वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२०- भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना
अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| साऽपि तेनैव पतिना महिषी चारुदर्शना।<br>समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ॥ ५९<br>ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा सा सुषुवे मुने।<br>अजीजनत् सुतं शुभ्रं महिषं कामरूपिणम् ॥ ६० | मालवटके निकट गया। वह सुन्दरी महिषी भी उसी पतिके साथ उस पवित्र और उत्तम यक्षमण्डलमें गयी। मुने! उसके वहीं निवास करते समय उस महिषीने सन्तान उत्पन्न की। उसने एक शुभ्र तथा इच्छाके अनुकूल रूप धारण करनेवाले महिष-पुत्रको जन्म दिया॥ ५७—६०॥ |
| एतामृतुमतीं जातां महिषोऽन्यो ददर्श ह।<br>सा चाभ्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ॥ ६१<br>तमुन्नामितनासं च महिषं वीक्ष्य दानवः।<br>खड्गं निष्कृष्य तरसा महिषं समुपाद्रवत् ॥ ६२<br>तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः।<br>निर्भिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥ ६३<br>मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता।<br>रक्षिता गुह्यकैः साध्वी निवार्य महिषं ततः ॥ ६४ | उसके पुनः ऋतुमती होनेपर एक दूसरे महिषने उसे देखा। वह अपने शीलकी रक्षा करती हुई दैत्यश्रेष्ठके निकट गयी। नाकको ऊपर उठाये उस महिषको देखकर दानवने खड्ग निकालकर महिषपर वेगसे आक्रमण किया। उस महिषने भी तीक्ष्ण शृङ्गोंसे दैत्यके हृदयमें प्रहार किया। वह दैत्य हृदय फट जानेसे भूमिपर गिर पड़ा और मर गया। पतिके मर जानेपर वह महिषी यक्षोंकी शरणमें गयी। उसके बाद गुह्यकोंने महिषको हटाकर साध्वी महिषीकी रक्षा की॥ ६१—६४॥ |
| ततो निवारितो यक्षैर्ह्यारिमर्दनातुरः।<br>निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥ ६५<br>नमरो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः।<br>यक्षानाश्रित्य तस्थौ च कालयन् श्वापदान् मुने ॥ ६६<br>स च दैत्येश्वरो यक्षैर्मालवटपुरस्सरैः।<br>चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥ ६७<br>ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुरुषो रौद्रदर्शनः।<br>व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिर्भयंकरः ॥ ६८ | यक्षोंद्वारा हटाया गया कामातुर ह्यारि (महिष) एक दिव्य सरोवरमें गिर पड़ा। उसके बाद वह मरकर एक दैत्य हो गया। मुने! वन्य पशुओंको मारते हुए यक्षोंके आश्रयमें रहनेवाला महान् बली तथा पराक्रमी वह दैत्य 'नमर' नामसे विख्यात हुआ। फिर मालवट आदि यक्षोंने उस ह्यारि दैत्येश्वरको चितापर रखा। वह श्यामा भी पतिके साथ चितापर चढ़ गयी। तब अग्निके मध्यसे हाथमें खड्ग लिये विकराल रूपवाला भयंकर पुरुष प्रकट हुआ। उसने सभी यक्षोंको भगा दिया॥ ६५—६८॥ |
| ततो हतास्तु महिषाः सर्व एव महात्मना।<br>ऋते संरक्षितां हि महिषं रम्भनन्दन ॥ ६९<br>स नामतः स्मृतो दैत्यो रक्तबीजो महामुने।<br>योज्जयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ॥ ७०<br>एवं प्रभावा दनुपुंगवास्ते<br>तेजोऽधिकस्तत्र बभौ हयारिः।<br>राज्येऽभिषिक्तश्च महासुरेन्द्रै-<br>र्विनिर्जितैः शम्बरतारकाद्यैः ॥ ७१<br>अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवैः<br>सलोकपालैः सहुताशभास्करैः।<br>स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-<br>र्धर्मश्च दूरे प्रतियोजितश्च ॥ ७२ | और फिर उस बलवान् दैत्यने रम्भनन्दन महिषको छोड़कर सारे महिषोंको मार डाला। महामुने! वह दैत्य रक्तबीज नामसे विख्यात हुआ। उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य एवं मारुत आदिके साथ देवोंको जीत लिया। यद्यपि वे सभी दैत्य इस प्रकारके प्रभावसे युक्त थे; फिर भी उनमें महिष अधिक तेजस्वी था। उसके द्वारा विजित शम्बर, तारक आदि महान् असुरोंने उसका राज्याभिषेक किया। लोकपालोंसहित अग्नि, सूर्य आदि देवोंके द्वारा एक साथ मिलकर जब वह जीता नहीं गया तब चन्द्र, इन्द्र एवं सूर्यने अपना-अपना स्थान छोड़ दिया तथा धर्मको भी दूर हटा दिया गया॥ ६९—७२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १७॥
| ९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ |
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अठारहवाँ अध्याय
महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने-अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधोंको लेकर विष्णुलोक चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर—इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा। उन दोनों सिद्धि-साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी। वे बोले—प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारोंको छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं। हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें चले जायँगे॥ १—४॥ |
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| ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः<br>स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः।<br>जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं ते<br>द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम्॥ १<br>गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ<br>स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि।<br>दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ<br>न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥ २<br>प्रभोऽश्विसूर्येन्दुनिलाग्निवेधसां<br>जलेशशक्रादिषु चाधिकारान्।<br>आक्रम्य नाकात्तु निराकृता वयं<br>कृतावनिस्था महिषासुरेण॥ ३<br>एतद् भवन्तौ शरणागतानां<br>श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम्।<br>न चेद् व्रजामोऽद्य रसातलं हि<br>संकाल्यमाना युधि दानवेन॥ ४ | |
| इत्थं मुरारिः सह शङ्करेण<br>श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान्।<br>दृष्ट्वाऽथ चक्रे सहसैव कोपं<br>कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा॥ ५<br>ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य<br>सशङ्करस्यापि पितामहस्य।<br>तथैव शक्रादिषु दैवतेषु<br>महर्द्धि तेजो वदनाद्विनिःसृतम्॥ ६<br>तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं<br>जगाम तेजः प्रवराश्रमे मुने।<br>कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन<br>महर्षिणा तेज उपाकृतं च॥ ७<br>तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं<br>ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्रतुल्यम् ।<br>तस्माच्च जाता तरलायताक्षी<br>कात्यायनी योगविशुद्धदेहा॥ ८ | शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने (भी) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया। उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह (ब्रह्मा) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ। मुने! फिर वह तेजोरराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी। उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की। उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त हो गया। उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो गयीं॥ ५—८॥ |
अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९७
माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया
