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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

३२- सरस्वती नदीका वर्णन—उसका कुरुक्षेत्रमें प्रवाहित होना

अध्याय ३० ]
बलिको प्रह्लादको संतुष्ट करना, वामनका प्राकट्य
१३९
लोमहर्षण उवाच
अदितिर्वरमासाद्य सर्वकामसमृद्धिदम् ।
क्रमेण हृदरे देवो वृद्धिं प्राप्तो महायशाः ॥ १२
ततो मासेऽथ दशमे काले प्रसव आगते।
अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः ॥ १३
अवतीर्णे जगन्नाथे तस्मिन् सर्वामरेश्वरे।
देवाश्च मुमुचुर्दुःखं देवमाताऽदितिस्तथा ॥ १४
ववुर्वाताः सुखस्पर्शा नीरजस्कमभून्नभः।
धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत ॥ १५
नोद्वेगश्चाप्यभूद् देहे मनुजानां द्विजोत्तमाः।
तदा हि सर्वभूतानां धर्मे मतिरजायत ॥ १६
तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।
जातकर्मादिकां कृत्वा क्रियां तुष्टाव च प्रभुम् ॥ १७
ब्रह्मोवाच
जयाधीश जयाजेय जय विश्वगुरो हरे।
जन्ममृत्युजरातीत जयानन्त जयाच्युत ॥ १८
जयाजित जयाशेष जयाव्यक्तस्थिते जय।
परमार्थार्थ सर्वज्ञ ज्ञानज्ञेयार्थनिःसृत ॥ १९
जयाशेष जगत्साक्षिञ्जगत्कर्त्तुर्जगद्गुरो।
जगतोऽजगतन्तेश स्थितौ पालयते जय ॥ २०
जयाखिल जयाशेष जय सर्वहृदिस्थित।
जयादिमध्यान्तमय सर्वज्ञानमयोत्तम ॥ २१
मुमुक्षुभिरनिर्देश्य नित्यहृष्ट जयेश्वर ।
योगिभिर्मुक्तिकामैस्तु दमादिगुणभूषण ॥ २२
जयातिसूक्ष्म दुर्ज्ञेय जय स्थूल जगन्मय।
जय सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्वं जयानिन्द्रिय सेन्द्रिय ॥ २३
जय स्वमायायोगस्थ शेषभोग जयाक्षर।
जयैकदंष्ट्रप्रान्तेन समुद्धृतवसुंधर ॥ २४
लोमहर्षणने कहा- (उधर) अदितिने सभी
कामनाओंकी समृद्धि करनेवाले वरको प्राप्त कर लिया
तब उसके उदरमें महायशस्वी देव (भगवान्) धीरे-
धीरे बढ़ने लगे। इसके बाद दसवें महीनेमें जब
प्रसवका समय आया तब भगवान् गोविन्द वामनाकारमें
उत्पन्न हो गये। संसारके स्वामी उन अखिलेश्वरके
अवतार ले लेनेपर देवता और देवमाता अदिति दुःखसे
मुक्त हो गये। फिर तो (संसारमें) आनन्ददायी वायु
बहने लगी, गगनमण्डल बिना धूलिका (स्वच्छ) हो
गया एवं सभी जीवोंकी बुद्धि धर्म करनेमें लग गयी।
द्विजोत्तमो ! उस समय मनुष्योंकी देहमें कोई घबड़ाहट
नहीं थी और तब समस्त प्राणियोंकी बुद्धि धर्ममें लग
गयी। उनके उत्पन्न होते ही लोकपितामह ब्रह्माने
उनकी तत्काल जातकर्म आदि क्रिया (संस्कार)
सम्पन्न करके उन प्रभुकी स्तुति की ॥ १२-१७॥
ब्रह्मा बोले- अधीश ! आपकी जय हो। अजेय !
आपकी जय हो। विश्वके गुरु हरि ! आपकी जय हो।
जन्म-मृत्यु तथा जरासे अतीत अनन्त ! आपकी जय हो।
अच्युत ! आपकी जय हो। अजित ! आपकी जय हो।
अशेष ! आपकी जय हो। अव्यक्त स्थितिवाले भगवन् !
आपकी जय हो। परमार्थार्थकी (उत्तम अभिप्रायकी)
पूर्तिमें निमित्त ! ज्ञान और ज्ञेयके अर्थके उत्पादक सर्वज्ञ !
आपकी जय हो। अशेष जगत्के साक्षी ! जगत्के कर्ता !
जगद्गुरु ! आपकी जय हो। जगत् (चर) एवं अजगत्
(अचर) -के स्थिति, पालन एवं प्रलयके स्वामी ! आपकी
जय हो। अखिल ! आपकी जय हो। अशेष ! आपकी
जय हो। सभीके हृदयमें रहनेवाले प्रभो ! आपकी जय
हो। आदि, मध्य और अन्तस्वरूप ! समस्त ज्ञानकी
मूर्ति, उत्तम ! आपकी जय हो। मुमुक्षुओंके द्वारा
अनिर्देश्य, नित्य-प्रसन्न ईश्वर ! आपकी जय हो। हे
मुक्तिकी कामना करनेवाले योगियोंसे सेवित, दम आदि
गुणोंसे विभूषित परमेश्वर ! आपकी जय हो ॥ १८-२२॥
हे अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूपवाले ! हे दुर्ज्ञेय (कठिनतासे
समझमें आनेवाले) ! आपकी जय हो। हे स्थूल
और जगत्-मूर्ति ! आपकी जय हो। हे सूक्ष्मसे भी
अत्यन्त सूक्ष्म प्रभो ! आपकी जय हो। हे इन्द्रियोंसे
रहित तथा इन्द्रियोंसे युक्त (नाथ) ! आपकी जय हो।

