वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५५- देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ-निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड-मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश
| अध्याय ५३ ] | हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति | २३१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महाहिरत्नवलयो हारकेयूरनूपुरः।<br>समुन्नतजटाभारो वृषभस्थो विराजते॥ ७<br><br>तस्याग्रतो गणाः स्वैः स्वैरारूढा यान्ति वाहनैः।<br>देवाश्च पृष्ठतो जग्मुर्हुताशनपुरोगमाः॥ ८ | कङ्कण पहने, कण्ठमें हार, बाहुओंमें भुजबंद, पैरोंमें नूपुर धारण किये, सिरपर ऊँची जटा बाँधे, ललाटपर गोरोचनका तिलक लगाये हुए भगवान् शङ्कर वृषभपर विराजमान हुए। शङ्करके आगे अपनी-अपनी सवारियोंपर बैठे उनके गण एवं उनके पीछे अग्नि आदि देवता (बारात) चले॥ ५-८॥ |
| वैनतेयं समारूढः सह लक्ष्म्या जनार्दनः।<br>प्रयाति देवपार्श्वस्थो हंसेन च पितामहः॥ ९<br><br>गजाधिरूढो देवेन्द्रश्छत्रं शुक्लपटं विभुः।<br>धारयामास विततं शच्या सह सहस्त्रदृक्॥ १०<br><br>यमुना सरितां श्रेष्ठा बालव्यजनमुत्तमम्।<br>श्वेतं प्रगृह्य हस्तेन कच्छपे संस्थिता ययौ॥ ११<br><br>हंसकुन्देन्दुसंकाशं बालव्यजनमुत्तमम्।<br>सरस्वती सरिच्छ्रेष्ठा गजारूढा समादधे॥ १२ | शङ्करकी बगलमें लक्ष्मीके साथ गरुडपर बैठे हुए विष्णु एवं हंसपर आरूढ ब्रह्मा चलने लगे। शचीके साथ ऐरावत हस्तीपर चढ़कर सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने श्वेत वस्त्रके बने विशाल छत्रको धारण किया। (एक ओर) नदियोंमें श्रेष्ठ यमुना कच्छपपर सवार होकर अपने हाथमें उत्तम श्वेत चँवर लेकर डुलाने लगी और (दूसरी ओर) सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती भी हाथीपर आरूढ़ होकर हंस, कुन्द एवं इन्दुके समान उत्तम चँवर लेकर डुलाने लगी॥ ९-१२॥ |
| ऋतवः षट् समादाय कुसुमं गन्धसंयुतम्।<br>पञ्चवर्णं महेशानं जग्मुस्ते कामचारिणः॥ १३<br><br>मत्तमैरावतनिभं गजमारुह्य वेगवान्।<br>अनुलेपनमादाय ययौ तत्र पृथूदकः॥ १४<br><br>गन्धर्वास्तुम्बुरुमुखा गायन्तो मधुरस्वरम्।<br>अनुजग्मुर्महादेवं वादयन्तश्च किन्नराः॥ १५<br><br>नृत्यन्त्योऽप्सरसश्चैव स्तुवन्तो मुनयश्च तम्।<br>गन्धर्वा यान्ति देवेशं त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्॥ १६ | कामचारी छः ऋतुएँ पाँचरंगे सुगन्धित पुष्पोंको लेकर शङ्करके साथ चलने लगीं। ऐरावतके समान मतवाले हाथीपर चढ़कर पृथूदक अनुलेपन लेकर चला। तुम्बुरु आदि गन्धर्व मधुर स्वरसे गाते एवं किन्नर बाजा बजाते हुए शङ्करके पीछे-पीछे चले। नृत्य करती हुई अप्सराएँ तथा शूलपाणि त्रिलोचन देवेशकी स्तुति करते हुए मुनि और गन्धर्व (मङ्गलमयी वरयात्रामें) चले॥ १३-१६॥ |
