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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन

५६ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १०
श्रुत्वाथ शब्दं दितिजैः समीरितं
जम्भप्रधाना दितिजेश्वरास्ततः ।
समभ्यधावंस्त्वरिता जलेश्वरं
यथा पतङ्गा ज्वलितं हुताशनम् ॥ ३८
तानागतान् वै प्रसमीक्ष्य देवः
प्राह्लादिमुत्सृज्य वितत्य पाशम् ।
गदां समुद्भाव्य जलेश्वरस्तु
दुद्राव ताञ्जम्भमुखानरातीन् ॥ ३९
जम्भं च पाशेन तथा निहत्य
तारं तलेनाशनिसंनिभेन ।
पादेन वृत्रं तरसा कुजम्भं
निपातयामास बलं च मुष्ट्या ॥ ४०
तेनार्दिता देववरेण दैत्याः
संप्राद्रवन् दिक्षु विमुक्तशस्त्राः ।
ततोऽन्धकः स त्वरितोऽभ्युपेयाद्
रणाय योद्धुं जलनायकेन ॥ ४१
तमापतन्तं गदया जघान
पाशेन बद्ध्वा वरुणो सुरेशम् ।
तं पाशमाविध्य गदां प्रगृह्य
चिक्षेप दैत्यः स जलेश्वराय ॥ ४२
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य पाशं
गदां च दाक्षायणिनन्दनस्तु ।
विवेश वेगात् पयसां निधानं
ततोऽन्धको देवबलं ममर्द ॥ ४३
ततो हुताशः सुरशत्रुसैन्यं
ददाह रोषात् पवनावधूतः ।
तमभ्ययाद् दानवविश्वकर्मा
मयो महाबाहुरुदग्रवीर्यः ॥ ४४
तमापतन्तं सह शम्बरेण
समीक्ष्य वह्निः पवनेन सार्धम् ।
शक्त्या मयं शम्बरमेत्य कण्ठे
सन्ताड्य जग्राह बलान्महर्षे ॥ ४५
शक्त्या स कायावरणे विदारिते
संभिन्नदेहो न्यपतत् पृथिव्याम् ।
मयः प्रजज्वाल च शम्बरोऽपि
कण्ठावलग्ने ज्वलने प्रदीप्ते ॥ ४६
स दह्यमानो दितिजोऽग्निनाथ
सुविस्वरं घोरतरं रुराव ।
सिंहाभिपन्नो विपिने यथैव
मत्तो गजः क्रन्दति वेदनार्त्तः ॥ ४७
मारते हैं। दैत्योंके रुदनको सुनकर जम्भ आदि प्रमुख
दैत्यगण वरुणकी ओर शीघ्रतासे ऐसे दौड़े जैसे पतङ्ग
प्रज्वलित अग्निकी ओर दौड़ते हैं ॥ ३४-३८॥
उन दैत्योंको आया देख वरुण प्रह्लाद-पुत्र
(विरोचन)-को छोड़ करके पाश फैलाकर और गदा
घुमाकर उन जम्भप्रभृति शत्रुओंकी ओर दौड़े। उन्होंने
जम्भको पाशसे, तार-दैत्यको वज्र-तुल्य करतलके
प्रहारसे, वृत्रासुरको पैरोंसे, कुजम्भको अपने वेगसे
और बल नामक असुरको मुक्केसे मारकर गिरा
दिया। देवप्रवर ! वरुणद्वारा मर्दित दैत्य अपने अस्त्र-
शस्त्रोंको छोड़कर दसों दिशाओंमें भागने लगे। उसके
बाद अन्धक वरुणदेवके साथ युद्ध करनेके लिये बड़ी
तेजीसे उनके पास पहुँचा। अपनी ओर आते देख
वरुणने उस दैत्यनायक अन्धकको अपने पाशसे बाँधकर
गदासे मारा, किंतु दैत्यने उस पाश और गदाको
छीनकर वरुणपर ही फेंक दिया ॥ ३९-४२॥
उस पाश और गदाको अपनी ओर आते
देखकर दाक्षायणीके पुत्र वरुण शीघ्रतासे समुद्रमें पैठ
गये। तब अन्धक देवसेनाका मर्दन करने लगा।
उसके बाद पवनद्वारा प्रज्वलित अग्निदेव क्रोधपूर्वक
असुरोंकी सेनाको दग्ध करने लगे। तब दानवोंका
'विश्वकर्मा' (शिल्पिराज) प्रचण्ड प्रतापी महाबाहु
मय उनके सामने आया। नारदजी ! शम्बरके साथ
उसे आते देख अग्निदेवने वायुदेवताके साथ
