वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३१३
| स एव नूनं नरदेवसूनु-<br>र्वृतो मया पूर्वतरं पतिर्यः॥ ११७<br>यश्चैष जाम्बूनदतुल्यवर्णः<br>श्वेतं जटाभारमधारयिष्यत्।<br>स एष नूनं तपतां वरिष्ठो<br>ऋतध्वजो नात्र विचारमस्ति॥ ११८<br>ततोऽब्रवीदथो हृष्टा नन्दयन्ती सखीजनम्।<br>एषोऽपरोऽस्यैव सुतो जाबालिनात्र संशयः॥ ११९<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीर्य च।<br>समासताग्रतः शम्भोर्गायन्त्यो गीतिकां शुभाम्॥ १२० | दिखलायी पड़ रहा है, निश्चय ही पहले (जन्ममें) मैंने उसी राजपुत्रको पतिरूपसे वरण किया था। इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। स्वर्णके समान वर्णवाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभारको धारण किये हुए हैं वे निश्चय ही तपस्वियोंमें श्रेष्ठ ऋतध्वज ही हैं (इसमें शङ्का नहीं है)। उसके बाद नन्दयन्तीने सखियोंसे हर्षित होकर कहा—वह दूसरा व्यक्ति निःसन्देह इन्हीं ऋतध्वजके पुत्र जाबालि हैं। इस प्रकार कहकर वे सभी छतसे उतरीं एवं शङ्करके सामने बैठकर कल्याण करनेवाले गीतका गान करने (स्तुति करने) लगीं—॥ ११६-१२०॥ |
| नमोऽस्तु शर्व शम्भो त्रिनेत्र चारुगात्र त्रैलोक्यनाथ<br><br>उमापते दक्षयज्ञविध्वंसकर कामाङ्गनाशन घोर<br><br>पापप्रणाशन महापुरुष महोग्रमूर्ते सर्वसत्त्वक्षयंकर<br><br>शुभङ्कर महेश्वर त्रिशूलधारिन् स्मरारे गुहावासिन्<br><br>दिग्वासः महाशङ्खशेखर जटाधर कपालमाला-<br><br>विभूषितशरीर वामचक्षुः वामदेवप्रजाध्यक्ष भगाक्ष्णोः<br><br>क्षयङ्कर भीमसेन महासेनानाथ पशुपते कामाङ्गदहन<br><br>चत्वरवासिन् शिव महादेव ईशान शङ्कर भीम भव<br><br>वृषभध्वज जटिल प्रौढ महानाट्येश्वर भूरिरत्न<br><br>अविमुक्तक रुद्र रुद्रेश्वर स्थाणो एकलिङ्ग<br><br>कालिन्दीप्रिय श्रीकण्ठ नीलकण्ठ अपराजित<br><br>रिपुभयङ्कर सन्तोषपते वामदेव अघोर तत्पुरुष महाघोर<br><br>अघोरमूर्ते शान्त सरस्वतीकान्त कीनाट सहस्रमूर्ते<br><br>महोद्भव विभो कालाग्निरुद्र रुद्र हर महीधरप्रिय<br><br>सर्वतीर्थाधिवास हंस कामेश्वर केदाराधिपते परिपूर्ण<br><br>मुचुकुन्द मधुनिवासिन् कृपाणपाणे भयङ्कर विद्याराज | हे शर्व! हे शम्भो! हे तीन नेत्रवाले! हे सुन्दर गात्रवाले! हे तीनों लोकोंके स्वामिन्! हे उमापते! हे दक्ष यज्ञको विध्वस्त करनेवाले! हे कामदेवके नाश करनेवाले! हे घोर! हे पापके नष्ट करनेवाले! हे महापुरुष! हे भयङ्कर मूर्तिवाले! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके क्षय करनेवाले! हे शुभ करनेवाले! हे महेश्वर! हे त्रिशूलधारिन्! हे कामशत्रो! हे गुफामें रहनेवाले! हे दिगम्बर! हे महाशङ्खके शिरोभूषणवाले! हे जटाधर! हे कपालमालासे विभूषित शरीरवाले! हे वामचक्षु! हे वामदेव! हे प्रजाध्यक्ष! हे भगाक्षिके क्षयकारिन्! हे भीमसेन! हे महासेनानाथ! हे पशुपते! हे कामदेवके जलानेवाले! हे चत्वरवासिन् (चबूतरेपर वास करनेवाले)! हे शिव! हे महादेव! हे ईशान! हे शङ्कर! हे भीम! हे भव! हे वृषभध्वज! हे जटिल! हे प्रौढ! हे महानाट्येश्वर! हे भूरिरत्न (रत्नराशि)! हे अविमुक्तक! हे रुद्र! हे रुद्रेश्वर! हे स्थाणो! हे एकलिङ्ग! हे कालिन्दीप्रिय! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ! हे अपराजित! हे रिपुभयङ्कर! हे सन्तोषपते! हे वामदेव! हे अघोर! हे तत्पुरुष! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ते! हे शान्त! हे सरस्वतीकान्त! हे कीनाट! हे सहस्रमूर्ते! हे महोद्भव! हे विभो! हे कालाग्निरुद्र! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय! हे सर्वतीर्थाधिवास! हे हंस! हे कामेश्वर! हे केदाराधिपते! हे परिपूर्ण! हे मुचुकुन्द! हे मधुनिवासिन्! हे कपालपाणे! हे भयङ्कर! हे विद्याराज! |
| ३१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सोमराज कामराज रञ्जक अञ्जनराजकन्याहृदचल-<br>वसते समुद्रशायिन् गजमुख घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने।<br>सहस्रवक्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते॥ | हे सोमराज! हे कामराज! हे रञ्जक! हे अञ्जनराजकन्या (काली)-के हृदयमें सदा रहनेवाले! हे समुद्रशायिन्! हे गजमुख! हे घण्टेश्वर! हे गोकर्ण! हे ब्रह्मयोने! हे हजार मुख, आँख एवं चरणवाले! हे हाटकेश्वर! आपको नमस्कार है। |
| एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताः सर्व एवर्षिपार्थिवाः।<br>द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्तारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम्॥ १२१<br>समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितश्च ताः।<br>स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम्॥ १२२<br>ततः सुदेवतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम्।<br>दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु संरोहत्पुलको बभौ॥ १२३<br>ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गीं दृष्ट्वा चित्राङ्गदां स्थिताम्।<br>प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बभौ मुदितमानसः॥ १२४<br>ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तुवन्तः संस्थिताः क्रमात्॥ १२५ | इसी बीच समस्त ऋषि एवं राजालोग तीनों लोकोंके कर्ता भगवान् त्र्यम्बक हाटकेश्वरका दर्शन करने वहाँ पहुँच गये और भलीभाँति स्नान करनेके बाद ऊपर चढ़कर उन लोगोंने देवताके अभिमुख बैठकर गीत गाती हुई (स्तुति करती हुई) स्त्रियोंको देखा। उसके बाद वसुदेवके पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्माकी पुत्रीको देखकर हर्षसे गद्गद हो गये। योगी ऋतध्वज भी तन्वङ्गी चित्राङ्गदाको वहाँ स्थित देख एवं पहचानकर महान् हर्षमें भर गये। उसके बाद सभी व्यक्ति शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर भगवान्के निकट गये एवं त्रिलोचनकी पूजाकर क्रमशः खड़े होकर स्तुति करने लगे॥ १२१-१२५॥ |