| एकादश तथा कोट्यो रुद्राणां तत्र वै ययुः।<br>द्वादशैवादित्यानामष्टौ कोट्यो वसूनपि॥ १७<br><br>सप्तषष्टिस्तथा कोट्यो गणानामृषिसत्तम।<br>चतुर्विंशत् तथा जग्मूर्ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम्॥ १८<br><br>असंख्यातानि यूथानि यक्षकिन्नररक्षसाम्।<br>अनुजग्मुर्महेशानं विवाहाय समाकुलाः॥ १९<br><br>ततः क्षणेन देवेशः क्ष्माधराधिपतेस्तलम्।<br>संप्राप्तास्त्वागमन् शैलाः कुञ्जरस्थाः समन्ततः॥ २० | ऋषिसत्तम! ग्यारह कोटि रुद्र, बारह कोटि आदित्य, आठ कोटि वसु, सड़सठ कोटि गण एवं चौबीस (कोटि) ऊर्ध्वरेता ऋषियोंने (भी साथ ही) प्रस्थान किया। महेशके पीछे यक्ष, किन्नर एवं राक्षसोंके अनगिनत झुंड विवाहके लिये उत्साहपूर्वक चले। तत्पश्चात् देवेश (भगवान् शङ्कर) क्षणमात्रमें पर्वतराज हिमालयपर पहुँच गये। चारों ओरसे हाथियोंपर बैठे पर्वत उनके पास इकट्ठे हो गये॥ १७-२०॥ |
| ततो ननाम भगवांस्त्रिनेत्रः स्थावराधिपम्।<br>शैलाः प्रणेमुरीशानं ततोऽसौ मुदितोऽभवत्॥ २१<br><br>समं सुरैः पार्षदैश्च विवेश वृषकेतनः।<br>नन्दिना दर्शिते मार्गे शैलराजपुरं महत्॥ २२ | उसके बाद त्रिलोचन भगवान् शङ्करने पर्वतराजको प्रणाम किया। उसके पश्चात् अन्य पर्वतोंने भी शिवजीको प्रणाम किया जिससे वे प्रसन्न हो गये। नन्दीद्वारा दिखाये गये मार्गसे देवताओं एवं पार्षदोंके साथ वृषकेतु शङ्कर |
| २३२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५३ |
|---|
| जीमूतकेतुरायात इत्येवं नगरस्त्रियः।<br>निजं कर्म परित्यज्य दर्शनव्यापृताभवन्॥ २३<br><br>माल्यार्द्धमन्या चादाय करेणैकेन भामिनी।<br>केशपाशं द्वितीयेन शङ्कराभिमुखी गता॥ २४ | पर्वतराजके महान् पुरमें प्रविष्ट हुए। जीमूतकेतु शङ्करको आया हुआ जानकर नगरकी स्त्रियाँ (स्वागतके उल्लासमें इतनी विह्वल हो गयीं कि) अपना काम छोड़कर उन्हें देखने लगीं। एक स्त्री एक हाथमें आधी माला और दूसरे हाथमें अपने केशपाशको पकड़े हुए शङ्करकी ओर दौड़ पड़ी॥ २१—२४॥ |
| अन्याऽलक्तकरागाढ्यं पादं कृत्वाकुलेक्षणा।<br>अनलक्तकमेकं हि हरं द्रष्टुमुपागता॥ २५<br><br>एकेनाक्ष्णाञ्जितेनैव श्रुत्वा भीममुपागतम्।<br>साञ्जनां च प्रगृह्यान्या शलाकां सुष्ठु धावति॥ २६<br><br>अन्या सरसनं वासः पाणिनादाय सुन्दरी।<br>उन्मत्तेवागमन्नग्ना हरदर्शनलालसा॥ २७<br><br>अन्यातिक्रान्तमीशानं श्रुत्वा स्तनभरालसा।<br>अनिन्दत रुषा बाला यौवनं स्वं कृशोदरी॥ २८ | लालसाभरी नेत्रोंवाली अन्य स्त्री एक पैरमें महावर लगाकर तथा दूसरेमें बिना महावर लगाये शङ्करको देखने चली आयी। कोई स्त्री शङ्करको आया सुनकर एक आँखमें अञ्जन लगाये और दूसरी आँखमें अञ्जन लगानेके लिये अञ्जनयुक्त सलाई लिये दौड़ पड़ी। शङ्करके दर्शनकी उत्सुकतासे दूसरी सुन्दरी उन्मत्ताकी भाँति करधनीके साथ पहननेके वस्त्रको हाथमें लिये नंगी ही चली आयी। दूसरी कोई महादेवका आना सुनकर स्तनके भारसे अलसायी कृशोदरी बाला रोषसे अपने यौवनकी निन्दा करने लगी॥ २५—२८॥ |
| इत्थं स नगरस्त्रीणां क्षोभं संजनयन् हरः।<br>जगाम वृषभारूढो दिव्यं श्वशुरमन्दिरम्॥ २९<br>ततः प्रविष्टं प्रसमीक्ष्य शम्भुं<br>शैलेन्द्रवेश्मन्यबला ब्रुवन्ति।<br>स्थाने तपो दुश्चरमम्बिकाया-<br>श्रीर्णं महानेष सुरस्तु शम्भुः॥ ३०<br>स एष येनाङ्गमनङ्गतां कृतं<br>कन्दर्पनाम्नः कुसुमायुधस्य ।<br>क्रतोः क्षयी दक्षविनाशकर्ता<br>भगाक्षिहा शूलधरः पिनाकी॥ ३१<br>नमो नमः शङ्कर शूलपाणे<br>मृगारिचर्माम्बर कालशत्रो।<br>महाहिहाराङ्कितकुण्डलाय<br>नमो नमः पार्वतिवल्लभाय॥