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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

: समझ में आती ही नहीं। इस कारण प्रेम के स्वरूप की विवे-
: चना इस श्लोक में सूझी है। प्रेम ऐसा होना चाहिए जो सभी
: पदार्थों पर लागू हो सकता हो। यदि वह सब पदार्थों पर लागू
: नहीं होता है तो वह प्रेम नहीं है। उसको सर्वविषयक सिद्ध
: करने के लिए प्रीति का रूप बताना चाहिए जो सब में
: पाया जा सकता हो।]
: तर्ह्यस्तु सात्त्विकी वृत्तिः सुखमात्रानुवर्तिनी ।
: प्राप्ते, नष्टेऽपि, सद्भावादिच्छातो व्यतिरिच्यते ॥२२॥
: उसका उत्तर यह है कि यदि वह प्रीति रागादिरूप नहीं
: हो सकती है तो आप उस प्रीति को केवल सुख को विषय
: करने वाली एक सात्त्विक वृत्ति मान लो। उस प्रीति को सत्त्व-
: गुण से बनी हुई अन्तःकरण की वृत्ति समझ लो। जब कोई
: वस्तु प्राप्त हुई रहती है या जब कोई वस्तु प्राप्त होकर नष्ट हो
: जाती है अथवा अप्राप्त रहती है तब भी उसके विषय में यह
: [केवल सुख को विषय करने वाली सात्त्विक] वृत्ति बनी ही
: रहती है। इस कारण इस वृत्ति को इच्छा से भिन्न माना जाता
: है। [क्योंकि इच्छा तो केवल अप्राप्त सुखादि को ही अपना
: विषय बनाया करती है और यह वृत्ति प्राप्त अप्राप्त सभी को
: अपना विषय बनाती है]
: सुखसाधनतोपाधेरन्नपानादयः प्रियाः ॥२३॥
: आत्मानुकूल्यादन्नादिसमश्चेदमुनात्रकः ।
: अनुकूलयितव्यः स्यान्नैकस्मिन् कर्मकर्तृता ॥२४॥
: प्रश्न होता है कि--सुख के साधन होने के कारण जैसे
: अन्न पानादि प्रिय देखे गए हैं इसी प्रकार यदि यह आत्मा भी