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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

४१० पंचदशी
करने के लिए ] इन्द्रियों के साथ साथ [अथवा इन्द्रियों के द्वारा]
बार बार बाहर निकला करती है। बस बुद्धि की इसी चंचलता
को [बुद्धि के भासक] साक्षी में वृथा ही आरोपित कर लिया
जाता है। [ उस साक्षी में वास्तविक चंचलता नहीं है।]
गृहान्तरगतः खल्पो गवाक्षादातपोऽचलः ।
तत्र हस्ते नर्त्यमाने नृत्यतीवातपो यथा ॥१७॥
निजस्थानस्थितः साक्षी बहिरन्तर्गमागमौ ।
अकुर्वन् बुद्धिचाञ्चल्यात् करोतीव तथा तथा ॥१८॥
झरोखे में होकर घर में गया हुआ नन्हा सा सूर्यप्रकाश,
अचल ही होता है। [वह हिलता जुलता नहीं है] उस आतप के
बीच में जब कोई पुरुष अपना हाथ हिलाने लगता है, तब जिस
प्रकार वह आतप भी हिलने सा लगता है, ठीक इसी प्रकार
साक्षी तो अपने ही स्थान में [किंवा अपनी अचल मर्यादा में ]
बैठा रहता है, वह कभी बाहर अन्दर आता जाता नहीं है।
परन्तु फिर भी बुद्धि की चंचलता के कारण, वैसा वैसा करता
हुआ सा [ व्यर्थ ही] प्रतीत होने लगता है।
न बाह्यो नान्तरः साक्षी बुद्धेर्देशौ हि तावुभौ ।
बुद्ध्याद्यशेषसंशान्तौ यत्र भात्यस्ति तत्र सः ॥१९॥
[ पहिले श्लोक में जो साक्षी को अपने स्थान पर स्थित
बताया है उसका अभिप्राय सुन लो ] वह साक्षी बाह्य या आन्तर
कभी नहीं होता। ये तो दोनों बुद्धि के ही देश कहाते हैं। बुद्धि
तथा इन्द्रिय आदि की प्रतीति के बन्द होने पर यह भाव अथवा
यह प्रकाश, जहाँ [ स्वतन्त्र रूप से ] जगमगाता रहता है, उसी
को इस साक्षी का स्थान समझ लो।

नाटकदीपप्रकरणम् ४११

नाटकदीपप्रकरणम् ४११
देशः कोऽपि न भासेत यदि तर्हस्त्वदेशभाक् ।
सर्वदेशप्रक्लप्त्यैव सर्वगत्वं न तु स्वतः ॥२०॥
यदि कहो कि-सम्पूर्ण व्यवहार के बन्द हो जाने पर तो
कोई भी देश भासा नहीं करता फिर उसको वहाँ कैसे पहचानें ?
तो हम कहेंगे कि तुम उसको बिना ही देश [स्थान] का समझ
लो [भाव यह है कि देश आदि की जितनी भी कल्पनायें हैं
उन सब कल्पनाओं का जो अधिष्ठान है उसे तो अपने से भिन्न
किसी देश की कुछ अपेक्षा ही नहीं होती ।] शास्त्र में भी उसको
कहीं कहीं सर्वगत आदि कहा गया है, वह भी सर्वदेश की कल्पना
के कारण ही कहा है। वह साक्षी आत्मा स्वभाव से सर्वगत
कदापि नहीं है [स्वभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है]
अन्तर्बहिर्वा सर्वं वा यं देशं परिकल्पयेत् ।
बुद्धिस्तद्देशगः साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥२१॥
अन्दर या बाहर या जिस किसी भी देश की कल्पना यह
बुद्धि कर लेती है उस देश का यह आत्मा 'साक्षी' कहाने लगता
है [वास्तव में तो सर्वगतपन की तरह सर्वसाक्षिपना भी कोई
पदार्थ नहीं है] इसी प्रकार अन्य वस्तुओं में भी साक्षी को समझ
लेना चाहिए ।
यद्यद् रूपादि कल्प्येत बुद्ध्या तत्तत् प्रकाशयन् ।
तस्य तस्य भवेत् साक्षी स्वतो वाग्बुद्ध्यगोचरः॥२२॥
बुद्धि से जिस जिस रूपादि की कल्पना की जाती है, उस
उस [कल्पित पदार्थ] को प्रकाशित रखने वाला यह आत्मा उस
उसका 'साक्षी' कहाने लगता है