३२ | इस प्रकार नगरकी महिलाओंको क्षुभित करते हुए बैलपर चढ़े शङ्कर अपने श्वशुरके दिव्य महलमें गये। तदनन्तर घरमें प्रविष्ट हुए शम्भुको देखकर घरमें आयी हुई स्त्रियाँ स्पष्ट कहने लगीं कि पार्वतीद्वारा किया गया कठिन तप सर्वथा उचित है; क्योंकि ये शङ्कर महान् देव हैं। ये वही हैं, जिन्होंने कन्दर्प नामके कामदेवके शरीरको भस्म कर दिया। ये ही क्रतुक्षयी, दक्षयज्ञविनाशक, भगाक्षिहन्ता, शूलधर एवं पिनाकी हैं। (फिर वे उन्हें बार-बार नमन करने लगीं—) हे शङ्कर! हे शूलपाणे! हे व्याघ्रचर्मधारिन्! हे कालशत्रो! हे महान् सर्पोंका हार और कुण्डल धारण करनेवाले पार्वतीवल्लभ! आपको बार-बार नमस्कार है॥ २९—३२॥ |
| इत्थं संस्तूयमानः सुरपतिविधृतेनातपत्रेण शम्भुः<br>सिद्धैर्वन्द्यः सयक्षैरहिकृतवलयी चारुभस्मोपलिप्तः।<br>अग्रस्थेनाग्रजेन प्रमुदितमनसा विष्णुना चानुगेन<br>वैवाहीँ मङ्गलाढ्यां हुतवहमूदितामारुरोहाथ वेदीम्॥ ३३<br>आयाते त्रिपुरान्तके सहचरैः सार्धं च सप्तर्षिभि-<br>र्व्यग्रोऽभूद्गिरिराजवेश्मनि जनः काल्याः समालङ्कृतौ।<br>व्याकुल्यं समुपागताश्च गिरयः पूजादिना देवताः<br>प्रायो व्याकुलिता भवन्ति सुहृदः कन्याविवाहोत्सुकाः॥ ३४ | इस प्रकार संस्तुत तथा इन्द्रके द्वारा धारण किये छत्रसे युक्त, सिद्धों एवं यक्षोंद्वारा वन्दनीय, सर्पका कंकण पहने, सुन्दर भस्म रमाये, ब्रह्माको आगे किये हुए एवं विष्णुद्वारा अनुगत शिव मङ्गलमयी अग्निशोभित विवाह-मण्डपकी वेदीपर गये। सहचरों और सप्तर्षियोंके साथ त्रिपुरान्तक शिवके आ जानेपर हिमवान्के घरके लोग |
| अध्याय ५३ ] | हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति | २३३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रसाध्य देवीं गिरिजां ततः स्त्रियो<br>दुकूलशुक्लाभिवृताङ्गयष्टिकाम्।<br>भ्रात्रा सुनाभेन तदोत्सवे कृते<br>सा शङ्कराभ्याशमथोपपादिता॥ ३५<br><br>ततः शुभे हर्म्यतले हिरण्मये<br>स्थिताः सुराः शङ्करकालिचेष्टितम्।<br>पश्यन्ति देवोऽपि समं कृशाङ्ग्या<br>लोकानुजुष्टं पदमाससाद॥ ३६ | कालीका शृङ्गार करनेमें एवं आये हुए पर्वत-देवताओंकी पूजा और सत्कार करनेमें व्यस्त हो गये। कन्याके विवाहमें उछाहभरे प्रेमीजन प्रायः व्याकुल हो ही जाते हैं। फिर तो पार्वतीके दुबले-पतले शरीरको स्त्रियोंने उज्ज्वल रेशमी वस्त्र पहनाकर अलङ्कृत कर दिया एवं भाई सुनाभने वैवाहिक उत्सवके लिये उसे शङ्करके पास पहुँचाया। उसके बाद सोनेके बने महलके अंदर बैठे हुए देवगण शङ्कर और पार्वतीकी विवाह-विधि देखने लगे और महादेवजीने भी दुबले-पतले शरीरवाली पार्वतीके साथ जगत्पूज्य स्थानको प्राप्त कर लिया॥ ३३—३६॥ |
| यत्र क्रीडा विचित्राः सुकुसुमतरो वारिणो विन्दुपातै-<br>र्गन्धाढ्यैर्गन्धचूर्णैः प्रविरलमवनौ गुण्डितौ गुण्डिकायाम्।<br>मुक्तादामैः प्रकामं हरगिरितनया क्रीडनार्थं तदाऽऽच्छत्<br>पश्चात् सिन्दूरपुञ्जैरविरतविततैश्चक्रतुः क्ष्मां सुरक्ताम्॥ ३७<br><br>एवं क्रीडां हरः कृत्वा समं च गिरिकन्यया।<br>आगच्छद् दक्षिणां वेदिमृषिभिः सेवितां दृढाम्॥ ३८<br><br>अथाजगाम हिमवान् शुक्लाम्बरधरः शुचिः।<br>पवित्रपाणिरादाय मधुपर्कमथोज्ज्वलम्॥ ३९<br><br>उपविष्टस्त्रिनेत्रस्तु शाक्रीं दिशमपश्यत।<br>सप्तर्षिकांश्च शैलेन्द्रः सूपविष्टोऽवलोकयन्॥ ४०<br><br>सुखासीनस्य शर्वस्य कृताञ्जलिपुटो गिरिः।<br>प्रोवाच वचनं श्रीमान् धर्मसाधनमात्मनः॥ ४१ | सुन्दर पुष्पोंवाले वृक्षोंसे सुशोभित भूमिके घेरेमें क्रीडा करते हुए शङ्कर और पार्वतीने एक-दूसरेपर सुगन्धित जलसीकरों (फुहारों) और गन्धचूर्णोंकी लगातार वर्षा की। उसके बाद उन दोनोंने क्रीडा-हेतु एक-दूसरेको मुक्तादाम (मोतीकी मालाओं)-से आहरण-क्रीडा करनेके बाद सिन्दूरकी मुट्ठी भर-भरकर विवाह-स्थलको सिन्दूरसे रँग दिया—पृथ्वीपर सिन्दूर-ही-सिन्दूर कर दिया। इस प्रकार शङ्करजी पार्वतीके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् ऋषियोंसे सेवित सुदृढ़ (वैवाहिक मण्डपकी) दक्षिण वेदीपर आये। उसके बाद पवित्रक पहने तथा श्वेत वस्त्र धारण किये हिमवान् श्वेत-मधुर मधुपर्क लिये हुए आये। बैठे हुए त्रिनेत्र ऐन्द्री (पूर्व) दिशाकी ओर देख रहे थे। शैलेन्द्रने सप्तर्षियोंकी ओर देखते हुए भलीभाँति आसन ग्रहण किया। आरामसे आसनपर आसीन शङ्करसे गिरिने हाथ जोड़कर अपने धर्मका साधक वचन कहा—॥ ३७—४१॥ |
| हिमवानुवाच<br>मत्पुत्रीं भगवन् कालीं पौत्रीं च पुलहाग्रजे।<br>पितॄणामपि दौहित्रीं प्रतीच्छेमां मयोद्यताम्॥ ४२ | हिमवान्ने कहा— भगवन्! मेरे द्वारा दी जा रही पुलहाग्रजकी पौत्री, पितरोंकी दौहित्री एवं मेरी पुत्री कालीको आप कृपया स्वीकार करें॥ ४२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रो हस्तं हस्तेन योजयन्।<br>प्रादात् प्रतीच्छ भगवन् इदमूच्चैरुदीरयन्॥ ४३ | पुलस्त्यजी बोले— यह कहकर शैलेन्द्रने (शङ्करके) हाथसे (पार्वतीके) हाथको संयोजितकर उच्च स्वरसे यह कहते हुए कि 'हे भगवन्! इसे आप स्वीकार करें' दान दे दिया॥ ४३॥ |
| २३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हर उवाच<br>न मेऽस्ति माता न पिता तथैव<br>न ज्ञातयो वाऽपि च बान्धवाश्च।<br>निराश्रयोऽहं गिरिशृङ्गवासी<br>सुतां प्रतीच्छामि तवाद्रिराज ॥ ४४<br>इत्येवमुक्त्वा वरदोऽवपीडयत्<br>करं करेणाद्रिकुमारिकायाः।<br>सा चापि संस्पर्शमवाप्य शम्भोः<br>परां मुदं लब्धवती सुरर्षे ॥ ४५<br>तथाधिरूढो वरदोऽथ वेदिं<br>सहाद्रिपुत्र्या मधुपर्कमश्नन्।<br>दत्त्वा च लाजान् कमलस्य शुक्लां-<br>स्ततो विरिञ्चो गिरिजामुवाच ॥ ४६<br>कालि पश्यस्व वदनं भर्तुः शशधरप्रभम्।<br>समदृष्टिः स्थिरा भूत्वा कुरुष्वाग्नेः प्रदक्षिणम् ॥ ४७<br>ततोऽम्बिका हरमुखे दृष्टे शैत्यमुपागता।<br>यथार्करश्मिसंतप्ता प्राप्य वृष्टिमिवावनिः ॥ ४८ | शङ्करने कहा— पर्वतराज ! मेरे पिता, माता, दायाद या कोई बान्धव नहीं है। मैं गृह-विहीन होकर पर्वतकी ऊँची चोटीपर रहता हूँ। मैं आपकी पुत्रीको अङ्गीकार करता हूँ। यह कहकर वरदाता शङ्करने पर्वतकी पुत्री पार्वतीके हाथको अपने हाथमें ले लिया। देवर्षे! शङ्करके हाथका स्पर्श प्राप्त कर उसे भी अत्यन्त हर्ष हुआ। इसके बाद मधुपर्कका प्राशन करते हुए वरदायक शङ्कर पर्वतकी पुत्रीके साथ वेदीपर बैठे। उसके बाद धानका सफेद लावा देकर ब्रह्माने गिरिजासे कहा—कालि! पतिके चन्द्रमाके समान मुखको देखो एवं समदृष्टिमें स्थित होकर अग्निकी प्रदक्षिणा करो। उसके बाद शङ्करका मुख देखनेपर अम्बिकाको इस प्रकारकी शीतलता प्राप्त हुई जैसी सूर्यकी किरणोंसे सन्तप्त पृथ्वीको वृष्टि पाकर होती है॥ ४४–४८॥ |
