सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १३९

१ जनवरी, १८८३परिच्छेद २२१३९

तिलक, पर शरीर पर कपड़ा नहीं। – छः-सात साल की बालिका, मेरे साथ साथ घूमने और मुझसे हँसी-ठट्ठा करने लगी।

गौरांग-दर्शन – रति की माँ के वेष में माँ

“जब मैं हृदय के घर पर था तब गौरांग के दर्शन हुए थे, वे काली धारीदार धोती पहने थे।

“हलधारी कहता था, वे भाव और अभाव से परे हैं। मैंने माँ से जाकर कहा, 'माँ', हलधारी ऐसी बात कह रहा है, तो क्या रूप आदि मिथ्या हैं?' माँ रति की माँ के रूप में मेरे पास आयीं और बोलीं, 'तू भाव में ही रह।' मैंने भी हलधारी से यही कहा।

“कभी कभी यह बात भूल जाता हूँ, इसलिए कष्ट भोगना पड़ता है। भाव में न रहने के कारण दाँत टूट गए। अतएव 'दैववाणी' या 'प्रत्यक्ष' न होने तक भाव में ही रहूँगा – भक्ति ही लेकर रहूँगा। क्यों – तुम क्या कहते हो?”

प्राणकृष्ण – जी हाँ।

भक्ति का अवतार क्यों? राम की इच्छा

श्रीरामकृष्ण – और तुम्हीं से क्यों पूछूँ? इसके भीतर कोई एक रहता है। वही मुझे इस तरह चला रहा है। कभी कभी मुझमें देवभाव का आवेश होता था, तब बिना पूजा किये चित्त शान्त न होता था।

“मैं यन्त्र हूँ, और वे यन्त्री। वे जैसा कराते हैं, वैसा ही करता हूँ। जो कुछ बुलवाते हैं, वही बोलता हूँ।”

श्रीरामकृष्ण ने भक्त रामप्रसाद के एक गीत की पंक्तियाँ उदाहरण के लिए कहीं; उसका अर्थ यह है –

‘भवसागर में अपना डोंगा बहाकर उस पर बैठा हुआ हूँ। जब ज्वार आयगी, तब पानी के साथ साथ मैं भी चढ़ता जाऊँगा और जब भाटा हो जायगा, तब उतरता जाऊँगा।’

श्रीरामकृष्ण – जूठी पत्तल हवा के झोंके से उड़कर कभी तो अच्छी जगह पर गिरती हैं, कभी नाली में गिर जाती है – हवा जिधर ले जाती है उधर ही चली जाती है।

“जुलाहे ने कहा – राम की मर्जी से डाका डाला गया, राम ही की मर्जी से मुझे छोड़ दिया।

“हनुमान ने कहा – हे राम, मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; – यही आशीर्वाद दीजिये कि आपके पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति हो, फिर कभी आपकी भुवनमोहिनी माया में मुग्ध न होऊँ।

“मेढक मरते हुए बोला – राम, जब साँप पकड़ता है, तब तो 'राम, रक्षा करो' कहकर चिल्लाता हूँ, परन्तु अब जब कि राम ही के धनुष से बिंधकर मर रहा हूँ, तो चुप्पी

१४०श्रीरामकृष्णवचनामृत१ जनवरी, १८८३

साधनी ही पड़ी।

“पहले प्रत्यक्ष दर्शन होते थे – इन्हीं आँखों से, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ। अब भावावेश में दर्शन होते हैं।

“ईश्वर-लाभ होने पर बालकों का-सा स्वभाव हो जाता है। जो जिसका चिन्तन करता है, वह उसकी सत्ता को भी पाता है। ईश्वर का स्वभाव बालकों जैसा है। खेलते हुए बालक जैसे घरौंदा बनाते, बिगाड़ते और उसे फिर से बनाते हैं, उसी तरह वे भी सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रहे हैं। बालक जैसे किसी गुण के वश में नहीं है, उसी प्रकार वे भी सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हैं।

“इसीलिए जो परमहंस होते हैं, वे दस-पाँच बालक अपने साथ रखते हैं – अपने पर उनके स्वभाव का आरोप करने के लिए।”

आगरपाड़ा से एक बीस-बाईस साल का लड़का आया हुआ है। जब यह आया है, श्रीरामकृष्ण को इशारा करके एकान्त में ले जाता है और वहीं चुपचाप अपने मन की बात कहता है। यह अभी हाल ही में आने-जाने लगा है। आज वह निकट आकर फर्श पर बैठा।

प्रकृतिभाव तथा कामजय। सरलता और ईश्वरलाभ

श्रीरामकृष्ण (उसी लड़के से) – आरोप करने पर भाव बदल जाता है। प्रकृति के भाव का आरोप करो तो धीरे धीरे कामादि रिपु नष्ट हो जाते हैं। ठीक स्त्रियों के-से हाव-भाव हो जाते हैं। नाटक में जो लोग स्त्रियों का काम करते हैं, उन्हें नहाते समय देखा है, – स्त्रियों की ही तरह दाँत माँजते और बातचीत करते हैं।

“तुम किसी शनिवार या मंगलवार को आओ।”

(प्राणकृष्ण से) – “ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। शक्ति न मानो तो संसार मिथ्या हो जाता है; हम, तुम, घर, परिवार – सब मिथ्या हो जाते हैं। आद्याशक्ति के रहने ही के कारण संसार का अस्तित्व है। बिना आधार के कोई चीज कभी ठहर सकती है? बिना खूँटियों के न तो ढाँचा खड़ा रह सकता है और न उस पर सुन्दर मूर्ति ही बन सकती है।

“विषयबुद्धि का त्याग किये बिना चैतन्य नहीं होता है – ईश्वर नहीं मिलते। उसके रहने ही से कपटता आ जाती है। बिना सरल हुए कोई उन्हें पा नहीं सकता।

‘ऐसी भक्ति करो घट भीतर, छोड़ कपट चतुराई।
सेवा बन्दी और अधीनता, सहज मिलें रघुराई।।’

“जो लोग विषयकर्म करते हैं, आफिस का काम या व्यवसाय करते हैं, उन्हें भी सच्चाई से रहना चाहिए। सच बोलना कलिकाल की तपस्या है।

प्राणकृष्ण –

“अस्मिन् धर्मे महेशि स्यात् सत्यवादी जितेन्द्रियः।
परोपकारनिरतो निर्विकारः सदाशयः।।”