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सर्वकोश
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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

४१- कुरुक्षेत्रके तीर्थों—शतसाहस्रिक, शांतिक, रेणुका, ऋणमोचन, ओजस, संनिहति, प्राची सरस्वती, पञ्चवट, कुरुतीर्थ, अनरकतीर्थ, काम्यकवन आदिका वर्णन

१६८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ३७

| सप्तसारस्वतं तीर्थं त्रैलोक्यस्यापि दुर्लभम्।<br>यत्र सप्त सरस्वत्य एकीभूता वहन्ति च॥ १७<br><br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला मानसह्नदा।<br>सरस्वत्योधनामा च सुरेणुर्विमलोदका॥ १८ | होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है। तीनों लोकोंमें दुर्लभ 'सप्तसारस्वत' नामक एक तीर्थ है, जहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मानसह्नदा, सरस्वती, ओघवती, विमलोदका एवं सुरेणु नामकी सातों सरस्वतियाँ (नदियाँ) एकत्र मिलकर प्रवाहित होती हैं॥ १५–१८॥ |
| पितामहस्य यजतः पुष्करेषु स्थितस्य ह।<br>अब्रुवन् ऋषयः सर्वे नाऽयं यज्ञो महाफलः॥ १९<br><br>न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती।<br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम्॥ २०<br><br>पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै।<br>सुप्रभा नाम सा देवी तत्र ख्याता सरस्वती॥ २१<br><br>तां दृष्ट्वा मुनयः प्रीता वेगयुक्तां सरस्वतीम्।<br>पितामहं मानयन्तीं ते तु तां बहु मेनिरे॥ २२ | पुष्करतीर्थमें स्थित ब्रह्माजीके यज्ञके अनुष्ठानमें लग जानेपर सभी ऋषियोंने उनसे कहा—आपका यह यज्ञ महाफलजनक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती (नदी) नहीं दिखलायी पड़ रही है। उसे सुनकर भगवान्ने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका स्मरण किया। पुष्करमें यज्ञ कर रहे ब्रह्माजीद्वारा आहूत की गयी 'सुप्रभा' नामकी देवी वहाँ सरस्वती नामसे प्रसिद्ध हुई। ब्रह्माजीका मान करनेवाली उस वेगवती सरस्वतीको देखकर मुनिजन प्रसन्न हो गये और उन सबोंने उनका अत्यधिक सम्मान किया॥ १९–२२॥ |
| एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करस्था सरस्वती।<br>समानीता कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना॥ २३<br><br>नैमिषे मुनयः स्थित्वा शौनकाद्यास्तपोधनाः।<br>ते पृच्छन्ति महात्मानं पौराणं लोमहर्षणम्॥ २४<br><br>कथं यज्ञफलोऽस्माकं वर्ततां सत्पथे भवेत्।<br>ततोऽब्रवीन्महाभागः प्रणम्य शिरसा ऋषीन्॥ २५<br><br>सरस्वती स्थिता यत्र तत्र यज्ञफलं महत्।<br>एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो नानास्वाध्यायवेदिनः॥ २६<br><br>समागम्‍य ततः सर्वे सस्मरुस्ते सरस्वतीम्।<br>सा तु ध्याता ततस्तत्र ऋषिभिः सत्रयाजिभिः॥ २७<br><br>समागता प्लावनार्थं यज्ञे तेषां महात्मनाम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षी तु स्मृता मङ्कणकेन सा॥ २८<br><br>समागता कुरुक्षेत्रं पुण्यतोया सरस्वती।<br>गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम्॥ २९<br><br>आहूता च सरिच्छ्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती।<br>विशालां नाम तां प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः॥ ३० | इस प्रकार पुष्करतीर्थमें स्थित एवं नदियोंमें श्रेष्ठ इस सरस्वतीको महात्मा मङ्कण कुरुक्षेत्रमें लाये। एक समय नैमिषारण्यमें रहनेवाले तपस्याके धनी शौनक आदि मुनियोंने पुराणोंके ज्ञाता महात्मा लोमहर्षणसे पूछा—सत्पथगामी हमलोगोंको यज्ञका फल कैसे प्राप्त होगा? (—इसे कृपाकर समझाइये।) उसके बाद महानुभाव लोमहर्षणजीने ऋषियोंको सिरसे प्रणाम कर कहा कि ऋषियो! जहाँ सरस्वती नदी अवस्थित है, वहाँ (रहनेसे) यज्ञका महान् फल प्राप्त होता है। इसको सुनकर विविध वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले मुनियोंने एकत्र होकर सरस्वतीका स्मरण किया। दीर्घकालिक यज्ञ करनेवाले उन ऋषियोंके ध्यान (स्मरण) करनेपर वे (सरस्वती) वहाँ नैमिषक्षेत्रमें उन महात्माओंके यज्ञमें प्लावन करनेके लिये काञ्चनाक्षी नामसे उपस्थित हो गयीं। वे ही प्रसिद्ध नदी मङ्कणके द्वारा स्मृत होनेपर पवित्र-सलिला सरस्वतीके रूपमें कुरुक्षेत्रमें (भी) आयीं और महान् व्रती ऋषियोंने गया-क्षेत्रमें महायज्ञका अनुष्ठान करनेवाले गयके यज्ञमें आहूत की गयी उन श्रेष्ठ सरस्वती नदीको 'विशाला'के नामसे स्मरण किया॥ २३–३०॥ |
| सरित् सा हि समाहूता मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रं समायाता प्रविष्टा च महानदी॥ ३१<br><br>उत्तरे कोशलाभागे पुण्ये देवर्षिसेविते।<br>उद्दालकेन मुनिना तत्र ध्याता सरस्वती॥ ३२ | महात्मा मङ्कण ऋषिद्वारा समाहूत की गयी वही नदी कुरुक्षेत्रमें आकर प्रवेश कर गयी। (फिर) उद्दालक मुनिने देवर्षियोंके द्वारा सेवित परम पवित्र उत्तरकोसल |