शक्तिके प्रहारसे मय और शम्बरके कण्ठमें चोट
पहुँचाकर उन दोनोंको ही जोरसे पकड़ लिया।
शक्तिसे कवचके फट जानेपर छिन्न-भिन्न
शरीरवाला मय पृथ्वीपर गिर पड़ा और शम्बरासुर
कण्ठमें प्रदीप्त अग्निके लग जानेसे दग्ध होने लगा।
अग्निद्वारा जलते दैत्यने उस समय मुक्त कण्ठसे
इस प्रकार रोदन किया, जैसे वनमें सिंहसे आक्रान्त
मतवाला हाथी वेदनासे दुःखी होकर करुण
चिग्घाड़ करता है ॥ ४३-४७॥

अध्याय १० ]अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय५७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं शब्दमाकर्ण्य च शम्बरस्य<br>दैत्येश्वरः क्रोधविरक्तदृष्टिः ।<br>आः किं किमेतन्ननु केन युद्धे<br>जितो मयः शम्बरदानवश्च ॥ ४८<br><br>ततोऽब्रुवन् दैत्यभटा दितीशं<br>प्रदह्यते ह्येष हुताशनेन ।<br>रक्षस्व चाभ्येत्य न शक्यतेऽन्यै-<br>र्हुताशनो वारयितुं रणाग्रे ॥ ४९<br><br>इत्थं स दैत्यैरभिनोदितस्तु<br>हिरण्यचक्षुस्तनयो महर्षे ।<br>उद्यम्य वेगात् परिघं हुताशं<br>समाद्रवत् तिष्ठ तिष्ठ ब्रुवन् हि ॥ ५०<br><br>श्रुत्वाऽन्धकस्यापि वचो व्ययात्मा<br>संक्रुद्धचित्तस्त्वरितो हि दैत्यम् ।<br>उत्पाद्य भूम्यां च विनिष्पिपे ष<br>ततोऽन्धकः पावकमाससाद ॥ ५१शम्बरके उस शब्दको सुनकर क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले दैत्येश्वरने कहा—अरे! यह क्या है? युद्धमें मय और शम्बरको किसने जीता है? इसपर दैत्ययोद्धाओंने अन्धकसे कहा—अग्निदेव इनको जला रहे हैं। आप जाकर उनकी रक्षा करें। आपके अतिरिक्त दूसरा कोई भी अग्निको नहीं रोक सकता। नारदजी! दैत्योंके ऐसा कहनेपर हिरण्याक्षपुत्र शीघ्रतासे परिघ उठाकर ‘ठहरो-ठहरो’—कहता हुआ अग्निकी ओर दौड़ पड़ा। अन्धकके वचनको सुनकर अव्ययात्मा अग्निदेवने अत्यन्त क्रोधसे उस दैत्यको शीघ्र ही उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया। उसके बाद अन्धक अग्निके पास पहुँचा॥ ४८—५१॥
समाजघानाथ हुताशनं हि<br>वरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये ।<br>समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं<br>तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२<br><br>तमापतन्तं परिघेण भूयः<br>समाहनन्मूर्ध्नि तदान्धकोऽपि ।<br>स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण<br>भयात् प्रदुद्राव रणाजिराद्धि ॥ ५३<br><br>ततोऽन्धको मारुतचन्द्रभास्करान्<br>साध्यान् सरुद्रांश्विवसून् महोरगान् ।<br>यान् या शरेण स्पृशते पराक्रमी<br>पराङ्मुखांस्तान् कृतवान् रणाजिरात् ॥ ५४<br><br>ततो विजित्यामरसैन्यमुग्रं<br>सैन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् ।<br>संपूज्यमानो दनुपुंगवैस्तु<br>तदान्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५<br><br>आसाद्य भूमिं करदान् नरेन्द्रान्<br>कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च ।<br>जगत्समग्रं प्रविवेश धीमान्<br>पातालमग्र्यं पुरमश्मकाह्वम् ॥ ५६<br><br>तत्र स्थितस्यापि महासुरस्य<br>गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः ।<br>सहाप्सरोभिः परिचारणाय<br>पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७उसने श्रेष्ठ अस्त्रके द्वारा अग्निके सिरपर प्रहार किया। इस प्रकार आहत अग्निदेव शम्बरको छोड़कर तत्काल अन्धककी ओर दौड़े। अन्धकने आते हुए अग्निदेवके सिरपर पुनः परिघसे प्रहार किया। अन्धकद्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्रसे भाग गये। उसके बाद पराक्रमी अन्धक वायु, चन्द्र, सूर्य, साध्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु और महानागोंमें जिन-जिनको बाणसे स्पर्श करता था, वे सभी युद्धभूमिसे पराङ्मुख हो जाते थे। इस प्रकार इन्द्र, रुद्र, यम, सोमसहित देवताओंकी उग्र सेनाको जीतकर अन्धक श्रेष्ठ दानवोंके द्वारा पूजित होकर पृथ्वीपर आ गया। वहाँ वह बुद्धिमान् दैत्य सभी राजाओंको अपना करद (सामन्त) बना करके तथा समस्त चराचर जगत्को वशमें कर पातालमें स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगरमें चला गया। वहाँ उस महासुर अन्धककी सेवा करनेके लिये अप्सराओंके साथ सभी प्रमुख गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धोंके समूह पातालमें आकर निवास करने लगे॥ ५२—५७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १०॥

५८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ११
ग्यारहवाँ अध्याय
सुकेशीकी कथा, मगधारण्यमें ऋषियोंसे प्रश्न करना, ऋषियोंका धर्मोपदेश,
देवादिके धर्म, भुवनकोश एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन
नारद उवाच
यदेतद् भवता प्रोक्तं सुकेशिनगरोऽम्बरात् ।
पातितो भुवि सूर्येण तत्कदा कुत्र कुत्र च ॥ १
सुकेशीति च कश्चासौ केन दत्तं पुरोऽस्य च ।
किमर्थं पातितो भूयामाकाशाद् भास्करेण हि ॥ २
पुलस्त्य उवाच
शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।
यथोक्तवान् स्वयम्भूर्मा कथ्यमानां मयाऽनघ ॥ ३
आसीन्निशाचरपतिर्विद्युत्केशीति विश्रुतः ।
तस्य पुत्रो गुणज्येष्ठः सुकेशिरभवत्ततः ॥ ४
तस्य तुष्टस्तथेशानः पुरमाकाशचारिणम् ।
प्रादादजेयत्वमपि शत्रुभिश्चाप्यवध्यताम् ॥ ५
स चापि शंकरात् प्राप्य वरं गगनगं पुरम् ।
रेमे निशाचरैः सार्द्धं सदा धर्मपथि स्थितः ॥ ६
स कदाचिद् गतोऽरण्यं मागधं राक्षसेश्वरः ।
तत्राश्रमांस्तु ददृशे ऋषीणां भावितात्मनाम् ॥ ७
महर्षीन् स तदा दृष्ट्वा प्रणिपत्याभिवाद्य च ।
प्रत्युवाच ऋषीन् सर्वान् कृतासनपरिग्रहः ॥ ८
सुकेशिरुवाच
प्रष्टुमिच्छामि भवतः संशयोऽयं हृदि स्थितः ।
कथयन्तु भवन्तो मे न चैवाज्ञापयाम्यहम् ॥ ९
किंस्विच्छ्रेयः परे लोके किमु चेह द्विजोत्तमाः ।
केन पूज्यस्तथा सत्सु केनासौ सुखमेधते ॥ १०
पुलस्त्य उवाच
इत्थं सुकेशिवचनं निशम्य परमर्षयः ।
प्रोचुर्विमृश्य श्रेयोऽर्थमिह लोके परत्र च ॥ ११
ऋषय ऊचुः
