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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished711 pages

About this granth

Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.

This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.

The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.

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२१८श्रीरामकृष्णवचनामृत४ जून, १८८३

जाएगा, तब क्या वह रास्ते में नाचता फिरेगा? वह फिर किसी आफिस की नौकरी ढूँढ़ लेगा, वही पुराना काम करता रहेगा। इसी तरह गुरु की कृपा से ज्ञानलाभ होने पर मनुष्य संसार में भी जीवन्मुक्त होकर रह सकता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने सांसारिक मनुष्यों को अभय प्रदान किया।

(४)

श्रीरामकृष्ण और निराकारवाद। विश्वास ही सब कुछ है।

मणिलाल (श्रीरामकृष्ण से) – उपासना के समय उनका ध्यान किस जगह करेंगे?

श्रीरामकृष्ण – हृदय तो खूब प्रसिद्ध स्थान है। वहीं उनका ध्यान करना।

मणिलाल निराकारवादी ब्राह्म हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें लक्ष्य कर कहते हैं, “कबीर कहते थे –

'निर्गुण तो है पिता हमारा और सगुण महतारी।
काकों निन्दौ काकों बन्दौ दोनों पल्ले भारी।।'

“हलधारी दिन में साकार भाव में और रात को निराकार भाव में रहता था। बात यह है कि चाहे जिस भाव का आश्रय करो, विश्वास पक्का होना चाहिए। चाहे साकार में विश्वास करो चाहे निराकार में, परन्तु वह ठीक ठीक होना चाहिए।

“शम्भु मल्लिक बागबाजार से पैदल अपने बाग में आया करते थे। किसी ने कहा था, 'इतनी दूर है, गाड़ी से क्यों नहीं आते? रास्ते में कोई विपत्ति हो सकती है।' उस समय शम्भु ने नाराज होकर कहा था, 'क्या मैं भगवान् का नाम लेकर निकला हूँ, फिर मुझे विपत्ति'?

“विश्वास से ही सब कुछ होता है। मैं कहता था यदि अमुक से भेंट हो जाय या यदि अमुक खजांची मेरे साथ बात करे तो समझूँ कि मेरी यह अवस्था सत्य है। परन्तु जो मन में आता, वही हो जाता था।”

मास्टर ने अंग्रेजी का न्यायशास्त्र पढ़ा था। उसमें लिखा है कि सबेरे के स्वप्न का सत्य होना लोगों के कुसंस्कार की ही उपज है। इसलिए उन्होंने पूछा, “अच्छा, कभी ऐसा भी हुआ है कि कोई घटना नहीं हुई?”

श्रीरामकृष्ण – “नहीं, उस समय सब हो जाता था। ईश्वर का नाम लेकर जो विश्वास करता था, वही हो जाता था। (मणिलाल से) पर इसमें एक बात है। सरल और उदार हुए बिना यह विश्वास नहीं होता। जिसके शरीर की हड्डियाँ दिखायी देती हैं, जिसकी आँखें छोटी और घुसी हुई हैं, जो ऐंचाताना है, उसे सहज में विश्वास नहीं होता। इसी प्रकार और भी कई लक्षण हैं।”

४ जून, १८८३ | परिच्छेद ३६ | २१९

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४ जून, १८८३परिच्छेद ३६२१९

श्रीरामकृष्ण और सतीत्त्व धर्म

शाम हो गयी। दासी कमरे में धूनी दे गयी। मणिलाल आदि के चले जाने के बाद दो एक भक्त अभी बैठे हैं। कमरा शान्त और धूने से सुवासित है। श्रीरामकृष्ण अपने छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिंतन कर रहे हैं। मास्टर और राखाल जमीन पर बैठे हैं।

थोड़ी देर बाद मथुरबाबू के घर की दासी भगवती ने आकर दूर से श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। आपने उसे बैठने के लिए कहा। भगवती बाबू की बहुत पुरानी दासी है। बहुत साल से बाबू के यहाँ रह रही है। श्रीरामकृष्ण उसे बहुत दिनों से जानते हैं। पहले पहल उसका स्वभाव अच्छा न था; पर श्रीरामकृष्ण दया के सागर, पतितपावन हैं, इसीलिए उससे पुरानी बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – अब तो तेरी उम्र बहुत हुई है। जो रुपये कमाए हैं उनसे साधु-वैष्णवों को खिलाती है या नहीं?

भगवती (मुसकराकर) – यह भला कैसे कहूँ?

श्रीरामकृष्ण – काशी, वृन्दावन यह सब तो हो आयी?

भगवती (थोड़ा सकुचाती हुई) – कैसे बतलाऊँ? एक घाट बनवा दिया है उसमें पत्थर पर मेरा नाम लिखा है।

श्रीरामकृष्ण – ऐसी बात!

भगवती – हाँ, नाम लिखा है, 'श्रीमती भगवती दासी।'

श्रीरामकृष्ण (मुसकराकर) – बहुत अच्छा।

भगवती ने साहस पाकर श्रीरामकृष्ण के चरण छूकर प्रणाम किया।

बिच्छू के काटने से जैसे कोई चौंक उठता है और अस्थिर हो खड़ा हो जाता है, वैसे ही श्रीरामकृष्ण अधीर हो, 'गोविन्द' 'गोविन्द' उच्चारण करते हुए खड़े हो गए। कमरे के कोने में गंगाजल का एक मटका था – और अब भी है – हाँफते हाँफते, मानो घबराए हुए, उसी के पास गए और पैर के जिस स्थान को दासी ने छुआ था, उसे गंगाजल से धोने लगे।

दो-एक भक्त जो कमरे में थे, स्तब्ध और चकित हो एकटक यह दृश्य देख रहे हैं। दासी जीवन्मृत की तरह बैठी है। दयासिन्धु पतितपावन श्रीरामकृष्ण ने दासी से करुणा से सने हुए स्वर में कहा, "तुम लोग ऐसे ही प्रणाम करना।" यह कहकर फिर आसन पर बैठकर दासी को बहलाने की चेष्टा करते रहे। उन्होंने कहा, "कुछ गाते हैं, सुन।" यह कहकर उसे गाना सुनाने लगे। –

(१) (भावार्थ) – "मेरा मनमधुप श्यामापद-नीलकमल में मस्त हो गया। कामादि पुष्पों में जितने विषय-मधु थे सब तुच्छ हो गए। ..."

