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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

१९- चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १७
आषाढे स्नानमुदितं श्रीफलैरर्चनं तथा।<br>धत्तूरकुसुमैः शुक्लैर्र्धूपयेत् सिल्हकं तथा॥ ५८<br><br>नैवेद्याः सघृताः पूपाः दक्षिणा सघृता यवाः।<br>नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरूदीरयेत्॥ ५९<br><br>श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वाऽर्चयेद्धरम्।<br>श्रीवृक्षपत्रैः सफलैर्धूपं दद्यात् तथागुरुम्॥ ६०<br><br>नैवेद्यं सघृतं दद्याद् दधि पूपान् समोदकान्।<br>दध्योदनं सकृसरं माषधानाः सशष्कुलीः॥ ६१<br><br>दक्षिणां श्वेतवृषभं धेनुं च कपिलां शुभाम्।<br>कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि।<br>गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः॥ ६२<br><br>अमीभिः षड्भिरपरैर्मासैः पारणमुत्तमम्।<br>एवं संवत्सरं पूर्णं सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>अक्षयाँल्लभते कामान् महेश्वरवचो यथा॥ ६३<br><br>इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम्।<br>स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा॥ ६४आषाढ़मासमें बिल्वके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा धतूरके उजले पुष्पोंसे उनकी पूजा करे; सिल्हक (सिलारस-वृक्षका गोंद)-का धूप दे और घृतके सहित मालपूएका नैवेद्य अर्पित करे एवं—हे दक्षके यज्ञका विनाश करनेवाले शंकर! आपको नमस्कार है—यह ऊँचे स्वरसे उच्चारण करे। श्रावणमासमें मृगभोज्य (जटामासी)-के जलसे स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रोंसे महादेवकी पूजा करे तथा अगुरुका धूप दे। उसके बाद घृतयुक्त पूप, मोदक, दधि, दध्योदन, उड़दकी दाल, भुना हुआ जौ एवं कचौड़ीका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति ब्राह्मणको श्वेत बैल, शुभा कपिला (काली) गौ, स्वर्ण एवं रक्तवस्त्रकी दक्षिणा दे। पण्डितोंको चाहिये कि शिवजीके ‘गङ्गाधर’ इस नामका जप करें॥ ५८—६२॥<br><br>इन दूसरे छः महीनोंके अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्षतक वृषभध्वज (शिवजी)-का पूजन कर महेश्वरके वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओंको प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् शंकरने यह कल्याणकारी पवित्र एवं सभी पुण्योंको अक्षय करनेवाला व्रत बतलाया था। यह जैसा कहा गया है, वैसा ही है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ६३-६४॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १६॥


सत्रहवाँ अध्याय

देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग

पुलस्त्य उवाच<br>मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्मं जगत्पतेः।<br>नाभ्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन्॥ १<br><br>कंदर्पस्य कराग्रे तु कदम्बश्चारुदर्शनः।<br>तेन तस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते॥ २<br><br>यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद।<br>वटवृक्षः समभवत् तस्मिंस्तस्य रतिः सदा॥ ३पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आश्विन मासमें जब जगत्पति (विष्णु)-की नाभिसे कमल निकला, तब अन्य देवताओंसे भी ये वस्तुएँ उत्पन्न हुईं— कामदेवके करतलके अग्रभागमें सुन्दर कदम्ब वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिये कदम्बसे उसे बड़ी प्रीति रहती है। नारदजी! यक्षोंके राजा मणिभद्रसे वटवृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः उन्हें उसके प्रति विशेष प्रेम है।

अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९१
महेश्वरस्य हृदये धत्तूरविटपः शुभः।
संजातः स च शर्वस्य रतिकृत् तस्य नित्यशः ॥ ४
ब्रह्मणो मध्यतो देहाज्जातो मरकतप्रभः।
खदिरः कण्टकी श्रेयानभवद्विश्वकर्मणः ॥ ५
भगवान् शंकरके हृदयपर सुन्दर धतूर-वृक्ष उत्पन्न
हुआ, अतः वह शिवजीको सदा प्यारा है॥१-४॥
ब्रह्माजीके शरीरके बीचसे मरकतमणिके समान
खैरवृक्षकी उत्पत्ति हुई और विश्वकर्माके शरीरसे सुन्दर
कटैया उत्पन्न हुआ। गिरिनन्दिनी पार्वतीके करतलपर
कुन्द लता उत्पन्न हुई और गणपति के कुम्भ-देशसे
सेंदुवारवृक्ष उत्पन्न हुआ। यमराजकी दाहिनी बगलसे
पलाश तथा बायीं बगलसे गूलरका वृक्ष उत्पन्न हुआ।
रुद्रसे उद्विग्न करनेवाला वृष (ओषधि-विशेष)-की
उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार स्कन्दसे बन्धुजीव, सूर्यसे
पीपल, कात्यायनी दुर्गासे शमी और लक्ष्मीजीके हाथसे
बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ ॥ ५-८ ॥
गिरिजायाः करतले कुन्दगुल्मस्त्वजायत।
गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिन्धुवारकः ॥ ६
यमस्य दक्षिणे पार्श्वे पालाशो दक्षिणोत्तरे।
कृष्णोदुम्बरको रुद्राज्जातः क्षोभकरो वृषः ॥ ७
स्कन्दस्य बन्धुजीवस्तु रखेरश्वत्थ एव च।
कात्यायन्याः शमी जाता बिल्वो लक्ष्म्याः करेऽभवत् ॥ ८
नागानां पतये ब्रह्मञ्छरस्तम्बो व्यजायत।
वासुकेर्विस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वा सितासिता ॥ ९
साध्यानां हृदये जातो वृक्षो हरितचन्दनः ।
एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतिर्भवेत् ॥ १०
नारदजी! इसी प्रकार शेषनागसे सरपत,
वासुकिनागकी पुच्छ और पीठपर श्वेत एवं कृष्ण दूर्वा
उत्पन्न हुई। साध्योंके हृदयमें हरिचन्दनवृक्ष उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार उत्पन्न होनेसे उन सभी वृक्षोंमें उन-
उन देवताओंका प्रेम होता है। उस रमणीय सुन्दर
समयमें शुक्लपक्षकी जो एकादशी तिथि होती है,
उसमें भगवान् विष्णुकी पूजा करनी चाहिये।
इससे पूजाकी न्यूनता दूर हो जाती है। शरत्कालकी
उपस्थितितक गन्ध, वर्ण और रसयुक्त पत्र, पुष्प एवं
फलों तथा मुख्य ओषधियोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा
करनी चाहिये ॥ ९-१२ ॥
तत्र रम्ये शुभे काले या शुक्लौकादशी भवेत् ।
तस्यां सम्पूजयेद् विष्णुं तेन खण्डोऽस्य पूर्यते ॥ ११
पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि गन्धवर्णरसान्वितैः ।
ओषधीभिश्च मुख्याभिर्यावत्स्याच्छरदागमः ॥ १२
घृतं तिला ब्रीहयवा हिरण्यकनकादि यत्।
मणिमुक्ताप्रवालानि वस्त्राणि विविधानि च ॥ १३
रसानि स्वादुक्ट्वम्लकषायलवणानि च ।
तिक्तानि च निवेद्यानि तान्यखण्डानि यानि हि ॥ १४
तत्पूजार्थं प्रदातव्यं केशवाय महात्मने।
यदा संवत्सरं पूर्णमखण्डं भवते गृहे ॥ १५
कृतोपवासो देवर्षे द्वितीयेऽहनि संयतः।
स्नानेन तेन स्नायीत येनाखण्डं हि वत्सरम् ॥ १६
घी, तिल, चावल, जौ, चाँदी, सोना, मणि, मुक्ता,
मूँगा तथा नाना प्रकारके वस्त्र, स्वादु, कटु, अम्ल,
कषाय, लवण और तिक्त रस आदि वस्तुओंको
अखण्डितरूपसे महात्मा केशवकी पूजाके लिये अर्पित
करना चाहिये। इस प्रकार पूजा करते हुए वर्षको
बितानेपर घरमें पूर्ण समृद्धि होती है। देवर्षे ! जितेन्द्रिय
होकर दूसरे दिन उपवास करके जिससे वर्ष अखण्डित
रहे इसलिये इस प्रकार स्नान करे - ॥ १३-१६ ॥
सफेद सरसों या तिलके द्वारा उबटन
तैयार करना चाहिये ऐसा कहा गया है। उससे
या घीसे भगवान् विष्णुको स्नान कराना
चाहिये। नारदजी! होममें भी घीका ही विधान है
और दानमें भी यथाशक्ति उसीकी विधि है।
सिद्धार्थकैस्तिलैर्वापि तेनैवोद्वर्त्तनं स्मृतम् ।
हविषा पद्मनाभस्य स्नानमेव समाचरेत्।
होमे तदेव गदितं दाने शक्तिर्निजा द्विज ॥ १७