| भूयः प्राह विभोर्वक्त्रमीक्षस्वेति पितामहः।<br>लज्जया साऽपि दृष्टेति शनैर्ब्रह्माणमब्रवीत् ॥ ४९<br>समं गिरिजया तेन हुताशस्त्रिः प्रदक्षिणम्।<br>कृतो लाजाश्च हविषा समं क्षिप्ता हुताशने ॥ ५०<br>ततो हराङ्घ्रिमालिन्या गृहीतो दायकारणात्।<br>किं याचसि च दास्यामि मुञ्चस्वेति हरोऽब्रवीत् ॥ ५१<br>मालिनी शङ्करं प्राह मत्सख्या देहि शङ्कर।<br>सौभाग्यं निजगोत्रीयं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ५२ | पितामहने फिर कहा—विभुका मुख देखो। अब उसने भी लज्जापूर्वक धीरेसे ब्रह्मासे कहा—देख लिया। (इसके बाद) गिरिजाके साथ उन्होंने अग्निकी तीन प्रदक्षिणा की एवं अग्निमें हविष्यके साथ लावाकी आहुति दी। तत्पश्चात् मालिनीने दाय (नेग)-के लिये शङ्करका पैर पकड़ लिया। शङ्करने कहा—क्या माँगती हो? मैं दूँगा। पैर छोड़ दो। मालिनीने शङ्करसे कहा—हे शङ्करजी! मेरी सखीको अपने गोत्रका सौभाग्य दीजिये, तभी छुटकारा मिलेगा॥ ४९–५२॥ |
| अथोवाच महादेवो दत्तं मालिनि मुञ्च माम्।<br>सौभाग्यं निजगोत्रीयं योऽस्यास्तं शृणु वच्मि ते ॥ ५३<br>योऽसौ पीताम्बरधरः शङ्खधृङ्मधुसूदनः।<br>एतदीयो हि सौभाग्यो दत्तोऽस्मद्गोत्रमेव हि ॥ ५४<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रमुमोच वृषध्वजम्।<br>मालिनी निजगोत्रस्य शुभचारित्रमालिनी ॥ ५५<br>यदा हरो हि मालिन्या गृहीतश्चरणे शुभे।<br>तदा कालीमुखं ब्रह्मा ददर्श शशिनोऽधिकम् ॥ ५६ | उसके बाद महादेवने कहा—मालिनी! तुम जो माँगती हो उसे मैंने दे दिया। मुझे छोड़ो। इसका जो गोत्रीय सौभाग्य होगा उसे मैं तुम्हें बतलाता हूँ। तुम सुनो! ये जो पीताम्बर पहनने और शङ्ख धारण करनेवाले मधुसूदन हैं मेरा गोत्र इनका सौभाग्य ही है; उसे मैंने दे दिया। इस प्रकार शङ्करके कहनेपर अपने कुलकी शुभ सच्चरित्रताकी माला धारण करनेवाली मालिनीने शङ्करको छोड़ दिया। जब मालिनीने शङ्करके दोनों चरण पकड़ रखे थे, तब ब्रह्माने कालीके चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर मुखको देखा॥ ५३–५६॥ |
| तद् दृष्ट्वा क्षोभमगमच्छुक्रच्युतिमवाप च।<br>तच्छुक्रं बालुकायां च खिलीचक्रे ससाध्वसः ॥ ५७ | उसको देखकर वे क्षुब्ध हो गये। उनका शुक्र च्युत हो गया। भयवश उन्होंने उस शुक्रको बालुकामें छिपा दिया। |
अध्याय ५४ ] भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति २३५
| ततोऽब्रवीद्धरो ब्रह्मन् न द्विजान् हन्तुमर्हसि।<br>अमी महर्षयो धन्या बालखिल्याः पितामह ॥ ५८<br>ततो महेशवाक्यान्ते समुत्तस्थुस्तपस्विनः।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि बालखिल्या इति स्मृताः ॥ ५९<br>ततो विवाहे निर्वृत्ते प्रविष्टः कौतुकं हरः।<br>रेमे सहोमया रात्रिं प्रभाते पुनरुत्थितः ॥ ६०<br>ततोऽद्रिपुत्रीं समवाप्य शम्भुः<br>सुरैः समं भूतगणैश्च हृष्टः।<br>सम्पूजितः पर्वतपार्थिवेन<br>स मन्दरं शीघ्रमुपाजगाम ॥ ६१<br>ततः सुरान् ब्रह्महरीन्द्रमुख्यान्<br>प्रणम्य सम्पूज्य यथाविभागम्।<br>विसर्ज्य भूतैः सहितो महीध्र-<br>मध्यावसन्मन्दरमष्टमूर्तिः ॥ ६२ | उसके बाद शङ्करने कहा—ब्रह्मन्! ब्राह्मणोंका वध मत कीजिये। पितामह! ये सभी बालखिल्य महर्षि हैं, जो बड़े ही धन्य हैं। फिर शङ्करके कहनेके बाद अठासी हजार बालखिल्य नामक तपस्वी उठ खड़े हुए। उसके बाद विवाह हो जानेपर शङ्कर कौतुकागार (कोहवर)-में गये। उन्होंने रात्रिमें पार्वतीके साथ विनोद किया। पुनः प्रातःकाल उठे। उसके बाद पार्वतीको प्राप्तकर प्रसन्न हुए शङ्कर पर्वतराजासे पूजित होनेके बाद देवों एवं भूतगणोंके साथ तुरन्त ही मन्दराचलपर आ गये। उसके बाद अष्टमूर्ति शङ्करने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओंका यथोचित पूजन किया तथा उन्हें प्रणाम कर विदा किया। फिर स्वयं अपने भूतगणोंके साथ मन्दर पर्वतपर रहने लगे॥ ५७—६२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५३॥
चौवनवाँ अध्याय
भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण, शिवका यज्ञकर्म करना, पार्वतीकी तपस्यासे ब्रह्माका वर देना, कौशिकीकी स्थापना, शिवके प्राङ्गणमें अग्नि-प्रवेश, देवोंकी प्रार्थना आदि और गजाननकी उत्पत्ति
| पुलस्त्य उवाच<br>ततो गिरौ वसन् रुद्रः स्वेच्छया विचरन् मुने।<br>विश्वकर्माणमाहूय प्रोवाच कुरु मे गृहम् ॥ १<br>ततश्चकार शर्वस्य गृहं स्वस्तिकलक्षणम्।<br>योजनानि चतुःषष्टिः प्रमाणेन हिरण्मयम् ॥ २<br>दन्ततोरणनिर्व्यूहं मुक्ताजालान्तरं शुभम्।<br>शुद्धस्फटिकसोपानं वैडूर्यकृतरूपकम् ॥ ३<br>सप्तकक्षं सुविस्तीर्णं सर्वैः समुदितं गुणैः।<br>ततो देवपतिश्चक्रे यज्ञं गार्हस्थ्यलक्षणम् ॥ ४ | **पुलस्त्यजी बोले—**मुने! मन्दरगिरिपर रहते हुए और इच्छानुसार भ्रमण करते हुए शङ्करने विश्वकर्माको आवाहित कर कहा—विश्वकर्मन्! मेरे लिये गृह बना दो। उसके बाद विश्वकर्माने शङ्करके लिये चौंसठ योजन विस्तृत स्वर्णनिर्मित तथा स्वस्तिक चिह्नोंसे युक्त गृहका निर्माण किया। उसमें हाथीके दाँतोंके तोरण तथा मोतियोंकी सुन्दर झालरें लगी हुई थीं और वैदूर्यमणिसे जटित शुद्ध-स्फटिककी सीढ़ियाँ थीं। सात कक्षोंवाला वह लम्बा-चौड़ा घर सभी गुणोंसे भरा-पूरा था। घर बन जानेके बाद देवाधिदेवने गृहस्थ आश्रमके उपयुक्त यज्ञकर्म सम्पन्न किया॥ १—४॥ |
| २३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं पूर्वचरितं मार्गमनुयाति स्म शङ्करः।<br>तथा सतस्त्रिनेत्रस्य महान् कालोऽभ्यगान्मने॥ ५<br>रमतः सह पार्वत्या धर्मापेक्षी जगत्पतिः।<br>ततः कदाचिन्नर्मार्थं कालीत्युक्ता भवेन हि॥ ६<br>पार्वती मन्युनाविष्टा शङ्करं वाक्यमब्रवीत्।<br>संरोहतीषुणा विद्धं वनं परशुना हतम्।<br>वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न प्ररोहति वाक्क्षतम्॥ ७<br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>तैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>न तान् विमुञ्चेत् हि पण्डितो जन-<br>स्तमद्य धर्मं वितथं त्वया कृतम्॥ ८ | शङ्करभगवान् पहलेके श्रेष्ठ जनोंद्वारा आचरित (धर्म्य) पथका अनुसरण करने लगे। मुने! त्रिनेत्रके इस प्रकार रहते हुए बहुत समय बीत गया। पार्वतीके साथ धर्मके अनुसार व्यवहार करते हुए जगत्स्वामी शङ्करने किसी समय विनोदमें गिरिजाको ‘काली’ कह दिया। क्रोधसे भरकर पार्वती ३ने शङ्करसे कहा—(देखिये प्रभु!) बाणसे बिंधा हुआ घाव भर जाता है और कुल्हाड़ीसे काटा हुआ वन पुनः हरा-भरा हो जाता है; किंतु वाणीसे किया गया दोषपूर्ण तथा बीभत्स घाव नहीं भरता। मुखसे निकले हुए वाग्बाणोंसे घायल प्राणी दिन-रात चिन्ता करते रहते हैं; अतः पण्डितजनोंको उन्हें (कुवाच्य—वाक्य-बाणोंको) नहीं प्रयुक्त करना चाहिये। आज आपने उस वाङ्मयधर्मको व्यर्थ कर दिया॥ ५-८॥ |