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२२०श्रीरामकृष्णवचनामृत४ जून, १८८३

(२) (भावार्थ) – “श्यामा माँ के चरणरूपी आकाश में मन की पतंग उड़ रही थी। कलुष की कुवायु से वह चक्कर खाकर गिर पड़ी। ...”

(३) (भावार्थ) – “मन! अपने आप में रहो। किसी दूसरे के घर न जाओ। जो कुछ चाहोगे वह बैठे हुए ही पाओगे, अपने अन्तःपुर में जरा खोजो तो सही! ...”

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परिच्छेद ३७

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परिच्छेद ३७

श्रीरामकृष्ण का प्रथम प्रेमोन्माद

(१)

पूर्वकथा – देवेन्द्र ठाकुर, दीन मुखर्जी और कुँवरसिंह

आज अमावस्या, मंगलवार का दिन है, ५ जून १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर में हैं। भक्त-समागम रविवार को विशेष होता है; आज अधिक लोग नहीं है। राखाल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। हाजरा भी हैं, श्रीरामकृष्ण के कमरे के सामने वाले बरामदे में अपना आसन लगाया है। मास्टर पिछले रविवार से यहाँ हैं।

कल सोमवार रात को कालीमन्दिर में कृष्णलीला पर नाटक हुआ था। श्रीरामकृष्ण ने कुछ देर तक देखा था। वैसे यह नाटक रविवार को होनेवाला था, पर उस दिन न हो पाया इसलिए कल सोमवार को हुआ।

दोपहर को भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण अपने प्रेमोन्माद की अवस्था का वर्णन कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – कैसी हालत बीत चुकी है! यहाँ भोजन न करता था, वराहनगर या दक्षिणेश्वर या आरियादह में किसी ब्राह्मण के घर चला जाता, और जाता भी देर में था। जाकर बैठ जाता था, पर बोलता कुछ नहीं। घर के लोग पूछते तो केवल कहता, ‘मैं यहाँ खाऊँगा।’ और कोई बात नहीं करता। आलमबाजार में राम चटर्जी के यहाँ जाता। कभी दक्षिणेश्वर में सावर्ण चौधरी के मकान पर जाता। उनके यहाँ खाया तो करता था, पर अच्छा नहीं लगता था; उसमें कैसी गन्ध आती थी!

“एक दिन हठ कर बैठा, देवेन्द्रनाथ ठाकुर के घर जाऊँगा। मथुरबाबू से कहा, ‘देवेन्द्र ईश्वर का नाम लेते हैं, उनको देखना चाहता हूँ, मुझे ले चलोगे?’ मथुरबाबू को अपनी मान-मर्यादा का बड़ा अभिमान था, वे अपनी गरज से किसी के मकान पर क्यों जाने लगे? आगापीछा करने लगे। बाद में बोले, ‘अच्छा, देवेन्द्र और हम एक साथ पढ़ चुके हैं, चलिए, आपको ले चलेंगे।’

“एक दिन सुना कि दीन मुखर्जी नाम का एक भला आदमी बागबाजार के पुल के पास रहता है। भक्त है। मथुरबाबू को पकड़ा, दीन मुखर्जी के यहाँ जाऊँगा। मथुरबाबू क्या

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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२२२श्रीरामकृष्णवचनामृत५ जून, १८८३

करते, गाड़ी पर मुझे ले गए। छोटासा मकान और इधर एक बड़ी भारी गाड़ी पर एक बड़ा आदमी आया है; वह भी शरमा गयाऔर हम भी। फिर उसके लड़के का जनेऊ होनेवाला था। कहाँ बैठाए! हम लोग बाजू के कमरे में जाने लगे तो वह बोल उठा, 'वहाँ न जाइए, उस कमरे में औरतें हैं।' बड़ा असमंजस था। मथुरबाबू लौटते समय बोले, 'बाबा, तुम्हारी बात अब कभी न मानूँगा।' मैं हँसने लगा।

“कैसी अनोखी अवस्था थी! कुँवरसिंह ने साधुओ को भोजन कराना चाहा, मुझे भी न्योता दिया। जाकर देखा बहुतसे साधु आए हैं। मेरे बैठने पर साधुओ में से कोई कोई मेरा परिचय पूछने लगे – 'आप गिरी हैं या पुरी?' पर ज्योंही उन्होंने पूछा त्योंही मैं अलग जाकर बैठा। सोचा कि इतनी खबर काहे की? बाद को ज्योंही पत्तल बिछाकर भोजन के लिए बैठाया, किसी के कुछ कहने के पहले ही मैंने खाना शुरू कर दिया। साधुओं में से किसी किसी को कहते सुना, 'अरे यह क्या!'

(२)

साधु और अवतार में अन्तर

पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे के बरामदे की सीढ़ी पर बैठे हैं। राखाल, हाजरा और मास्टर पास बैठे हैं।

हाजरा का भाव है – 'सोऽहं – मैं ही ब्रह्म हूँ।'

श्रीरामकृष्ण (हाजरा से) – हाँ, यह सोचने से सब गड़बड़ मिट जाती है, – वे ही आस्तिक हैं, वे ही नास्तिक; वे ही भले हैं, वे ही बुरे; वे ही नित्यवस्तु हैं, वे ही अनित्य जगत्; जागृति और निद्रा उन्हीं की अवस्थाएँ हैं; फिर वे ही इन सारी अवस्थाओं से परे भी हैं।

