पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४२१
नन्द, अद्वैतानन्द नाम के तीनों अध्यायों में ] ब्रह्मानन्द का ही
विभाग करके दिखायेंगे ।
भृगुः पुत्रः पितुः श्रुत्वा वरुणाद् ब्रह्मलक्षणम् ।
अन्नप्राणमनोबुद्धींस्त्यक्त्वाऽऽनन्दं विजज्ञिवान् ॥१२॥
भृगु नाम के पुत्र ने अपने वरुण नाम के पिता से ब्रह्म के
लक्षण [ "जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके
सहारे से जीते रहते हैं मरते समय जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं,
उसको जानो वही ब्रह्म है" ] को सुना और जब उसने अन्न
प्राण मन और बुद्धि नामक कोशों में इस लक्षण को नहीं पाया
तब उसे उनके अब्रह्म होने का निश्चय हो गया । फिर इन सब
को छोड़ कर अन्त में उसने [ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण मिलने
से ] आनन्द को ही ब्रह्म जान लिया ।
आनन्दादेव भूतानि जायन्ते तेन जीवनम् ।
तेषां लयश्च तत्रातो ब्रह्मानन्दो न संशयः ॥१३॥
[ आनन्द में ब्रह्म का लक्षण कैसे घट जाता है सो भी देख
लो ] ग्राम्यधर्म [ मैथुन ] से जब माता पिता को आनन्द
आता है तब उसी से ये प्राणी उत्पन्न होते हैं । [ विषयभोगादि
मूलक ] आनन्द के सहारे से ही ये प्राणी जीवन धारण कर
रहे हैं । उन प्राणियों का लय भी उसी आनन्द में हो जाता है
[ सुषुप्ति के समय प्रतीत होने वाला जो स्वरूपभूत आनन्द है
उसी में ये प्राणी लीन हो जाते हैं । क्योंकि सुषुप्ति में आनन्द
की अधिकता के सिवाय और किसी का भी अनुभव नहीं
होता ] इस कारण कहते हैं कि आनन्द नाम की जो वस्तु है