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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४४- ऋषियोंसहित ब्रह्माजीका शंकरजीकी शरणमें जाना और स्तवन; स्थाण्वीश्वरप्रसङ्ग और हस्तिरूप शंकरकी स्तुति एवं लिङ्गमें संनिधान

१८०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४२

| यस्मिन् स्नातस्तु मुच्येत पातकैरुपपातकैः।<br>वैशाखे च यदा षष्ठी मङ्गलस्य दिनं भवेत्॥ २६<br><br>तदा स्नानं तत्र कृत्वा मुक्तो भवति पातकैः।<br>यः प्रयच्छेत करकांश्चतुरो भक्ष्यसंयुतान्॥ २७<br><br>कलशं च तथा दद्यादपूपैः परिशोभितम्।<br>देवताः प्रीणयेत् पूर्वं करकैरन्नसंयुतैः॥ २८<br><br>ततस्तु कलशं दद्यात् सर्वपातकनाशनम्।<br>अनेनैव विधानेन यस्तु स्नानं समाचरेत्॥ २९<br><br>स मुक्तः कलुषैः सर्वैः प्रयाति परमं पदम्।<br>अन्यत्रापि यदा षष्ठी मङ्गलेन भविष्यति॥ ३०<br><br>तत्रापि मुक्तिफलदा क्रिया तस्मिन् भविष्यति। | जिस (अनरकतीर्थ)-में स्नान करनेवाला मनुष्य छोटे-बड़े सभी पापोंसे छूट जाता है। जब वैशाखमासकी षष्ठी तिथिको मङ्गल दिन हो तब वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाता है। (उस दिन) खाद्य पदार्थसे संयुक्त चार करक (करवे या कमण्डलु) एवं मालपुओं आदिसे सुशोभित कलशका दान करे। पहले अन्नसे युक्त करवोंसे देवताकी पूजा करे, फिर सम्पूर्ण पापोंके नाश करनेवाले कलशका दान करे। जो मानव इस विधानसे स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूट जायगा और परमपदको प्राप्त करेगा। इसके अतिरिक्त (वैशाखके सिवा) अन्य समयमें भी मङ्गलके दिन षष्ठी तिथि होनेपर उस तीर्थमें की हुई पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति देनेवाली होगी॥ २६—३०॥ |
| तीर्थे च सर्वतीर्थानां यस्मिन् स्नातो द्विजोत्तमाः॥ ३१<br><br>सर्वदेवैरनुज्ञातः परं पदमवाप्नुयात्।<br>काम्यकं च वनं पुण्यं सर्वपातकनाशनम्॥ ३२<br><br>यस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु मुक्तो भवति किल्बिषैः।<br>यमाश्रित्य वनं पुण्यं सविता प्रकटः स्थितः॥ ३३<br><br>पूषा नाम द्विजश्रेष्ठा दर्शनान्मुक्तिमाप्नुयात्।<br>आदित्यस्य दिने प्राप्ते तस्मिन् स्नातस्तु मानवः।<br>विशुद्धदेहो भवति मनसा चिन्तितं लभेत्॥ ३४ | श्रेष्ठ द्विजो ! वहीं समस्त पापोंका विनाश करनेवाला तीर्थ-शिरोमणि काम्यकवन नामका एक तीर्थ है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सभी देवोंकी अनुमतिसे परमपदको प्राप्त करता है। इस वनमें प्रवेश करनेसे ही मनुष्य अपने समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस पवित्र वनमें पूषा नामके सूर्यभगवान् प्रत्यक्ष रूपसे स्थित हैं। द्विजश्रेष्ठो ! उन सूर्यभगवान्‌के दर्शनसे मुक्ति प्राप्त होती है। रविवारको उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य विशुद्ध-देह हो जाता है और अपने मनोरथको प्राप्त करता है॥ ३१—३४॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४१॥


बयालीसवाँ अध्याय

काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
काम्यकस्य तु पूर्वेण कुञ्जं देवैर्निषेवितम्।<br>तस्य तीर्थस्य सम्भूतिं विस्तरेण ब्रवीहि नः॥ १(लोमहर्षणजी !) काम्यकवनके पूर्वमें स्थित कुञ्जका आश्रयण देवताओंने किया था, पर उस काम्यकवन-तीर्थकी उत्पत्ति कैसे हुई, इसे आप हमें विस्तारसे बतलाइये॥ १॥
लोमहर्षण उवाचलोमहर्षणजी बोले—
शृण्वन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>ऋषीणां चरितं श्रुत्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः॥ २(उत्तर दिया) — मुनियो ! आप सभी लोग इस तीर्थके श्रेष्ठ माहात्म्यको सुनें। ऋषियोंके चरित्रको सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है।