“एक किसान को बुढ़ापे में एक लड़का हुआ था। लड़के को वह बहुत यत्न से पालता था। धीरे धीरे लड़का बड़ा हुआ। एक दिन जब किसान खेत में काम कर रहा था, किसी ने आकर उसे खबर दी कि तुम्हारा लड़का बहुत बीमार है – अब-तब हो रहा है। उसने घर में आकर देखा, लड़का मर गया है। स्त्री खूब रो रही है; पर किसान की आँखों में आँसू तक नहीं। उसकी स्त्री अपनी पड़ोसिनों के पास इसलिए और भी शोक करनें लगी कि ऐसा लड़का चला गया, पर इनकी आँखों में आँसू का नाम नहीं! बड़ी देर बाद किसान ने अपनी स्त्री को पुकारकर कहा, 'मैं क्यों नहीं रोता, जानती हो? मैंने कल स्वप्न में देखा कि राजा हो गया हूँ और सात लड़कों का बाप बना हूँ। स्वप्न में ही देखा कि वे लड़के रूप और गुण में अच्छे हैं। क्रमशः वे बड़े हुए और विद्या तथा धर्म उपार्जन करने लगे। इतने में ही नींद खुल गयी। अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे इस एक लड़के के लिए रोऊँ या अपने उन सात लड़कों के लिए?' ज्ञानियों के मत से स्वप्न की अवस्था जैसी सत्य है,

५ जून, १८८३ परिच्छेद ३७ २२३

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५ जून, १८८३ परिच्छेद ३७ २२३

जाग्रत् अवस्था भी वैसी ही सत्य है।

“ईश्वर ही कर्ता हैं, उन्हीं की इच्छा से सब कुछ हो रहा है।”

हाजरा – पर यह समझना बड़ा कठिन है। भू-कैलास के साधु को कितना कष्ट दिया गया, जो एक तरह से उनकी मृत्यु का कारण हुआ। वे समाधि की हालत में मिले थे। होश में लाने के लिए लोगों ने उन्हें कभी जमीन में गाड़ा, कभी जल में डुबोया और कभी उनका शरीर दाग दिया। इस तरह उन्हें चैतन्य कराया। इन यन्त्रणाओं के कारण उनका शरीर छूट गया। लोगों ने उन्हें कष्ट भी दिया और इधर ईश्वर की इच्छा से उनकी मृत्यु भी हुई।

श्रीरामकृष्ण – जिसका जैसा कर्म है, उसका फल वह पाएगा। किन्तु ईश्वर की इच्छा से उन साधु का शरीर-त्याग हुआ। वैद्य बोतल के अन्दर मकरध्वज तैयार करते हैं। उसके चारों ओर मिट्टी लीपकर वे उसे आग में रख देते हैं। बोतल के अन्दर का सोना आग की गर्मी से और कई चीजों के साथ मिलकर मकरध्वज बन जाता है। तब वैद्य बोतल को उठाकर उसे धीरे धीरे तोड़ता है और उससे मकरध्वज निकालकर रख लेता है। उस समय बोतल रहे चाहे नष्ट हो जाए, उससे क्या? उसी तरह लोग सोचते हैं कि साधु मार डाले गए, पर शायद उनकी चीज बन चुकी होगी। भगवान् का लाभ होने के बाद शरीर रहे भी तो क्या, और जाय तो भी क्या?

“भू-कैलास के वे साधु समाधिस्थ थे। समाधि अनेक प्रकार की होती है। हृषीकेश के साधु के कथन से मेरी अवस्था मिल गयी थी। कभी शरीर में चींटी की तरह वायु चलती हुई जान पड़ती है; कभी बड़े वेग के साथ, जैसे बन्दर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते हैं; कभी मछली की तरह गति होती है। जिसको हो वही जान सकता है। जगत् का ख्याल जाता रहता है। मन के कुछ उतरने पर मैं कहता हूँ, 'माँ, मुझे अच्छा कर दो, मैं बातें करना चाहता हूँ।'

“ईश्वरकोटि जैसे अवतार आदि, न होने पर कोई समाधि से नहीं लौट सकता। जीवकोटि के कोई कोई साधना के बल से समाधिस्थ होते तो हैं; पर वे फिर नहीं लौटते। जब ईश्वर स्वयं मनुष्य होकर आते हैं, अवतार रूप में आते हैं और जीवों की मुक्ति की चाबी उनके हाथ में रहती है, तब वे समाधि के बाद लौटते हैं – लोगों के कल्याण के लिए।”

मास्टर (मन ही मन) – क्या श्रीरामकृष्ण के हाथ में जीवों की मुक्ति की चाबी है?

हाजरा – ईश्वर को सन्तुष्ट करने से सब कुछ हुआ। अवतार हों या न हों।

श्रीरामकृष्ण (हँसकर) – हाँ, हाँ। विष्णुपुर में रजिस्ट्री का बड़ा दफ्तर है, वहाँ रजिस्ट्री हो जाने पर फिर 'गोघाट' में कोई बखेड़ा नहीं होता।

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२२४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ जून, १८८३

गुरुशिष्य-संवाद

शाम हुई। मन्दिर में आरती हो रही है। बारह शिवमन्दिरों तथा श्रीराधाकान्त के और माता भवतारिणी के मन्दिर में शंख घण्टा आदि मंगल-वाद्य बज रहे हैं। आरती समाप्त होने के कुछ समय बाद श्रीरामकृष्ण अपने कमरे से दक्षिण के बरामदे में आ बैठे। चारों ओर घना अन्धकार है, केवल मन्दिर में स्थान स्थान पर दीपक जल रहे हैं। गंगाजी के वक्ष पर आकाश की काली छाया पड़ी है। आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण सहज ही भावमय हैं, आज भाव और भी गम्भीर हो रहा है। बीच बीच में प्रणव उच्चारण कर रहे हैं और देवी का नाम ले रहे हैं। गर्मी का मौसम है, कमरे के भीतर गर्मी बहुत है। इसलिए बरामदे में आए हैं। किसी भक्त ने एक कीमती चटाई दी है। वही बरामदे में बिछायी गयी है। श्रीरामकृष्ण को सर्वदा माँ का ध्यान लगा रहता है। लेटे हुए आप मणि से धीरे धीरे बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – देखो, ईश्वर के दर्शन होते हैं। अमुक को दर्शन मिले हैं, परन्तु किसी से कहना मत। तुम्हें ईश्वर का रूप पसन्द है या निराकार-चिन्ता?

