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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | ११९

१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | ११९

क्या वर चाहते हो?’’

मुक्त पुरुष का शरीरत्याग

एक भक्त बोल उठे, “आत्महत्या की बात सुनकर भय लगता है।”

श्रीरामकृष्ण – आत्महत्या करना महापाप है, घूम-फिरकर संसार में आना पड़ता है, और वही संसार-दुःख भोगना पड़ता है।

“परन्तु यदि कोई ईश्वर-दर्शन के बाद शरीर त्याग दे, तो उसे आत्महत्या नहीं कहते। उस प्रकार के शरीरत्याग में दोष नहीं है। ज्ञानलाभ के बाद कोई कोई शरीर छोड़ देते हैं। जब मिट्टी के साँचे में सोने की मूर्ति ढल जाती है, तब मिट्टी का साँचा चाहे कोई रखे, चाहे तोड़ दे।

“कई वर्ष हो गये, वराहनगर से एक लड़का आता था, उम्र कोई बीस साल की होगी। नाम गोपाल सेन था। जब यहाँ आता था तब उसको इतना भाव हो जाता था कि हृदय को उसे पकड़ रखना पड़ता था कि कहीं गिरकर उसके हाथ-पैर न टूट जाएँ।

“उस लड़के ने एक दिन एकाएक मेरे पैरों पर हाथ रखकर कहा, 'मैं और न आ सकूँगा – अब मैं चला!' कुछ दिन बाद सुना कि उसने देह छोड़ दी।”

(२)

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। (गीता, ९।३३)

जीव के चार दर्जे। बद्ध जीव के लक्षण – कामिनी-कांचन।

श्रीरामकृष्ण – जीव चार दर्जे के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। संसार मानो जाल है और जीव मछली। ईश्वर, यह संसार जिनकी माया है, मछुए हैं। जब मछुए के जाल में मछलियाँ पड़ती हैं, तब कुछ मछलियाँ जाल चीरकर भागने की अर्थात् मुक्त होने की कोशिश करती हैं। उन्हें मुमुक्षु जीव कहना चाहिए। जो भागने की चेष्टा करती हैं उनमें से सभी नहीं भाग सकतीं। दो-चार मछलियाँ ही धड़ाम से कूदकर भाग जाती हैं। तब लोग कहते हैं, वह बड़ी मछली निकल गयी। ऐसे ही दो-चार मनुष्य मुक्त जीव हैं। कुछ मछलियाँ स्वभावतः ऐसी सावधानी से रहती हैं कि कभी जाल में आती ही नहीं। नारदादि नित्य जीव कभी संसार-जाल में नहीं फँसते। परन्तु प्रायः अधिकतर मछलियाँ जाल में पड़ जाती हैं, फिर भी उन्हें होश नहीं कि जाल में पड़ी हैं, अब मरना होगा। जाल में पड़ते ही जाल-सहित इधर से उधर भागती हैं, और सीधे कीच में घुसकर देह छिपाना चाहती हैं। भागने की कोई चेष्टा नहीं, बल्कि कीच में और गड़ जाती हैं। ये ही बद्ध जीव हैं। बद्ध जीव संसार में अर्थात् कामिनी कांचन में फँसे हुए हैं, कलंकसागर में मग्न हैं, पर सोचते हैं कि बड़े आनन्द में हैं! जो मुमुक्षु या मुक्त हैं, संसार उन्हें कूप

१२० श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ दिसम्बर १८८२

जान पड़ता है, अच्छा नहीं लगता। इसीलिए कोई कोई ज्ञानलाभ, ईश्वरलाभ हो जाने पर शरीर छोड़ देते हैं, परन्तु इस तरह का शरीरत्याग बड़ी दूर की बात है।

“बद्ध जीवों – संसारी जीवों को किसी तरह होश नहीं होता। कितना दुःख पाते हैं, कितना धोखा खाते हैं, कितनी विपदाएँ झेलते हैं, फिर भी बुद्धि ठिकाने नहीं आती।

“ऊँट कटीली घास को बहुत चाव से खाता है। परन्तु जितना ही खाता है उतना ही मुँह से धर धर खून गिरता है, फिर भी कटीली घास को खाना नहीं छोड़ता! संसारी मनुष्यों को इतना शोकताप मिलता है, किन्तु कुछ दिन बीते कि सब भूल गए। औरत गुजर गयी या बदचलन निकली, तो, फिर ब्याह कर लेता है। बच्चा मर गया, कितना दुःख पाया, पर कुछ ही दिनों में सब भूल जाता है। बच्चे की वही माँ जो मारे शोक के अधीर हो रही थी, कुछ दिन बीत जाने पर फिर बाल सँवारती, जूड़ा बाँधती और गहनों से सजती है। इसी तरह मनुष्य बेटी के ब्याह में कुल धन गँवा बैठता है, परन्तु हर साल बेटियों को पैदा करने में घाटा नहीं होने देता! मुकदमेबाजी से घर में एक कौड़ी नहीं रह जाती तो भी मुकदमे के लिए लोटा डोर टाँगे फिरते हैं! जितने लड़के पैदा हुए हैं, अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े, अच्छा घर, उन्हीं को नहीं मिलता, ऊपर से हर साल एक और पैदा होता है!

“कभी कभी तो ‘साँप छछूँदर’ वाली गति होती है। न निगल सके, न उगल सके। बद्ध जीव कभी समझ भी गया कि संसार में कुछ है नहीं, सिर्फ गुठली चाटना है, तो भी वह उसे नहीं छोड़ सकता, ईश्वर की ओर मन नहीं ले जा सकता।

“केशव सेन के एक आत्मीय को देखा, उम्र कोई पचास साल की थी, पर ताश खेल रहा था। मानो ईश्वर का नाम लेने का समय नहीं आया!

“बद्ध जीव का एक और लक्षण है। यदि उसको संसार से हटाकर किसी अच्छी जगह पर ले जाओ, तो वह तड़प-तड़पकर मर जाएगा। विष्ठा के कीट को विष्ठा ही में आनन्द मिलता है। उसी से वह हृष्टपुष्ट होता है। उस कीट को अगर अन्न की हण्डी में रख दो तो वह मर जाएगा।” (सब स्तब्ध हैं।)

(३)

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।। (गीता, ६।३५)

तीव्र वैराग्य तथा बद्ध जीव

विजय – बद्ध जीवों के मन की कैसी अवस्था हो तो मुक्ति हो सकती है?

श्रीरामकृष्ण – ईश्वर की कृपा से तीव्र वैराग्य होने पर इस कामिनी-कांचन की आसक्ति से निस्तार हो सकता है। जानते हो तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं? ‘बनत बनत बनि