नेत्रत्रयं पावकतेजसा च। और अग्निके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये।
याम्येन केशा हरितेजसा च इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे
भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ ९ उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए
सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके
मध्यं तथैन्द्रेन च तेजसाऽभवत्। तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई।
ऊरू च जङ्घे च नितम्बसंयुते लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान
जाते जलेश्यस्य तु तेजसा हि ॥ १० उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ
पादौ च लोकप्रपितामहस्य एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ
पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । उत्पन्न हुईं। प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके
दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके
कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ ११ तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें
प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा प्रकट हुई - ॥ ९-१२ ॥
याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान्
साध्येन च भ्रूयुगलं सुकान्तिमत् तेज पृथ्वीपर 'कात्यायनी' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ,
कंदर्पबाणासनसन्निभं बभौ ॥ १२ तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं। वरदानी
तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह- शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने
नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम्। चक्र, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा
कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा सूर्यने अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर (तरकस) प्रदान
नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ १३ किये। इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने
ददौ त्रिशूलं वरदस्तत्रिशूली गदा, ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला
चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । तथा कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान
शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं किया। चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्रने
तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ १४ माला, हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूडामणि,
वज्रं तथैन्द्रः सह घण्टया च कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य*
यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च। प्रदान किया ॥ १३-१६ ॥
ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान
कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ १५ (मद्य)-पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने
हारं च सोमः सह चामरेण कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की।
मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम्।
चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं
प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकत्र्ता ॥ १६
गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं
पानस्य पूर्णं सदृशं च भाजनम्।
भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि
अम्लानपुष्पामृतवः स्त्रजं च ॥ १७
- सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने - देनेकी चर्चा है। कुछ प्रतियोंके अर्थमें
समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है।
| ९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ |
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| तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां<br>अट्टाट्टहासं मुमुचे त्रिनेत्रा।<br>तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः<br>सविष्णुरुद्रेन्द्रनिलाग्निभास्कराः॥ १८<br>नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै<br>या संस्थिता योगविशुद्धदेहा।<br>निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य<br>तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः॥ १९<br>श्रद्धा स्मृतिः पुष्टि्रथो क्षमा च<br>छाया च शक्तिः कमलालया च।<br>वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया<br>नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै॥ २० | उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी)-ने उच्च अट्टहास किया। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे—योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है। वे निद्रारूपसे पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी देवीको नमस्कार है॥ १७—२०॥ |
| ततः स्तुता देववरैर्मृगेन्द्र-<br>मारुह्य देवी प्रगताऽवनीध्रम्।<br>विन्ध्यं महापर्वतमुच्चशृङ्गं<br>चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः॥ २१ | फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न कर दिया था॥ २१॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थमद्रिं भगवानगस्त्य-<br>स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः।<br>कस्मै कृते केन च कारणेन<br>एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते॥ २२ | नारदजीने पूछा— शुद्धात्मन् (पुलस्त्यजी)! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला कर दिया?॥ २२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य<br>गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य।<br>रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य<br>होमावसाने वचनं बभाषे॥ २३<br>समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां<br>कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र।<br>ददस्व दानं मम यन्मनीषितं<br>चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः॥ २४<br>इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि<br>श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे।<br>दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं<br>नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव॥ २५<br>श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य<br>प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि।<br>एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्गं<br>विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व॥ २६ | पुलस्त्यजीने कहा— प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने (अपने ऊँचे शिखरोंसे) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था। तब सूर्यने महर्षि अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा—द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें। मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ। इस प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले—मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा। मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता। अगस्त्यजीकी अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यने कहा—भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका प्रयत्न करें॥ २३—२६॥ |