४१२ पञ्चदशी
को पूछो तो हम कहेंगे कि ] वह स्वयं तो वाणी और बुद्धि का
अविषय ही है [ फिर उसे साक्षी भी कैसे कह दें ? ]
कथं तादृङ् मया ग्राह्य इति चेन्मैव गृह्यताम् ।
सर्वग्रहोपसंशान्तौ स्वयमेवावशिष्यते ॥२३॥
यदि वह साक्षी अवाङ् मनोगोचर है तो फिर मैं मुमुक्षु
ऐसे उसको कैसे ग्रहण करूँ ? इसका उत्तर यही है कि—उसे
तुम ग्रहण ही मत करो ! [तुम ग्रहण करने के झगड़े में ही मत
फंसो] जब सर्वग्रह शान्त हो जायगा [जब इस सब कुछ कहाने
वाले द्वैत की प्रतीति बन्द हो जायगी ] तब समझते हो क्या
शेष रह जायगा ? देखो उस समय यह स्वयं ही शेष रह गया
होगा [इसी को हम साक्षी कहते हैं । इसी को हम वाणी और
बुद्धि का अगोचर बताते हैं ।]
न तत्र मानापेक्षास्ति स्वप्रकाशस्वरूपतः ।
तादृग्व्युत्पत्यपेक्षा चेच्छ्रुतिं पठ गुरोर्मुखात् ॥२४॥
सर्वग्रह की शान्ति हो जाने पर जो स्वात्मा शेष रहता है,
उसके प्रत्यक्ष के लिए प्रमाण की कुछ भी आवश्यकता नहीं है।
क्योंकि वह तो स्वयं प्रकाश-स्वरूप ही है । वह आत्मा स्वयं
प्रकाशस्वरूप कैसे है ? यह जानना हो तो गुरु के मुख से
वेदान्त का अध्यन करो । [ इस गहन तत्व का ज्ञान तुम्हारे
स्वतन्त्र स्वाध्याय से या किसी ग्रन्थ का अनुवाद पढ़ने से नहीं
हो सकेगा । यह बात तो अनुभव वाला ही समझा सकेगा ]
यदि सर्वग्रहत्यागोऽशक्यस्तर्हि धियं व्रज ।
शरणं, तदधीनोऽन्तर्बहिष्वैषोऽनुभूयताम् ॥२५॥

नाटकदीपप्रकरणम् ४१३

नाटकदीपप्रकरणम् ४१३
यदि मन्दाधिकारी लोग सर्वग्रह का त्याग न कर सकते
हों तो वे बुद्धि की शरण ले लें। अन्दर या बाहर सब जगह
बुद्धि के अधीन हुए हुए इस साक्षी का वे लोग अनुभव करें
[ वे लोग यह विचारें कि-यह बुद्धि जिस जिस बाह्य या
आभ्यन्तर पदार्थ की कल्पना करती है, उस उस पदार्थ का
साक्षी होकर यह परमात्मा उसके अधीन सा रहता है। वे लोग
इसी मार्ग से परमात्मा का अनुभव प्राप्त करें। ]
इतिश्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितपंचदश्यां नाटकदीपप्रकरणम्

11. Yogananda

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम्
ब्रह्मानन्दं प्रवक्ष्यामि, ज्ञाते तस्मिन्नशेषतः ।
ऐहिकामुष्मिकानर्थव्रातं हित्वा सुखायते ॥१॥
अब हम ब्रह्मरूप आनन्द किंवा ब्रह्मानन्द नामक ग्रन्थ का
वर्णन करेंगे। जब कोई उस आनन्द तथा उस ग्रन्थ को सम्पूर्ण
रूप से जान लेगा तब वह ऐहिक और आमुष्मिक दोनों
प्रकार के अनर्थों से छूट कर सुखरूप हो जायगा। [उसको जो
इस लोक के देह पुत्रादि में 'मैं' और 'मेरेपन' का अभिमान
करने से आध्यात्मिक आदि ताप होते थे, या परलोक में जिन
तापों के मिलने की संभावना थी वह उन सब को सम्पूर्णरूप
से छोड़ कर सुख रूप ब्रह्मतत्व ही हो जायगा।]
ब्रह्मवित् परमाप्नोति, शोकं तरति चात्मवित् ।
रसो ब्रह्म रसं लब्ध्वानन्दी भवति नान्यथा ॥२॥
ब्रह्मदर्शी पर को पा लेता है। आत्मज्ञानी शोक को तर
जाता है। रस ब्रह्म ही है। रस को पाकर ही आनन्दी होता है
और तरह से नहीं।
ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै० २-१) इस वाक्य में कहा गया है
कि जो ब्रह्म को जानता है वह पर अथवा उत्कृष्ट आनन्दरूप
ब्रह्म को प्राप्त कर चुकता है। श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकं

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१५

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१५
चात्मवित् (छा० ७-१-३) इस श्रुति में कहा गया है कि देश-
काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित आत्मतत्व को जान लेने
वाला पुरुष शोक अर्थात् इस अज्ञानमूलक संसार समुद्र को
लांघ जाता है । रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति (तै०२-७)
इस श्रुति में कहा गया है कि जिसको कहीं पर 'ब्रह्म' और
कहीं पर 'आत्मा' कहा जाता है वह यह आत्मा रस किंवा
सार अथवा आनन्दरूप है,उस आनन्दरूप ब्रह्म को पाकर [ मैं
ब्रह्म हूँ इस ज्ञान से प्राप्त करके] आनन्दी हो जाता है—मर्यादा-
रहित और सर्वाधिक सुख को पा लेता है। ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान
को छोड़ कर किसी भी दूसरे साधन के अनुष्ठान से आनन्दी
नहीं हो सकता। इन सब वाक्यों से यही सिद्ध होता है कि
ब्रह्मज्ञान से अनिष्ट की निवृत्ति होती है और इष्ट की प्राप्ति होती है।
प्रतिष्ठां विन्दते स्वस्मिन् यदा स्यादथ सोऽभयः।
कुरुतेऽस्मिन्नन्तरं चेदथ तस्य भयं भवेत् ॥३॥
जब अपने आपे में प्रतिष्ठा पा लेता है तब वह अभय हो
जाता है। जब इसमें भेद कर बैठता है फिर उसे भय लगने
लगता है।
यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्ये ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां
विन्दते ऽथ सोऽभयं गतो भवति (तै ०२-७) इस श्रुति में कहा गया
है कि जिस समय यह मुमुक्षु इन्द्रियों से न दीखने वाले, स्वरूप
होने के कारण अपना न कहा सकने वाले, शब्दों से न कहे
जाने वाले, किसी के आश्रय में न रहने वाले, अपनी ही महिमा
में ठहरने वाले, विद्वानों के अनुभव में आने वाले, इस आत्मा
में अभय अर्थात् भेद रहित होकर, प्रतिष्ठा अर्थात् अपनी ब्रह्म