अध्याय ३८ ] मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति [ १६९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात्।<br>पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः॥ ३३<br>मनोहरेति विख्याता सर्वपापक्षयावहा।<br>आहूता सा कुरुक्षेत्रे मङ्कणेन महात्मना।<br>ऋषेः संमाननार्थाय प्रविष्टा तीर्थमुत्तमम्॥ ३४<br>सुवेणुरिति विख्याता केदारे या सरस्वती।<br>सर्वपापक्षया ज्ञेया ऋषिंसिद्धनिषेविता॥ ३५प्रदेशमें सरस्वतीका ध्यान किया। उन मुनिके कारण नदियोंमें श्रेष्ठ वह सरस्वती नदी उस देशमें आ गयी एवं वह वल्कल तथा मृगचर्मको धारण करनेवाले मुनियोंद्वारा पूजित हुई। तब सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाली वह ‘मनोहरा’ नामसे विख्यात हुई। फिर वह महात्मा मङ्कणद्वारा आहूत होकर ऋषिको सम्मानित करनेके लिये कुरुक्षेत्रके उत्तम तीर्थमें प्रविष्ट हुई। केदारतीर्थमें जो सरस्वती ‘सुवेणु’ नामसे प्रसिद्ध है, वह ऋषियों और सिद्धोंके द्वारा सेवित तथा सर्वपापनाशक रूपसे जानी जाती है॥ ३१—३५॥
सापि तेनेह मुनिना आराध्य परमेश्वरम्।<br>ऋषीणामुपकारार्थं कुरुक्षेत्रं प्रवेशिता॥ ३६<br>दक्षेण यजता सापि गङ्गाद्वारे सरस्वती।<br>विमलोदा भगवती दक्षेण प्रकटीकृता॥ ३७<br>समाहूता ययौ तत्र मङ्कणेन महात्मना।<br>कुरुक्षेत्रे तु कुरुणा यजिता च सरस्वती॥ ३८<br>सरोमध्ये समानीता मार्कण्डेयेन धीमता।<br>अभिष्टूय महाभागां पुण्यतोयां सरस्वतीम्॥ ३९<br>यत्र मङ्कणकः सिद्धः सप्तसारस्वते स्थितः।<br>नृत्यमानश्च देवेन शंकरेण निवारितः॥ ४०परमेश्वरकी आराधना कर उन मुनिने उसे (सुवेणुको) भी ऋषियोंका उपकार करनेके लिये इस कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित कराया। गङ्गाद्वारमें यज्ञ कर रहे दक्षने ‘विमलोदा’ नामसे भगवती सरस्वतीको प्रकट किया। कुरुक्षेत्रमें कुरुद्वारा पूजित सरस्वती मङ्कणद्वारा बुलायी जानेपर वहाँ गयी। फिर बुद्धिमान् मार्कण्डेयजी उस पवित्र जलवाली महाभागा सरस्वतीकी स्तुति कर उसे सरोवरके मध्यमें ले गये। वहीं सप्तसारस्वततीर्थमें उपस्थित एवं नृत्य करते हुए सिद्ध मङ्कणकको नृत्य करनेसे शंकरजीने रोका था॥ ३६—४०॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सैंतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३७॥


अड़तीसवाँ अध्याय

मङ्कणक-प्रसङ्ग, मङ्कणकका शिवस्तवन और उनकी अनुकूलता प्राप्ति

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं मङ्कणकः सिद्धः कस्माज्जातो महानृषिः।<br>नृत्यमानस्तु देवेन किमर्थं स निवारितः॥ १ऋषियोंने कहा—(प्रभो!) मङ्कणक किस प्रकार सिद्ध हुए? वे महान् ऋषि किससे उत्पन्न हुए थे? नृत्य करते हुए उन मङ्कणकको महादेवने क्यों रोका?॥ १॥
लोमहर्षण उवाच<br>कश्यपस्य सुतो जज्ञे मानसो मङ्कणो मुनिः।<br>स्नानं कर्तुं व्यवसितो गृहीत्वा वल्कलं द्विजः॥ २<br>तत्र गता ह्यप्सरसो रम्भाद्याः प्रियदर्शनाः।<br>स्नायन्ति रुचिराः स्निग्धास्तेन सार्धमनिन्दिताः॥ ३लोमहर्षणने कहा—(ऋषियो!) मङ्कणकमुनि महर्षि कश्यपके मानसपुत्र थे। (एक समय) वे ब्राह्मण देवता वल्कल-वस्त्र लेकर स्नान करने गये। वहाँ रम्भा आदि सुन्दरी अप्सराएँ भी गयी थीं। अनिन्द्य, कोमल एवं मनोहर (रूपवाली वे सभी) अप्सराएँ उनके साथ (ही)