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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 726 में से

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पृष्ठ 498

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४७६ पञ्चदशी .


अनुकूल किंवा प्रिय होने के कारण ही [अन्नपानादि के समान]
सुख का साधन होता होगा,तो इसका क्या समाधान करते हो ?
इस का उत्तर यह है कि—अच्छा यह बताओ कि तुम्हें इस
आत्मा से किस की अनुकूलता करनी है ? [ऐसा तो कोई दीख
नहीं पड़ता कि इस आत्मा को जिस के अनुकूल बना दिया
जाता हो। आत्मा से भिन्न तो कोई और भोक्ता है ही नहीं।
यदि कहो कि वह स्वयं अपने आप के ही अनुकूल हो जायगा
तो हम कहेंगे कि] एक में कर्म और कर्ता की दोनों बात नहीं
रह सकतीं। [वही आत्मा उपकार्य भी हो और वही उपकारक
भी हो, यह दोनों विरुद्ध धर्म एक आत्मा में कैसे टिकेंगे ? ]
सुखे वैषयिके प्रीतिमात्रमात्मा त्वतिप्रियः ।
सुखे व्यभिचरत्येषा नात्मनि व्यभिचारिणी ॥२५॥
विषयजन्य जो सुख है, उनमें प्रीति तो होती है [किन्तु
उनमें प्रगाढ प्रीति नहीं होती] इसके विपरीत आत्मा तो अत्यन्त
प्रिय होता है [इस कारण उसे विषयजन्य सुखों के समान
मत मानो। जैसे विषयसुख भोक्ता के काम आता है, वैसे
यह आत्मा किसी भोक्ता के उपयोग में आने वाला तत्व नहीं
है ] देख लो कि विषय सुखों में रहने वाली यह प्रीति व्यभि-
चार कर जाती है—[यह प्रीति कभी पूर्वसुखों को छोड़ कर
दूसरे सुखों में पहुँच जाती है—एक सुख में बँध कर बैठे रहना
इस प्रीति को पसन्द नहीं है] परन्तु आत्मा में जो प्रीति रहती
है वह कभी व्यभिचार नहीं करती—[वह विषयान्तर में कभी
नहीं जाती। इस कारण आत्मप्रीति को ही निरतिशय प्रीति
कह सकते हैं।]