४१६ पञ्चदशी
रूप स्थिति को, श्रवणादि के द्वारा उपार्जन कर लेता है ऐसा
जानने वाला पुरुष फिर उसी समय भयरहित मोक्षरूपी अद्वि-
तीय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है । फिर आगे 'यदा ह्येवैष एतस्मि-
न्नुदरमन्तरं कुरुतेऽथ तस्य भयं भवति ( तै० २-७ ) इस श्रुति में
कहा गया है कि जब तो वही मुमुक्षु उसी प्रत्यगभिन्न ब्रह्म में
थोड़ा सा भी [ उपास्य उपासक आदि रूपी ] भेद करता या
देखने लगता है तब तुरन्त ही उस भेददर्शी को भय अर्थात्
संसार प्रयुक्त दुःख होने लगता है ।
वायुः सूर्यो वह्निरिन्द्रो मृत्यु र्जन्मान्तरेन्तरम् ।
कृत्वा धर्मं विजानन्तोऽप्यस्माद् भीत्या चरन्ति हि ॥४॥
भीषास्माद्वातः पवते (तै० २-८) इसमें कहा गया है कि[जगत्
के नियामक कहाने वाले] वायु, सूर्य, अग्नि, इन्द्र तथा मृत्यु ये
पांचों देवता पिछले जन्मों में अपने धर्म को जानते हुए भी
केवल अन्तर कर लेने [ किंवा प्रत्यगात्मा और ब्रह्म तत्व का
भेद समझ लेने ] के कारण अब उसी ब्रह्म के भय से [इन वायु
आदि जन्मों में ] अपने अपने कामों में ही सदा लगे रहते हैं
[ जैसे कि डण्डे के डर से तेली का बैल अपने चक्कर पर घूमता
रहता हो । ]
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ।
एतमेव तपेन्नैषा चिन्ता कर्माग्निसंभृता ॥५॥
ब्रह्मतत्व के आनन्द को समझ चुकने वाला पुरुष फिर
किसी बात से भय नहीं करता। कर्मरूपी अग्नि की चिन्ता बस
केवल इस ज्ञानी को ही नहीं तपाती [ शेष तो सब प्राणी इसी
कर्तव्याग्नि की ज्वालाओं से झुलसते और जलते भुनते रहते हैं]

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१७
ब्रह्मानन्द का ज्ञान हो जाने से अनर्थ की निवृत्ति को अत्यन्त
स्पष्ट शब्दों में कहने वाली श्रुति यह है कि 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्
नबिभेति कुतश्चन (तै० २-८-९) ब्रह्म के स्वरूपभूत आनन्द को
अपरोक्ष रूप से जान लेने वाला पुरुष किसी से भी नहीं डरता।
न तो उसे ऐहिक व्याघ्रादि का ही डर रहता है और न पार-
लौकिक मायादि से ही वह भय मानता है। एतं ह वाव न तपति
किमहं साधु नाकरवं किमहं पापमकरवम् इस वाक्य में कहा गया है
कि पुण्य पाप कर्मरूपी जो अग्नि है उससे बनी हुई यह चिन्ता
कि मैंने पुण्य क्यों नहीं किया और पाप क्यों कर डाला-
बस एक इस तत्वज्ञानी को ही संतप्त नहीं करती। इस तत्व
को न जानने वाले लोग तो इस चिन्ता से सदा संतप्त होते ही
रहते हैं।
एवं विद्वान् कर्मणी द्वे हित्वात्मानं स्मरेत् सदा।
कृते च कर्मणी स्वात्मरूपेणैवैष पश्यति ॥६॥
ऐसा जानने वाला पुरुष दोनों [पुण्यपाप] कर्मों को छोड़
कर सदा आत्मा को ही याद रखता है और किये हुए कर्मों
को आत्मरूप ही जाना करता है।
स य एवं विद्वानेतं आत्मानं स्पृणुते उभेह्येवैष एते आत्मानं स्पृणुते
इस श्रुति में कहा गया है कि इस पुरुष और आदित्य में
एक ही आत्मा है। इस रीति से जो कोई पुरुष जान जाता है
वह जब संसार में प्रवृत्त होता है तब वह इन पुण्य पापों को
छोड़कर इस ब्रह्माभिन्न प्रत्यगात्मा को सदा प्रसन्न करता किंवा
स्मरण करता रहता है। पुण्यपाप को मिथ्या समझकर छोड़
देता है। इस कारण उनकी चिन्ता ही उसे नहीं रहती। फिर