| तस्माद् व्रजामि देवेश तपस्तप्तुमनुत्तमम्।<br>तथा यतिष्ये न यथा भवान् कालीति वक्ष्यति॥ ९<br>इत्येवमुक्त्वा गिरिजा प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>अनुज्ञाता त्रिनेत्रेण दिवमेवोत्पपात ह॥ १०<br>समुत्पत्य च वेगेन हिमाद्रिशिखरं शिवम्।<br>टङ्कच्छिन्नं प्रयत्नेन विधात्रा निर्मितं यथा॥ ११<br>ततोऽवतीर्य सस्मार जयां च विजयां तथा।<br>जयन्तीं च महापुण्यां चतुर्थीमपराजिताम्॥ १२ | देवेश्वर! इसलिये मैं सर्वोत्तम तपस्या करने जा रही हूँ। मैं कठोर परिश्रम करके ऐसा उपाय करूँगी जिससे आप फिर मुझे ‘काली’—ऐसा न कहेंगे। इस प्रकार कहनेके बाद हिमतनया (पार्वती)-ने शङ्करको प्रणाम किया एवं उनसे आदेश लेकर आकाशमें चली गयीं और वे उड़कर मङ्गलमय हिमालयकी चोटीपर पहुँचीं। वह हिमालयकी चोटी ऐसी थी जैसे विधाताने प्रयत्नपूर्वक टाँकीसे काटकर निर्माण किया हो। (आकाशसे पर्वतपर) उतरकर (उन्होंने) जया, विजया, जयन्ती तथा चौथी महापुण्या अपराजिताका स्मरण किया॥ ९-१२॥ |
| ताः संस्मृताः समाजग्मुः कालीं द्रष्टुं हि देवताः।<br>अनुज्ञातास्तथा देव्या शुश्रूषां चक्रिरे शुभाः॥ १३<br>ततस्तपसि पार्वत्यां स्थितायां हिमवद्वनात्।<br>समाजगाम तं देशं व्याघ्रो दंष्ट्रानखायुधः॥ १४<br>एकपादस्थितायां तु देव्यां व्याघ्रस्त्वचिन्तयत्।<br>यदा पतिष्यते चेयं तदादास्यामि वै अहम्॥ १५<br>इत्येवं चिन्तयन्नेव दत्तदृष्टिर्मृगाधिपः।<br>पश्यमानस्तु वदनमेकदृष्टिरजायत॥ १६ | (पार्वतीके) स्मरण करते ही वे (आहूत) देवियाँ कालीको देखनेके लिये आ गयीं। (और) वे कल्याणकारिणी सखियाँ देवीकी आज्ञा पाकर उनकी सेवा करने लगीं। उसके बाद पार्वतीके तपस्यामें लग जानेपर हिमालयके वनसे आयुधके काममें आनेवाले दाँतों और नखोंके आयुधवाला एक बाघ उस स्थानपर आया। पार्वतीको एक पैरपर खड़ी देखकर बाघने सोचा कि जब यह गिरेगी तो मैं अवश्य ही इसे पा जाऊँगा। इस प्रकार सोचता हुआ वह मृगोंका स्वामी पार्वतीके मुखको एकटक देखने लगा॥ १३-१६॥ |
| ततो वर्षशतं देवी गृणन्ती ब्रह्मणः पदम्।<br>तपोऽतप्यत् ततोऽभ्यागाद् ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः॥ १७ | उसके बाद सौ वर्षोंतक ब्रह्ममन्त्रका जाप करती हुई देवीने तपस्या की। तब स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालके स्वामी ब्रह्मा उपस्थित हुए। ब्रह्माने देवीसे कहा— |
अध्याय ५४] भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति २३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितामहस्ततोवाच देवीं प्रीतोऽस्मि शाश्वते।<br>तपसा धूतपापाऽसि वरं वृणु यथेप्सितम्॥ १८<br>अथोवाच वचः काली व्याघ्रस्य कमलोद्भव।<br>वरदो भव तेनाहं यास्ये प्रीतिमनुत्तमाम्॥ १९<br>ततः प्रादाद् वरं ब्रह्मा व्याघ्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>गाणपत्यं विभौ भक्तिमजेयत्वं च धर्मिताम्॥ २० | सनातनि! मैं प्रसन्न हूँ। तुम तपस्या करके निष्पाप हो गयी हो। इच्छानुकूल वर माँगो। इसके बाद कालीने कहा—हे कमलजन्मा (ब्रह्माजी)! इस व्याघ्रको आप वर दें। इससे मैं उत्तम सुख प्राप्त करूँगी। तब ब्रह्माजीने उस अलौकिक कर्म करनेवाले व्याघ्रको गणनायक हो जाने, शङ्करकी भक्ति प्राप्त करने एवं किसीसे न जीते जाने और धार्मिक हो जानेका वर दिया॥ १७–२०॥ |
