श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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इस ग्रन्थ के बारे में
श्री रामकृष्ण वचनामृत श्री रामकृष्ण परमहंस के उन वार्तालापों का संग्रह है जिन्हें उनके गृहस्थ शिष्य महेन्द्रनाथ गुप्त ने 'श्री म' के नाम से बांग्ला में 'श्रीश्रीरामकृष्ण कथामृत' शीर्षक से लिखा था। महेन्द्रनाथ गुप्त ने १८८२ से १८८६ के बीच दक्षिणेश्वर और कोलकाता में ठाकुर के पास हुई बातचीत को तारीख़ सहित अपनी डायरी में दर्ज किया था, इसलिए यह ग्रन्थ लगभग प्रत्यक्ष विवरण जैसा पढ़ा जाता है।
यह उसका प्रथम भाग है, जिसका हिन्दी अनुवाद महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने किया था। सामग्री परिच्छेदों में बँटी है और प्रत्येक प्रसंग के साथ उसकी तिथि दी गई है, जैसे ११ मार्च, १६ अक्टूबर और २८ अक्टूबर १८८२ के प्रसंग। इन वार्तालापों में ईश्वर-दर्शन, भक्ति और ज्ञान, गृहस्थ के लिए साधना, माया और सर्व-धर्म-समन्वय जैसे विषय सहज दृष्टान्तों के साथ आते हैं। आरम्भ में प्राक्कथन और प्रस्तावना है।
यह प्रति गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के पुस्तकालय से आई है और लगभग ७११ पृष्ठों की है। निराला के गद्य में रामकृष्ण के वचन पढ़ना अपने आप में हिन्दी साहित्य का भी अनुभव है।
४ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६८३
४ अक्टूबर, १८८४ परिच्छेद १५ ६८३
श्रीरामकृष्ण के साथ बाबूराम, किशोरी तथा और भी दो-एक भक्त आये हैं। मास्टर भी आये हैं। वे नीचे बैठे हुए श्रीरामकृष्ण का संकीर्तन सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से कह रहे हैं - “संसार अनित्य है। मृत्यु पर सदा ही ध्यान रखना चाहिए।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं -
“मन! सोच कर देख, कोई किसी का नहीं है। इस संसार में वृथा ही तू चक्कर मारता फिरता है। माया-जाल में फँसकर दक्षिणाकाली को कभी भूल न जाना। इस संसार में दो ही दिन के लिए लोक ‘मालिक-मालिक’ करते हैं। जब कभी कालरूप मालिक आ जाते हैं, तब पहले के उस मालिक को लोग श्मशान में डाल देते हैं। जिसके लिए तुम सोचकर मर रहे हो, क्या वह तुम्हारे संग भी जाता है? तुम्हारी वही प्रेयसी तुम्हारे मर जाने पर अमंगल की आशंका करके गोबर से घर को लीपती-पोतती है!”
श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं - “डूबो; ऊपर उतराते रहने से क्या होगा? कुछ दिन एकान्त में, सब कुछ छोड़कर, उन पर सोलहों आने मन लगाकर, उन्हें पुकारो।” श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं - “ऐ मन, रूप के समुद्र में तू डूब जा। तलातल और पाताल में खोज करने पर तुझे प्रेमरूपी रत्न मिलेगा।”
श्रीरामकृष्ण ब्राह्मभक्तों से “तुम मेरे सर्वस्व हो” यह गाना गाने के लिए कह रहे हैं।
ब्राह्मभक्तों का गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण ने श्रीकृष्ण पर एक गाना गाया। यह गाना सुनकर केशव ने इसी के जोड़ का एक दूसरा गीत रचा था।
अब श्रीरामकृष्ण गौरांग-कीर्तन करने लगे। भक्तों के साथ बड़ी देर तक नृत्य-गीत होता रहा।
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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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| GURUKUL KANGRI LIBRARY | |
|---|---|
| Sign: | [हस्ताक्षर] 12/09/07 |
| Access on | |
| Class on | 11/103 |
| Cat on | [हस्ताक्षर] " |
| Tag at | [हस्ताक्षर] |
| Filing | |
| E.A.R | [हस्ताक्षर] 3 |
| Any ot | |
| Checked |
ARCHIVES DATA BASE
2011 - 12
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[हस्ताक्षर]
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वृषाली ऑफसेट, नागपूर- १८
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तन्नो हंसः प्रचोदयात्
रामकृष्ण मठ
श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द साहित्य
एवं अन्य आध्यात्मिक प्रकाशनों के लिए लिखें :
रामकृष्ण मठ, (प्रकाशन विभाग)
रामकृष्ण आश्रम मार्ग, धन्तोली, नागपुर ४४० ०१२
(H-1) Shri Ramakrishna-Vachanamrit Part : 1
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