श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ८८
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ८८
कीर्तनानन्द में श्रीरामकृष्ण
(१)
अधर के घर में नरेन्द्रादि भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण अधर के घर के बैठकखाने में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। बैठकखाना दुमंजले पर है। श्रीयुत नरेन्द्र, दोनों भाई मुखर्जी, भवनाथ, मास्टर, चुनीलाल, हाजरा आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हैं। दिन के तीन बजे होंगे। आज शनिवार है, ६ सितम्बर १८८४।
भक्तगण प्रणाम कर रहे हैं। मास्टर के प्रणाम करने के बाद श्रीरामकृष्ण अधर से पूछते हैं, क्या निताई डाक्टर न आयेगा?
श्रीयुत नरेन्द्र गायेंगे, इसके लिए बन्दोबस्त हो रहा है। तानपूरा बाँधते समय तार टूट गया। श्रीरामकृष्ण ने कहा, अरे यह क्या किया! तब नरेन्द्र अपना तबला ठीक करने लगे। श्रीरामकृष्ण कहते हैं - अरे तुम तबला ठोंक रहे हो पर मुझे तो ऐसा मालूम होता है मानो कोई मेरे गाल पर चपत मार रहा हो।
कीर्तन के गीत के सम्बन्ध में बातचीत हो रही है। नरेन्द्र कह रहे हैं - कीर्तन में ताल-सम आदि कुछ नहीं हैं, इसीलिए इतना Popular (जनप्रिय) है और लोग उसे पसन्द करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – यह तू क्या कह रहा है? गाना करुणापूर्ण होता है, इसीलिए लोग इतना चाहते हैं।
नरेन्द्र गा रहे हैं -
(१) हे दीनशरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है।
(२) क्या मेरे दिन व्यर्थ ही चले जायेंगे? हे नाथ! सदा ही आशा-पथ पर मेरी दृष्टि लगी हुई है।
श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से, सहास्य) – इसने पहली भेंट के समय यही गाना गाया था।
नरेन्द्र ने और भी दो-एक गाने गाये। फिर वैष्णवचरण ने एक गाना गाया।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
| ५८६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ६ सितम्बर, १८८४ |
|---|
श्रीरामकृष्ण – 'ऐ वीणा! तू ईश्वर का नाम ले,' यह गाना एक बार गाओ।
वैष्णवचरण गा रहे हैं –
“ऐ वीणा, तू ईश्वर का नाम ले। उनके श्रीचरणों को छोड़ तुझे परम-तत्त्व की प्राप्ति न होगी। उनके नाम से पाप और ताप दूर हो जाते हैं। तू 'हरे कृष्ण' 'हरे कृष्ण' कहती जा। उनकी कृपा होगी तो मैं भवसागर में फिर न रह जाऊँगा, न उसके लिए मुझे कोई चिन्ता होगी। वीणा, एक ही बार उनका नाम ले; नाम के सिवा और दूसरा अवलम्ब नहीं है। गोविन्ददास कहते हैं, दिन चले जा रहे हैं, सावधान रहना जिससे कि मैं अपार समुद्र में कहीं बह न जाऊँ।”
गाना सुनते ही श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया है। वे उसी आवेश में कहते हैं – 'अहा! हरे कृष्ण कहो – हरे कृष्ण कहो।'
यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। भक्तगण चारों ओर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। कमरा आदमियों से भर गया है।
कीर्तनिया उस गाने को समाप्त कर एक दूसरा गाना गाने लगा – 'श्रीगौरांग सुन्दर नव नटवर तप्तकांचनकाय' वह गा रहा था, श्रीरामकृष्ण उठकर खड़े हो गये और नृत्य करने लगे। फिर बैठकर बाँहें फैलाकर स्वयं उसके पद गा रहे हैं।
गाते ही गाते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो गया। सिर झुकाये हुए समाधिलीन हो गये। सामने तकिया पड़ा हुआ है, उस पर सिर झुककर ढुलक गया है। कीर्तनिया फिर गा रहे हैं –
“हरिनाम के सिवा संसार में और कौनसा धन है? मधाई, मधुर स्वर से तू उनके नाम का कीर्तन कर। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।”
कीर्तनिया ने एक गाना और गाया। श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो गये, नृत्य कर रहे हैं। वह अपूर्व नृत्य देखकर नरेन्द्र आदि भक्तगण स्थिर न रह सके। सब श्रीरामकृष्ण के साथ नृत्य करने लगे।
नृत्य करते हुए श्रीरामकृष्ण को समाधि हो रही है। उस समय उनकी अन्तर्दशा हो गयी। जबान बन्द हो गयी। सर्वांग स्थिर हो गया। भक्तगण उन्हें घेरकर नाच रहे हैं। प्रेमोन्मत्त की तरह।
कुछ प्राकृत दशा में आते ही श्रीरामकृष्ण ने गाना शुरू किया।
आज अंधर का बैठकखाना श्रीवास का आँगन हो रहा है। हरिनाम की ध्वनि सुनकर आम सड़क पर कितने ही आदमी एकत्र हो गये हैं।
भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य करके श्रीरामकृष्ण ने आसन ग्रहण किया। भावावेश अब भी है। उसी अवस्था में नरेन्द्र से कह रहे हैं, “वही गाना गा, 'माँ, मुझे
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar