पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७३
पूजे जाते हैं, वह पूजा उन निष्पाप देवताओं के लिए नहीं
होती। किन्तु वह पूजा तो पूजक के लिए ही की जाती है [यों
अपने स्वार्थ के लिए ही ईश्वर पूजा की जाती है। ईश्वर का तो
उसमें कुछ भी स्वार्थ नहीं होता।]
ऋगादयो ह्यधीयन्ते दुर्ब्राह्मण्यानवाप्तये ।
न तत् प्रसक्तं वेदेषु मनुष्येषु प्रसज्जते ॥१७॥
व्रात्यपन से बचने के लिए ऋगादि वेदों का अध्ययन किया
जाता है। वेदों में तो उस व्रात्यपन की संभावना भी नहीं
होती। वह तो मनुष्यों में ही प्रसक्त होता है [यों अपने स्वार्थ
के लिए ही वेदाध्ययन किया जाता है।]
भूम्यादिपञ्चभूतानि स्थानतृट्पाकशोषणैः ।
हेतुभिश्चावकाशेन वाञ्छन्त्येषां न हेतवः ॥१८॥
सारे प्राणी किसी वस्तु को रखने के लिए भूमि को, प्यास
निवारण करने के लिए जल को, पाक और शोषण करने के
लिए अग्नि और वायु को तथा अवकाशदान करने के कारण
आकाश को चाहते हैं। इन पृथिवी आदि भूतों को तो स्थान
आदि की कुछ आवश्यकता ही नहीं होती है।
स्वामिभृत्यादिकं सर्वं स्वोपकाशाय वाञ्छति ।
तत्तत्कृतोपकारस्तु तस्य तस्य न विद्यते ॥१९॥
स्वामी जो भृत्य को चाहता है, भृत्य जो स्वामी को चाहता
है, सो सब अपने अपने उपकार के लिए ही तो चाहता है।
दूसरों का किया हुआ उपकार दूसरों को नहीं मिलता।
कोई भी किसी दूसरे की भलाई करना नहीं चाहता सभी
संसार स्वार्थी है। दुनिया के परोपकारी कहलाने वाले लोग
४७४ पञ्चदशी
भी स्वार्थी ही हैं। वे जब किसी को दुःखी देखते हैं तब उनके
जी में एक कांटा सा चुभा करता है। हृदय में चुभने वाले
अपने उस कांटे को निकालने के लिए ही वे परोपकार में प्रवृत्त
होते हैं। परोपकार किये बिना उनके जी का कांटा निकलता
ही नहीं। यों परोपकारी लोग भी अन्ततः सच्चे स्वार्थी ही हैं।
सर्वव्यवहृतिष्वेवमनुसन्धायमीदृशम् ।
उदाहरणबाहुल्यं, तेन स्वां वासयेन्मतिम् ॥२०॥
[यों इच्छापूर्वक जितने भी व्यवहार होते हैं उन] सब
व्यवहारों में इसी प्रकार आत्मप्रीति को दिखाने के लिए पति
पत्नी आदि बहुत से उदाहरण दिये हैं। इस कारण समझदार
को आत्ममति की वासना कर लेनी [आत्मविषयक बुद्धि बना
लेनी] चाहिए [सब पदार्थों को आत्मा का उपकारी समझ कर,
आत्मा को ही सब से अधिक प्रिय जान लेना चाहिए।]
अथ केयं भवेत् प्रीतिः श्रूयते या निजात्मनि ।
रागो वध्वादिविषये, श्रद्धा यागादिकर्मणि ।
भक्तिःस्याद् गुरुदेवादाविच्छा त्वप्राप्तवस्तुनि ॥२१॥
अब प्रश्न यह है कि—यह जो निजात्मा में प्रीति सुनी
जाती है। उस प्रीति का रूप क्या है ? क्या वह राग है ?
श्रद्धा है ? भक्ति है ? या इच्छा है ? यदि वह राग हो तो वधू
आदि में ही हो। यदि वह श्रद्धा हो तो वह यागादि में ही हो।
यदि वह भक्ति हो तो वह गुरु आदि में ही हो। यदि वह
इच्छा हो तो वह अप्राप्त वस्तु ही में हो। [आत्मा का शेष
(अंग) होने से सब पदार्थ प्रिय होते हैं और आत्मा प्रियतम
होता है। प्रेम के स्वरूप को जाने बिना आत्मा की प्रियतमता
: समझ में आती ही नहीं। इस कारण प्रेम के स्वरूप की विवे-
: चना इस श्लोक में सूझी है। प्रेम ऐसा होना चाहिए जो सभी
: पदार्थों पर लागू हो सकता हो। यदि वह सब पदार्थों पर लागू
: नहीं होता है तो वह प्रेम नहीं है। उसको सर्वविषयक सिद्ध
: करने के लिए प्रीति का रूप बताना चाहिए जो सब में
: पाया जा सकता हो।]
: तर्ह्यस्तु सात्त्विकी वृत्तिः सुखमात्रानुवर्तिनी ।
: प्राप्ते, नष्टेऽपि, सद्भावादिच्छातो व्यतिरिच्यते ॥२२॥
: उसका उत्तर यह है कि यदि वह प्रीति रागादिरूप नहीं
: हो सकती है तो आप उस प्रीति को केवल सुख को विषय
: करने वाली एक सात्त्विक वृत्ति मान लो। उस प्रीति को सत्त्व-
: गुण से बनी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो। जब कोई
: वस्तु प्राप्त हुई रहती है या जब कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो
: जाती है अथवा अप्राप्त रहती है तब भी उसके विषय में यह
: [केवल सुख को विषय करने वाली सात्त्विक] वृत्ति बनी ही
: रहती है। इस कारण इस वृत्ति को इच्छा से भिन्न माना जाता
: है। [क्योंकि इच्छा तो केवल अप्राप्त सुखादि को ही अपना
: विषय बनाया करती है और यह वृत्ति प्राप्त अप्राप्त सभी को
: अपना विषय बनाती है]
: सुखसाधनतोपाधेरन्नपानादयः प्रियाः ॥२३॥
: आत्मानुकूल्यादन्नादिसमश्चेदमुनात्रकः ।
: अनुकूलयितव्यः स्यान्नैकस्मिन् कर्मकर्तृता ॥२४॥
: प्रश्न होता है कि--सुख के साधन होने के कारण जैसे
: अन्न पानादि प्रिय देखे गए हैं इसी प्रकार यदि यह आत्मा भी
[header]
४७६ पञ्चदशी .
अनुकूल किंवा प्रिय होने के कारण ही [अन्नपानादि के समान]
सुख का साधन होता होगा,तो इसका क्या समाधान करते हो ?
इस का उत्तर यह है कि—अच्छा यह बताओ कि तुम्हें इस
आत्मा से किस की अनुकूलता करनी है ? [ऐसा तो कोई दीख
नहीं पड़ता कि इस आत्मा को जिस के अनुकूल बना दिया
जाता हो। आत्मा से भिन्न तो कोई और भोक्ता है ही नहीं।
यदि कहो कि वह स्वयं अपने आप के ही अनुकूल हो जायगा
तो हम कहेंगे कि] एक में कर्म और कर्ता की दोनों बात नहीं
रह सकतीं। [वही आत्मा उपकार्य भी हो और वही उपकारक
भी हो, यह दोनों विरुद्ध धर्म एक आत्मा में कैसे टिकेंगे ? ]
सुखे वैषयिके प्रीतिमात्रमात्मा त्वतिप्रियः ।
सुखे व्यभिचरत्येषा नात्मनि व्यभिचारिणी ॥२५॥
विषयजन्य जो सुख है, उनमें प्रीति तो होती है [किन्तु
उनमें प्रगाढ प्रीति नहीं होती] इसके विपरीत आत्मा तो अत्यन्त
प्रिय होता है [इस कारण उसे विषयजन्य सुखों के समान
मत मानो। जैसे विषयसुख भोक्ता के काम आता है, वैसे
यह आत्मा किसी भोक्ता के उपयोग में आने वाला तत्व नहीं
है ] देख लो कि विषय सुखों में रहने वाली यह प्रीति व्यभि-
चार कर जाती है—[यह प्रीति कभी पूर्वसुखों को छोड़ कर
दूसरे सुखों में पहुँच जाती है—एक सुख में बँध कर बैठे रहना
इस प्रीति को पसन्द नहीं है] परन्तु आत्मा में जो प्रीति रहती
है वह कभी व्यभिचार नहीं करती—[वह विषयान्तर में कभी
नहीं जाती। इस कारण आत्मप्रीति को ही निरतिशय प्रीति
कह सकते हैं।]
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ५७७
एकं त्यक्त्वान्यदादत्त सुखं वैषयिकं सदा।
नात्मा त्याज्यो न चादेयस्तस्मिन् व्यभिचरेत् कथम् ॥२६॥
वैषयिक सुखों की तो यह आदत है कि वे सदा एक को
छोड़ कर दूसरे से नेह जोड़ लेते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने
के अयोग्य होने के कारण आत्मा तो छोड़ा या ग्रहण किया ही
नहीं जा सकता। फिर यह प्रीति उसमें व्यभिचार कैसे कर
सकेगी ?
हानादानविहीनेऽस्मिन्नुपेक्षा चेत् तृणादिवत् ।
उपेक्षितुः स्वरूपत्वान्नोपेक्ष्यत्वं निजात्मनः ॥२७॥
परत्याग करना और स्वीकार कर लेना, ये दोनों ही जिस
आत्मा में नहीं बन सकते, यदि उस आत्मा को तृण आदि
तुच्छ पदार्थों की तरह उपेक्षा करना चाहो, तो भी अयोग्य
होने के कारण उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती । क्योंकि जिस
आत्मा की उपेक्षा करनी है वह तो उस उपेक्षा करने वाले का
स्वरूप ही है [जो निजात्मा अर्थात् अपना अविनाशी स्वरूप
है, स्वरूप होने के कारण ही वह अपने से भिन्न तृणादि विषय
के समान, उपेक्षा का विषय ही नहीं हो सकता ।]
रोगक्रोधाभिभूतानां मुमूर्षा वीक्ष्यते क्वचित् ।
ततो द्वेषाद् भवेत् त्याज्य आत्मेति यदि तन्न हि ॥२८॥
जब कोई दारुण रोग, या दारुण क्रोध किसी पर आक्र-
मण करता है तब वह मर जाना चाहता है। इस दृष्टान्त को
लेकर आत्मा में द्वेष की संभावना हो जाती है और सांप बिच्छू
के समान यह आत्मा भी द्वेष के कारण त्याज्य हो जाता है
ऐसी शंका का करना ठीक नहीं है
४७८ पञ्चदशी
आत्मा से भिन्न देह का ही हो सकता है। आत्मा का त्याग
कभी हो ही नहीं सकता।]
त्यक्तुं योग्यस्य देहस्य नात्मता त्यक्तुरेव सा ।
न त्यक्तर्य्यस्ति स द्वेष स्त्याज्ये द्वेषे तु का क्षतिः ॥२६॥
देख लो कि जो देह त्याग करने के योग्य है, वह तो आत्मा
ही नहीं है। देह का त्याग करने वाला, देह से भिन्न जो जीव
है, उसी को 'आत्मा' कहते हैं। प्रकृत तात्पर्य तो यही है कि—
वह द्वेष त्याग करने वाले आत्मा से नहीं हो सकता। यदि
किसी को त्याज्य देहादि पदार्थों में द्वेष हो तो उससे मेरे
सिद्धान्त में क्या हानि होगी? [जो मैं यह मान रहा हूँ कि
आत्मा का त्याग नहीं हो सकता, उस मेरे मत में त्याज्य देहों
में किसी रोगी या किसी क्रोधी को द्वेष हो भी तो उससे मेरे
सिद्धान्त की क्षति नहीं होती।]
आत्मार्थत्वेन सर्वस्य प्रीतेश्चात्मा ह्यतिप्रियः ।
सिद्धो, यथा पुत्रमित्रात् पुत्रः प्रियतरस्तथा ॥३०॥
[सुख और सुख के साधन पति-पत्नी आदि] सभी कुछ
जब आत्मार्थ हो जाते हैं [जब ये सब अपने उपकारक हो जाते
हैं] तभी प्रिय होते हैं, इस कारण से भी आत्मा ही अत्यन्तप्रिय
माना जाता है। लोक में भी देखा जाता है कि—पुत्र के मित्र
से [जिस पर कि हमारा प्रेम पुत्र के द्वारा होता] पुत्र ही [व्यव-
धानरहित प्रेम का पात्र होने के कारण] पिता को अधिक
प्यारा लगता है [इसी प्रकार जो सब पदार्थ अपने सम्बन्धी
होने के कारण प्रेम के पात्र बन गये हैं उन सब पदार्थों की
अपेक्षा वह आत्मा अधिक प्यारा होता है]
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४७९
मा न भूवमहं किन्तु भूयासं सर्वदेत्यसौ ।
आशीः सर्वस्य दृष्टेति प्रत्यक्षा प्रीतिरात्मनि ॥३१॥
अपने अनुभव से भी पूछ लो कि—'मेरा कभी भी असत्त्व
न हो । किन्तु मैं सदा ही बना रहूँ' ऐसी प्रार्थना सभी प्राणी
करते पाये जाते हैं। जब कि सभी ऐसी प्रार्थना करते हैं तब
आत्मा में प्रत्यक्ष ही निरतिशय प्रीति सिद्ध हो जाती है ।
इत्यादिभिस्त्रिभिः प्रीतौ सिद्धायामेवमात्मनि ।
पुत्रभार्यादिशेषत्वमात्मनः कैश्चिदीरितम् ॥३२॥
यों अनुभव युक्ति और श्रुति इन तीनों प्रमाणों से प्रथम
कही हुई रीति से, यद्यपि आत्मा में निरतिशय प्रेम सिद्ध हो
चुका है, तो भी श्रुत्यादि के रहस्यों को न समझने वाले कोई
कोई पुरुष आत्मा को भी पुत्रभार्यादि का शेष किंवा उपकारक
कहते हैं ।
एतद्विवक्षया पुत्रे मुख्यात्मत्वं श्रुतीरितम् ।
आत्मा वै पुत्रनामेति तच्चोपनिषदि स्फुटम् ॥३३॥
वे कहते हैं कि—'आत्मा वै पुत्रनामासि' इत्यादि श्रुति में इसी
भाव से पुत्र को मुख्य आत्मा कहा है । पुत्र के मुख्य आत्मा
होने की बात ऐतरेय आदि उपनिषदों में भी स्पष्ट कही गयी है ।
सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मेभ्यः प्रतिधीयते ।
अथास्येतर आत्मायं कृतकृत्यः प्रमीयते ॥३४॥
उनमें कहा गया है कि—इस पिता का यही वह पुत्ररूप
आत्मा [जो पुरुष के देह में गर्भरूप से रहता है, जिसको बड़े
प्रेम से पालनीय कहा जाता है] पुण्य कर्मों के करने के लिए,
अपना प्रतिनिधि बना कर, छोड़ा जाता है । उसके पश्चात् इस
४८० पञ्चदशी
पिता का यह पितृरूप आत्मा अपने आप तो कृतकृत्य होकर
मर जाता है।
सत्यप्यात्मनि लोकोस्ति नापुत्रस्यात एव हि।
अनुशिष्टं पुत्रमेव लोक्यमाहुर्मनीषिणः ॥३५॥
'नापुत्रस्य लोकोस्ति' इस वाक्य में कहा गया है कि—
आत्मा के होने पर भी अगर पुत्र नहीं है, तो पिता को पर-
लोक नहीं मिलता। मनीषी लोग शिक्षित पुत्र को ही लोक्य
[अर्थात् परलोक का साधन] बताते हैं।
मनुष्यलोको जय्यः स्यात् पुत्रेणैवेतरेण नो।
मुमूर्षुमंन्त्रयेत् पुत्रं त्वं ब्रह्मेत्यादिमन्त्रकैः ॥३६॥
'सोयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा' (बृ० १-५-१६)
इस वाक्य में कहा गया है कि मनुष्यलोक का सुख तो केवल
पुत्र स हो सम्पादित हो सकता है। कर्म आदि दूसरे किसी
साधन से मनुष्यलोक के सुख का उपार्जन नहीं हो सकता।
[देखते हैं कि जिसके पुत्र नहीं होता उसको सुख के साधन
धन सम्पत्ति को देख देख कर भी निर्वेदं हुआ करता है]
मुमूर्षु पिता को चाहिए कि मरते समय 'त्वं ब्रह्म' इत्यादि तीन
मन्त्रों के द्वारा पुत्र का अनुशासन करे।
इत्यादिश्रुतयः प्राहुः पुत्रभार्यादिशेषताम् ।
लौकिका अपि पुत्रस्य प्राधान्यमनुमन्वते ॥३७॥
इत्यादि पूर्वोक्त श्रुतियों ने आत्मा को पुत्र भार्या आदि का