श्रूयतां कथयिष्यामस्तव राक्षसपुंगव ।
यद्धि श्रेयो भवेद् वीर इह चामुत्र चाव्ययम् ॥ १२
नारदजीने (पुलस्त्यजीसे) पूछा- आपने जो
यह कहा है कि सूर्यने सुकेशीके नगरको आकाशसे
पृथ्वीपर गिरा दिया था तो यह घटना कब और कहाँ
हुई थी? सुकेशी नामका वह कौन व्यक्ति था? उसे
वह नगर किसने दिया था और भगवान् सूर्यने उसे
आकाशसे पृथ्वीपर क्यों गिरा दिया ? ॥ १-२॥
पुलस्त्यजी बोले- निष्पाप नारदजी ! यह कथा
बहुत पुरानी है; आप इसे सावधानीसे सुनिये। ब्रह्माजीने
जैसे यह कथा मुझे सुनायी थी, वैसे ही इसे मैं आपको
सुना रहा हूँ। पहले विद्युत्केशी नामसे प्रसिद्ध राक्षसोंका
एक राजा था। उसका पुत्र सुकेशी गुणोंमें उससे भी
बढ़कर था। उसपर प्रसन्न होकर शिवजीने उसे एक
आकाशचारी नगर और शत्रुओंसे अजेय एवं अवध्य
होनेका वर भी दिया। वह शंकरसे आकाशचारी श्रेष्ठ
नगर पाकर राक्षसोंके साथ सदा धर्मपथपर रहते हुए
विचरने लगा। एक समय मगधारण्यमें जाकर उस
राक्षसराजने वहाँ ध्यान-परायण ऋषियोंके आश्रमोंको
देखा। उस समय महर्षियोंको देखकर अभिवादन और
प्रणाम किया। फिर एक जगह बैठकर उसने समस्त
ऋषियोंसे कहा- ॥ ३-८॥
सुकेशि बोला - मैं आपलोगोंको आदेश नहीं
दे रहा हूँ; बल्कि मेरे हृदयमें एक संदेह है, उसे मैं
आपसे पूछना चाहता हूँ। आप मुझको उसे बतलाइये।
द्विजोत्तमो! इस लोक और परलोकमें कल्याणकारी
क्या है? मनुष्य सज्जनोंमें कैसे पूज्य होता है और उसे
सुखकी प्राप्ति कैसे होती है ? ॥ ९-१० ॥
पुलस्त्यजी बोले- सुकेशीके इस प्रकारके
वचनको सुनकर श्रेष्ठ ऋषियोंने विचारकर उससे इस
लोक और परलोकमें कल्याणकारी बातें कहीं ॥ ११ ॥
ऋषिगण बोले- वीर राक्षस-श्रेष्ठ ! इस लोक
और परलोकमें जो अक्षय श्रेयस्कर वस्तु है, उसे हम तुमसे

अध्याय ११] सुकेशीकी कथा, ऋषियोंका धर्मोपदेश, देवादिके धर्म एवं इक्कीस नरकोंका वर्णन५९

| श्रेयो धर्मः परे लोके इह च क्षणदाचर।<br>तस्मिन् समाश्रितः सत्सु पूज्यस्तेन सुखी भवेत्॥ १३ | कहते हैं, उसे सुनो। निशाचर! इस लोक और परलोकमें धर्म ही कल्याणकारी है। उसमें स्थित रहकर व्यक्ति सज्जनोंमें आदरणीय एवं सुखी होता है॥ १२-१३॥ |
| सुकेशिरुवाच<br>किं लक्षणो भवेद् धर्मः किमाचरणसत्क्रियः।<br>यमाश्रित्य न सीदन्ति देवादद्यास्तु तदुच्यताम्॥ १४ | सुकेशि बोला— धर्मका लक्षण (परिचय) क्या है? उसमें कौन-से आचरण एवं सत्कर्म होते हैं, जिनका आश्रय लेकर देवादि कभी दुःखी नहीं होते। आप उसका वर्णन करें॥ १४॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां परमो धर्मः सदा यज्ञादिकाः क्रियाः।<br>स्वाध्यायवेदवेत्तृत्वं विष्णुपूजारतिः स्मृता॥ १५<br>दैत्यानां बाहुशालित्वं मात्सर्यं युद्धसत्क्रिया।<br>वेदनं नीतिशास्त्राणां हरभक्तिरुदाहृता॥ १६<br>सिद्धानामुदितो धर्मो योगयुक्तिरनुत्तमा।<br>स्वाध्यायं ब्रह्मविज्ञानं भक्तिर्द्वाभ्यामपि स्थिरा॥ १७<br>उत्कृष्टोपासनं ज्ञेयं नृत्यवाद्येषु वेदिता।