अध्याय ४२] काम्यकवन-तीर्थका प्रसङ्ग, सरस्वती नदीकी महिमा और तत्सम्बद्ध तीर्थोंका वर्णन [१८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नैमिषेयाश्च ऋषयः कुरुक्षेत्रे समागताः।<br>सरस्वत्यास्तु स्नानार्थं प्रवेशं ते न लेभिरे॥ ३<br><br>ततस्ते कल्पयामासुस्तीर्थं यज्ञोपवीतिकम्।<br>शेषास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे॥ ४<br><br>रन्तुकस्याश्रमात्तावद् यावत्तीर्थं सचक्रकम्।<br>ब्राह्मणैः परिपूर्णं तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती॥ ५<br><br>हितार्थं सर्वविप्राणां कृत्वा कुञ्जानि सा नदी।<br>प्रयाता पश्चिमं मार्गं सर्वभूतहिते स्थिता॥ ६(एक बारकी बात है—) नैमिषारण्यके निवासी ऋषि सरस्वती नदीमें स्नान करनेके लिये कुरुक्षेत्र आये। परंतु वे सरस्वतीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश न पा सके। तब उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामके एक तीर्थकी कल्पना कर ली। (पर फिर भी) शेष मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न पा सके। सरस्वतीने देखा कि रन्तुक आश्रमसे सचक्रकतक जितने भी तीर्थस्थल हैं, वे सब-के-सब ब्राह्मणोंसे भर गये हैं। इसलिये सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये उस सरस्वती नदीने कुञ्ज बना दिया और सभी प्राणियोंकी भलाईमें तत्पर होकर वह पश्चिम मार्गको (पश्चिमवाहिनी बनकर) चल पड़ी॥ २—६॥
पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफलं लभेत्।<br>प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा॥ ७<br><br>पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी।<br>यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी॥ ८<br><br>एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती।<br>तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः॥ ९जो मनुष्य सरस्वतीके पूर्वी प्रवाहमें स्नान करता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। उसके दक्षिणी प्रवाहमें सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा एवं पश्चिम दिशाकी ओर यमुना नदी संश्रित है। किंतु जब वह उत्तर दिशाकी ओर बहने लगती है तो वह सिन्धु हो जाती है। इस प्रकार विभिन्न दिशाओंमें वह पवित्र सरस्वती नदी (भिन्न-भिन्न रूपोंमें) प्रवाहित होती है। उस सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाला मनुष्य मानो सभी तीर्थोंमें स्नान कर लेता है। द्विजश्रेष्ठो! सरस्वती नदीमें स्नान करनेके बाद तीर्थसेवीको तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध महात्मा मदनके 'विहार' नामक तीर्थमें जाना चाहिये॥ ७—१०॥
ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः।<br>तीर्थं त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः॥ १०<br><br>यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाङ्क्षिणः।<br>समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम्॥ ११<br><br>ते स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम्।<br>ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम्॥ १२<br><br>भवस्य उमया सार्धं विहारे क्रीडितं महत्।<br>तच्छ्रुत्वा देवतास्तत्र पत्नीराहूय क्रीडिताः॥ १३<br><br>तेषां क्रीडाविनोदेन तुष्टः प्रोवाच शंकरः।<br>योऽस्मिंस्तीर्थे नरः स्नाति विहारे श्रद्धयान्वितः॥ १४<br><br>धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संशयः।<br>दुर्गातीर्थं ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत्॥ १५जहाँपर भगवान् शिवके दर्शनाभिलाषी देवता आये, पर वे उमासहित शिवका दर्शन न कर पाये। वे लोग गणनायक महादेव नन्दीकी स्तुति करने लगे। इससे नन्दीश्वर प्रसन्न हो गये और (उन्होंने) उमाके साथ की जा रही शिवकी महती विहार-क्रीडाका वर्णन किया। यह सुनकर देवताओंने भी अपनी पत्नियोंको बुलाया और उनके साथ (उन लोगोंने भी) क्रीडा की। उनके क्रीडा-विनोदसे शंकर प्रसन्न हो गये और बोले—इस विहार-तीर्थमें जो श्रद्धाके साथ स्नान करेगा, वह निःसंदेह धन-धान्य एवं प्रिय सम्बन्धियोंसे सम्पन्न होगा। उमा-शिवके विहार-स्थलकी यात्राके बाद दुर्गासे प्रतिष्ठित उस महान् दुर्गातीर्थमें जाना चाहिये॥ ११—१५॥