शेष कहा है। इसके अतिरिक्त लौकिक लोग भी पुत्र की प्रधा-
नता को मानते ही हैं।
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८१
स्वस्मिन् मृतेऽपि पुत्रादिर्जीवेद् वित्तादिना यथा ।
तथैव यत्नं कुरुते मुख्याः पुत्रादयस्ततः ॥३८॥
देखा जाता है कि-अपने मर जाने पर भी पुत्र पत्नी
आदि, क्षेत्र आदि सम्पत्ति के द्वारा जैसे जीते रहें, वैसा यत्न
यह प्राणी किया करता है। इससे यही सिद्ध होता है कि-
पुत्र भार्या आदि ही मुख्य हैं [क्योंकि अपना प्रयास सह सह-
कर भी पुत्रादि के जीवन का उपाय किया जाता है, इसी से
समझते हैं कि पुत्रादि ही प्रधान हैं।]
बाढमेतावता नात्मा शेषो भवति कस्यचित् ।
गौणमिथ्यामुख्यभेदैरात्मायं भवति त्रिधा ॥३९॥
इसका समाधान यह है कि-उक्त रीति से कहीं कहीं
पुत्रादि मुख्य तो होते हैं। परन्तु केवल इतनी सी बात से यह
आत्मा किसी का शेष नहीं बन जाता। गौण, मिथ्या तथा
मुख्य ये तीन भेद आत्मा के होते हैं। [सो जिस जिस व्यव-
हार में, जिस जिस तरह की आत्मता विवक्षित होती है,
उस-उस व्यवहार में उस-उस आत्मा की प्रधानता मानी
जाती है।]
देवदत्तस्तु सिंहोऽयमित्यैक्यं गौणमेतयोः ।
भेदस्य भासमानत्वात् पुत्रादेरात्मता तथा ॥४०॥
'यह देवदत्त तो शेर है' ऐसा जब कोई कहता है तब शेर
तथा देवदत्त इन दोनों की जो एकता भासती है वह गौण है।
क्योंकि इन दोनों का भेद तो प्रत्यक्ष ही प्रतीत होता रहता है।
इसी प्रकार भेद के प्रत्यक्ष प्रतीत होते रहने के कारण पुत्रादि
भी गौण आत्मा माने जा सकते हैं। [ मुख्य नहीं ]
४८२ पञ्चदशी
भेदोस्ति पंचकोशेषु साक्षिणो न तु भात्यसौ ।
मिथ्यात्मताऽतः कोशानां स्थाणोश्चौरात्मता यथा ॥४१॥
आनन्दमयादि जो पांच कोष हैं, वे यद्यपि साक्षी से भिन्न
हैं, परन्तु यह भेद किसी को भी भासता नहीं है। इस कारण
इन कोशों को मिथ्या आत्मा कहा जाता है। जो स्थाणु वस्तुतः
चोर से भिन्न है उस स्थाणु की चोररूपता जैसे मिथ्या होती
है [ऐसे ही ये पांच कोष भी मिथ्या आत्मा कहा सकते हैं]
न भाति भेदो नाप्यस्ति साक्षिणोऽप्रतियोगिनः ।
सर्वान्तरत्वात् तस्यैव मुख्यमात्मत्वमिष्यते ॥४२॥
अप्रतियोगी होने के कारण, साक्षी का भेद न तो है ही
और न प्रतीत ही होता है। सर्वान्तर होने के कारण उस साक्षी
को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
पुत्र या देह आदि का प्रतियोगी जैसे स्वयं होता है इस
प्रकार स्वयं का कोई भी (सच्चा) प्रतियोगी नहीं होता, [क्योंकि
देहादि सभी पदार्थ आरोपित हैं] इस कारण साक्षीरूप इस
आत्मा का, पुत्रादि गौण आत्माओं की तरह, किसी से भी भेद
प्रतीत नहीं होता है और न देहादि मिथ्या आत्माओं की तरह
किसी से भेद है ही। देह या पुत्रादि जितने भी मिथ्या आत्मा
या गौण आत्मा हैं, उन सभी से आन्तर होने के कारण इस
साक्षी को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
सत्येवं व्यवहारेषु येषु यस्यात्मतोचिता ।
तेषु तस्यैव शेषित्वं सर्वस्यान्यस्य शेषता ॥४३॥
यों आत्मा के तीन प्रकार का होने पर भी जिन व्यवहारों
में जिसको आत्मा होना चाहिये, उन व्यवहारों में वही आत्मा
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८३
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८३
प्रधान होता है। उससे भिन्न और दोनों तरह के आत्मा 'शेष'
किंवा 'गौण' हो जाते हैं।
आत्मा यद्यपि तीन प्रकार का है तो भी पालन में 'पुत्र'
'मुख्यात्मा' होता है। पोषण के समय 'देह' ही 'मुख्यात्मा'
माना जाता है। तथा ब्रह्मात्मत्व का अनुसन्धान करते समय
'साक्षी' को ही 'मुख्यात्मा समझा जाता है। जब इनमें से किसी
एक को 'मुख्यात्मा' माना जाता है तब उस समय वही एक
