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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२२ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५३ ३०५

२२ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५३ ३०५

आवरण है, तब तक 'माँ माँ' कहकर पुकारना अच्छा है। तुम माँ हो, मैं तुम्हारी सन्तान हूँ। तुम प्रभु हो, मैं तुम्हारा दास हूँ। सेव्यसेवक-भाव अच्छा है। इसी दासभाव से फिर सभी भाव आते हैं - शान्त, सख्य आदि। मालिक यदि नौकर से प्यार करता है, तो उसे बुलाकर कहता है, 'आ, मेरे पास बैठ, तू जो है, मैं भी वही हूँ;' परन्तु नौकर यदि अपनी इच्छा से मालिक के पास बैठने जाय तो क्या मालिक नाराज न होंगे?

आद्याशक्ति तथा अवतार-लीला। वेद, पुराण एवं तन्त्रों का समन्वय

“अवतार-लीला - ये सब चित्शक्ति के ऐश्वर्य हैं। जो ब्रह्म हैं, वे ही फिर राम, कृष्ण तथा शिव हैं।”

ईशान – हरि और हर, एक ही धातु है, केवल प्रत्यय का भेद है। (सभी हँस पड़े।)

श्रीरामकृष्ण – हाँ, एक के अतिरिक्त दो कुछ भी नहीं है। वेद में कहा है – ॐ सच्चिदानन्दं ब्रह्म; पुराण में कहा है – ॐ सच्चिदानन्दः कृष्णः और तन्त्र में कहा है – ॐ सच्चिदानन्दः शिवः।

“उस चित्शक्ति ने महामाया के रूप में सभी को अज्ञानी बना रखा है। अध्यात्मरामायण में है, राम के दर्शन जितने ऋषियों ने किए वे सभी एक बात कहते थे, – 'हे राम, हमें अपनी भुवनमोहिनी माया द्वारा मुग्ध न करो।'”*

ईशान – यह माया क्या है?

श्रीरामकृष्ण – जो कुछ देखते हो, सुनते हो, सोचते हो, सभी माया है। एक बात में कहना हो तो, कामिनी-कांचन ही माया का आवरण है।

“पान खाना, तम्बाकू पीना, तेल मालिश करना - इनमें दोष नहीं है। केवल इन्हीं का त्याग करने से क्या होगा? कामिनीकांचन के त्याग की आवश्यकता है। वही त्याग है! गृहस्थ लोग बीच बीच में निर्जन स्थान में जाकर साधन-भजन कर भक्ति प्राप्त करके मन से त्याग करें। संन्यासी बाहर भीतर दोनों ओर से त्याग करें।

“केशव सेन से मैंने कहा था, 'जिस कमरे में जल का घड़ा और इमली का अचार है उसी कमरे में यदि सन्निपात का रोगी रहे तो भला वह कैसे अच्छा हो सकता है? बीच बीच में निर्जन स्थान में जाना ही चाहिए।'”

एक भक्त – महाराज, नवविधान ब्राह्मसमाज किस प्रकार है - मानो खिचड़ी जैसा!

श्रीरामकृष्ण – कोई कोई कहते हैं आधुनिक। मैं सोचता हूँ, क्या ब्राह्मसमाजवालों का ईश्वर दूसरा है? कहते हैं नवविधान नया विधान; सो होगा। जिस प्रकार छः दर्शन हैं, षड्दर्शन, उसी प्रकार एक और कुछ होगा।


* अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः। – गीता, ५।१५

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“परन्तु निराकारवादियों की भूल क्या है जानते हो? भूल यह है कि वे कहते हैं, ‘ईश्वर निराकार हैं, और बाकी सारे मत गलत हैं।’ ”

“मैं जानता हूँ, वे साकार निराकार दोनों ही हैं, और भी कितने प्रकार के बन सकते हैं! वे सब कुछ बन सकते हैं।”

(ईशान के प्रति) – “वही चित्शक्ति, वही महामाया चौबीस तत्त्व बनी हुई है। मैं ध्यान कर रहा था, ध्यान करते करते मन चला गया। रसके के घर में। रसके मेहतर है। मन से कहा, ‘अरे, रह, वहीं पर रह’। माँ ने दिखा दिया, उसके घर में जो लोग घूम रहे हैं, वे बाहर का आवरण मात्र हैं, भीतर वही एक कुलकुण्डलिनी, एक षट्चक्र है।

“वह आद्याशक्ति स्त्री है या पुरुष? मैंने उस देश में देखा, लाहाओ के घर पर कालीपूजा हो रही है। माँ के गले में जनेऊ दिया है। एक व्यक्ति ने पूछा, ‘माँ को जनेऊ क्यों है?’ जिसके घर में पूजा है उसने कहा, ‘भाई, तूने माँ को ठीक पहचाना है, परन्तु मैं तो कुछ भी नहीं जानता कि माँ पुरुष है या स्त्री!’

