करते झींगुर भौंरा ही बन जाता है। वह अनुभव कैसा होता है जानते हो? मानो हण्डी की मछली को गंगा में छोड़ दिया हो।

अमृत – क्या जरा भी अहंकार नहीं रह जाता?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, बहुधा मेरा कुछ अहंकार रह जाता है। सोने के एक टुकड़े को तुम चाहे जितना घिस डालो पर अन्त में एक छोटासा कण बचा ही रहता है। और, जैसे कोई बड़ी भारी अग्निराशी है, उसकी एक जरासी चिनगारी हो। बाह्य ज्ञान चला जाता है, परन्तु प्रायः थोड़ासा अहंकार रह जाता है, शायद वे विलास के लिए रख छोड़ते हैं। ‘मैं’ और ‘तुम’ इन दोनों के रहने ही से स्वाद मिलता है। कभी कभी इस ‘अहं’ को भी वे मिटा देते हैं। इसे ‘जड़ समाधि’ या ‘निर्विकल्प समाधि’ कहते हैं। तब क्या अवस्था होती है, यह कहा नहीं जा सकता! नमक का पुतला समुद्र नापने गया था। ज्योंही समुद्र में उतरा कि गल गया। ‘तदाकाराकारित’! अब लौटकर कौन बतलाये कि समुद्र कितना गहरा है!

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