शेषी किंवा मुख्य होता है। उस समय उससे भिन्न और सबके
सब शेष अथवा अमुख्य हो जाते हैं।
मुमूर्षो गृहरक्षादौ गौणात्मैवोपयुज्यते ।
न मुख्यात्मा न मिथ्यात्मा पुत्रः शेषी भवत्यतः॥४४॥
गृहरक्षादि कामों में मुमूर्षु को गौणात्मा का ही उपयोग
हो सकता है। मुख्यात्मा या मिथ्यात्मा का नहीं। इस कारण
ऐसे कामों में पुत्र ही शेषी होता है।
देख लो कि—घर की रक्षा आदि जो काम हैं उनमें पुत्र
या भार्या आदि गौणात्माओं का ही उपयोग हो सकता है।
क्योंकि वे उस के बाद भी जीवित रहना चाहते हैं। अविकारी
होने के कारण मुख्य आत्मा [ जो साक्षी है घर की रक्षा में
उस ] का तो कुछ उपयोग ही नहीं हो सकता। मिथ्या आत्मा
[जो देह है वह] तो मरने को तैयार बैठा है। उससे भी घर
की रक्षा नहीं हो सकती। इस कारण ऐसे काम में पुत्र ही
'शेषी' किंवा 'मुख्यात्मा' हो सकता है।
अध्येता वह्निरित्यत्र सन्नप्यग्निर्न गृह्यते ।
अयोग्यत्वेन, योग्यत्वाद् बटुरेवात्र गृह्यते ॥४५॥
४८४ पञ्चदशी
'यह पढ़ने वाला तो अग्नि है' इस वाक्य में, पढ़ने के
अयोग्य होने के कारण [वहाँ पर] विद्यमान भी अग्नि नहीं लिया
जाता। किन्तु उचित होने के कारण पढ़ने के योग्य तीव्र बालक का
ही अग्नि शब्द से ग्रहण किया जाता है [इस दृष्टान्त के अनुसार
ही, अपने मरने के बाद घर की रक्षा करने के लिये, अपने
आपे को छोड़ कर, पुत्र को ही 'आत्मा' माना जाता है।]
कृशोऽहं पुष्टि माप्स्यामीत्यादौ देहात्मतोचिता ।
न पुत्रं विनियुङ्क्तेऽत्र पुष्टिहेत्वन्नभक्षणे ॥४६॥
'मैं अब कृश होगया हूँ, अब घी दूध खा कर पुष्ट हो
जाऊँगा'इत्यादि लौकिक व्यवहारों में तो जो देह के लिये पुष्टि-
कारक अन्न खा सकता है उस को ही 'आत्मा' समझना
चाहिये। देखते हैं कि कोई भी अपने शरीर की पुष्टि को लक्ष्य
बना कर पुष्टि करने वाले अन्न का भोजन, पुत्र को नहीं
कराता [किन्तु स्वयं अपने देह को ही कराता है। ऐसे स्थलों
में मिथ्या आत्मा यह देह ही—प्रधान हो सकता है। मुख्यात्मा
को तो कुछ खिलाया ही नहीं जासकता। गौणात्मा को खिलाने
से अपने शरीर में पुष्टि नहीं आती]
तपसा स्वर्ग मेष्यामीत्यादौ कर्त्रात्मतोचिता ।
अनपेक्ष्य वपुर्भोगं चरेत् कृच्छ्रादिकं ततः ॥४७॥
'तप करके उससे स्वर्ग को पाऊँगा' इत्यादि व्यवहार.जब
किया जाता है, तब कर्ता जो विज्ञानमय है, वही आत्मा होना
चाहिये [इस व्यवहार में देहादि को आत्मा मानें तो काम नहीं
चलता। क्यों कि देह तो यहीं जल कर भस्म हो जाता है]
यही कारण है कि देह के भोगों को लात मार कर कृच्छ्र
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८५
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८५
चान्द्रायण आदि व्रत किये जाते हैं [इन कृच्छ्रादि से कर्त्ता
कहाने वाले विज्ञानमय का ही उपकार होता है। क्योंकि यही
विज्ञानमय लोकान्तरगमन आदि किया करता है]
मोक्ष्येऽहमित्यत्र युक्तं चिदात्मत्वं तदा पुमान् ।
तद्वेत्ति गुरुशास्त्राभ्यां न तु किंचिच्चिकीर्षति ॥४८॥
'मुझे मुक्ति पानी है' यह विचार जब आता है तब इस
विचार में चेतनतत्व ही आत्मा होना चाहिये। क्योंकि तब
यह [ अधिकारी ] पुरुष गुरु [ आचार्योपदेश ] तथा शास्त्र
[वाक्यार्थ] के विचार से उस चिदात्मतत्व को जान लेता है
[कि मैं कर्ता भोक्ता आदि कुछ नहीं हूँ। मैं तो सच्चिदानन्द
ब्रह्मतत्व ही हूँ] अपने इस रूप को जान चुकने के बाद यह पुरुष
कुछ भी करना नहीं चाहता है। [ इस मोक्षव्यवहार में
चेतन तत्व ही आत्मा होना चाहिये। इस में कर्ता आदि
आत्माओं से काम नहीं चल सकता]
विप्रक्षत्रादयो यद्वद् बृहस्पतिसवादिषु ।
व्यवस्थितास्तथा गौणमिथ्यामुख्या यथोचितम् ॥४९॥
विप्र क्षत्रिय आदि जिस प्रकार पृथक् पृथक् बृहस्पति