“इस प्रकार कहा जाता है कि महामाया शिव को निगल गयी। माँ के भीतर षट्चक्र का ज्ञान होने पर शिव माँ की जाँघ में से निकल आए। फिर शिव ने तन्त्रों की रचना की।”

“उस चित्शक्ति के, इस महामाया के शरणागत होना चाहिए।”

ईशान – आप कृपा कीजिए।

‘डुबकी लगाओ’। गुरु का प्रयोजन। शास्त्राध्ययन

श्रीरामकृष्ण – सरल भाव से कहो, ‘हे ईश्वर, दर्शन दो’ और रोओ और कहो, ‘हे ईश्वर, कामिनी-कांचन से मन को हटा दो।’

“और डुबकी लगाओ। ऊपर ऊपर बहने से या तैरने से क्या रत्न मिलता है? डुबकी लगानी पड़ती है।”

“गुरु से पता लेना चाहिए। एक व्यक्ति बाणलिंग शिव की खोज कर रहा था। किसी ने कह दिया, ‘अमुक नदी के किनारे जाओ, वहाँ पर एक वृक्ष देखोगे, उस वृक्ष के पास एक भँवर है। वहाँ पर डुबकी लगानी होगी, तब बाणलिंग शिव मिलेगा।’ इसीलिए गुरु से पता जान लेना चाहिए।”

ईशान – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – सच्चिदानंद ही गुरु के रूप में आते हैं। मनुष्य गुरु से यदि कोई दीक्षा लेता है, तो उन्हें मनुष्य मानने से कुछ नहीं होगा। उन्हें साक्षात् ईश्वर मानना होगा, तभी मन्त्र पर विश्वास होगा। विश्वास हुआ कि सब कुछ हो गया! शूद्र एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य बनाकर वन में बाण चलाना सीखा था। मिट्टी के द्रोण की पूजा करता था –

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साक्षात् द्रोणाचार्य मानकर। इसी से वह धनुर्विद्या में सिद्ध हो गया!

“और तुम ब्राह्मण-पण्डितों को लेकर अधिक झमेला न किया करो। उन्हें चिन्ता है दो पैसे पाने की!”

“मैंने देखा है, ब्राह्मण स्वस्त्ययन करने आया है; चण्डीपाठ या और कुछ पाठ कर रहा है - पर आधे पन्ने वैसे ही उलटता जा रहा है। (सभी हँस पड़े।)

“अपनी हत्या एक छोटी नहरनी से भी हो सकती है। दूसरों को मारने के लिए ढाल-तलवार चाहिए। - शास्त्रग्रन्थादि का यही हेतु है।”

“बहुतसे शास्त्रों की भी कोई आवश्यकता नहीं है। यदि विवेक न हो तो केवल पाण्डित्य से कुछ नहीं होता, षट्शास्त्र पढ़कर भी कुछ नहीं होता। निर्जन में, एकान्त में, गुप्त रूप से रो-रोकर उन्हें पुकारो, वे ही सब कुछ कर देंगे।”

श्रीरामकृष्ण ने सुना है, ईशान भाटपाड़ा में पुरश्चरण करने के लिए गंगा के तट पर कुटिया बना रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (व्यग्र भाव से ईशान के प्रति) – क्यों जी, क्या कुटिया बन गयी? जानते हो, ये सब काम लोगों से जितने छिपे रहें, उतना ही अच्छा है। जो लोग सतोगुणी हैं, वे ध्यान करते हैं मन में, कोने में, वन में; कभी तो मच्छरदानी के भीतर ही बैठे ध्यान करते हैं।

हाजरा महाशय को ईशान बीच बीच में भाटपाड़ा ले जाते हैं। हाजरा महाशय छूतधर्मी की तरह आचरण करते हैं। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें वैसा करने से मना किया था।

