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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

२२ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ६७ | ३९५

२२ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६७३९५

है, उसे मन्थन करना पड़ता है। राई में तेल है, उसे पेरना पड़ता है। मेहदी से हाथ लाल होता है, उसे पीसना पड़ता है।'

भक्त (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – अच्छा, वे साकार हैं या निराकार?

श्रीरामकृष्ण – ठहरो, पहले कलकत्ता तो जाओ, तभी तो जानोगे कि कहाँ है किले का मैदान, कहाँ एशियाटिक सोसायटी है और कहाँ बंगाल बैंक है।

“खड़दा ब्राह्मण-मुहल्ले में जाने के लिए पहले तो खड़दा पहुँचना ही होगा!

“निराकार साधना होगी क्यों नहीं? परन्तु बड़ी कठिन है। कामिनी-कांचन का त्याग हुए बिना नहीं होता! बाहर त्याग, फिर भीतर त्याग! विषयबुद्धि का लवलेश रहते काम नहीं बनेगा।

“साकार की साधना सरल है – परन्तु उतनी सरल भी नहीं है।

“निराकार साधना, ज्ञानयोग की साधना की चर्चा भक्तों के पास नहीं करनी चाहिए। बड़ी कठिनाई से उसे थोड़ीसी भक्ति प्राप्त हो रही है; उसके पास यह कहने से कि सब कुछ स्वप्नतुल्य है, उसकी भक्ति की हानि होती है।

“कबीरदास निराकारवादी थे। शिव, काली, कृष्ण को नहीं मानते थे। वे कहते थे, काली चावल-केला खाती है, कृष्ण गोपियों के हथेली बजाने पर बन्दर की तरह नाचते थे। (सभी हँस पड़े।)

“निराकार साधक मानो पहले दशभुजा का दर्शन करते हैं, उसके बाद चतुर्भुज का, उसके बाद द्विभुज गोपाल का और अन्त में अखण्ड ज्योति का दर्शन कर उसी में लीन होते हैं।

“कहा जाता है, दत्तात्रेय, जड़भरत ब्रह्मदर्शन के बाद नहीं लौटे।

“कहते हैं कि शुकदेव ने उस ब्रह्मसमुद्र की एक बूँद मात्र का आस्वादन किया था। समुद्र की तरंगों की उछल-कूद देखी थी, गर्जना सुनी थी, परन्तु समुद्र में डूबे न थे।

“एक ब्रह्मचारी ने कहा था, बद्रीकेदार के उस पार जाने से शरीर नहीं रहता। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान के बाद फिर शरीर नहीं रहता। इक्कीस दिनों में मृत्यु हो जाती है।

“दीवाल के उस पार अनन्त मैदान है। चार मित्रों ने दीवाल के उस पार क्या है, यह देखने की चेष्टा की। एक-एक व्यक्ति दीवाल पर चढ़ता है; उस मैदान को देखकर ‘हो हो’ करके हँसता हुआ दूसरी ओर कूद जाता है। तीन व्यक्तियों ने कोई खबर न दी। सिर्फ एक ने खबर दी। ब्रह्मज्ञान के बाद भी उसका शरीर रहा, लोकशिक्षा के लिए – जैसे अवतार आदि का।

“हिमालय के घर में पार्वती ने जन्मग्रहण किया, और अपने अनेक रूप पिता को दिखाने लगीं। हिमालय ने कहा, ‘बेटी, ये सब रूप तो देखे। परन्तु तुम्हारा एक ब्रह्मस्वरूप है – उसे एकबार दिखा दो।’ पार्वती ने कहा, ‘पिताजी, यदि तुम ब्रह्मज्ञान

३९६श्रीरामकृष्णवचनामृत२२ दिसम्बर, १८८३

चाहते हो तो संसार छोड़कर सत्संग करना पड़ेगा।'

“पर हिमालय किसी भी तरह संसार नहीं छोड़ते थे। तब पार्वतीजी ने एक बार अपना ब्रह्मस्वरूप दिखाया। देखते ही गिरिराज एकदम मूर्छित हो गए।

भक्तियोग

“यह जो कुछ कहा, सब तर्क-विचार की बातें हैं। ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ यही विचार है। सब स्वप्न की तरह है बड़ा कठिन मार्ग है। इस पथ में उनकी लीला स्वप्न जैसी मिथ्या बन जाती है। फिर ‘मैं’ भी उड़ जाता है। इस पथ में अवतार भी नहीं माना जाता। बड़ा कठिन है। ये सब विचार की बातें भक्तों को अधिक सुननी नहीं चाहिए।

“इसीलिए ईश्वर अवतीर्ण होकर भक्ति का उपदेश देते हैं – शरणागत होने के लिए कहते हैं। भक्ति से, उनकी कृपा से सभी कुछ हो जाता है – ज्ञान, विज्ञान सब कुछ होता है।

“वे लीला कर रहे हैं – वे भक्त के अधीन हैं। ‘माँ भक्त की भक्तिरूपी रस्सी से स्वयं बँधी हुई हैं।’

“ईश्वर कभी चुम्बक बनते हैं, भक्त सूई होता है। फिर कभी भक्त चुम्बक और वे सूई होते हैं। भक्त उन्हें खींच लेते हैं – वे भक्तवत्सल, भक्ताधीन हैं।

“एक मत यह है कि यशोदा तथा अन्य गोपीगण पूर्वजन्म में निराकारवादी थीं। उससे उनकी तृप्ति न हुई, इसीलिए उन्होंने वृन्दावनलीला में श्रीकृष्ण को लेकर आनन्द किया। श्रीकृष्ण ने एक दिन कहा, ‘तुम्हें नित्यधाम का दर्शन कराऊँगा, चलो, यमुना में स्नान करने चलें!’ ज्योंही उन्होंने डुबकी लगायी – एकदम गोलोक का दर्शन! फिर उसके बाद अखण्ड ज्योति का दर्शन! तब यशोदा बोलीं, ‘कृष्ण, ये सब और अधिक देखना नहीं चाहती, अब तेरे उसी मानवरूप का दर्शन करूँगी, तुझे गोदी में लूँगी, खिलाऊँगी!!’

“इसीलिए अवतार में उनका अधिक प्रकाश है। अवतार का शरीर रहते उनकी पूजा-सेवा करनी चाहिए। ‘वह जो कोठरी के भीतर चोर-कोठरी है, भोर होते ही वह उसमें छिप जाएगा रे!’

“अवतार को सभी लोग नहीं पहचान सकते। देहधारण करने पर रोग, शोक, क्षुधा, तृष्णा सभी कुछ होता है, ऐसा लगता है मानो वे हमारी ही तरह हैं! राम सीता के शोध में रोये थे - ‘पंचभूत के फन्दे में पड़कर ब्रह्म भी रोते हैं।’

“पुराण में कहा है, हिरण्याक्ष-वध के बाद वराह-अवतार बच्चों को लेकर रहने लगे – उन्हें स्तनपान करा रहे थे। (सभी हँसे।) स्वधाम में जाने का नाम तक नहीं। अन्त में शिव ने आकर त्रिशूल द्वारा उनके शरीर का विनाश किया, तब वे हँसते हुए स्वधाम में पधारे।”