९२
श्रीवामनपुराण
[ अध्याय १७
पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम्।
धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम्॥ १८
हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद्गुरुम्।
रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत्॥ १९
ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम्।
विज्ञापयेन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत॥ २०
फिर पुष्पोंद्वारा चरणसे आरम्भकर (सिरतक) सभी अङ्गोंमें केशवकी पूजा करे एवं नाना प्रकारके धूपोंसे उन्हें सुवासित करे, जिससे संवत्सर पूर्ण हो। सुवर्ण, रत्नों और वस्त्रोंद्वारा (उन) जगद्गुरुका पूजन करे तथा राग-खाँड, चोष्य एवं हविष्योंका नैवेद्य अर्पित करे। सुव्रत नारदजी! देवेश जगद्गुरु विष्णुकी पूजा करनेके बाद इस मन्त्रसे प्रार्थना करे - ॥ १७-२०॥
नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते।
धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे॥ २१
विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि सर्वतः।
तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव॥ २२
एवं संवत्सरं पूर्णं सोपवासो जितेन्द्रियः।
अखण्डं पारयेद् ब्रह्मन् व्रतं वै सर्ववस्तुषु॥ २३
अस्मिंश्चीर्णे व्रते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः।
धर्मार्थकाममोक्षाद्यास्त्वक्षयाः सम्भवन्ति हि॥ २४
हे महाकान्तिवाले पद्मनाभ लक्ष्मीपते! आपको प्रणाम है। (आपकी कृपाके प्रसादसे) हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों। विकसित कमलपत्रके समान नेत्रवाले! आप जिस प्रकार चारों ओरसे अखण्ड हैं, उसी सत्यके प्रभावसे मेरे भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ) अखण्डित रहें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वर्षभर उपवास और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओंके द्वारा व्रतको अखण्डरूपसे पूरा करे। इस व्रतके करनेपर देवता निश्चितरूपसे प्रसन्न होते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सभी पूर्ण होते हैं ॥ २१-२४ ॥
एतानि ते मयोक्तानि व्रतान्युक्तानि कामिभिः।
प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्॥ २५
नारद! यहाँतक मैंने तुमसे सकाम व्रतोंका वर्णन किया है। अब मैं कल्याणकारी विष्णुपञ्जर* स्तोत्रको कहूँगा। (वह इस प्रकार है - )
नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्।
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २६
गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर मेरी पूर्व दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ।
गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितद्युते।
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २७
अमितद्युते पद्मनाभ ! आप कौमोदकी गदा धारणकर मेरी दक्षिण दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपके शरण हूँ।
हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम।
प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः॥ २८
पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। आप सौनन्द नामक हल लेकर मेरी पश्चिम दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ॥ २५-२८॥
मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्।
उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः॥ २९
पुण्डरीकाक्ष ! आप 'शातन' नामके विनाशकारी मुसलको लेकर मेरी उत्तर दिशामें रक्षा करें। जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ।
शार्ङ्गमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे।
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः॥ ३०
हरे ! शार्ङ्गधनुष एवं नारायणास्त्र लेकर मेरी ईशानकोणमें रक्षा करें। रक्षोघ्न ! आपको नमस्कार है, मैं आपके शरण हूँ।

  • यह विष्णुपञ्जरस्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है तथा स्वल्पान्तरसे अग्निपुराण अ० १३, ब्रह्मवैवर्त ३।१९, विष्णुधर्मोत्तर १।११५ आदिमें प्राप्त होता है। वामनपुराणमें तो यह दो बार आया है- एक यहाँ तथा आगे ८५वें अध्यायमें।