४१८ पञ्चदशी
उस चिन्ता से होने वाला ताप भी उसे कैसे होगा ? यह
विद्वान् पुरुष देहादि की प्रवृत्ति से उत्पन्न होने वाले पुण्य-पाप
कर्मों को आत्मरूप ही देखता है । यों आत्मा से अभिन्न हो
जाने के कारण पुण्य-पाप कर्म उसके तापक नहीं रहते ।
भिद्यते हृदयग्रन्थि श्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥७॥
उस परावर के देख लिये जाने पर इसकी हृदयग्रन्थि खुल
जाती है, सब सन्देह मिट जाते हैं और सभी कर्म नष्ट होजाते हैं।
'पर' भी हिरण्यगर्भ आदि का पद जिसके सामने
'अवर' अर्थात् निकृष्ट जंचने लगता है, उस 'परावर' परमात्मा
का साक्षात्कार जब किसी को होजाता है तब उस साक्षात्कारी
की अन्योन्याध्यासरूपी हृदय-ग्रन्थि—जिसमें बुद्धि और चिदा-
त्मा दोनों ही रस्सी की गांठ की तरह हिलमिल रहे हैं—विदीर्ण
हो जाती है । फिर तो आत्मा देहादि से भिन्न है या नहीं ?
भिन्न होने पर भी कर्तृत्व आदि धर्म वाला है या नहीं ? अकर्ता
होने पर भी ब्रह्म से भिन्न है या नहीं ? अभेद होने पर भी
उसके ज्ञान से मुक्ति मिलेगी या नहीं ? इत्यादि सभो संशय टूक
टूक हो जाते हैं । फिर इस ज्ञानी के संचित और आगामी कर्म
भी नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि उनका निदान अज्ञान ही शेष
नहीं रहता ।
तमेव विद्वानत्येति मृत्युं पन्था न चेतरः ।
ज्ञात्वा देवं पाशहानिः क्षीणैः क्लेशैर्न जन्मभाक् ॥८॥
उसी को जानने वाला जन्म मरण के चक्कर से छूट सकता
है, छूटने का दूसरा कोई भी उपाय नहीं है । देव को जानकर

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१९
ही फांसा खुल सकता है । क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर
जन्म लेना नहीं पड़ता ।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे.
३-८) इस श्रुति में कहा है कि उस पूर्वोक्त परमात्मा को
जानने वाला ही इस मृत्यु रूपी संसार को अतिक्रमण कर जाता
है । अर्थात् आत्मज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा कोई
भी साधन नहीं है । ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्म-
मृत्युप्रहाणिः (श्वे. १-११) इस श्रुति में कहा गया है कि—
देव अर्थात् स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा को जो कोई जान लेता है किंवा
अपरोक्षरूप से अनुभव कर लेता है फिर उसके काम क्रोध
आदि सभी पाशों की हानि हो जाती है । जब उसके रागादि
क्लेश क्षीण हो जाते हैं तब फिर उसके जन्म और मृत्यु भी नहीं
होते । क्योंकि नष्ट हुए रागादि अगला जन्म दिलाने वाले कर्मों
को उत्पन्न ही नहीं कर सकते। यों परलोक के न रहने पर इस
आत्मज्ञान से जैसे इस लोक के अनिष्ट नष्ट होते हैं, इसी
तरह परलोक के अनिष्ट भी मर जाते हैं ।
देवं मत्वा हर्षशोकौ जहात्यत्रैव धैर्यवान् ।
नैनं कृताकृते पुण्यपापे तापयतः क्वचित् ॥६॥
धीर पुरुष देव को जानकर इसी जन्म में और इसी लोक
में हर्ष शोक करना छोड़ देता है । किये और बेकिये पुण्य
पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते ।
‘अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति’ (कठ.
१-२-१२) इस श्रुति में कहा गया है कि—धैर्य अर्थात् ब्रह्म-
चर्य आदि साधनों से सम्पन्न पुरुष, चिदानन्दरूपी देव को जान

४२० पञ्चदशी
कर, इसी जन्म में हर्ष और शोक करना छोड़ देता है। नैनं
कृताकृते तपतः इस वाक्य में कहा गया है कि—किया
और बेकिया हुआ पुण्य तथा पाप इस ज्ञानी को तप्त
नहीं करता। एक प्रकार का चित्तविकार ही 'ताप' कहाता है।
जब पुण्य किया जाता है तब हर्ष रूपी विकार उत्पन्न होता है।
जब नहीं किया जाता तब विषाद् रूपी विकार होता है। इसके
विपरीत जब पाप का आचरण न हो तब हर्ष होता है जब हो
जाय तब विषाद होता है। तत्वज्ञानी में तो ये दोनों ही, दोनों
तरह के विकारों को उत्पन्न नहीं कर सकते। क्योंकि उस तत्व-
ज्ञानी को तो अविक्रिय ब्रह्मरूपता का परिज्ञान हो चुकता है।
भाव यह है कि—नव ज्ञानियों में इष्टानिष्ट की प्राप्ति या परि-
हार के लिये प्रवृत्ति दीखती भी हो परन्तु दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान
जिन्हें हो जाता है उन्हें फिर हर्ष शोक नहीं होते। वे फिर इष्टा-
निष्ट की प्राप्ति या परिहार का उद्योग छोड़ बैठते हैं।
इत्यादि श्रुतयो बह्व्यः पुराणैः स्मृतिभिः सह ।
ब्रह्मज्ञानेऽनर्थहानि मानन्दं चाप्यघोषयन् ॥१०॥
ये ही नहीं, ऐसी बहुत सी श्रुतियें, स्मृतियें तथा पुराण,
इस बात की घोषणा कर रहे हैं कि ब्रह्मज्ञान से अनर्थ की हानि
और आनन्द की प्राप्ति होती है ।
आनन्दस्त्रिविधो ब्रह्मानन्दो विद्यासुखं तथा ।
विषयानन्द इत्यादौ ब्रह्मानन्दो विविच्यते ॥११॥
'ब्रह्मानन्द' 'विद्यानन्द' और 'विषयानन्द' यों तीन प्रकार
का आनन्द जानना चाहिये। [इनमें से पिछले दोनों आनन्द
ब्रह्मानन्दमूलक होते हैं इस लिये ] पहले

