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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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नाटकदीपप्रकरणम् ४११
देशः कोऽपि न भासेत यदि तर्हस्त्वदेशभाक् ।
सर्वदेशप्रक्लप्त्यैव सर्वगत्वं न तु स्वतः ॥२०॥
यदि कहो कि-सम्पूर्ण व्यवहार के बन्द हो जाने पर तो
कोई भी देश भासा नहीं करता फिर उसको वहाँ कैसे पहचानें ?
तो हम कहेंगे कि तुम उसको बिना ही देश [स्थान] का समझ
लो [भाव यह है कि देश आदि की जितनी भी कल्पनायें हैं
उन सब कल्पनाओं का जो अधिष्ठान है उसे तो अपने से भिन्न
किसी देश की कुछ अपेक्षा ही नहीं होती ।] शास्त्र में भी उसको
कहीं कहीं सर्वगत आदि कहा गया है, वह भी सर्वदेश की कल्पना
के कारण ही कहा है। वह साक्षी आत्मा स्वभाव से सर्वगत
कदापि नहीं है [स्वभाव से तो वह अद्वितीय और असंग ही है]
अन्तर्बहिर्वा सर्वं वा यं देशं परिकल्पयेत् ।
बुद्धिस्तद्देशगः साक्षी तथा वस्तुषु योजयेत् ॥२१॥
अन्दर या बाहर या जिस किसी भी देश की कल्पना यह
बुद्धि कर लेती है उस देश का यह आत्मा 'साक्षी' कहाने लगता
है [वास्तव में तो सर्वगतपन की तरह सर्वसाक्षिपना भी कोई
पदार्थ नहीं है] इसी प्रकार अन्य वस्तुओं में भी साक्षी को समझ
लेना चाहिए ।
यद्यद् रूपादि कल्प्येत बुद्ध्या तत्तत् प्रकाशयन् ।
तस्य तस्य भवेत् साक्षी स्वतो वाग्बुद्ध्यगोचरः॥२२॥
बुद्धि से जिस जिस रूपादि की कल्पना की जाती है, उस
उस [कल्पित पदार्थ] को प्रकाशित रखने वाला यह आत्मा उस
उसका 'साक्षी' कहाने लगता है