<br>सरस्वत्यां स्थिरा भक्तिर्गा‌न्धर्वो धर्म उच्यते॥ १८ | ऋषियोंने कहा— सदा यज्ञादि कार्य, स्वाध्याय, वेदज्ञान और विष्णुपूजामें रति—ये देवताओंके शाश्वत परम धर्म हैं। बाहुबल, ईर्ष्याभाव, युद्धकार्य, नीतिशास्त्रका ज्ञान और हर-भक्ति—ये दैत्योंके धर्म कहे गये हैं। श्रेष्ठ योगसाधन, वेदाध्ययन, ब्रह्मविज्ञान तथा विष्णु और शिव—इन दोनोंमें अचल भक्ति—ये सब सिद्धोंके धर्म कहे गये हैं। ऊँची उपासना, नृत्य और वाद्यका ज्ञान तथा सरस्वतीके प्रति निश्चल भक्ति—ये गन्धर्वोंके धर्म कहे जाते हैं॥ १५-१८॥ |
| विद्याधरत्वमतुलं विज्ञानं पौरुषे मतिः।<br>विद्याधराणां धर्मोऽयं भवान्यां भक्तिरेव च॥ १९<br>गन्धर्वविद्यावेदित्वं भक्तिर्भानौ तथा स्थिरा।<br>कौशल्यं सर्वशिल्पानां धर्मः किम्पुरुषः स्मृतः॥ २०<br>ब्रह्मचर्यममानित्वं योगाभ्यासरतिर्दृढा।<br>सर्वत्र कामचारित्वं धर्मोऽयं पैतृकः स्मृतः॥ २१<br>ब्रह्मचर्यं यताशित्वं जप्यं ज्ञानं च राक्षस।<br>नियमाद्धर्मवेदित्वमार्षो धर्मः प्रचक्ष्यते॥ २२<br>स्वाध्यायं ब्रह्मचर्यं च दानं यजनमेव च।<br>अकार्पण्यमनायासं दया हिंसा क्षमा दमः॥ २३<br>जितेन्द्रियत्वं शौचं च माङ्गल्यं भक्तिरच्युते।<br>शंकरे भास्करे देव्यां धर्मोऽयं मानवः स्मृतः॥ २४ | अद्भुत विद्याका धारण करना, विज्ञान, पुरुषार्थकी बुद्धि और भवानीके प्रति भक्ति—ये विद्याधरोंके धर्म हैं। गन्धर्वविद्याका ज्ञान, सूर्यके प्रति अटल भक्ति और सभी शिल्प-कलाओंमें कुशलता—ये किम्पुरुषोंके धर्म माने जाते हैं। ब्रह्मचर्य, अमानित्व (अभिमानसे बचना) योगाभ्यासमें दृढ़ प्रीति एवं सर्वत्र इच्छानुसार भ्रमण—ये पितरोंके धर्म कहलाते हैं। राक्षस! ब्रह्मचर्य, नियताहार, जप, आत्मज्ञान और नियमानुसार धर्मज्ञान—ये ऋषियोंके धर्म कहे जाते हैं। स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, उदारता, विश्रान्ति, दया, अहिंसा, क्षमा, दम, जितेन्द्रियता, शौच, माङ्गल्य तथा विष्णु, शिव, सूर्य और दुर्गादेवीमें भक्ति—ये मानवोंके (सामान्य) धर्म हैं॥ १९-२४॥ |
| धनाधिपत्यं भोगानि स्वाध्यायं शंकरार्चनम्।<br>अहंकारमशौण्डीयं धर्मोऽयं गुह्यकेष्विति॥ २५<br>परदारावमर्शित्वं पारक्येऽर्थे च लोलता।<br>स्वाध्यायं त्र्यम्बके भक्तिर्धर्मोऽयं राक्षसः स्मृतः॥ २६<br>अविवेकंमथाज्ञानं शौचहानिरसत्यता।<br>पिशाचानामयं धर्मः सदा चामिषगृध्नता॥ २७<br>योनयो द्वादशैवैतास्तासु धर्माश्च राक्षस।<br>ब्रह्मणा कथिताः पुण्या द्वादशैव गतिप्रदाः॥ २८ | धनका स्वामित्व, भोग, स्वाध्याय, शिवजीकी पूजा, अहंकार और सौम्यता—ये गुह्योंके धर्म हैं। परस्त्रीगमन, दूसरेके धनमें लोलुपता, वेदाध्ययन और शिवभक्ति—ये राक्षसोंके धर्म कहे गये हैं। अविवेक, अज्ञान, अपवित्रता, असत्यता एवं सदा मांस-भक्षणकी प्रवृत्ति—ये पिशाचोंके धर्म हैं। राक्षस! ये ही बारह योनियाँ हैं। पितामह ब्रह्माने उनके ये बारह गति देनेवाले धर्म कहे हैं॥ २५-२८॥ |