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२१

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२१
नन्द, अद्वैतानन्द नाम के तीनों अध्यायों में ] ब्रह्मानन्द का ही
विभाग करके दिखायेंगे ।
भृगुः पुत्रः पितुः श्रुत्वा वरुणाद् ब्रह्मलक्षणम् ।
अन्नप्राणमनोबुद्धींस्त्यक्त्वाऽऽनन्दं विजज्ञिवान् ॥१२॥
भृगु नाम के पुत्र ने अपने वरुण नाम के पिता से ब्रह्म के
लक्षण [ "जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके
सहारे से जीते रहते हैं मरते समय जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं,
उसको जानो वही ब्रह्म है" ] को सुना और जब उसने अन्न
प्राण मन और बुद्धि नामक कोशों में इस लक्षण को नहीं पाया
तब उसे उनके अब्रह्म होने का निश्चय हो गया । फिर इन सब
को छोड़ कर अन्त में उसने [ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण मिलने
से ] आनन्द को ही ब्रह्म जान लिया ।
आनन्दादेव भूतानि जायन्ते तेन जीवनम् ।
तेषां लयश्च तत्रातो ब्रह्मानन्दो न संशयः ॥१३॥
[ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण कैसे घट जाता है सो भी देख
लो ] ग्राम्यधर्म [ मैथुन ] से जब माता पिता को आनन्द
आता है तब उसी से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं । [ विषयभोगादि
मूलक ] आनन्द के सहारे से ही ये प्राणी जीवन धारण कर
रहे हैं । उन प्राणियों का लय भी उसी आनन्द में हो जाता है
[ सुषुप्ति के समय प्रतीत होने वाला जो स्वरूपभूत आनन्द है
उसी में ये प्राणी लीन हो जाते हैं । क्योंकि सुषुप्ति में आनन्द
की अधिकता के सिवाय और किसी का भी अनुभव नहीं
होता ] इस कारण कहते हैं कि आनन्द नाम की जो वस्तु है

४२२ पञ्चदशी
वही तो ब्रह्म है [ सब के अनुभव से सिद्ध होने के कारण ]
इसमें सन्देह न करना चाहिये ।
भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटी द्वैतवर्जनात् ।
ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो ॥१४॥
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा (छा०
७-२४-१) इस छान्दोग्य श्रुति में कहा गया है कि भूत [आकाश
आदि और उनके कार्य जरायुज अण्डज आदि ] की उत्पत्ति
जब तक नहीं हुई थी उससे पहिले त्रिपुटी रूपी द्वैत [ ज्ञाता
ज्ञान ज्ञेय-रूपी तीन आकारों का नाम ही द्वैत है उस ] के न
रहने से, बस एक भूमा नाम का परमात्मा ही परमात्मा था
[उस समय उसमें देश काल और वस्तुकृत परिच्छेद नहीं था ।
क्योंकि वेदान्तों का यह सिद्धान्त है कि ] प्रलयकाल में ज्ञाता
ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी रहती ही नहीं ।
विज्ञानमय उत्पन्नो ज्ञाता, ज्ञानं मनोमयः ।
ज्ञेयाः शब्दादयो, नैतत्त्रयमुत्पत्तितः पुरा ॥१५॥
उस भूमा परमात्मा से उत्पन्न होने वाला, विज्ञानमय नाम
का यह जीव 'ज्ञाता' कहाता है । मन में प्रतिबिम्बित होकर
मनोमय कहाने वाला वही चैतन्य 'ज्ञान' कहा जाता है । शब्द
स्पर्श आदि 'ज्ञेय' प्रसिद्ध ही हैं। ये तीनों उत्पत्ति से पहले नहीं
थे । [उस समय ये कारणरूप ही हो रहे थे । ]
त्रयाभावे तु निर्द्वैतः पूर्ण एवानुभूयते ।
समाधिसुप्तिमूर्च्छासु पूर्णः सृष्टेः पुरा तथा ॥१६॥
प्रकृत तात्पर्य यही है कि—[ज्ञाता आदि] तीनों जब नहीं
रहते तब समाधि सुषुप्ति और मूर्च्छा के समय उस निर्द्वैत पूर्ण