| चित्राङ्गदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान्।<br>समं ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत्॥ १२६<br>स च ताः प्रतिनन्द्यैव समं पुत्रेण तापसः।<br>समं नृपतिभिर्हृष्टः संविवेश यथासुखम्॥ १२७<br>ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि।<br>स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिदृक्षुर्हाटकेश्वरम्॥ १२८<br>ततोऽपश्यत् सुतां तन्वीं घृताची शुभदर्शनाम्।<br>साऽपि तां मातरे दृष्ट्वा हृष्टाऽभूद्वरवणिनी॥ १२९ | चित्राङ्गदाने भी उन ऋतध्वज आदिको देखकर उन तन्वङ्गी (कन्याओं)-के साथ उठकर प्रणाम किया। पुत्रसहित उन तपस्वीने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे प्रसन्नतासे राजाओंके साथ सुखपूर्वक बैठ गये। सुन्दरि! उसके बाद गोदावरीतीर्थमें स्नानकर हाटकेश्वर भगवान्का दर्शन करनेकी इच्छावाला वह श्रेष्ठ बन्दर भी घृताचीके साथ वहाँ पहुँचा। फिर घृताचीने अपनी शोभाशालिनी कृशाङ्गी पुत्रीको देखा। वह सुन्दरी भी अपनी उस माताको देखकर हर्षित हो गयी॥ १२६-१२९॥ |
| ततो घृताची स्वां पुत्रीं परिष्वज्य न्यपीडयत्।<br>स्नेहात् सवाष्पनयनां मुहुस्तां परिजिघ्रती॥ १३० | उसके बाद घृताचीने अपनी पुत्रीको भलीभाँति गले लगाया। स्नेहसे आँखोंमें आँसू भरकर वह (अपनी) पुत्रीको बार-बार सूँघने लगी—आशीर्वादात्मक शुभ भावना करने लगी। |
| ततो ऋतध्वजः श्रीमान् कपिं वचनमब्रवीत्।<br>गच्छानेतुं गुह्यकं त्वमञ्जनाद्रौ महाञ्जनम्॥ १३१ | उसके बाद श्रीमान् ऋतध्वजने कपिसे कहा—तुम महाजन नामके गुह्यकको ले आनेके |
| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३१५ |
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| पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम्।<br>स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय॥ १३२<br>इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह वेदवती कपिम्।<br>गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि॥ १३३ | लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ। फिर पातालसे वीर दैत्येश्वर कन्दारमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ। मुनिके इस प्रकार कहनेपर वेदवतीने बन्दरसे कहा—कपिश्रेष्ठ! गालवको भी आप यहाँ बुला लावें॥ १३०-१३३॥ |
| इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः।<br>गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम्॥ १३४<br>पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे।<br>सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः॥ १३५<br>तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम्।<br>पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरज्जवी॥ १३६<br>गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु।<br>समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम्॥ १३७<br>तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम्।<br>ददृशे नन्दयन्तीं च स्थितां वेदवतीमपि॥ १३८ | ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और (गुह्यकको) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया। वहाँ उसने पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया। वहाँ (जाकर उसने) महापराक्रमी कन्दारमालीको आमन्त्रित किया। वेगशाली बन्दर फिर पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने-फिरने लगा। तपोनिधि गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया। वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा वेदवतीको भी देखा॥ १३४-१३८॥ |
| तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्।<br>स चार्चयिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत्।<br>ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम्॥ १३९<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम्।<br>तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः॥ १४०<br>समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।<br>तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः॥ १४१<br>स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन्।<br>नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना॥ १४२<br>सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा।<br>अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः॥ १४३ | उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको प्रणाम किया। उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ गये। उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये। उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें स्नेहसे आँसू भर आये। वे सभी अपने-अपने पिताके गले लग गयीं। नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें (पिताकी स्मृतिमें) आँसू छलक आये। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने उससे सच्ची बात कह दी—॥ १३९-१४३॥ |
| मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः।<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना॥ १४४<br>कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना।<br>दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ १४५<br>इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह। | पुत्रि! तुम उदास मत होओ। यह बन्दर ही तुम्हारा पिता है। उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः (उसने सोचा—) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी। मनमें इस प्रकार |
| ३१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
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| परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६<br><br>पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br><br>अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥ १४७ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ। आप मेरी रक्षा करें। पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ। अतः आप स्वीकृति दें। तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा—अब विषाद मत करो ॥ १४४—१४७॥ |
| भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम्।<br>भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥ १४८<br>जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा।<br>इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥ १४९<br>घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।<br>पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥ १५०<br>भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।<br>इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥ १५१ | भवितव्यताका विनाश नहीं होता—होनी होकर रहती है। इसलिये देहका परित्याग मत करो। घृताचीकी कोखसे पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर देवताओंके शिल्पी हो जायेंगे—इसमें संदेह नहीं है। मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे कहा—पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो। तुम्हारे पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें निःसंदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा। (फिर सुतरां शाप-विमोचन हो जायगा।) ऐसा कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी ॥ १४८—१५१ ॥ |
| प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।<br>सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥ १५२<br>प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।<br>ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥ १५३<br>तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।<br>जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥ १५४ | सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाहमें मिलनेवाले पिताके दर्शनकी (उत्सुकतासे) प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाहके समयकी प्रतीक्षा करने लगीं। दस महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो (आगे चलकर) नल (नामक) हुआ। पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२—१५४ ॥ |
| समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।<br>ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥ १५५<br>सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।<br>त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥ १५६<br>सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।<br>समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥ १५७<br>इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह।<br>जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥ १५८<br>गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।<br>नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९ | अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको स्नेहपूर्वक गले लगाया। उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका स्मरण किया। देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! जाबालिको कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५—१५९ ॥ |
| ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च।<br>बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥ १६० | यह वेदवती मेरी (इन्द्रद्युम्नकी) और त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथकी पत्नी हो। मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा—ठीक है। |