श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६९
२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६९
श्रीरामकृष्ण – क्या तुम पैदल आ रहे हो? कहाँ रहते हो?
ठाकुरदादा – जी हाँ, वराहनगर में रहता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ क्या कोई काम था?
ठाकुरदादा – जी, आपके दर्शन करने आया हूँ। उन्हें पुकारता हूँ, परन्तु बीच बीच में अशान्ति क्यों होती है? दो-चार दिन तो आनन्द में रहता हूँ, परन्तु उसके बाद फिर अशान्ति क्यों होने लगती है?
कारीगर; मन्त्र में विश्वास; हरिभक्ति; ज्ञान के दो लक्षण
श्रीरामकृष्ण – मैं समझ गया। पटरी ठीक नहीं बैठती। कारीगर दाँत में दाँत ठीक बैठा देता है तब होता है। शायद कहीं कुछ अटक रहा है।
ठाकुरदादा – जी हाँ, ऐसी ही अवस्था हुई है।
श्रीरामकृष्ण – क्या तुम मन्त्र ले चुके हो?
ठाकुरदादा – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – मन्त्र पर विश्वास तो है?
ठाकुरदादा के एक मित्र ने कहा – ‘ये बहुत अच्छा गाते हैं।’ श्रीरामकृष्ण ने एक गाना गाने के लिए कहा। ठाकुरदादा गा रहे हैं –
“प्रेम-गिरि की कन्दरा में योगी बनकर रहूँगा। वहाँ आनन्द के झरने के पास मैं ध्यान करता हुआ बैठा रहूँगा। तत्त्व-फलों का संग्रह करके मैं ज्ञान की भूख मिटाऊँगा। और वैराग्यकुसुमों से श्रीपादपद्मों की पूजा करूँगा। विरह की प्यास बुझाने के लिए मैं अब कुएँ के पानी के लिए न जाऊँगा, हृदय के पात्र में शान्ति का सलिल भर लूँगा। कभी भाव के शिखर पर चरणामृत पीकर हँसूँगा, रोऊँगा, नाचूँगा और गाऊँगा।”
श्रीरामकृष्ण – वाह, अच्छा गाना है! आनन्द-निर्झर! तत्त्वफल! हँसूँगा, रोऊँगा, नाचूँगा और गाऊँगा!
“तुम्हारे भीतर से गाना कैसा मधुर लग रहा है! – बस और क्या चाहिए!
“संसार में रहने से सुख और दुःख हैं ही – थोड़ी सी अशान्ति तो मिलेगी ही। काजल की कोठरी में रहने से देह में कुछ कालिख लग ही जाती है।”
ठाकुरदादा – जी, मैं अब क्या करूँ, बतला दीजिये।
श्रीरामकृष्ण – तालियाँ बजा-बजाकर सुबह-शाम ईश्वर के गुण गाया करना – नाम लेना ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर।
“एक बार और आना – मेरा हाथ कुछ अच्छा होने पर।”
महिमाचरण ने श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण – (महिमा से) – अहा! उन्होंने एक बड़ा सुन्दर गाना गाया है। गाओ
४७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४
तो जी वही गाना एक बार और।
गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं - 'तुम वही श्लोक एक बार कहो तो जरा, जिसमें ईश्वरभक्ति की बातें हैं।'
महिमाचरण ने, 'अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्', कहकर सुनाया; श्रीरामकृष्ण ने कहा, और वह भी कहो जिसमें 'लभ लभ हरिभक्तिम्' है।
महिमाचरण कहने लगे -
विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शंकरं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥
श्रीरामकृष्ण - शंकर हरि-भक्ति देंगे।
महिमा - पाशमुक्तः सदा शिवः।
श्रीरामकृष्ण - लज्जा, घृणा, भय और संकोच, ये सब पाश हैं, क्यों जी?
महिमा - जी हाँ। गुप्त रखने की इच्छा, प्रशंसा से अत्यधिक सिकुड़ना।
श्रीरामकृष्ण - ज्ञान के दो लक्षण हैं। पहला तो यह कि कूटस्थ बुद्धि हो। लाख दुःख, कष्ट, विपत्तियाँ और विघ्न हों - सब में निर्विकार रहना - जैसे लोहार के यहाँ का लोहा, जिस पर हथौड़ा चलाते हैं। और दूसरा है पुरुषकार - पूरी जिद। काम और क्रोध से अपना अनिष्ट हो रहा है - देखा कि एकदम त्याग!! कछुआ जब अपने हाथ पैर भीतर समेट लेता है, तब उसके चार खण्ड कर डालने पर भी उन्हें वह बाहर नहीं निकालता।
(ठाकुरदादा आदि से) "वैराग्य दो तरह का है। तीव्र वैराग्य और मन्द वैराग्य। मन्द वैराग्य वह है जिसका भाव है, 'होता है - हो जायगा।' तीव्र वैराग्य शान पर लगाये हुए छुरे की धार है - माया के पाशों को तुरन्त काट देता है।
"कोई किसान कितने ही दिनों से मेहनत करता है, परन्तु पानी खेत में आता ही नहीं मन में जिद है ही नहीं! और कोई दो-चार दिन मेहनत करने के बाद - 'आज पानी लाकर दम लूँगा' इस तरह का हठ ठान बैठता है। नहाना-खाना सब बन्द कर देता है। दिन भर मेहनत करने के बाद जब कुल-कुल स्वर से पानी आने लगता है तब उसे कितना आनन्द होता है! तब वह घर जाकर अपनी स्त्री से कहता है - 'ले आ तेल - मालिश करके नहाऊँगा'। नहा-खाकर फिर सुख की नींद सोता है।
"एक की स्त्री ने कहा, 'अमुक को बड़ा वैराग्य हुआ है - तुम्हें कुछ भी न हुआ।' जिसे वैराग्य हुआ था, उसके सोलह स्त्रियाँ थीं, एक एक करके वह सब को छोड़ रहा है।