मणि – इस समय तो निराकार-चिन्ता कुछ अच्छी लगती है, पर यह भी कुछ कुछ समझ में आया है कि वे ही साकार हो इन अनेक रूपों में विराजते हैं।

श्रीरामकृष्ण – देखो, मुझे गाड़ी पर बेलघरिया में मोती शील की झील को ले चलोगे? वहाँ चारा फेंक दो, मछलियाँ आकर उसे खाने लगेंगी। अहा! मछलियों को खेलती हुई देखकर क्या आनन्द होता है, तुम्हें उद्दीपना होगी कि मानो सच्चिदानन्दरूपी सागर में आत्मारूपी मछली खेल रही है। उसी तरह लम्बे-चौड़े मैदान में खड़े होने से ईश्वरीय भाव आ जाता है, जैसे किसी हण्डी में रखी हुई मछली तालाब को पहुँच गयी हो।

“उनके दर्शन के लिए साधना चाहिए। मुझे कठोर साधनाएँ करनी पड़ीं। बिल्ववृक्ष के नीचे तरह तरह की साधनाएँ कर चुका। वृक्ष के नीचे पड़ा रहता था, – यह कहते हुए कि माँ, दर्शन दो। रोते रोते आँसुओं की झड़ी लग जाती थी।

मणि – जब आप ही इतनी साधनाएँ कर चुके तब दूसरे लोग क्या एक ही क्षण में सब कर लेंगे? मकान के चारों ओर उँगली फेर देने ही से क्या दीवाल बन जाएगी?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – अमृत कहता है, एक आदमी के आग जलाने पर दस आदमी उसके ताप से लाभ उठाते हैं। एक बात और है, – नित्य को पहुँचकर लीला में रहना अच्छा है।

मणि – आपने तो कहा है कि लीला विलास के लिए है।

श्रीरामकृष्ण – नहीं, लीला भी सत्य है। और देखो, जब यहाँ आओगे तब अपने साथ थोड़ा कुछ लेते आना। खुद नहीं कहना चाहिए, इससे अभिमान होता है। अधर सेन से भी कहता हूँ, एक पैसे का कुछ लेकर आना। भवनाथ से कहता हूँ कि एक पैसे का

५ जून, १८८३ | परिच्छेद ३७ | २२५

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५ जून, १८८३परिच्छेद ३७२२५

पान लाना। भवनाथ की भक्ति कैसी है, देखी है तुमने? भवनाथ और नरेन्द्र मानो स्त्री और पुरुष हैं। भवनाथ नरेन्द्र का अनुगत हैं। नरेन्द्र को गाड़ी पर ले आना। कुछ खाने की चीज लाना। इससे बहुत भला होता है।

ज्ञानपथ और नास्तिकता

“ज्ञान और भक्ति – दोनों ही मार्ग हैं। भक्तिमार्ग में आचार कुछ अधिक पालन करना पड़ता है। ज्ञानमार्ग में यदि कोई अनाचार भी करे तो वह मिट जाता है। खूब आग जलाकर एक केले का पेड़ भी झोंक दो, वह भी भस्म हो जाता है।

“ज्ञानी का मार्ग विचारमार्ग है। विचार करते करते कभी कभी नास्तिकपन भी आ सकता है। पर भगवान् को जानने के लिए भक्त की यदि हार्दिक इच्छा हो, तो नास्तिकता आने पर भी वह ईश्वरचिन्तन नहीं त्यागता। जिसके बाप-दादे किसानी करते आ रहे हैं, अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण किसी साल फसल न होने पर भी वह खेती करता ही रहता है।”

श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे बातें कर रहे हैं। बीच में मणि से बोले, “मेरा पैर थोड़ा दर्द कर रहा है, जरा हाथ फेर दो।”

अहेतुक कृपासिन्धु गुरुदेव के कमलचरणों की सेवा करते हुए, मणि उनके श्रीमुख से वे अपूर्व तत्त्व सुन रहे हैं।

परिच्छेद ३८

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परिच्छेद ३८

दक्षिणेश्वर मन्दिर में

श्रीरामकृष्ण की समाधि। भक्तों के द्वारा श्रीचरण-पूजा

श्रीरामकृष्ण आज सन्ध्या-आरती के बाद दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में देवी की प्रतिमा के सम्मुख खड़े होकर दर्शन करते और चमर लेकर कुछ देर डुलाते रहे।

ग्रीष्म ऋतु है। ज्येष्ठ शुक्ला तृतीया तिथि है। शुक्रवार, ८ जून १८८३ ई.। आज शाम को राम, केदार चटर्जी और तारक श्रीरामकृष्ण के लिए फूल और मिठाई लिये कलकत्ते से गाड़ी पर आये हैं।

केदार की उम्र कोई पचीस वर्ष की होगी। बड़े भक्त हैं। ईश्वर की चर्चा सुनते ही उनके नेत्र अश्रुपूर्ण हो जाते हैं। पहले ब्राह्मसमाज में आते-जाते थे। फिर कर्ताभजा, नवरसिक आदि अनेक सम्प्रदायों से मिलकर अन्त में उन्होंने श्रीरामकृष्ण के चरणों में शरण ली है। सरकारी नौकरी में हिसाबनवीस का काम करते हैं। उनका घर काँचड़ापाड़ा के निकट हालीशहर गाँव में है।

तारक की उम्र चौबीस वर्ष की होगी। विवाह के कुछ दिन बाद उनके स्त्री की मृत्यु हो गयी। उनका मकान बारासात गाँव में है। उनके पिता एक उच्च कोटि के साधक थे, श्रीरामकृष्ण के दर्शन उन्होंने अनेक बार किये थे। तारक की माता की मृत्यु होने पर उनके पिता ने अपना दूसरा विवाह कर लिया था।

तारक राम के मकान पर सर्वदा आते-जाते रहते हैं। उनके और नित्यगोपाल के साथ वे प्रायः श्रीरामकृष्णदेव के दर्शन करने के लिए आते हैं। इस समय भी किसी आफिस में काम करते हैं। परन्तु सर्वदा विरक्ति का भाव है।

श्रीरामकृष्ण ने कालीमन्दिर से निकलकर चबूतरे पर भूमिष्ठ हो माता को प्रणाम किया। उन्होंने देखा राम, मास्टर, केदार तारक आदि भक्त वहाँ खड़े हैं।

तारक को देखकर आप बड़े प्रसन्न हुए और उनकी ठुड्डी छूकर प्यार करने लगे।

अब श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर अपने कमरे में जमीन पर बैठे हैं। उनके दोनों पैर फैले हैं। राम और केदार ने उन चरणकमलों को पुष्पमालाओं से शोभित किया है। श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हैं।

८ जून, १८८३ परिच्छेद ३८ २२७

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८ जून, १८८३ परिच्छेद ३८ २२७

केदार का भाव नवरसिक समाज का है। वे श्रीरामकृष्ण के चरणों के अँगूठों को पकड़े हुए हैं। उनकी धारणा है कि इससे शक्ति का संचार होगा। श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ हो कह रहे हैं, “माँ! अँगूठों को पकड़कर वह मेरा क्या कर सकेगा?”