सवादियों में व्यवस्थित हैं [ब्राह्मण को बृहस्पतिसव का ही
अधिकार है। राजसूय क्षत्रिय ही कर सकता है। वैश्यस्तोम
वैश्य को ही करना चाहिये] इसी प्रकार 'गौण' 'मिथ्या' या
'मुख्य' तीनों प्रकार के 'आत्मा' यथायोग्य अपने अपने
व्यवहारों में प्रधान रहते हैं।
तत्र तत्रोचिते प्रीति रात्मन्येवातिशायिनी ।
अनात्मनि तु तच्छेषे प्रीति रन्यत्र नोभयम् ॥५०॥
४८६ पञ्चदशी
जिस जिस व्यवहार में जो जो आत्मा उचित होता है,
उस व्यवहार में उसी उचित आत्मा [अथवा यों कहो कि उपयोगी
होने से प्रधान बने हुए उसी आत्मा] में प्रेम की अधिकता हो
जाती है। जो जो अनात्मपदार्थ उस आत्मा का शेष होता है,
उस में भी प्रेम तो हो जाता है, परन्तु उस में निरतिशय प्रेम
नहीं हो सकता। जो पदार्थ न तो आत्मा ही हो और न आत्मा
का शेष [उपकारक, अंग] ही हो उसमें तो दोनों तरह का प्रेम
[अतिशय प्रेम और साधारण प्रेम] नहीं पाया जाता।
उपेक्ष्यं द्वेष्यमित्यन्यद् द्वेधा, मार्गतृणादिकम् ।
उपेक्ष्यं, व्याघ्रसर्पादि द्वेष्यमेवं चतुर्विधम् ॥५१॥
आत्मा और आत्मशेष से भिन्न जो पदार्थ होते हैं वे भी
दो दो तरह के होते हैं—एक 'उपेक्ष्य' दूसरे 'द्वेष्य' । उनमें से
मार्ग में पड़े हुए तिनके आदि उपेक्ष्य [ उपेक्षा करने योग्य ]
होते हैं तथा अपने को हानि पहुँचाने वाले व्याघ्र या सर्प आदि
'द्वेष्य' होते हैं। यों संसार के पदार्थ चार श्रेणियों में विभक्त
किये गये हैं।
आत्मा, शेष, उपेक्ष्यं च द्वेष्यं चेति चतुर्ष्वपि ।
न व्यक्तिनियमः किन्तु तत्तत्कार्यात् तथा तथा ॥५२॥
( १ ) आत्मा ( २ ) आत्मा का शेष ( ३ ) उपेक्ष्य तथा
( ४ ) द्वेष्य ये चार श्रेणियां संसार के पदार्थों की हैं। इन चारों
मे 'यही प्रियतम है' 'यही प्रिय है' 'यही उपेक्ष्य है' और 'यही
द्वेष्य हैं' ऐसा कोई भी नियम नहीं हो सकता। किन्तु उन उन
[ उपकारादि ] कामों के कारण ये वैसे वैसे हो जाया करते हैं
[ ये अपना रूप बदल देते हैं। कभी प्रिय द्वेष्य हो जाते हैं और
द्वेष्य प्रिय बन जाते हैं इत्यादि ।]
स्याद् व्याघ्रः संमुखो द्वेष्यो ह्युपेक्ष्यस्तु पराङ्मुखः ।
लालनादनुकूलश्चेद् विनोदायेति शेषताम् ॥५३॥
देख लो कि—जो व्याघ्र सामने से [ खाने को ] आता है
वह 'द्वेष्य' होता है । जब वह लौट कर दूसरी तरफ निकला
चला जाता है तब वही 'उपेक्ष्य' हो जाता है । वही व्याघ्र यदि
लालन से अपने अनुकूल हो जाय तो अपने विनोद की वस्तु हो
जाती है, यों अपना उपकारक होकर अपना 'प्रिय' किंवा
'शेष' हो जाता है ।
व्यक्तीनां नियमो मा भूल्लक्षणात्तु व्यवस्थितिः ।
आनुकूल्यं प्रातिकूल्यं द्वयाभावश्च लक्षणम् ॥५४॥
यद्यपि 'प्रिय' 'अप्रिय' या 'उपेक्ष्य' आदि नाम की कोई भी
एक नियत वस्तु नहीं होती, फिर भी व्यवहार की व्यवस्था तो
लक्षण के कारण हो ही जाती है। अनुकूलता 'प्रिय' का लक्षण
है। प्रतिकूलता 'द्वेष्य' का लक्षण बताया जाता है। जो तो
अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो उसको 'उपेक्ष्य'
मानते हैं ।
आत्मा प्रेयान्, प्रियः शेषो, द्वेषोपेक्षे तदन्ययोः ।
इति व्यवस्थितो लोको याज्ञवल्क्यमतं च तत्॥५५॥
[इस सब का संक्षेप यही है कि]—आत्मा अत्यन्त प्रिय
है। शेष अर्थात् अपने साधन बने हुए पदार्थ प्रिय कहाते हैं।
आत्मा और आत्मा के शेष से भिन्न जितने भी पदार्थ होते
४८८ पंचदशी
है, उन में से किसी से तो द्वेष होता है और किसी की उपेक्षा
की जाती है। यों चार विभागों के कारण लोक की व्यवस्था
हो रही है [इन चार विभागों के अतिरिक्त और किसी प्रकार
के पदार्थ नहीं पाये जाते] आत्मा आदि की जो प्रियतमता आदि
हमने बतायी है वह याज्ञवल्क्य को भी सम्मत है [देखो
बृहदारण्यक मैत्रेयी ब्राह्मण]
