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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१५

२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१५

दो, उन्हें आम मुखत्यारी दे दो! वे जो कुछ अच्छा समझें, करें। बड़े आदमी पर अगर भार दे दिया जाय, तो वह कभी बुराई नहीं कर सकता।

“साधना की भी आवश्यकता है। परन्तु साधक दो तरह के होते हैं। एक तरह के साधकों का स्वभाव बन्दर के बच्चे जैसा होता है, दूसरे तरह के साधक का बिल्ली के बच्चे जैसा। बन्दर का बच्चा किसी तरह खुद अपनी माँ को पकड़े रहता है। इसी तरह कोई साधक सोचते हैं, हमें इतना जप करना चाहिए, इतनी देर तक ध्यान करना चाहिए, इतनी तपस्या करनी चाहिए, तब कहीं ईश्वर मिलेंगे। इस तरह के साधक अपने प्रयत्न से ईश्वर-प्राप्ति की आशा रखते हैं।

“परन्तु बिल्ली का बच्चा खुद अपनी माँ को नहीं पकड़ सकता। वह पड़ा हुआ बस ‘मीऊँ मीऊँ’ करके पुकारता है। उसकी माँ चाहे जो करे। उसकी माँ कभी उसे बिस्तर पर ले जाती है, कभी छत पर लकड़ी की आड़ में रख देती है, और कभी उसे मुँह में दबाकर यहाँ-वहाँ रखती फिरती है। वह स्वयं अपनी माँ को पकड़ना नहीं जानता। इसी तरह कोई कोई साधक स्वयं हिसाब करके साधन-भजन नहीं कर सकते कि इतना जप करूँगा, इतना ध्यान करूँगा। वह केवल व्याकुल होकर रो-रोकर उन्हें पुकारता है। उसका रोना सुनकर वे फिर रह नहीं सकते। आकर दर्शन देते हैं।”

(२)

ईश्वर कर्ता हैं, तथापि कर्मों के लिए जीव उत्तरदायी है।

दिन चढ़ आया है। घर के मालिक ने भोजन के लिए घर में कच्ची रसोई का सामान तैयार कराया है। वे बड़े व्यस्त हैं। वे घर के भीतर जाकर भोजन का प्रबन्ध कर रहे हैं।

दिन बहुत हो गया है, इसीलिए श्रीरामकृष्ण भोजन के लिए जल्दी कर रहे हैं। वे उसी कमरे में टहल रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। कभी कभी केशव कीर्तनिया से वार्तालाप कर रहे हैं।

केशव कीर्तनिया – वही करण और वही कारण हैं; दुर्योधन ने कहा था,

‘त्वया हृषीकेश हृदिस्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।’

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, वही सब कराते हैं; यह ठीक है। कर्ता वही हैं, मनुष्य तो यन्त्र-स्वरूप है।

“और यह भी ठीक है कि कर्मफल भी है। मिर्च खाने पर पेट जलता रहेगा। पाप करने से उसका फल अवश्य भोगना होगा।

“जिसे सिद्धि हो गयी है, जिसने ईश्वर को पा लिया है, वह फिर पाप नहीं कर सकता। उसके पैर बेताल नहीं पड़ते। जिसका सधा हुआ गला है, उसके स्वर में सा रे ग म बिगड़ने नहीं पाता।”

४१६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३

भोजन तैयार है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ मकान के भीतर गए और उन्होंने आसन ग्रहण किया। ब्राह्मण का मकान है व्यंजन कई तरह के तैयार कराये गए हैं, ऊपर से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ भी लायी गयी हैं।

दिन के तीन बजे का समय होगा। भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के बैठकखाने में आकर बैठे। पास में श्रीश और मास्टर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण श्रीश के साथ फिर बातचीत करने लगे।

श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा क्या भाव है? सोऽहं या सेव्य-सेवक?

“संसारियों के लिए सेव्य-सेवक का भाव बहुत अच्छा है। सब सांसारिक काम तो कर रहे हैं, ऐसी अवस्था में ‘मैं वही हूँ’ यह भाव कैसे आ सकता है? जो कहता है, ‘मैं वही हूँ’, उसके लिए तो संसार स्वप्नवत् है; उसका अपना शरीर और मन भी स्वप्नवत् है, उसका ‘मैं’ भी स्वप्नवत् है; अतएव संसार का काम वह नहीं कर सकता। इसीलिए सेव्य-सेवक भाव, दास-भाव बहुत अच्छा है।

“दास-भाव हनुमान का था। श्रीराम से हनुमान ने कहा था ‘राम, कभी तो मैं सोचता हूँ, तुम पूर्ण हो – मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो – मैं दास हूँ, और जब तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब देखता हूँ, मैं ही तुम हूँ, और तुम्हीं मैं हो।’

“तत्त्वज्ञान के समय सोऽहम् हो सकता है, परन्तु वह दूर की बात है।”

श्रीश – जी हाँ, दास-भाव से आदमी निश्चिन्त हो सकता है। प्रभु पर सब कुछ निर्भर है। कुत्ता बड़ा स्वामिभक्त है, इसीलिए स्वामी पर सब भार देकर वह निश्चिन्त रहता है।

साकार निराकार – नाममाहात्म्य

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हें साकार ज्यादा पसन्द है या निराकार? बात यह है कि जो निराकार है, वही साकार भी है। भक्त की आँखों को वे साकार रूप से दर्शन देते हैं। जैसे अनन्त जलराशि, महासमुद्र, जिसका न ओर है न छोर; उसी जल में कहीं कहीं बर्फ जम गयी है; ज्यादा ठण्डक पहुँचने पर पानी जमकर बर्फ हो जाता है। उसी तरह भक्ति-हिम द्वारा साकार रूप के दर्शन होते हैं। फिर जिस तरह सूर्योदय होने पर बर्फ गल जाती है – ज्यों का त्यों पानी हो जाता है, उसी तरह ज्ञानमार्ग या विचार-मार्ग से होकर जाने पर साकार रूप के दर्शन नहीं होते, फिर तो सब निराकार ही निराकार दीख पड़ता है। ज्ञान-सूर्योदय होने पर साकार बर्फ गल जाती है।

“परन्तु देखो, जिसकी निराकार सत्ता है, उसी की साकार भी है।”

शाम होने को है। श्रीरामकृष्ण उठे। अब दक्षिणेश्वर को लौटनेवाले हैं। बैठकखाने के दक्षिण ओर जो बरामद़ा है, उसी पर खड़े होकर ईशान से बातचीत कर रहे हैं। वहीं