श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२५
१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२५
श्रीरामकृष्ण – जीव का अहंकार ही माया है। यही अहंकार कुल आवरणों का कारण है। ‘मैं’ मरा कि बला टली। यदि ईश्वर की कृपा से ‘मैं अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान हो गया तो वह मनुष्य तो जीवन्मुक्त हो गया। फिर उसे कोई भय नहीं।
“यह माया या ‘अहं’ मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकड़ा क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरु की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।
“सिर्फ ढाई हाथ की दूरी पर श्रीरामचन्द्र हैं, जो साक्षात् ईश्वर हैं; पर बीच में सीतारूपिणी माया का पर्दा पड़ा हुआ है, इसी कारण लक्ष्मणरूपी जीव को ईश्वर के दर्शन नहीं होते। यह देखो तुम्हारे मुँह के आगे मैं इस अँगोछे की ओट करता हूँ। अब तुम मुझे नहीं देख सकते। पर हूँ मैं तुम्हारे बिलकुल निकट। इसी तरह औरों की अपेक्षा भगवान् निकट हैं, परन्तु इस माया-आवरण के कारण तुम उनके दर्शन नहीं पाते।
“जीव तो स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, परन्तु इसी माया या अहंकार से वे नाना उपाधियों में पड़े हुए अपने स्वरूप को भूल गए हैं।
“एक एक उपाधि होती है, और जीवों का स्वभाव बदल जाता है। किसी ने काली धारीदार धोती पहनी कि देखना, प्रेमगीतों की तान मुँह से आप ही आप निकल पड़ती है, और ताश खेलना, सैरसपाटे के लिए निकलना तो हाथ में छड़ी लेकर – ये सब आप ही आप जुट जाते हैं! चाहे दुबला-पतला ही हो परन्तु बूट पहनते ही सीटी बजाना शुरू हो जाता है; सीढ़ियों पर चढ़ते समय साहबों की तरह उछलकर चढ़ता है! मनुष्य के हाथ में कलम रहे तो उसका यह गुण है कि कागज का जैसा-तैसा टुकड़ा पाते ही वह उस पर कलम घिसना शुरू कर देता है।
“रुपया भी एक विचित्र उपाधि है। रुपया होते ही मनुष्य एक दूसरी तरह का हो जाता है। वह पहले जैसा नहीं रह जाता। यहाँ एक ब्राह्मण आया जाया करता था। बाहर से वह बड़ा विनयी था। कुछ दिन बाद हम लोग कोन्नगर गए, हृदय साथ था। हम लोग नाव पर से उतरे कि देखा, वही ब्राह्मण गंगा के किनारे बैठा हुआ है। शायद हवाखोरी के लिए आया था। हम लोगों को देखकर बोला, ‘क्यों महाराज, कहो कैसे हो?’ उसकी आवाज सुनकर मैंने हृदय से कहा, ‘हृदय, सुना, इसके धन हो गया है, इसी से आवाज किरकिराने लगी’ हृदय हँसने लगा।
“किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बड़े गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!’ रुपये का इतना अहंकार होता है!
१२६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ दिसम्बर १८८२
अहंकार कब जाता है? – ब्रह्मज्ञान की अवस्था सप्तभूमि
“ज्ञानलाभ होने से अहंकार दूर हो सकता है। ज्ञानलाभ होने से समाधि होती है। जब समाधि होती है, तभी अहंकार जाता है। ऐसा ज्ञानलाभ बड़ा कठिन है।
“वेदों में कहा है कि मन सप्तम भूमि पर जाने से समाधि होती है। समाधि होने से ही अहंकार दूर हो सकता है। मन प्रायः प्रथम तीन भूमियों में रहता है। लिंग, गुदा और नाभि ये ही वे तीन भूमियाँ हैं। तब मन संसार की ओर – कामिनी-कांचन की ओर खिंचा रहता है। जब मन हृदय में रहता है तब ईश्वरी ज्योति के दर्शन होते हैं। वह मनुष्य ज्योति देखकर कह उठता है – ‘यह क्या, यह क्या है!’ इसके बाद मन कण्ठ में आता है। तब केवल ईश्वर की ही चर्चा करने और सुनने की इच्छा होती है। कपाल या भौंहों के बीच में जब मन आता है तब सच्चिदानन्द-रूप दीख पड़ता है। उस रूप को गले लगाने और उसे छूने की इच्छा होती है, परन्तु छुआ नहीं जाता। लालटेन के भीतर की बत्ती को कोई चाहे देख ले पर उसे छू नहीं सकता, जान पड़ता है कि छू लिया, परन्तु छू नहीं पाता। जब सप्तम भूमि पर मन जाता है तब अहं नहीं रह जाता, समाधि होती है।”
विजय – वहाँ पहुँचने पर जब ब्रह्मज्ञान होता है, तब मनुष्य क्या देखता है?
श्रीरामकृष्ण – सप्तम भूमि में मन के जाने पर क्या होता है, मुँह से नहीं कहा जा सकता। नमक की गुड़िया समुंदर नापने गई। किन्तु जैसे पानी में उतरी वैसेही गल गई अब समुंदर के गहराई की खबर कौन देगी? जो देगी वही तो उसके साथ मिल गई। सप्तम भूमि में मन का नाश होता है, समाधि होती है। क्या अनुभव होता है वह मुँह से कहा नहीं जाता।
‘अहं’ जाता नहीं है। ‘बदमाश मैं।’ ‘दास मैं।’
“जो ‘मैं’ संसारी बनता है, कामिनी-कांचन में फँसता है, वह बदमाश ‘मैं’ है। जीव और आत्मा में भेद सिर्फ इसलिए है कि बीच में यह ‘मैं’ जुड़ा हुआ है। पानी पर अगर लाठी डाल दी जाए तो पानी दो हिस्सों में बँटा हुआ दीख पड़ता है। परन्तु वास्तव में है वह एक ही पानी; लाठी के कारण उसके दो हिस्से नजर आते हैं।
“यह लाठी ‘अहं’ ही है। लाठी उठा लो, वही एक जल रह जायगा।
“‘बदमाश मैं’ वह है जो कहता है, ‘मुझे नहीं जानते हो! मेरे इतने रुपये हैं, क्या मुझसे भी कोई बड़ा आदमी है?’ यदि किसी ने दस रुपये चुरा लिये तो पहले वह चोर से रुपये छीन लेता है, फिर चोर की ऐसी मरम्मत करता है कि पसली पसली ढीली कर देता है; इतने पर भी उसको नहीं छोड़ता, पहरेवाले के हाथ सौंपता है और सजा दिलवाता है! ‘बदमाश मैं’ कहता है, ‘अरे, इसने मेरे दस रुपये चुराये थे, उफ, इतनी हिम्मत!’”
विजय – यदि बिना ‘अहं’ के दूर हुए सांसारिक भोगों से पिण्ड नहीं छूटने का –