यत्र स्नात्वा पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात्।<br><br>तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ १६जहाँ स्नानकर पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको दुर्गति की प्राप्ति नहीं होती। उसी स्थानपर तीनों लोकोंमें
१८२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ४२
श्लोकअर्थ
दर्शनान्मुक्तिमाप्नोति सर्वपातकवर्जितः।<br>यस्तत्र तर्पयेद् देवान् पितृंश्च श्रद्धयान्वितः ॥ १७<br><br>अक्षय्यं लभते सर्वं पितृतीर्थं विशिष्यते।<br>मातृहा पितृहा यश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १८<br><br>स्नात्वा शुद्धिमवाप्नोति यत्र प्राची सरस्वती।<br>देवमार्गप्रविष्टा च देवमार्गेण निःसृता ॥ १९प्रसिद्ध सरस्वतीका एक कूप है। उसका दर्शन करनेमात्रसे ही मनुष्य सभी पापोंसे रहित हो जाता है और मुक्ति प्राप्त करता है। जो वहाँ श्रद्धापूर्वक देवता और पितरोंका तर्पण करता है, वह व्यक्ति समस्त अक्षय्य (कभी भी नष्ट न होनेवाले) पदार्थोंको प्राप्त करता है। पितृतीर्थकी विशेष महत्ता है। उस तीर्थमें माता, पिता और ब्राह्मणका घातक तथा गुरुपत्नीगामी भी स्नान करनेसे (ही) शुद्ध हो जाता है। वहीं पूर्व दिशाकी ओर बहनेवाली सरस्वती देवमार्गमें प्रविष्ट होकर देवमार्गसे ही निकली हुई है॥ १६—१९॥
प्राची सरस्वती पुण्या अपि दुष्कृतकर्मणाम्।<br>त्रिरात्रं ये करिष्यन्ति प्राचीं प्राप्य सरस्वतीम् ॥ २०<br><br>न तेषां दुष्कृतं किंचिद् देहमाश्रित्य तिष्ठति।<br>नरनारायणौ देवौ ब्रह्मा स्थाणुस्तथा रविः ॥ २१<br><br>प्राचीं दिशं निषेवन्ते सदा देवाः सवासवाः।<br>ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राचीमाश्रित्य मानवाः ॥ २२<br><br>तेषां न दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र च।<br>तस्मात् प्राची सदा सेव्या पञ्चम्यां च विशेषतः ॥ २३<br><br>पञ्चम्यां सेवमानस्तु लक्ष्मीवाञ्जायते नरः।<br>तत्र तीर्थमौशनसं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम् ॥ २४<br><br>उशना यत्र संसिद्ध आराध्य परमेश्वरम्।<br>ग्रहमध्येषु पूज्यते तस्य तीर्थस्य सेवनात् ॥ २५पूर्ववाहिनी सरस्वती दुष्कर्मियोंके लिये भी पुण्य देनेवाली है। जो प्राची सरस्वतीके निकट जाकर त्रिरात्रव्रत करता है, उसके शरीरमें कोई पाप नहीं रह जाता। नर और नारायण—ये दोनों देव, ब्रह्मा, स्थाणु तथा सूर्य एवं इन्द्रसहित सभी देवता प्राची दिशाका सेवन करते हैं। जो मानव प्राची सरस्वतीमें श्राद्ध करेंगे, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा। अतः प्राची सरस्वतीका सर्वदा सेवन करना चाहिये—विशेषतः पञ्चमीके दिन। पञ्चमी तिथिको प्राची सरस्वतीका सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मीवान् होता है। वहीं तीनों लोकोंमें दुर्लभ औशनस नामका तीर्थ है, जहाँ परमेश्वरकी आराधना कर शुक्राचार्य सिद्ध हो गये थे। उस तीर्थका सेवन करनेसे ग्रहोंके मध्य उनकी पूजा होती है॥ २०—२५॥
एवं शुक्रेण मुनिना सेवितं तीर्थमुत्तमम्।<br>ये सेवन्ते श्रद्दधानास्ते यान्ति परमां गतिम् ॥ २६<br><br>यस्तु श्राद्धं नरो भक्त्या तस्मिंस्तीर्थे करिष्यति।<br>पितरस्तारितास्तेन भविष्यन्ति न संशयः ॥ २७<br><br>चतुर्मुखं ब्रह्मतीर्थं सरो मर्यादया स्थितम्।<br>ये सेवन्ते चतुर्दश्यां सोपवासा वसन्ति च ॥ २८<br><br>अष्टम्यां कृष्णपक्षस्य चैत्रे मासि द्विजोत्तमाः।<br>ते पश्यन्ति परं सूक्ष्मं यस्मान्नावर्तते पुनः ॥ २९<br><br>स्थाणुतीर्थं ततो गच्छेत् सहस्रलिङ्गशोभितम्।<br>तत्र स्थाणुवटं दृष्ट्वा मुक्तो भवति किल्बिषैः ॥ ३०इस प्रकार शुक्रमुनिके द्वारा सेवित उत्तमतीर्थका जो श्रद्धापूर्वक (स्वयं) सेवन करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक जो व्यक्ति श्राद्ध करेगा, उसके द्वारा उसके पितर निःसन्देह तर जायँगे। द्विजोत्तमो! जो सरोवरकी मर्यादासे स्थित चतुर्मुख ब्रह्मतीर्थमें चतुर्दशीके दिन उपवासव्रत करते हैं तथा चैत्रमासके कृष्णपक्षकी अष्टमीतक निवास करके तीर्थका सेवन करते हैं, उन्हें परम सूक्ष्म (तत्त्व)-का दर्शन प्राप्त होता है; जिससे वे पुनः संसारमें नहीं आते। ब्रह्मतीर्थके नियम पालन करनेके बाद सहस्रलिङ्गसे शोभित स्थाणुतीर्थमें जाय। वहाँ स्थाणुवटका दर्शन प्राप्त कर मनुष्य पापोंसे विमुक्त हो जाता है॥ २६—३०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ४२॥