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२३

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२३
भूमा का अनुभव हुआ करता है। [समाधि में उस निद्वैत पूर्ण
आत्मा का अनुभव विद्वान् को होता है। सुषुप्ति और मूर्छा में
उस निद्वैत पूर्ण भूमा का अनुभव सर्वसाधारण को भी हुआ
करता है।] सुषुप्ति आदि के समय परिच्छेदक न रहने पर जैसे
आत्मा में पूर्णता आ जाती है, इसी प्रकार सृष्टि बनने के पहले
भी भेदक के न रहने से वह आत्मा पूर्ण ही रहता है।
यो भूमा स सुखं नाल्पे सुखं त्रेधा विभेदिनी ।
सनत्कुमारः प्राहैवं नारदायातिशोकिने ॥१७॥
‘यो वै भूमा तत् सुखं नाल्पे सुखमस्ति’ (छा. ७-२४-१)
इसमें बताया गया है कि प्रथम कहा हुआ जो ‘भूमा है’ वही
सुख किंवा आनन्द है। भूमा और सुख में कोई भी भेद नहीं
है। जो अल्प है [जो परिच्छिन्न है, जिसके ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय
नाम के तीन तीन टूक हो जाते हैं] उसमें तो सुख है ही नहीं।
अपनी अवस्था पर अत्यधिक शोक करने वाले नारद को सनत्कु-
मार ने यही बात समझायी थी।
सपुराणान् पञ्च वेदाञ्शास्त्राणि विविधानि च ।
ज्ञात्वाप्यनात्मवित्वेन नारदोऽतिशुशोच ह ॥१८॥
चारों वेदों, पुराणों और विविध शास्त्रों को जानकर भी,
आत्मज्ञानरहित होने के कारण, नारद को बड़ा ही शोक हो
गया था।
वेदाभ्यासात् पुरा तापत्रयमात्रेण शोकिता ।
पश्चाच्चभ्यासविस्मारभङ्गगर्वैश्च शोकिता ॥१९॥
[वेदादि को जानने से तो शोक की निवृत्ति हो जानी
चाहिये थी, फिर इन्हें जानकर भी नारद के अतिशोकी होने

४२४ पञ्चदशी
का कारण यह था कि] वेदाभ्यास से पहले पहले तो आध्यात्मिक
आदि तीन ताप ही इसे शोकी रखते थे। अब तो उसे इन वेदों
का अभ्यास करना पड़ता है। इनके भूलने का डर बना रहता
है। पराजय की शंका लगी रहती है। अपने से थोड़े पढ़े को
देखकर गर्व भी हो जाता है। यों वेद पढ़ने के बाद उसके
शोक के कारण बढ़ गये हैं।
सोऽहं विद्वन् प्रशोचामि शोकपारं नयात्र माम् ।
इत्युक्तः सुखमेवास्य पारमित्यभ्यधादृषिः ॥२०॥
[नारद ने स्वयं अपने मुख से यह बात कही है कि] हे
विद्वन् ! वह मैं शोक में फंसा पड़ा हूँ। उस मुझको आप शोक
से पार कर दीजिये। यों जब उसने शोक की निवृत्ति का उपाय
बूझा था तब सनत्कुमार ऋषि ने अपने जाने हुए] सुखरूप ब्रह्म
को ही शोकनिवृत्ति का उपाय बता दिया था। [उसने कहा था
कि सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् (छा. ७-२२-१) यदि शोक का
पार पाना है तो सुख को ही जान लो कि सुख क्या तत्व है ?
सुख को जान लेने पर शोक करने का प्रसंग नहीं आयेगा ।
सुख तत्व को न समझने के कारण ही संसारी प्राणी उसे
विषयों में तलाश करते हैं। यदि वे सुख तत्व को समझ जांय
तो उनकी सुख की बाह्य मांग बन्द हो जाय और वे शोक-
सागर को एक क्षण में पार कर सकें। यही उस ऋषि का
अभिप्राय था]
सुखं वैषयिकं शोकसहस्रेणावृतत्वतः ।
दुःखमेवेति मत्वाऽह नाल्पेऽस्ति सुखमित्यसौ ॥२१॥
सनत्कुमार मुनि ने जब यह कहा था कि 'अल्प में सुख

