श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१६ अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५७ | ३३१
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| १६ अक्टूबर, १८८३ | परिच्छेद ५७ | ३३१ |
|---|
(२)
अछूतों की समस्या – अस्पृश्य जाति की हरिनाम से शुद्धि
हरिभक्ति होने पर फिर जाति का विचार नहीं रहता। श्रीरामकृष्ण मणि मल्लिक से कह रहे हैं, “तुम तुलसीदास की वह बात कहो तो।”
मणि मल्लिक – चातक की प्यास से छाती फटी जाती है – गंगा, यमुना, सरयू आदि कितनी नदियाँ और तालाब हैं, परन्तु वह कोई भी जल नहीं पीता, केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा के जल के लिए ही मुँह खोले रहता है!
श्रीरामकृष्ण – अर्थात् उनके चरणकमलों में भक्ति ही सार है शेष सब मिथ्या।
मणि मल्लिक – तुलसीदास की एक और बात – स्पर्शमणि से लगते ही, अष्टधातु सोना बन जाती है। उसी प्रकार सभी जातियाँ – चमार, चाण्डाल तक हरिनाम लेने पर शुद्ध हो जाती हैं। और वैसे तो ‘बिना हरिनाम चार जात चमार!’
श्रीरामकृष्ण – जिस चमड़े की खाल छूनी भी नहीं चाहिए, उसी को पका लेने के बाद फिर देवमन्दिर में भी ले जाते हैं!
“ईश्वर के नाम से मनुष्य पवित्र होता है। इसीलिए नामसंकीर्तन का अभ्यास करना चाहिए। मैंने यदु मल्लिक की माँ से कहा था, ‘जब मृत्यु आएगी, तब यही संसार की चिन्ता होगी। परिवार, लड़के-लड़कियों की चिन्ता, मृत्युपत्र की चिन्ता – यही सब चिन्ताएँ आएँगी; भगवान् की चिन्ता न आयगी। उपाय है उनके नाम का जप करना, नाम-कीर्तन का अभ्यास करना। यदि अभ्यास रहा, तो मृत्यु के समय में उन्हीं का नाम मुँह में आयगा। बिल्ली के पकड़ने पर चिड़िया की ‘च्याँ, च्याँ’ बोली ही निकलेगी। उस समय वह ‘राम राम’ ‘हरे कृष्ण’ न बोलेगी।’
“मृत्युसमय के लिए तैयार होना अच्छा है। अन्तिम दिनों में निर्जन में जाकर केवल ईश्वर का चिन्तन तथा उनका नाम जपना। हाथी को नहलाकर यदि हाथीखाने में ले जाया जाए तो फिर वह अपनी देह में मिट्टी–कीचड़ नहीं लगा सकता।”
बलराम के पिता, मणि मल्लिक, वेणी पाल ये अब वृद्ध हो गए हैं; क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उनके कल्याण के लिए ये सब उपदेश दे रहे हैं?
श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों को सम्बोधित करके बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – एकान्त में उनका चिन्तन और नामस्मरण करने के लिए क्यों कहता हूँ? संसार में रातदिन रहने पर अशान्ति होती है। देखो न, एक गज जमीन के लिए भाई
३३२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ अक्टूबर, १८८३
भाई में मारकाट होती है।
“सिक्खों का कहना है कि जमीन, स्त्री और धन – इन्ही तीनों के लिए इतनी गड़बड़ तथा अशान्ति होती है।
“तुम लोग संसार में हो तो इसमें भय क्या है? राम ने जब संसार छोड़ने की बात कही, तो दशरथ चिन्तित होकर वशिष्ठ की शरण में गए। वशिष्ठ ने राम से कहा, 'राम, तुम क्यों संसार को छोड़ोगे? मेरे साथ विचार करो, क्या संसार ईश्वर से अलग है? क्या छोड़ोगे और क्या ग्रहण करोगे? उनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे ईश्वर, माया, जीव, जगत् सभी रूप में प्रकट हो रहे हैं।' ”
बलराम के पिता – बड़ा कठिन है।
श्रीरामकृष्ण – साधना के समय यह संसार धोखे की टट्टी है, फिर ज्ञान प्राप्त करने के बाद, उनके दर्शन के बाद, वही संसार – ‘आनन्द की कुटिया’ है।
अवतार-पुरुष में ईश्वर का दर्शन। अवतार चैतन्यदेव
“वैष्णव-ग्रन्थ में कहा है, 'विश्वास से कृष्ण मिलते हैं, वे तर्क से बहुत दूर हैं।' केवल विश्वास!
“कृष्णकिशोर का क्या ही विश्वास है! वृन्दावन में कुएँ से एक नीच जाति के पुरुष ने जल निकाला; कृष्णकिशोर ने उससे कहा, 'तू बोल शिव;' उसके शिवनाम लेते ही उसने जल पी लिया। वह कहता था, 'ईश्वर का नाम लिया है, फिर भी धन आदि खर्च करके प्रायश्चित्त करना होगा? कैसी विडम्बना है!'
“कृष्णकिशोर यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि लोग अपने शारीरिक रोगों से छुटकारा पाने के लिए भगवान् को तुलसीदल चढ़ा रहे हैं।
“साधुदर्शन की बात पर हलधारी ने कहा था, 'और क्या देखने जाऊँ – पंचभूतों का पिंजरा!' कृष्णकिशोर ने क्रुद्ध होकर कहा, 'ऐसी बात हलधारी ने कही है!' क्या वह नहीं जानता कि साधुओं की देह चिन्मय होती है!'
“कालीबाड़ी के घाट पर हमसे कहा था, 'तुम लोग आशीर्वाद दो कि राम राम कहते मेरे दिन कट जाएँ!'
“मैं कृष्णकिशोर के मकान पर जब जाता था, तब मुझे देखते ही वह नाचने लगता था!”
“श्रीरामचन्द्र ने लक्ष्मण से कहा था, 'भाई, जहाँ पर ऊर्जित भक्ति देखोगे, जानो कि वहीं पर मैं हूँ।'