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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

२८- अदितिकी प्रार्थनापर भगवान्‌का प्रकट होना तथा भगवान्‌का अदितिको वर देना

१२२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २४
चौबीसवाँ अध्याय
वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना
ऋषय ऊचुः
ऋषियोंने कहा - आप हमें यह बतलायें कि
देवानां ब्रूहि नः कर्म यद्वृत्तास्ते पराजिताः ।
देवताओंने कौन-सा कर्म किया, जिससे प्रभावित
कथं देवाधिदेवोऽसौ विष्णुर्वामनतां गतः ॥ १
होकर वे (दैत्य) पराजित हुए तथा देवाधिदेव भगवान्
विष्णु कैसे वामन (बौना) बने ॥ १ ॥
लोमहर्षण उवाच
लोमहर्षणने कहा (उत्तर दिया) - इन्द्रदेवने
बलिसंस्थं च त्रैलोक्यं दृष्ट्वा देवः पुरंदरः ।
जब तीनों लोकोंको बलिके अधिकारमें देखा तब वे
मेरुपृस्थं ययौ शक्रः स्वमातुर्निलयं शुभम् ॥ २
मेरु (पर्वत) - पर स्थित (रहनेवाली) अपनी कल्याणमयी
माताके घर गये। माताके समीप जाकर उन्होंने उनसे
समीपं प्राप्य मातुश्च कथयामास तां गिरम् ।
(मातासे) यह बात कही - जिससे देवगण युद्धमें दानव
आदित्याश्च यथा युद्धे दानवेन पराजिताः ॥ ३
बलिसे पराजित हुए थे ॥ २-३ ॥
अदितिरुवाच
(माता) अदितिने कहा- पुत्र ! यदि ऐसी बात
यद्येवं पुत्र युष्माभिर्न शक्यो हन्तुमाहवे ।
है तो तुमलोग सम्पूर्ण मरुद्गणोंके साथ मिलकर भी
बलिर्विरोचनसुतः सर्वैश्चैव मरुद्गणैः ॥ ४
संग्राममें विरोचनके पुत्र बलिको नहीं मार सकते।
सहस्राक्ष ! युद्धमें केवल हजारों सिरवाले (सहस्रशीर्षा)
सहस्रशिरसा शक्यः केवलं हन्तुमाहवे ।
भगवान् विष्णु ही (उसे) मार सकते हैं। उनके सिवा
तेनैकेन सहस्त्राक्ष न स ह्यन्येन शक्यते ॥ ५
किसी दूसरेसे वह नहीं मारा जा सकता। अतः इस
विषयमें उस महान् आत्मा (महाबलवान्) बलि नामक
तद्गत् पृच्छामि पितरं कश्यपं ब्रह्मवादिनम् ।
दैत्यकी पराजयके लिये मैं तुम्हारे पिता ब्रह्मवादी
पराजयार्थं दैत्यस्य बलेस्तस्य महात्मनः ॥ ६
कश्यपसे (उपाय) पूछूँगी ॥ ४-६ ॥
ततोऽदित्या सह सुराः संप्राप्ताः कश्यपान्तिकम् ।
इस प्रकार माता अदितिके कहनेपर सभी देवता
तत्रापश्यन्त मारीचं मुनिं दीप्ततपोनिधिम् ॥ ७
उनके साथ कश्यपजीके पास पहुँच गये। वहाँ (जाकर
आद्यं देवगुरुं दिव्यं प्रदीप्तं ब्रह्मवर्चसा ।
उन लोगोंने) तपस्याके धनी, मरीचिके पुत्र, आद्य एवं
तेजसा भास्कराकारं स्थितमग्निशिखोपमम् ॥ ८
दिव्य पुरुष, देवताओंके गुरु, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान और
अपने तेजसे सूर्यके समान तेजस्वी, अग्निशिखाकी
न्यस्तदण्डं तपोयुक्तं बद्धकृष्णाजिनाम्बरम् ।
भाँति दीप्त, संन्यासीके रूपमें, तपोयुक्त वल्कल तथा
वल्कलाजिनसंवीतं प्रदीप्तमिव तेजसा ॥ ९
मृगचर्म धारण किये हुए (आहुतिके) घीकी गन्धसे
हुताशमिव दीप्यन्तमाज्यगन्धपुरस्कृतम् ।
आप्यायित (वासित) अग्निके समान जलते हुए, स्वाध्यायमें
स्वाध्यायवन्तं पितरं वपुष्मन्तमिवानलम् ॥ १०
लगे हुए मानो शरीरधारी अग्नि ही हों एवं ब्रह्मवादी,
ब्रह्मवादिसत्यवादिसुरासुरगुरुं प्रभुम् ।
सत्यवादी देवों तथा दानवोंके गुरु, अनुपम ब्रह्मतेजसे
ब्राह्मण्याऽप्रतिमं लक्ष्म्या कश्यपं दीप्ततेजसम् ॥ ११
पूर्ण एवं शोभासे दीप्त कश्यपजीको देखा ॥ ७-११ ॥
वे (देवताओंके पिता श्रीकश्यपजी) सभी लोकोंके
यः स्रष्टा सर्वलोकानां प्रजानां पतिरुत्तमः ।
रचनेवाले, श्रेष्ठ प्रजापति एवं आत्मभाव अर्थात्
आत्मभावविशेषेण तृतीयो यः प्रजापतिः ॥ १२
अध्यात्मतत्त्वकी विज्ञताकी विशिष्टताके कारण ऐसे लग