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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 726 में से

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पृष्ठ 504

४८२ पञ्चदशी
भेदोस्ति पंचकोशेषु साक्षिणो न तु भात्यसौ ।
मिथ्यात्मताऽतः कोशानां स्थाणोश्चौरात्मता यथा ॥४१॥
आनन्दमयादि जो पांच कोष हैं, वे यद्यपि साक्षी से भिन्न
हैं, परन्तु यह भेद किसी को भी भासता नहीं है। इस कारण
इन कोशों को मिथ्या आत्मा कहा जाता है। जो स्थाणु वस्तुतः
चोर से भिन्न है उस स्थाणु की चोररूपता जैसे मिथ्या होती
है [ऐसे ही ये पांच कोष भी मिथ्या आत्मा कहा सकते हैं]
न भाति भेदो नाप्यस्ति साक्षिणोऽप्रतियोगिनः ।
सर्वान्तरत्वात् तस्यैव मुख्यमात्मत्वमिष्यते ॥४२॥
अप्रतियोगी होने के कारण, साक्षी का भेद न तो है ही
और न प्रतीत ही होता है। सर्वान्तर होने के कारण उस साक्षी
को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
पुत्र या देह आदि का प्रतियोगी जैसे स्वयं होता है इस
प्रकार स्वयं का कोई भी (सच्चा) प्रतियोगी नहीं होता, [क्योंकि
देहादि सभी पदार्थ आरोपित हैं] इस कारण साक्षीरूप इस
आत्मा का, पुत्रादि गौण आत्माओं की तरह, किसी से भी भेद
प्रतीत नहीं होता है और न देहादि मिथ्या आत्माओं की तरह
किसी से भेद है ही। देह या पुत्रादि जितने भी मिथ्या आत्मा
या गौण आत्मा हैं, उन सभी से आन्तर होने के कारण इस
साक्षी को ही मुख्य आत्मा माना जाता है।
सत्येवं व्यवहारेषु येषु यस्यात्मतोचिता ।
तेषु तस्यैव शेषित्वं सर्वस्यान्यस्य शेषता ॥४३॥
यों आत्मा के तीन प्रकार का होने पर भी जिन व्यवहारों
में जिसको आत्मा होना चाहिये, उन व्यवहारों में वही आत्मा