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नहीं है' तब उन्होंने यह समझ कर ही कहा था कि—वैषयिक
[विषयों की मार्फत मिले हुए] सुख हज़ारों शोकों से आच्छा-
दित रहते हैं, इस कारण वे तो एक प्रकार के दुःख ही हैं।
वैषयिक सुखरूपी मांस के टुकड़े पर हज़ारों शोकरूपी
गीधों और बाघों के दांत लगे रहते हैं—वे उस पर सदा मंड-
राते रहते हैं और उसे नोच नोच कर खाते रहते हैं। इस
कारण वैषयिक सुख को सुख कहना ही भूल है। वह तो एक
प्रकार दुःख ही है। वह तो ऐसा है जैसे किसी को खाज में
ही आनन्द आता हो। उसको तो सुख के वेश में आने वाला
दुःख ही मानना चाहिये।
ननु द्वैते सुखं मा भूदद्वैतेऽप्यस्ति नो सुखम् ।
अस्ति चेदुपलभ्येत तथा च त्रिपुटी भवेत् ॥२२॥
अच्छा यह तो मान लिया कि द्वैत में सुख नहीं है। परन्तु
हमें तो दीखता है कि अद्वैत में भी सुख नहीं है। यदि अद्वैत
में सुख होता तो वह [विषयसुखादि की तरह] उपलब्ध होना
चाहिये था [उपलब्ध न होने से मानते हैं कि अद्वैत में भी सुख
नहीं है] यदि कोई कहने लगे कि अद्वैत में तो सुख की उप-
लब्धि होती है तो उससे कहो कि फिर तो त्रिपुटी बन जायगी
[और अद्वैत नहीं रह सकेगा। तब तो अनुभवित्ता अनुभव
और अनुभाव्य ये तीन आकार मानने ही पड़ेंगे और अद्वैत
का नाश हो जायगा।]
मास्त्वद्वैते सुखं किन्तु सुखमद्वैतमेव हि ।
किं मानमिति चेन्नास्ति मानाकांक्षा स्वयंप्रभे ॥२३॥

४२६ पञ्चदशी
[सिद्धान्ती उत्तर देता है कि] अद्वैत में सुख न सही,
परन्तु अद्वैत ही सुख है इस बात का प्रमाण बूझना चाहो तो
यह तुम्हारा प्रमाण का प्रश्न ही नहीं बनता । क्योंकि स्वयंप्रकाश
वस्तु में तो प्रमाण की आवश्यकता होती ही नहीं ।
स्वप्रभत्वे भवद्वाक्यं मानं यस्माद् भवानिदम् ।
अद्वैतमभ्युपेत्यास्मिन् सुखं नास्तीति भाषते ॥२४॥
अद्वैत की स्वप्रकाशता में भी प्रमाण बूझना चाहो तो हम
कहेंगे कि उसमें तो तुम्हारा वाक्य ही प्रमाण है । क्योंकि तुम
प्रमाणों के बिना ही अद्वैत को मानकर, केवल सुख पर आक्षेप
करते हो कि अद्वैत में सुख नहीं है । [इस कारण कहते हैं कि
अद्वैत तत्त्व—जिसको तुम 'मैं' कहते हो—स्वयंप्रकाश ही है ।]
नाभ्युपैम्यहमद्वैतं त्वद्वचोनूद्य दूषणम् ।
वच्मीति चेत्तदा ब्रूहि किमासीद् द्वैततः पुरा ॥२५॥
[पूर्वपक्षी कहता है] मैं अद्वैत को मानने वाला नहीं हूँ ।
किन्तु मैं तो तुम्हारे कथन का अनुवाद करके उस पर दूषण
दे रहा हूँ । ऐसी अवस्था में मेरे शब्दों से अद्वैत की सिद्धि
करना अनुचित है। इस पर सिद्धान्ती कहता है कि अच्छा
तो यह बताओ कि द्वैत से पहले क्या था ?
किमद्वैत मुत द्वैत मन्यो वा कोटिरन्तिमः ।
अप्रसिद्धो, न द्वितीयोऽनुत्पत्तेः, शिष्यतेऽग्रिमः ॥२६॥
बताओ ? द्वैत से पहले अद्वैत था, द्वैत था, या कोई और
कोटि थी ? द्वैत और अद्वैत से भिन्न कोई तीसरी कोटि तो
प्रसिद्ध ही नहीं है । द्वैत से पहले द्वैत ही हो यह तो ठीक नहीं

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२७
है। क्यों कि तब तक तो द्वैत की उत्पत्ति ही नहीं हुई थी। इस
कारण प्रथम पक्ष ही शेष रह जाता है अर्थात् द्वैत की उत्पत्ति
से प्रथम अद्वैत ही था।
अद्वैतसिद्धिर्युक्त्यैव नानुभूत्येति चेद्वद।
निर्दृष्टान्ता सदृष्टान्ता वा कोट्यन्तर मत्र नो ॥२७॥
यदि कहो कि अद्वैत की सिद्धि युक्ति से तो हो जाती है,
परन्तु अनुभव से तो अद्वैत का अनुमोदन नहीं होता। तो
बताओ कि जो युक्ति अद्वैत को सिद्ध करती है वह किसी
दृष्टान्त को न देकर सिद्ध करती है, या दृष्टान्त को देकर सिद्ध
करती है ? इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त तीसरी बात तो
हो ही नहीं सकती।
नानुभूति र्न दृष्टान्त इति युक्तिस्तु शोभते।
सदृष्टान्तत्वपक्षे तु दृष्टान्तं वद मे मतम् ॥२८॥
[जो (इसी प्रकरण के २७श्लोक में) कहता है कि अद्वैत की
सिद्धि युक्ति से ही होती है, अनुभव से अद्वैत की सिद्धि नहीं
होती वह अनुभूति का तो निषेध ही कर रहा है, और दृष्टान्त
के बिना युक्ति कुछ सिद्ध नहीं कर सकती। फिर यह कहना कि]
बिना ही दृष्टान्त के अद्वैत सिद्धि हो जाती है आपके ही मुंह
को शोभा देने वाली बात है [विवेचक लोग तो ऐसी बात को
मान ही नहीं सकते कि बिना दृष्टान्त के भी कोई बात युक्ति से
सिद्ध हो जाती हो] अब केवल सदृष्टान्तत्व पक्ष शेष रह जाता
है [कि दृष्टान्त देकर ही युक्ति किसी अर्थ को सिद्ध किया करती
है] उसमें आपको ऐसा दृष्टान्त देना चाहिये जो हम दोनों
वादियों को सम्मत हो।