अन्यत्रापि श्रुतिः प्राह पुत्राद् वित्तात् तथान्यतः ।
सर्वस्मादान्तरं तत्त्वं तदेतत् प्रेय इष्यताम् ॥५६॥
केवल मैत्रेयी ब्राह्मण में ही नहीं, किन्तु पुरुषविध ब्राह्मण
में भी आत्मा को प्रियतम कहा है। वहाँ कहा गया है कि—
पुत्र से, धनधान्य से और सभी कुछ से, यह आत्मतत्त्व अत्यन्त
अन्दर का पदार्थ है। इस कारण इस को प्रेय [अर्थात् प्रियतम]
मान लेना चाहिये ।
श्रौत्या विचारदृष्ट्यायं साक्ष्येवात्मा न चेतरः ।
कोशान् पंच विविच्यान्तर्वस्तुदृष्टि र्विचारणा ॥५७॥
प्रकृत में तो हमें इतना ही कहना है कि—श्रौती विचारदृष्टि
करें तो यह अकेला साक्षी तत्व ही 'आत्मा' कहा सकता है।
इस से भिन्न पुत्रादि कुछ भी आत्मा नहीं है। यदि [तैत्तिरीय
श्रुति में बताये प्रकार से] अन्नमय आदि पांच कोशों को आत्मा
से पृथक् कर लिया जाय और उन सब के अन्दर छिपी हुई
जो आत्मवस्तु है उससे विचार की आंखें भिड़ा दी जांय, तो
बस यही 'विचारणा' कहाती है।
जागरस्वप्नसुप्तीना मागमापायभासनम् ।
यतो भवत्यसावात्मा स्वप्रकाशचिदात्मकः ॥५८॥
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्दप्रकरणम् ४८९
अन्दर की आत्मवस्तु को देखने की विधि किंवा आत्मविचार
की पद्धति तो यह है कि— [ आने जाने वाली जो] 'जागरण'
'स्वप्न' तथा 'सुषुप्ति' अवस्था हैं, इनमें से अगली के आने और
पिछली के चले जाने की प्रतीति जिस नित्य चैतन्य रूप साक्षी
से हुआ करती है वही स्वप्रकाशचिद्रूप पदार्थ 'आत्मा' है ।
शेषाः प्राणादिवित्तान्ता आसन्नास्तारतम्यतः ।
प्रीतिस्तथा तारतम्यात् तेषु सर्वेषु वीक्ष्यते ॥५९॥
शेष[अर्थात् उस साक्षी से भिन्न] प्राण से लेकर वित्तपर्यन्त
जितने भी पदार्थ हैं [जिन को आगे बताया गया है] न्यूनाधिक
भाव से आत्मा के समीपवर्ती होते हैं । जिस अनुपात से वे
आत्मा के समीपवर्ती हैं उसी अनुपात से उन सब (प्राणादियों)
में प्रीति पायी जाती है ।
वित्तात् पुत्रः प्रियः,पुत्रात् पिण्डः,पिण्डात्तथेन्द्रियम् ।
इन्द्रियाच्च प्रियः प्राणः, प्राणादात्मा प्रियः परः ॥६०॥
[प्रीति की न्यूनाधिकता इस प्रकार होती है कि] धन से
तो पुत्र प्यारा होता है। पुत्र की अपेक्षा शरीर पर अधिक प्यार
किया जाता है। शरीर से इन्द्रियें अधिक प्यारी होती हैं।
इन्द्रियों से प्राण प्यारे हैं। आत्मा तो प्राणों से भी बहुत अधिक
प्रिय माना गया है ।
सभी प्राणी पुत्र की विपत्ति को हटाने के लिये धन को
व्यय कर डालते हैं । पुत्र पर विपत्ति आने पर धन की पर्वाह
नहीं की जाती । कभी कभी तो अपने देह की रक्षा के लिये
पुत्रों तक को छोड़ दिया जाता है। इन्द्रियों के नाश को बचाने
के लिये लाठी डण्डों की मार से देह को पिटवाना पड़ता है और
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इन्द्रियों को बचा लेते हैं। मरने का प्रसङ्ग आपड़े तो इन्द्रियों
का छेदन भी सहन किया जाता है और प्राणों को बचा लिया
जाता है। आत्मा का कल्याण दीख पड़ता हो तो प्राणों का
परित्याग करते हुए 'गर्व' और 'हर्ष' दोनों ही पाये जाते हैं।
यों जो जो पदार्थ आत्मा के जितना जितना अधिक निकट है,
वह उतना ही उतना अधिक प्रिय होता है। इस बातका अनुमोदन
सभी का अनुभव कर रहा है। परन्तु आत्मा की सर्वाधिक
प्रियता की ओर को पामर पुरुषों का ध्यान जाता ही नहीं। वहां
तक तो विद्वानों का अनुभव ही पहुँच सकता है।
एवं स्थिते विवादोऽत्र प्रतिबुद्धविमूढयोः ।
श्रुत्योदाहारि तत्रात्मा प्रेयानित्येव निर्णयः ॥६१॥
यों आत्मा की प्रियतमता प्रमाण से सिद्ध भी है तो भी
ज्ञानी और अज्ञानी की विप्रतिपत्ति को हटाने के लिये श्रुति ने
उन दोनों के विवाद का वर्णन कर दिया है और यही निर्णय
किया है कि आत्मा ही प्रियतम है।