केदार विनीत भाव से हाथ जोड़े बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण (केदार से भावावेश में) – कामिनी और कांचन पर तुम्हारा मन खिंचता है। मुँह से कहने से क्या होगा कि मेरा मन उधर नहीं है!

“आगे बढ़ चलो। चन्दन की लकड़ी के आगे और भी बहुतकुछ हैं, – चाँदी की खान – सोने की खान – फिर हीरे और माणिक। थोड़ीसी उद्दीपना हुई है, इससे यह मत सोचो कि सब कुछ हो गया।”

श्रीरामकृष्ण फिर अपनी माता से बातें कर रहे हैं। कहते हैं, “माँ! इसे हटा दो।”

केदार का कण्ठ सूख गया है। भयभीत हो राम से कहते हैं, “ये यह क्या कह रहे हैं?

राखाल को देखकर श्रीरामकृष्ण फिर भावाविष्ट हो रहे हैं। उन्हें पुकारकर कहते हैं, “मैं यहाँ बहुत दिनों से आया हूँ। तू कब आया?”

क्या श्रीरामकृष्ण इशारे से कहते हैं कि वे भगवान् के अवतार हैं और राखाल उनके एक अन्तरंग पार्षद?

□ □ □

परिच्छेद ३९

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परिच्छेद ३९

मणिरामपुर तथा बेलघर के भक्तों के साथ

(१)

श्रीमुख-कथित चरितामृत

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में कभी खड़े होकर, कभी बैठकर भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। आज रविवार, १० जून १८८३ ई., ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी है। दिन के दस बजे का समय होगा। राखाल, मास्टर, लाटू, किशोरी, रामलाल, हाजरा आदि अनेक व्यक्ति उपस्थित हैं।

श्रीरामकृष्ण स्वयं अपने चरित्र का वर्णन कर अपनी पूर्वकथा सुना रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – उस देश में बचपन में मुझे स्त्री-पुरुष सभी चाहते थे। सभी मेरा गाना सुनते थे। फिर मैं लोगों की नकल उतार सकता था – लोग मेरा नकल उतारना देखते और सुनते थे। उनके घर की बहू-बेटियाँ मेरे लिए खाने की चीजें रख देती थीं। कोई मुझ पर अविश्वास न करता था। सभी घर के लड़के जैसा मानते थे।

“परन्तु मैं सुख पर लट्टू था। अच्छा सुखी घर देखकर आया-जाया करता था। जिस घर पर दुःख-विपत्ति देखता था, वहाँ से भाग जाता था।

“लड़कों में किसी को भला देखने पर उससे प्रेम करता था। और किसी किसी के साथ गहरी मित्रता जोड़ता था। परन्तु अब वे घोर संसारी बन गए हैं। अब उनमें से कोई कोई यहाँ पर आते हैं, आकर कहते हैं, ‘वाह खूब! पाठशाला में भी जैसा देखा, यहाँ पर भी वैसा ही देख रहे हैं।’

“पाठशाला में हिसाब देखकर सिर चकराता था, परन्तु चित्र अच्छा खींच सकता था और अच्छी मूर्तियाँ गढ़ सकता था।

“जहाँ भी सदावर्त, धर्मशाला देखता था वहीं पर जाता था – जाकर बहुत देर तक खड़ा देखता रहता था।

“कहीं पर रामायण या भागवत की कथा होने पर बैठकर सुनता था, परन्तु यदि कोई मुँह-हाथ बनाकर पढ़ता, तो उसकी नकल उतारता था और लोगों को सुनाता था।

“औरतों का चालचलन खूब समझ सकता था। उनकी बातें, स्वर आदि की नकल

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१० जून, १८८३ परिच्छेद ३९ २२९

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१० जून, १८८३ परिच्छेद ३९ २२९

उतारता था।

“बदचलन औरतों को पहचान सकता था। विधवा है - पर सिर पर सीधी माँग है और बड़ी लगन से शरीर पर तेल की मालिश कर रही है। लज्जा कम, बैठने का ढंग ही दूसरा है।

“रहने दो विषयी लोगों की बातें!”

रामलाल को गाना गाने के लिए कह रहे हैं। रामलाल गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “रणांगण में यह कौन मेघवर्ण नारी नाच रही है? मानो रुधिर-सरोवर में नवीन नलिनी तैर रही हो।”

अब रामलाल रावण-वध के बाद मन्दोदरी के विलाप का गाना गा रहे हैं -

(भावार्थ) - “हे कान्त, अबला के प्राणप्रिय, यह तुमने क्या किया! प्राणों का अन्त हुए बिना तो अब शान्ति नहीं मिलेगी! स्वर्णपुरी के सम्राट् होते हुए भी तुम आज धरती पर लेटे हो - यह देखकर भला तुम्हारी भार्या कैसे धीरज धर सकती है! स्वयं यमराज जहाँ दासत्व करें इतना बड़ा आधिपत्य स्वर्ग, मर्त्य, पाताल में और किसी का देखा गया है? जो इन्द्रादि की भी अधिश्वरी थी, वह तुम्हारी रानी आज संसार में भिखारिन बन गयी! उन नवीन जटाधारी वनविहारी को मनुष्य समझने के कारण तुमने सब कुछ खो डाला। स्वयं ब्रह्मा और ईशान जिनके चरणों की अभिलाषा रखते हैं, उन राम को हे राजा, तुमने माना ही नहीं। तुमने तो सुना था कि उनके चरण-स्पर्श से पाषाण भी नारी बन जाता है।”

आखिर का गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण आँसू बहा रहे हैं और कह रहे हैं - “मैने झाऊतल्ले में शौच जाते समय सुना था, नाव के माँझी नाव में यही गाना गा रहे हैं। वहाँ जब तक बैठा रहा, केवल रो रहा था। लोग पकड़कर मुझे कमरे में लाए थे।”

फिर गाना चलने लगा -

(भावार्थ) - “सुना है राम तारकब्रह्म हैं, जटाधारी राम मनुष्य नहीं हैं। हे पिताजी, क्या वंश का नाश करने के लिए उनकी सीता को चुराया है?”