१४०
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय ३०
नृकेसरिन् सुरारातिवक्षःस्थलविदारण।
साम्प्रतं जय विश्वात्मन् मायावामन केशव ॥ २५
निजमायापरिच्छिन्न जगद्धातर्जनार्दन।
जयाचिन्त्य जयानेकस्वरूपैकविध प्रभो ॥ २६
वर्द्धस्व वर्द्धितानेकविकारप्रकृते हरे।
त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः ॥ २७
न त्वामहं न चेशानो नेन्द्राद्यास्त्रिदशा हरे।
ज्ञातुमीशा न मुनयः सनकाद्या न योगिनः ॥ २८
त्वं मायापटसंवीतो जगत्यत्र जगत्पते।
कस्त्वां वेत्स्यति सर्वेश त्वत्प्रसादं विना नरः ॥ २९
त्वमेवाराधितो यस्य प्रसादसुमुखः प्रभो।
स एव केवलं देवं वेत्ति त्वां नेतरो जनः ॥ ३०
तदीश्र्वरेश्र्वरेशान विभो वर्द्धस्व भावन।
प्रभवायास्य विश्वस्य विश्वात्मन् पृथुलोचन ॥ ३१
लोमहर्षण उवाच
एवं स्तुतो हृषीकेशः स तदा वामनाकृतिः ।
प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचारूढसम्पदम् ॥ ३२
स्तुतोऽहं भवता पूर्वमिन्द्राद्यैः कश्यपेन च।
मया च वः प्रतिज्ञातमिन्द्रस्य भुवनत्रयम् ॥ ३३
भूयश्चाहं स्तुतोऽदित्या तस्याश्चापि मया श्रुतम्।
यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् ॥ ३४
सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः।
भविष्यति सहस्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥ ३५
ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्।
यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्य बृहस्पतिः ॥ ३६
हे अपनी मायासे योगमें स्थित रहनेवाले (स्वामी) !
आपकी जय हो। शेषकी शय्यापर सोनेवाले अविनाशी
शेषशायी प्रभो! आपकी जय हो। एक दाँतके कोनेपर
पृथ्वीको उठानेवाले वराहरूपधारी भगवन्! आपकी
जय हो। हे देवताओंके शत्रु (हिरण्यकशिपु)-के वक्षःस्थलको
विदीर्ण करनेवाले नृसिंहभगवान् तथा विश्वकी आत्मा
एवं अपनी मायासे वामनका रूप धारण करनेवाले
केशव! आपकी जय हो। हे अपनी मायासे आवृत तथा
संसारको धारण करनेवाले परमेश्वर ! आपकी जय हो।
हे ध्यानसे परे अनेक स्वरूप धारण करनेवाले तथा
एकविध प्रभो! आपकी जय हो। हरे! आपने प्रकृतिके
भाँति-भाँति विकार बढ़ाये हैं। आपकी वृद्धि हो।
जगत्का यह धर्ममार्ग आप प्रभुमें स्थित है ॥ २३-२७॥
हे हरे! मैं, शंकर, इन्द्र आदि देव, सनकादि मुनि
तथा योगिगण आपको जाननेमें असमर्थ हैं। हे जगत्पते !
आप इस संसारमें मायारूपी वस्त्रसे ढके हैं। हे सर्वेश !
आपकी प्रसन्नताके बिना कौन ऐसा मनुष्य है जो
आपको जान सके। प्रभो! जो मनुष्य आपकी आराधना
करता है और आप उसपर प्रसन्न होते हैं, वही आपको
जानता है, अन्य नहीं। हे ईश्वरोंके भी ईश्वर ! हे ईशान!
हे विभो ! हे भावन ! हे विश्वात्मन् ! हे पृथुलोचन ! इस
विश्वके प्रभव (उत्पत्ति - सृष्टिके कारण) विष्णु ! आपकी
वृद्धि हो - जय हो ॥ २८-३१॥
लोमहर्षणने कहा - इस प्रकार जब वामनरूपमें
अवतीर्ण भगवान्की स्तुति सम्पन्न हुई, तब हृषीकेश
भगवान् हँसकर अभिप्रायपूर्ण ऐश्वर्ययुक्त वाणीमें बोले-
पूर्वकालमें आपने, इन्द्र आदि देवों तथा कश्यपने मेरी
स्तुति की थी। मैंने भी आपलोगोंसे इन्द्रके लिये
त्रिभुवनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी। इसके बाद अदितिने
मेरी स्तुति की तो उससे भी मैंने प्रतिज्ञा की थी कि
मैं बाधाओंसे रहित तीनों लोकोंको इन्द्रको दूँगा। अतः
मैं ऐसा करूँगा, जिससे हजारों नेत्रोंवाले (इन्द्र) संसारके
स्वामी होंगे। मेरा यह कथन सत्य है ॥ ३२-३५॥
(हृषीकेश भगवान्के इस प्रकार अपने वचनकी
सत्यता घोषित करनेके बाद) ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्ण
मृगचर्म समर्पित किया एवं भगवान् बृहस्पतिने उन्हें