| वरं व्याघ्राय दत्त्वैवं शिवकान्तामथाऽब्रवीत्।<br>वृणीष्व वरमव्यग्रा वरं दास्ये तवाऽम्बिके॥ २१<br>ततो वरं गिरिसुता प्राह देवी पितामहम्।<br>वरः प्रदीयतां मह्यं वर्णं कनकसंनिभम्॥ २२<br>तथेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पार्वती चाभवत् ततः।<br>कोशं कृष्णं परित्यज्य पद्माकिञ्जल्कसन्निभा॥ २३<br>तस्मात् कोशाच्च संजाता भूयः कात्यायनी मुने।<br>तामभ्येत्य सहस्त्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम्।<br>प्रोवाच गिरिशां देवो वाक्यं स्वार्थाय वासवः॥ २४ | इस प्रकार व्याघ्रको वर देकर (उन्होंने) शिवकान्ता (पार्वती)-से कहा—अम्बिके! तुम (भी) शान्त चित्तसे वर माँगो। मैं तुम्हें (भी) वर दूँगा। उसके बाद गिरिनन्दिनी पार्वतीदेवीने पितामहसे कहा—ब्रह्मन्! मुझे यही वर दीजिये कि मेरा वर्ण सुवर्णके समान हो जाय। ब्रह्मा 'ऐसा ही हो' कहकर चले गये। पार्वती भी अपने शरीरका कालापन त्यागकर कमलके केसरके समान हो गयीं। मुने! उस कृष्ण कोशसे फिर कात्यायनी उत्पन्न हुई। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनके पास जाकर दक्षिणा ग्रहण की और अपने लिये गिरिजासे यह वचन कहा— ॥ २१–२४॥ |
| इन्द्र उवाच<br>इयं प्रदीयतां मह्यं भगिनी मेऽस्तु कौशिकी।<br>त्वत्कोशसम्भवा चेयं कौशिकी कौशिकोऽप्यहम्॥ २५<br>तां प्रादादिति संश्रुत्य कौशिकीं रूपसंयुताम्।<br>सहस्त्राक्षोऽपि तां गृह्य विन्ध्यं वेगाज्जगाम च॥ २६<br>तत्र गत्वा तथोवाच तिष्ठस्वात्र महाबले।<br>पूज्यमाना सुरैर्नाम्ना ख्याता त्वं विन्ध्यवासिनी॥ २७<br>तत्र स्थाप्य हरिर्देवीं दत्त्वा सिंहं च वाहनम्।<br>भवामरारिहन्त्रीत्युक्त्वा स्वर्गमुपागमत्॥ २८ | इन्द्रने कहा—आप इसे मेरे लिये दे दें। यह कौशिकी मेरी बहन बनेगी। आपके कोशसे उत्पन्न होनेके कारण यह 'कौशिकी' हुई और मैं भी कौशिक हुआ। उसे मैंने दे दिया—इस (प्रतिज्ञा-वचन)-को सुननेके बाद उस रूपवती कौशिकीको लेकर देवराज इन्द्र शीघ्रतापूर्वक विन्ध्यपर्वतपर चले गये। इसके बाद वहाँ जाकर (उन्होंने उससे) कहा—महाबले! तुम यहाँ रहो। देवताओंद्वारा आराधित होती हुई तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे प्रसिद्ध होगी। इन्द्रने देवीको वहाँ स्थापितकर उनके वाहनके लिये (उन्हें) सिंह दे दिया और तुम देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाली बनो—ऐसा कहकर वे स्वर्ग चले गये॥ २५–२८॥ |
| उमाऽपि तं वरं लब्ध्वा मन्दरं पुनरेत्य च।<br>प्रणम्य च महेशानं स्थिता सविनयं मुने॥ २९<br>ततोऽमरगुरुः श्रीमान् पार्वत्या सहितोऽव्ययः।<br>तस्थौ वर्षसहस्रं हि महामोहनके मुने॥ ३०<br>महामोहस्थिते रुद्रे भुवनाश्रेलुरुद्धताः।<br>चक्षुभुः सागराः सप्त देवाश्च भयमागमन्॥ ३१ | मुने! उमादेवी भी उस वरको प्राप्त करके मन्दर-पर्वतपर चली गयीं और महेशको प्रणाम कर विनीतभावसे रहने लगीं। मुने! उसके पश्चात् पार्वतीके साथ श्रीमान् अव्यय देवगुरु एक हजार वर्षोंतक महामोहनक (सुरतलीलामें) स्थित रहे। रुद्रदेवके महामोहमें स्थित होनेपर समस्त भुवन क्षुब्ध होकर विचलित हो गये। सातों सागर खलबला उठे और देवगण भयभीत हो गये। |