अक्रूर श्रीकृष्ण को रथ पर बैठाकर मथुरा ले जा रहे हैं। यह देख गोपियों ने रथचक्रों को जकड़कर पकड़ लिया है और उनमें से कोई कोई रथचक्र के सामने लेट गयी हैं। वे अक्रूर पर दोषारोपण कर रही हैं। वे नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण अपनी ही इच्छा से जा रहे हैं।

(भावार्थ) - “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो। क्या रथ चक्र से चलता है? जिनके चक्र से जगत् चलता है वे हरि ही इस चक्र के चक्री है।”

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) - अहा, गोपियों का यह कैसा प्रेम! श्रीमती राधिका ने अपने हाथ से श्रीकृष्ण का चित्र अंकित किया है, परन्तु पैर नहीं बनाया, कहीं वे वृन्दावन से मथुरा न भाग जाएँ!

“मैं इन सब गानों को बचपन में खूब गाता था। एक एक नाटक सारा का सारा गा

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२३०श्रीरामकृष्णवचनामृत१० जून, १८८३

सकता था। कोई कहता था कि मै कालीयदमन नाटक-दल में था।”

एक भक्त नयी चद्दर ओढ़कर आए हैं। राखाल का बालक जैसा स्वभाव है - कैंची लाकर उनकी चद्दर के किनारे के सूतों को काटने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोले, “क्यों काटता है? रहने दे। शाल की तरह अच्छा दिखायी देता है। हाँ जी, इसका क्या दाम है?” उन दिनों विलायती चद्दरों का दाम कम था। भक्त ने कहा, “एक रुपया छः आना जोड़ी।” श्रीरामकृष्ण बोले, “क्या कहते हो! जोड़ी! एक रुपया छः आना जोड़ी!”

थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण भक्त से कह रहे हैं, “जाओ, गंगा स्नान कर लो! अरे, इन्हें तेल दो तो थोड़ा'!”

स्नान के बाद जब वे लौटे तो श्रीरामकृष्ण ने ताक पर से एक आम लेकर उन्हे दिया। कहा, “यह आम इन्हें देता हूँ। तीन डिग्रियाँ पास हैं ये! अच्छा, तुम्हारा भाई अब कैसा है?”

भक्त – हाँ, दवा तो ठीक हो रही है, अब असर ठीक हो तो ठीक है!

श्रीरामकृष्ण – उसके लिए किसी नौकरी की व्यवस्था कर सकते हो? बुरा क्या है, तुम मुखिया बनोगे!

भक्त – स्वस्थ होने पर सभी सुविधाएँ हो जाएँगी।

(२)

साधन-भजन करो और व्याकुल होओ

श्रीरामकृष्ण भोजन के उपरान्त छोटे तख्त पर जरा बैठे हैं – अभी विश्राम करने का समय नहीं हुआ था। भक्तों का समागम होने लगा। पहले मणिरामपुर से भक्तों का एक दल आकर उपस्थित हुआ। एक व्यक्ति पी. डब्ल्यू. डी. में काम करते थे। इस समय पेन्शन पाते हैं। एक भक्त उन्हें लेकर आए हैं। धीरे धीरे बेलघर से भक्तों का एक दल आया। श्री मणि मल्लिक आदि भक्तगण भी धीरे धीरे आ पहुँचे।

मणिरामपुर के भक्तों ने कहा, “आपके विश्राम में विघ्न हुआ।”

श्रीरामकृष्ण बोले, “नहीं, नहीं, यह तो रजोगुण की बातें हैं कि वे अब सोएँगे।”

चाणक मणिरामपुर का नाम सुनकर श्रीरामकृष्ण को अपने बचपन के मित्र श्रीराम का स्मरण हुआ। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “श्रीराम की दूकान तुम्हारे वहीं पर है। श्रीराम मेरे साथ पाठशाला में पढ़ता था। थोड़े दिन हुए यहाँ पर आया था।”

मणिरामपुर के भक्तगण कह रहे हैं, “दया करके हमें जरा बता दीजिए कि किस उपाय से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।”

श्रीरामकृष्ण – थोड़ा साधन-भजन करना होता है। 'दूध में मक्खन है' केवल कहने से ही नहीं होता, दूध से दही बनाकर, मथन करके मक्खन उठाना पड़ता है। परन्तु बीच

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बीच में जरा निर्जन में रहना चाहिए।* कुछ दिन निर्जन में रहकर भक्ति प्राप्त करके उसके बाद फिर कहीं भी रहो। पैर में जूता पहनकर काँटेदार जंगल में भी आसानी से जाया जा सकता है।

“मुख्य बात है विश्वास। जैसा भाव वैसा लाभ, मूल बात है विश्वास। विश्वास हो जाने पर फिर भय नहीं होता।”

मणिरामपुर के भक्त – महाराज, गुरु क्या आवश्यक ही है?

