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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 726 में से

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पृष्ठ 439

ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१७
ब्रह्मानन्द का ज्ञान हो जाने से अनर्थ की निवृत्ति को अत्यन्त
स्पष्ट शब्दों में कहने वाली श्रुति यह है कि 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्
नबिभेति कुतश्चन (तै० २-८-९) ब्रह्म के स्वरूपभूत आनन्द को
अपरोक्ष रूप से जान लेने वाला पुरुष किसी से भी नहीं डरता।
न तो उसे ऐहिक व्याघ्रादि का ही डर रहता है और न पार-
लौकिक मायादि से ही वह भय मानता है। एतं ह वाव न तपति
किमहं साधु नाकरवं किमहं पापमकरवम् इस वाक्य में कहा गया है
कि पुण्य पाप कर्मरूपी जो अग्नि है उससे बनी हुई यह चिन्ता
कि मैंने पुण्य क्यों नहीं किया और पाप क्यों कर डाला-
बस एक इस तत्वज्ञानी को ही संतप्त नहीं करती। इस तत्व
को न जानने वाले लोग तो इस चिन्ता से सदा संतप्त होते ही
रहते हैं।
एवं विद्वान् कर्मणी द्वे हित्वात्मानं स्मरेत् सदा।
कृते च कर्मणी स्वात्मरूपेणैवैष पश्यति ॥६॥
ऐसा जानने वाला पुरुष दोनों [पुण्यपाप] कर्मों को छोड़
कर सदा आत्मा को ही याद रखता है और किये हुए कर्मों
को आत्मरूप ही जाना करता है।
स य एवं विद्वानेतं आत्मानं स्पृणुते उभेह्येवैष एते आत्मानं स्पृणुते
इस श्रुति में कहा गया है कि इस पुरुष और आदित्य में
एक ही आत्मा है। इस रीति से जो कोई पुरुष जान जाता है
वह जब संसार में प्रवृत्त होता है तब वह इन पुण्य पापों को
छोड़कर इस ब्रह्माभिन्न प्रत्यगात्मा को सदा प्रसन्न करता किंवा
स्मरण करता रहता है। पुण्यपाप को मिथ्या समझकर छोड़
देता है। इस कारण उनकी चिन्ता ही उसे नहीं रहती। फिर