श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२१ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९२ । ६३३
२१ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९२ । ६३३
इसके खाने की विशेष असुविधा नहीं है।
“शायद उन लोगों के सामने मैंने बाबूराम से कहा था, नारायण के लिए और अपने लिए ये सन्देश रख दे। इसके बाद गणी की माँ और वे सब कहने लगीं - ‘नारायण अपनी माँ को नित्य प्रति यहाँ आने के लिए नाव का किराया माँगकर परेशान किया करता है।’
“मुझसे कहा आप नारायण से कहिये जिससे विवाह करे। इस बात पर मैंने कहा, ये सब भाग्य की बातें हैं। क्यों मैं ऐसी बात के लिए जोर दूँ? (सब हँसते हैं।)
“नारायण अच्छी तरह पढ़ने में जी नहीं लगाता। इस पर उसने कहा, आप कहिये, जरा अच्छी तरह पढ़े। मैंने कहा, पढ़ना रे! तब उसने कहा, जरा अच्छी तरह कहिये। (सब हँसते हैं।)
(चुनी से) “क्यों जी भला गोपाल क्यों नहीं आता?”
चुनी – उसे खून जा रहा है – आँव के साथ।
श्रीरामकृष्ण – दवा खा रहा है न?
श्रीरामकृष्ण आज स्टार थियेटर में ‘चैतन्यलीला’ नाटक देखने जायेंगे। (पहले स्टार थियेटर का अभिनय जहाँ पर होता था, वहाँ आजकल कोहिनूर थियेटर है।) महेन्द्र मुखर्जी के साथ उन्ही की गाड़ी पर चढ़कर अभिनय देखने जायेंगे। कहाँ बैठने पर अच्छी तरह दीख पड़ता है, यही बात हो रही है। किसी ने कहा, एक रुपयेवाली जगह से खूब दीख पड़ता है। राम ने कहा, ये ‘बाक्स’ से देखेंगे।
श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं। किसी किसी ने कहा, वेश्याएँ अभिनय करती है। चैतन्यदेव, निताई, इनका पार्ट वे ही करती है।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – मैं उन्हे माँ आनन्दमयी देखूँगा।
“वे चैतन्य सजकर निकली हैं तो इससे क्या हुआ? नकली फल देखिये तो यथार्थ फल की बात याद आ जाती है।
“किसी भक्त ने रास्ते पर जाते हुए देखा, कुछ बबूल के पेड़ थे। देखते ही भक्त को भावावेश हो गया। उसे यह याद आया कि इसकी लकड़ी से श्यामसुन्दर के बगीचे की कुदार के लिए अच्छा बेंट हो सकता है। उसे श्यामसुन्दर की बात याद आ गयी थी। जब किले के मैदान में मुझे बेलून दिखाने के लिए ले गये थे, तब एक साहब का लड़का पेड़ के सहारे तिरछा होकर खड़ा था। उसे देखने के साथ ही कृष्ण की उद्दीपना हो गयी और मैं समाधिमग्न हो गया।
“चैतन्यदेव मेड़गाँव से होकर जा रहे थे। सुना, गाँव की मिट्टी से खोल बनते हैं। सुनने के साथ ही उन्हें भावावेश हो गया था।
“श्रीमती (राधा) मेघ या मोरों की गरदन देख लेने पर फिर स्थिर नहीं रह सकती
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थीं। श्रीकृष्ण की ऐसी उद्दीपना होती थी कि उनका बाह्यज्ञान लुप्त हो जाता था।
श्रीरामकृष्ण जरा देर चुपचाप बैठे हैं। कुछ देर बाद फिर बातचीत करते हैं – “श्रीमती को महाभाव होता था। गोपियों के प्रेम में कोई कामना नहीं है। जो सच्चा भक्त है, वह कोई कामना नहीं करता। केवल शुद्धा भक्ति की प्रार्थना करता है। कोई शक्ति या विभूति नहीं चाहता।”
(२)
तोतापुरीजी की शिक्षा - अष्ट सिद्धियाँ ईश्वर-लाभ में विघ्नरूप हैं
श्रीरामकृष्ण – विभूति का होना एक आफत है। नागे (तोतापुरी) ने मुझे सिखलाया – एक सिद्ध समुद्र के तट पर बैठा हुआ था। उसी समय एक तूफान आया। तूफान से कष्ट होने का भय हुआ। उसने कहा, 'तूफान रुक जा।' उसकी बात झूठ होने की नहीं थी, तूफान रुक गया। उधर एक जहाज जा रहा था। उसमें पाल लगा हुआ था। तूफान ज्योंही एकाएक रुक गया कि जहाज डूब गया। जहाज भर के आदमी उसीके साथ डूब गये। अब इतने आदमियों के मरने से जो पाप होने को था, सब उसी को हुआ। उसी पाप से उसकी विभूति भी चली गयी और उसे नरक भी हुआ।
“एक साधु के बहुत सी विभूतियाँ हुई थीं। और उनका उसे अहंकार भी था, परन्तु था वह कुछ अच्छा आदमी। उसमें तपस्या भी थी। भगवान् छद्मवेश धारण कर एक दिन साधु के पास आये। आकर कहा, महाराज, मैंने सुना है, आपके पास बहुत सिद्धियाँ हैं। साधु ने उनकी खातिर करके बैठाया। उसी समय एक हाथी उधर से जा रहा था। तब छद्मवेशधारी साधु ने कहा, अच्छा महाराज, आप चाहें तो क्या इस हाथी को मार सकते हैं? साधु ने कहा, हाँ, क्यों नहीं? यह कहकर साधु ने धूल पढ़कर हाथी पर ज्योंही छोड़ी कि वह छटपटाकर मर गया। तब जो साधु आया था, उसने कहा, 'वाह! आपमें तो बड़ी शक्ति है। हाथी को आपने मार डाला!’ वह साधु हँसने लगा। तब नये साधु ने कहा, अच्छा इसे आप अब जिला सकते हैं? उसने कहा, ‘हाँ, ऐसा भी हो सकता है। यह कहकर ज्योंही धूल पढ़कर उसने हाथी पर छोड़ी कि हाथी तुरन्त उठकर खड़ा हो गया। तब इस साधु ने कहा – ‘आप में बड़ी शक्ति है; परन्तु एक बात मैं आपसे पूछता हूँ। आपने हाथी को मारा और फिर से जिला दिया, इससे आपका क्या हुआ? आपकी अपनी उन्नति क्या हुई? इससे क्या आप ईश्वर को पा गये?’ यह कहकर वह साधु अन्तर्धान हो गये।
“धर्म की सूक्ष्म गति है। जरासी कामना रहने पर भी कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। सुई के भीतर सूत को जाना है, जरा सा रोवाँ भी बाहर रह गया तो फिर नहीं जा सकता।
“कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, भाई, मुझे अगर पाना चाहते हो, तो समझ लो कि