श्रीरामकृष्ण – अनेकों के लिए आवश्यक है।† परन्तु गुरुवाक्य में विश्वास करना पड़ता है। गुरु को ईश्वर मानना पड़ता है। तभी लाभ होता है। इसीलिए वैष्णव भक्त कहते हैं, – गुरु-कृष्ण-वैष्णव।

“उनका नाम सदा ही लेना चाहिए। कलि में नाम का माहात्म्य है। प्राण अन्नगत है, इसीलिए योग नहीं होता। उनका नाम लेकर ताली बजाने से पापरूपी पक्षी भाग जाते हैं।

“सत्संग सदा ही आवश्यक है। गंगाजी के जितने ही निकट जाओगे, उतनी ही ठण्डी हवा पाओगे। आग के जितने ही निकट जाओगे उतनी ही गर्मी होगी।

“सुस्ती करने से कुछ नहीं होगा। जिनकी सांसारिक विषयभोग की इच्छा है, वे कहते हैं, ‘होगा! कभी न कभी ईश्वर को प्राप्त कर लेंगे।’

“मैंने केशव सेन से कहा था, पुत्र को व्याकुल देखकर उसके पिता उसके बालिग होने के तीन वर्ष पहले ही उसका हिस्सा छोड़ देते हैं।

“माँ भोजन बना रही है, गोदी का बच्चा सो रहा है। माँ मुँह में चूसनी दे गयी है। जब चूसनी छोड़कर चीत्कार करके बच्चा रोता है, तब माँ हण्डी उतारकर बच्चे को गोदी में लेकर स्तनपान कराती है। ये सब बातें मैंने केशव सेन से कही थीं।

“कहते हैं, कलियुग में एक दिन एक रात भर रोने से ईश्वर का दर्शन होता है।

“मन में अभिमान करो और कहो, ‘तुमने मुझे पैदा किया है – दर्शन देना ही होगा!’

“गृहस्थी में रहो, अथवा कहीं भी रहो, ईश्वर मन को देखते हैं। विषयबुद्धिवाला मन मानो भीगी दियासलाई है, चाहे जितना रगड़ो कभी नहीं जलेगी। एकलव्य ने मिट्टी के बने द्रोण अर्थात् अपने गुरु की मूर्ति को सामने रखकर बाण चलाना सीखा था।

“कदम बढ़ाओ, – लकड़हारे ने आगे बढ़कर देखा था चन्दन की लकड़ी, चाँदी की खान, सोने की खान, और आगे बढ़कर देखा हीरा-मणि!

“जो लोग अज्ञानी हैं, वे मानो मिट्टी की दीवालवाले कमरे के भीतर हैं। भीतर भी


* योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः – गीता, ६.१०
† आचार्यवान् पुरुषो वेद। – छान्दोग्य उपनिषद ६। १४। २

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२३२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १० जून, १८८३

रोशनी नहीं है और बाहर की किसी चीज को भी देख नहीं सकते! ज्ञान प्राप्त करके जो लोग संसार में रहते हैं वे मानो काँच के बने कमरे के भीतर हैं। भीतर रोशनी, बाहर भी रोशनी; भीतर की चीजों को भी देख सकते हैं और बाहर की चीजों को भी!

ब्रह्म और जगन्माता एक हैं

“एक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे परब्रह्म जब तक 'मैं-पन' को रखते हैं, तब तक दिखाते हैं कि वे आद्याशक्ति के रूप में सृष्टि, स्थिति व प्रलय कर रहे हैं।

“जो ब्रह्म हैं, वे ही आद्याशक्ति हैं। एक राजा ने कहा था कि उसे एक ही बात में ज्ञान देना होगा। योगी ने कहा, 'अच्छा, तुम एक ही बात में ज्ञान पाओगे।' थोड़ी देर बाद राजा के यहाँ अकस्मात् एक जादूगर आ पहुँचा। राजा ने देखा, वह आकर सिर्फ दो उँगलियों को घुमा रहा है, कह रहा है, 'राजा यह देख, यह देख।' राजा विस्मित होकर देख रहा है! थोड़ी ही देर में दो उँगलियों की जगह एक ही उँगली रह गयी है। जादूगर एक उँगली घुमाता हुआ कह रहा है, 'राजा, यह देख, यह देख।' अर्थात् ब्रह्म और आद्याशक्ति पहले-पहल दो समझे जाते हैं, परन्तु ब्रह्मज्ञान होने पर फिर दो नहीं रह जाते। अभेद! एक! एक! अद्वितीय! अद्वैत!”

(३)

माया तथा मुक्ति

बेलघर से गोविन्द मुखोपाध्याय आदि भक्तगण आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन उनके मकान पर पधारे थे, उस दिन गायक का “जागो, जागो, जननि” यह गाना सुनकर समाधिस्थ हुए थे। गोविन्द उस गायक को भी लाए हैं। श्रीरामकृष्ण गायक को देख आनन्दित हुए हैं और कह रहे हैं, “तुम कुछ गाना गाओ।” गायक इस आशय के गीत गा रहे हैं -

(१) “दोष किसी का नहीं है, माँ! मैं अपने ही खोदे हुए कुएँ के जल में डूबकर मर रहा हूँ।”

(२) “रे यम! मुझे न छूना, मेरी जात बिगड़ गयी है। यदि पूछता है कि मेरी जात कैसी बिगड़ी तो सुन, - उस सत्यानासी काली ने मुझे संन्यासी बना दिया है।”

(३) “जागो, जागो, जननि! कितने ही दिनों से कुलकुण्डलिनी मूलाधार में सो रही है। माँ, अपना काम साधने के लिए मस्तक में चलो, जहाँ पर सहस्रदल-पद्म में परमशिव विराजमान हैं। षट्चक्र को भेदकर, हे चैतन्यरूपिणि, मन के दुःख को मिटा दो।”

श्रीरामकृष्ण - इस गीत में षट्चक्र-भेद की बात है। ईश्वर बाहर भी हैं, भीतर भी हैं। वे भीतर से मन में अनेक प्रकार की लहरें उत्पन्न कर रहे हैं। षट्चक्र का भेद होने पर

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माया का राज्य छोड़, जीवात्मा परमात्मा के साथ एक हो जाता है। इसी का नाम है ईश्वरदर्शन।

"माया के रास्ता न छोड़ने पर ईश्वर का दर्शन नहीं होता। राम, लक्ष्मण और सीता एक साथ जा रहे हैं। सब से आगे राम, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण हैं। जिस प्रकार सीता के बीच में रहने से लक्ष्मण राम को नहीं देख सकते, उसी प्रकार बीच में माया के रहने से जीव ईश्वर का दर्शन नहीं कर सकता। (मणि मल्लिक के प्रति) परन्तु ईश्वर की कृपा होने पर माया दरवाजे से हट जाती है, जिस प्रकार दरवान लोग कहते हैं, 'साहब की आज्ञा हो तो इसे अन्दर जाने दूँ।'*