साक्ष्येव दृश्यादन्यस्मात् प्रेयानित्याह तत्ववित् ।
प्रेयान् पुत्रादिरेवेमं भोक्तुं साक्षीति मूढधीः ॥६२॥
'अन्य सब दृश्य पदार्थों से अधिक प्रिय तो यह साक्षी
ही है' ऐसा तत्वज्ञानी समझता है। मूढबुद्धि का तो यह विचार
होता है कि—प्रियतम तो पुत्रादि ही हैं यह साक्षी आत्मा तो
इन [प्रियतम पुत्रादि] को भोगने के लिये इस संसार में उतरा है।
आत्मनोऽन्यं प्रियं ब्रूते शिष्यश्च प्रतिवाद्यपि ।
तस्योत्तरं वचो बोधशापौ कुर्यात् तयोः क्रमात् ॥६३॥
आत्मा से भिन्न को प्रिय कहने वाले दो होते हैं—एक
'शिष्य' दूसरा 'प्रतिवादी' । शिष्य के लिये उत्तर यही है कि
उसे आत्मबोध कराया जाय [और उसके अनुभव से ही आत्मा
की प्रियता को कहलाया जाय] प्रतिवादी के लिये उत्तर यही है कि
उसे शाप दिया जाय—उसे भय अर्थात् इस मन्तव्य से होने वाली
हानि दिखायी जाय [जैसा कि ६९ श्लोक में दिखाया गया है ।]
प्रियं त्वां रोत्स्यतीत्येवमुत्तरं वक्ति तत्ववित् ।
स्वोक्तप्रियस्य दुष्टत्वं शिष्यो वेत्ति विवेकतः ॥६४॥
[ तत्वज्ञानी पुरुष शिष्य और प्रतिवादी दोनों को एक ही
उत्तर देता है कि ]—हे शिष्य ! या हे प्रतिवादिन् तेरा माना
हुआ [ पुत्रादिरूपी ] प्रिय जब नष्ट होने लगेगा तब वह तुम्हें
[दोनों को] रुलायेगा । [रोक लेगा,बांध कर बैठा लेगा] शिष्य
जब इस उत्तर को सुनता है तब अपने प्रेमपात्र पुत्रादि के दोषों
का निम्नरीति से विचार करके उनकी दोषदुष्टता को पहचान
जाता है ।
अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् ।
लब्धोऽपि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥६५॥
जातस्य ग्रहरोजादिः कुमारस्य च मूर्खता ।
उपनीतेऽप्यविद्यत्व मनुद्वाहश्च पण्डिते ॥६६॥
यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः ।
पित्रोर्दुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥६७॥
दोषों का विचार करने की रीति यह है कि—जब पुत्र की
आशा नहीं होती तब माता पिता को उस अजात पुत्र से चिर-
काल तक बड़ा क्लेश रहता है । पुत्र की आशा भी हो और
गर्भपात हो जाय तब और भी क्लेश होता है । प्रसव काल में
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माता को अकथनीय दुःख देता है । उत्पन्न होने पर ग्रहपीडा
या रोगों का आक्रमण हो जाय तो माता पिता को बड़े कष्टों का
सामना करना पड़ता है । कुमारावस्था में यदि वह विद्या न
पढ़ने लगे तो भी माँ-बाप दुःखी ही रहते हैं । उपनयन हो जाने
पर यदि विद्या प्राप्त न कर सके तो भी दुःख का कारण बन
जाता है । पण्डित होकर यदि उसका विवाह न हो सके तो मां
बाप के कष्ट का अन्त ही मत पूछो । युवा होकर यदि परस्त्री-
गमनादि दुराचार करने लगे तो मां बाप मुँह दिखाने योग्य भी
नहीं रहते । सन्तान वाला होकर भी यदि वह दरिद्र रहे तो
भी वे उससे चिन्तित ही रहते हैं । धनी होकर भी यदि वह
भरी जवानी में मर जाय तब तो माता पिता की आंखों के
सामने अंधेरा हो जाता है । यों माता पिता की कष्टकथा का
अन्त ही नहीं होता ।
एवं विविच्य पुत्रादौ प्रीतिं त्यक्त्वा, निजात्मनि ।
निश्चित्य परमां प्रीतिं, वीक्षते तमहर्निशम् ॥६८॥
इस प्रकार पुत्र, स्त्री आदि जितने भी प्रिय प्रतीत होने
वाले पदार्थ हैं, उनके दोषों को जानकर, उनसे प्रेम छोड़कर,
अपने आत्मा में ही परम प्रेम का निश्चय करके, दिन रात उस
आत्मा का ही अनुसन्धान करने लग जाता है ।
आग्रहाद् ब्रह्मविद्वेषादपि पक्षममुञ्चतः ।
वादिनो नरकः प्रोक्तो दोषश्च बहुयोनिषु ॥६६॥
आग्रह से [कि पुत्रादि की प्रियता को तो मैं कभी छोड़
ही नहीं सकता हूँ] तथा ब्रह्मविद्वेष से [कि इसके कहे हुए ब्रह्म
की तो मैं धज्जी उड़ा डालूँगा] अपने पक्ष को न छोड़ने वाले.