अध्याय १७] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग । ९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तर्बोध्यं च पङ्कजम्।<br>प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर॥ ३१<br><br>चर्म सूर्यशतं गृह्य खड्गं चन्द्रमसं तथा।<br>नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्॥ ३२यज्ञवाराह विष्णो! आप पाञ्चजन्य नामक विशाल शङ्ख तथा अन्तर्बोध्य पङ्कजको लेकर मेरी अग्निकोणमें रक्षा करें। दिव्यमूर्ति नृसिंह! सूर्यशत नामकी ढाल तथा चन्द्रहास नामकी तलवार लेकर मेरी नैर्ऋत्यकोणमें रक्षा करें॥ २९–३२॥
वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।<br>वायव्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते॥ ३३<br><br>वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्षे जनार्दन।<br>मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित॥ ३४<br><br>विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले।<br>अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते॥ ३५<br><br>करशीर्षाङ्घ्रिपर्वेषु तथाऽष्टबाहुपञ्जरम्।<br>कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम॥ ३६आप वैजयन्ती नामकी माला तथा श्रीवत्स नामका कण्ठाभूषण धारणकर मेरी वायव्यकोणमें रक्षा करें। देव हयग्रीव! आपको नमस्कार है। जनार्दन! वैनतेय (गरुड़)-पर आरूढ़ होकर आप मेरी अन्तरिक्षमें रक्षा करें। अजित! अपराजित! आपको सदा नमस्कार है। महाकच्छप! आप विशालाक्षपर चढ़कर मेरी रसातलमें रक्षा करें। महामोह! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप आठ हाथोंसे पञ्जर बनाकर हाथ, सिर एवं सन्धि-स्थलों (जोड़ों) आदिमें मेरी रक्षा करें। देव! आपको नमस्कार है॥ ३३–३६॥
एतदुक्तं भगवता वैष्णवं पञ्जरं महत्।<br>पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम॥ ३७<br><br>नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३८द्विजोत्तम! प्राचीन कालमें भगवान् शंकरने कात्यायनी (दुर्गा)-की रक्षाके लिये इस महान् विष्णुपञ्जरस्तोत्रको उस स्थानपर कहा था, जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एवं अन्यान्य देव-शत्रुओंका नाश किया था॥ ३७-३८॥
नारद उवाच<br>काऽसौ कात्यायनी नाम या जघ्ने महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३९<br>कश्चासौ महिषो नाम कुले जातश्च कस्य सः।<br>कश्चासौ रक्तबीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः।<br>एतद्विस्तरतःतात यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ४०**नारदजीने पूछा—**ऋषे! महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुर-कण्टकोंका वध करनेवाली ये भगवती कात्यायनी कौन हैं? तात! यह महिष कौन है? तथा वह किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? यह रक्तबीज कौन है? तथा नमर किसका पुत्र है? आप इसका यथार्थ रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ ३९-४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वदा वरदा दुर्गा येयं कात्यायनी मुने॥ ४१<br><br>पुराऽसुरवरौ रौद्रौ जगत्क्षोभकरावुभौ।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां सुमहाबलौ॥ ४२<br><br>तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पञ्चनदे जले॥ ४३<br><br>तत्रैको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यग्निपञ्चमी।<br>करम्भश्चैव रम्भश्च यक्षं मालवटं प्रति॥ ४४**पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! सुनिये, मैं उस पापनाशक कथाको कहता हूँ। मुने! सब कुछ देनेवाली वरदायिनी भगवती दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं। प्राचीन-कालमें संसारमें उथल-पुथल मचानेवाले रम्भ और करम्भ नामके दो भयंकर और महाबलवान् असुर-श्रेष्ठ थे। देवर्षे! वे दोनों पुत्रहीन थे। उन दोनों दैत्योंने पुत्रके लिये पञ्चनदके जलमें रहकर बहुत वर्षोंतक तप किया। मालवट यक्षके प्रति एकाग्र होकर करम्भ और रम्भ—इन दोनोंमेंसे एक जलमें स्थित होकर और दूसरा पञ्चाग्निके मध्य बैठकर तप कर रहा था॥ ४१–४४॥