श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और देखो, अधिक छूतधर्म का आचरण मत करो। एक साधु को बड़ी प्यास लगी थी। भिश्ती जल लेकर जा रहा था; उसने साधु को जल देना चाहा। साधु ने कहा, 'क्या तुम्हारी मशक साफ है?' भिश्ती बोला, 'महाराज, मेरी मशक खूब साफ है! परन्तु आपकी मशक के भीतर मल-मूत्र आदि अनेक प्रकार के मैल हैं। इसलिए कहता हूँ, मेरी मशक से जल पीजिए, इससे दोष न लगेगा।' आपकी मशक अर्थात् आपकी देह, आपका पेट।

“और उनके नाम पर विश्वास रखो। तो फिर तीर्थ आदि की भी आवश्यकता न होगी।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण भाव में विभोर होकर गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) – “यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे शरीर का अन्त हो तो गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि कौन चाहता है? जो तीनों समय काली का नाम लेता है, वह क्या पूजा-सन्ध्या चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में रहकर भी पता नहीं पाती। कालीनाम के इतने गुण हैं कि कौन उसका पार पा सकता है। उन गुणों को देवाधिदेव महादेव पंचमुखों से गाते हैं। दया, व्रत, दान आदि और किसी में भी मन नहीं जाता, मदन

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का यज्ञ-याग ब्रह्ममयी के पादपद्म में है।”

ईशान सब सुनकर चुप होकर बैठे हैं।

बालक के समान विश्वास। जनक के समान, पहले साधन फिर संसार में ईश्वर लाभ।

श्रीरामकृष्ण (ईशान के प्रति) – और भी सन्देह हो तो पूछ लो।

ईशान – जी, आपने जो कहा है – विश्वास!

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक विश्वास के द्वारा ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। और पूरा विश्वास करने पर और भी शीघ्र प्रगति होती है। गौ यदि चुन-चुनकर खाती है तो दूध कम देती है, सभी प्रकार के घास-पत्ते खाने पर वह अधिक दूध देती है।

“राजकृष्ण बनर्जी के लड़के ने एक कहानी सुनायी थी कि एक व्यक्ति को आदेश हुआ कि इस भेड़ में ही तू अपना इष्ट देखना। उसने इसी पर विश्वास किया। सर्वभूतों में वे ही विराजमान हैं।”

“गुरु ने भक्त से कह दिया कि राम ही घट घट में विराजमान हैं। भक्त का उसी समय विश्वास हो गया! जब देखा एक कुत्ता मुँह में रोटी लेकर भाग रहा है, तो भक्त घी का पात्र हाथ में लेकर पीछे पीछे दौड़ता है और कहता है, 'राम, थोड़ा ठहरो, रोटी में घी तो लगा दूँ!'

“अहा! कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास था! कहा करता था, ‘ॐ कृष्ण ॐ राम’ इस मन्त्र का उच्चारण करने पर करोड़ों सन्ध्या-वन्दन का फल होता है।”

“फिर मुझे कृष्णकिशोर कान में कहा करता था, 'कहना नहीं किसी से; मुझे सन्ध्या-पूजा अच्छी नहीं लगती।”

“मुझे भी वैसा ही होता है। माँ दिखा देती हैं कि वे ही सब कुछ बनी हुई हैं। शौच के बाद मैदान से आ रहा था पंचवटी की ओर, देखा साथ साथ एक कुत्ता आ रहा है; तब पंचवटी के पास आकर थोड़ी देर खड़ा रहा; सोचा, शायद माँ इसके द्वारा कुछ कहलाए!

“इसलिए जैसा तुमने कहा, विश्वास से ही सब कुछ मिलता है।”

ईशान – परन्तु हम तो गृहस्थाश्रम में हैं।

श्रीरामकृष्ण – क्या हानि है! उनकी कृपा होने पर असम्भव भी सम्भव हो जाता है। रामप्रसाद ने गाना गाया था, यह संसार धोखे की टट्टी है। उसका उत्तर किसी दूसरे ने एक दूसरे गाने में दिया था -

(भावार्थ) – “‘यह संसार आनन्द की कुटिया है। मैं खाता, पीता और आनन्द करता हूँ। जनक राजा बड़े तेजस्वी थे, उन्हें किस बात की कमी थी, वे तो दोनों ओर संभाले रखकर आनन्द से दूध पीते थे।’

“परन्तु पहले निर्जन में गुप्त रूप से साधन-भजन करके ईश्वर को प्राप्त करने के