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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 726 में से

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पृष्ठ 513

'शिष्य' दूसरा 'प्रतिवादी' । शिष्य के लिये उत्तर यही है कि
उसे आत्मबोध कराया जाय [और उसके अनुभव से ही आत्मा
की प्रियता को कहलाया जाय] प्रतिवादी के लिये उत्तर यही है कि
उसे शाप दिया जाय—उसे भय अर्थात् इस मन्तव्य से होने वाली
हानि दिखायी जाय [जैसा कि ६९ श्लोक में दिखाया गया है ।]
प्रियं त्वां रोत्स्यतीत्येवमुत्तरं वक्ति तत्ववित् ।
स्वोक्तप्रियस्य दुष्टत्वं शिष्यो वेत्ति विवेकतः ॥६४॥
[ तत्वज्ञानी पुरुष शिष्य और प्रतिवादी दोनों को एक ही
उत्तर देता है कि ]—हे शिष्य ! या हे प्रतिवादिन् तेरा माना
हुआ [ पुत्रादिरूपी ] प्रिय जब नष्ट होने लगेगा तब वह तुम्हें
[दोनों को] रुलायेगा । [रोक लेगा,बांध कर बैठा लेगा] शिष्य
जब इस उत्तर को सुनता है तब अपने प्रेमपात्र पुत्रादि के दोषों
का निम्नरीति से विचार करके उनकी दोषदुष्टता को पहचान
जाता है ।
अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् ।
लब्धोऽपि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥६५॥
जातस्य ग्रहरोजादिः कुमारस्य च मूर्खता ।
उपनीतेऽप्यविद्यत्व मनुद्वाहश्च पण्डिते ॥६६॥
यूनश्च परदारादि दारिद्र्यं च कुटुम्बिनः ।
पित्रोर्दुःखस्य नास्त्यन्तो धनी चेन्म्रियते तदा ॥६७॥
दोषों का विचार करने की रीति यह है कि—जब पुत्र की
आशा नहीं होती तब माता पिता को उस अजात पुत्र से चिर-
काल तक बड़ा क्लेश रहता है । पुत्र की आशा भी हो और
गर्भपात हो जाय तब और भी क्लेश होता है । प्रसव काल में