४२८ पञ्चदशी
अद्वैतः प्रलयो द्वैतानुपलम्भेन सुप्तिवत् ।
इति चेत् सुप्तिरद्वैतेत्यत्र दृष्टान्तमीरय ॥२९॥
[पूर्ववादी कहता है कि अच्छा लो दृष्टान्त भी सुन लो]
प्रलय तो एक प्रकार का अद्वैत [अर्थात् द्वैत रहित अवस्था]
है। क्योंकि उस समय द्वैत की उपलब्धि नहीं होती। जिस
जिस में द्वैत की उपलब्धि नहीं होती वह वह सभी अद्वैत होता
है जैसे कि सुप्ति। इस पर हमारा कहना है कि सुप्ति अद्वैत
होती है इस बात को सिद्ध करने के लिये भी तुम्हें अन्य दृष्टान्त
देना पड़ेगा। [यदि तुम अपनी सुप्ति का दृष्टान्त दोगे तो उसे कोई
जानता नहीं। वह तो दूसरे के प्रति असिद्ध है। इस कारण उसकी
सिद्धि के लिये कोई और दृष्टान्त तुम्हें टटोलना ही पड़ेगा।]
दृष्टान्तः परसुप्तिश्चेदहो ते कौशलं महत् ।
यः स्वसुप्तिं न वेत्स्यस्य परसुप्तौ तु का कथा ॥३०॥
यदि तुम दूसरे की सुप्ति का दृष्टान्त दो 'सुप्तिरद्वैता पर-
सुप्तिवत्' तब तो यह तुम्हारी बड़ी [भद्दी] चतुराई है [क्योंकि
अप्रसिद्ध होने के कारण परसुप्ति का तो तुम्हें दृष्टान्त ही नहीं
देना चाहिये] भला जो तुम अपनी सुप्ति को भी नहीं जानते
हो वह तुम दूसरे की सुप्ति की बातें क्यों करते हो [जिसे
अपनी सुप्ति का ज्ञान नहीं है उसे परसुप्ति का ज्ञान भी नहीं
हो सकता।]
निश्चेष्टत्वात् परः सुप्तो यथाहमिति चेत् तदा ।
उदाहर्तुः सुषुप्तेस्ते स्वप्रभत्वं भवेद् बलात् ॥३१॥
यदि अनुमान से परसुप्ति को सिद्ध करना चाहो कि-
परः सुप्तः निश्चेष्टत्वात् अहमिव दूसरा सोया पड़ा है क्योंकि

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२९
[इसके प्राण चल रहे हैं और] निश्चेष्ट पड़ा है जैसे कि मैं सोया
करता हूँ । इस पर हम कहेंगे कि बस तब तो मेरे प्रति सुषुप्ति
का दृष्टान्त देने वाले तेरी सुषुप्ति ही, तेरे न चाहने पर भी
[तेरी इच्छा के विरुद्ध भी] स्वयं प्रकाश सिद्ध हो जाती है ।
[तभी तो तुम उसका उदाहरण दे रहे हो । नहीं तो बताओ कि
अपनी सुप्ति को तुम कैसे जानते हो ?]
नेन्द्रियाणि न दृष्टान्तस्तथाप्यङ्गीकरोषि ताम् ।
इदमेव स्वप्रभत्वं यद् भानं साधनैर्विना ॥३२॥
[तुम्हारे न चाहने पर भी, सुप्ति स्वयंप्रकाश कैसे सिद्ध हो
जाती है सो भी देख लो]—सुप्ति को ग्रहण करने वाली इन्द्रियें
नहीं होतीं [क्योंकि वे उस समय अपने कारण में विलीन हो
जाती हैं] तुम्हारे पास कोई दृष्टान्त भी नहीं है फिर भी तुम
उस सुप्ति को मान रहे हो। इसे देखकर यही कहना पड़ता है
कि ज्ञान के साधनों के बिना भी प्रकाशित होते रहना यही
[सुषुप्ति की] 'स्वयंप्रकाशता' है।
स्तामद्वैतस्वप्रभत्वे, वद सुप्तौ सुखं कथम् ।
शृणु, दुःखं तदा नास्ति ततस्ते शिष्यते सुखम् ॥३३॥
[प्रश्न यह है कि] सुषुप्ति अद्वैत और स्वयंप्रकाश भले ही हो,
परन्तु सुषुप्ति में सुख है, यह कैसे मान लें ? इस का उत्तर है
कि—उस समय [सुख का विरोध करने वाला] दुःख नहीं
रहता, इस कारण सुख ही शेष रह जाता है। [क्योंकि प्रकाश
और अन्धकार के समान सुख दुःख भी विरोधी वस्तुएँ हैं।
जब दुःख नहीं रहता तब सुख शेष रह ही जाता है। जैसे कि
अन्धकार के न रहने पर प्रकाश शेष रह जाता है।]