९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ ]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासवः।<br>चरणाभ्यां समादाय निजघान यथेच्छया॥ ४५<br>ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः।<br>वह्नौ स्वशीर्षं संक्षिप्य होतुमैच्छन् महाबलः॥ ४६<br>ततः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम्।<br>छेत्तुकामो निजं शीर्षं वह्निना प्रतिषेधितः॥ ४७<br>उक्तश्च मा दैत्यवर नाशायात्मानमात्मना।<br>दुस्तरा परवध्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा॥ ४८इन्द्रने ग्राहका रूप धारणकर इनमेंसे एकको जलमें निमग्न होनेपर पैर पकड़कर इच्छानुसार दूर ले जाकर मार डाला। उसके बाद भाईके नष्ट हो जानेपर क्रोधयुक्त महाबलशाली रम्भने अपने सिरको काटकर अग्निमें हवन करना चाहा। वह अपना केश पकड़कर हाथमें सूर्यके समान चमकनेवाली तलवार लेकर अपना सिर काटना ही चाहता था कि अग्निने उसे रोक दिया और कहा—दैत्यवर! तुम स्वयं अपना नाश मत करो। दूसरेका वध तो पाप होता ही है, आत्महत्या भी भयानक पाप है॥ ४५–४८॥
यच्च प्रार्थयसे वीर तद्ददामि यथेप्सितम्।<br>मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति वै कथा॥ ४९<br>ततोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः॥ ५०<br>अजेयो दैवतैः सर्वैः पुंभिर्दैत्यैश्च पावक।<br>महाबलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रवित्॥ ५१<br>तं प्रोवाच कविर्ब्रह्मन् बाढमेवं भविष्यति।<br>यस्यां चित्तं समालम्बि करिष्यसि ततः सुतः॥ ५२वीर! तुम जो माँगोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार वह मैं तुम्हें दूँगा। तुम मरो मत। इस संसारमें मृत व्यक्तिकी कथा नष्ट हो जाती है। इसपर रम्भने कहा—यदि आप वर देते हैं तो यह वर दीजिये कि मुझे आपसे भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्यविजयी पुत्र उत्पन्न हो। अग्निदेव! समस्त देवताओं तथा मानवों और दैत्योंसे भी वह अजेय हो। वह वायुके समान महाबलवान् तथा कामरूपी एवं सर्वास्त्रवेत्ता हो। नारदजी! इसपर अग्निने उससे कहा—अच्छा, ऐसा ही होगा। जिस स्त्रीमें तुम्हारा चित्त लग जायगा उसीसे तुम पुत्र उत्पन्न करोगे॥ ४९–५२॥
इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ।<br>द्रष्टुं मालवटं यक्षं यक्षैश्च परिवारितम्॥ ५३<br>तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः।<br>गजाश्च महिषाश्चाश्वा गावोऽजाविपरिप्लुताः॥ ५४<br>तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थिवः।<br>महिष्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन॥ ५५<br>सा समागाच्च दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी।<br>स चापि गमनं चक्रे भवितव्यप्रचोदितः॥ ५६अग्निदेवके ऐसा कहनेपर रम्भ यक्षोंसे घिरा हुआ मालवट यक्षका दर्शन करने गया। वहाँ उन यक्षोंका एक पद्म नामकी निधि अनन्य-चित्त होकर निवास करती थी। वहाँ बहुत-से बकरे, भेंड़े, घोड़े, भैंसे तथा हाथी और गाय-बैल थे। तपोधन! दानवराजने उन्हें देखकर तीन वर्षोंवाली रूपवती एक महिषीमें प्रेम प्रकट किया (अर्थात् आसक्त हुआ)। कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्रके समीप आ गयी तब भवितव्यतासे प्रेरित उसने (रम्भने) भी उस महिषीके साथ संगत किया॥ ५३–५६॥
तस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः।<br>पातालं प्रविवेशाथ ततः स्वभवनं गतः॥ ५७<br>दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः।<br>अकार्यकारकेत्येवं भूयो मालवटं गतः॥ ५८उसे गर्भ रह गया। उसके बाद उस महिषीको लेकर दानव पातालमें प्रविष्ट हुआ और अपने घर चला गया। उसके दानव-बन्धुओंने उसे देख एवं ‘अकार्यकारक’ जानकर उसका परित्याग कर दिया। फिर वह पुनः