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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 726 में से

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पृष्ठ 444

४२२ पञ्चदशी
वही तो ब्रह्म है [ सब के अनुभव से सिद्ध होने के कारण ]
इसमें सन्देह न करना चाहिये ।
भूतोत्पत्तेः पुरा भूमा त्रिपुटी द्वैतवर्जनात् ।
ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपा त्रिपुटी प्रलये हि नो ॥१४॥
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा (छा०
७-२४-१) इस छान्दोग्य श्रुति में कहा गया है कि भूत [आकाश
आदि और उनके कार्य जरायुज अण्डज आदि ] की उत्पत्ति
जब तक नहीं हुई थी उससे पहिले त्रिपुटी रूपी द्वैत [ ज्ञाता
ज्ञान ज्ञेय-रूपी तीन आकारों का नाम ही द्वैत है उस ] के न
रहने से, बस एक भूमा नाम का परमात्मा ही परमात्मा था
[उस समय उसमें देश काल और वस्तुकृत परिच्छेद नहीं था ।
क्योंकि वेदान्तों का यह सिद्धान्त है कि ] प्रलयकाल में ज्ञाता
ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी रहती ही नहीं ।
विज्ञानमय उत्पन्नो ज्ञाता, ज्ञानं मनोमयः ।
ज्ञेयाः शब्दादयो, नैतत्त्रयमुत्पत्तितः पुरा ॥१५॥
उस भूमा परमात्मा से उत्पन्न होने वाला, विज्ञानमय नाम
का यह जीव 'ज्ञाता' कहाता है । मन में प्रतिबिम्बित होकर
मनोमय कहाने वाला वही चैतन्य 'ज्ञान' कहा जाता है । शब्द
स्पर्श आदि 'ज्ञेय' प्रसिद्ध ही हैं। ये तीनों उत्पत्ति से पहले नहीं
थे । [उस समय ये कारणरूप ही हो रहे थे । ]
त्रयाभावे तु निर्द्वैतः पूर्ण एवानुभूयते ।
समाधिसुप्तिमूर्च्छासु पूर्णः सृष्टेः पुरा तथा ॥१६॥
प्रकृत तात्पर्य यही है कि—[ज्ञाता आदि] तीनों जब नहीं
रहते तब समाधि सुषुप्ति और मूर्च्छा के समय उस निर्द्वैत पूर्ण