"दो मत हैं – वेदान्त मत और पुराण मत। वेदान्त मत में कहा है, 'यह संसार धोखे की टट्टी है' अर्थात् जगत् भूल है, स्वप्न की तरह है; परन्तु पुराण मत या भक्तिशास्त्र कहता है कि ईश्वर ही चौबीस तत्त्व बनकर विद्यमान हैं। भीतर-बाहर उन्हीं की पूजा करो।

"जब तक उन्होंने 'मैं'-पन को रखा है, तब तक सभी हैं। फिर स्वप्नवत् कहने का उपाय नहीं है। नीचे आग जल रही है, इसीलिए बर्तन में दाल, चावल और आलू उबल रहे हैं, कूद रहे हैं और मानो कह रहे हैं, 'मैं हूँ' 'मैं कूद रहा हूँ'। यह शरीर मानो बर्तन है, मन-बुद्धि जल है, इन्द्रियों के विषय मानो दाल, चावल और आलू हैं, 'अहं' मानो उनका अभिमान है कि मैं उबल रहा हूँ और सच्चिदानन्द अग्नि हैं।

"इसीलिए भक्तिशास्त्र में इस संसार को 'मजे की कुटिया' कहा है। रामप्रसाद के गाने में है, 'यह संसार धोखे की टट्टी है।' इसीलिए एक ने जवाब दिया था, 'यह संसार मजे की कुटिया है।' 'काली का भक्त जीवन्मुक्त है, नित्यानन्दमय है।' भक्त देखता है, जो ईश्वर हैं, वे ही माया बने हैं, वे ही जीव-जगत् बने हैं। भक्त ईश्वर-माया-जीव-जगत् सब को एक देखता है। कोई कोई भक्त सभी कुछ राममय देखते हैं। राम ही सब बने हैं। कोई राधाकृष्णमय देखते हैं। कृष्ण ही ये चौबीस तत्त्व बने हुए हैं, जिस प्रकार हरा चश्मा पहनने पर सभी कुछ हरा हरा दिखायी देता है।

"भक्ति के मत में, शक्ति के प्रकाश की न्यूनाधिकता होती है। राम ही सब कुछ बने हुए हैं, परन्तु कहीं पर अधिक शक्ति है और कहीं पर कम। अवतार में उनका एक प्रकार का प्रकाश है और जीव में दूसरे प्रकार का। अवतार को भी देह और बुद्धि है। माया के कारण ही शरीर धारण कर सीता के लिए राम रोए थे। परन्तु अवतार जान-बूझकर अपनी आँखों पर पट्टी बाँधते हैं, जैसे लड़के चोर-चोर खेलते हैं और माँ के पुकारते ही खेल बन्द कर देते हैं। जीव की बात अलग है। जिस कपड़े से आँखों पर पट्टी बँधी हुई है, वह कपड़ा पीछे से आठ गाँठों से बड़ी मजबूती से बँधा हुआ है। अष्ट पाश* ! लज्जा,


* मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। – गीता ७।१४

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घृणा, भय, जाति, कुल, शील, शोक, जुगुप्सा (निन्दा) – ये आठ पाश हैं।* जब तक गुरु खोल नहीं देते, तब तक कुछ नहीं होता।”

(४)

सच्चे भक्त के लक्षण। व्याकुल होकर प्रार्थना करो। हठयोग : तथा राजयोग

बेलघर के भक्त – आप हम पर कृपा कीजिये।

श्रीरामकृष्ण – सभी के भीतर वे विद्यमान हैं, परन्तु गैस कम्पनी में अर्जी दो – तुम्हारे घर के साथ संयोग हो जाएगा।

“परन्तु व्याकुल होकर प्रार्थना करनी होगी। कहावत है, तीन प्रकार के प्रेम के आकर्षण एक साथ होने पर ईश्वर का दर्शन होता है, – सन्तान पर माता का प्रेम, सती स्त्री का स्वामी पर प्रेम और विषयी जीवों का विषय पर प्रेम।

“सच्चे भक्त के कुछ लक्षण हैं। वह गुरु का उपदेश सुनकर स्थिर हो जाता है; सँपेरे के संगीत को साधारण विषधर साँप स्थिर होकर सुनता है, परन्तु नाग नहीं। और दूसरा लक्षण, – सच्चे भक्त की धारणा-शक्ति होती है। केवल काँच पर चित्र खींचा नहीं जाता, किन्तु रसायनयुक्त काँच पर खींचा जाता है। जैसा फोटोग्राफ। भक्ति है वह रासायनिक द्रव्य।

“एक लक्षण और है। सच्चा भक्त जितेन्द्रिय होता है, कामजयी होता है। गोपियों में काम का संचार नहीं होता था।

“तुम लोग गृहस्थी में हो, रहो न, इससे साधन-भजन में और भी सुविधा है, मानो किले में से युद्ध करना। जिस समय शवसाधन करते हैं उस समय बीच बीच में शव मुँह खोलकर डराता है। इसलिए भुना हुआ चावल-चना रखना पड़ता है और उसके मुख में बीच बीच में देना पड़ता है। शव के शान्त होने पर निश्चिन्त होकर जप कर सकोगे। इसलिए घरवालों को शान्त रखना चाहिए। उनके खाने-पीने की व्यवस्था कर देनी पड़ती है, तब साधन-भजन की सुविधा होती है।

“जिनका भोग अभी कुछ बाकी है, वे गृहस्थी में रहकर ही ईश्वर का नाम लेंगे। नित्यानन्द कहा करते थे, ‘मागुर मांछेर झोल, युवती नारीर कोल, बोल हरि बोल!’ – हरिनाम लेने से मागुर मछली की रसदार तरकारी तथा युवती नारी तुम्हें मिलेगी।

“सच्चे त्यागी की बात अलग है। मधुमक्खी फूल के अतिरिक्त और किसी पर भी नहीं बैठेगी। चातक की दृष्टि में सभी जल निःस्वाद हैं। वह दूसरे किसी भी जल को नहीं


* घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पंचमी।
कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः।। – कुलार्णवतन्त्र

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पीएगा, केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा के लिए ही मुँह खोले रहेगा। सच्चा त्यागी अन्य कोई भी आनन्द नहीं लेगा, केवल ईश्वर का आनन्द। मधुमक्खी केवल फूल पर बैठती है। सच्चे त्यागी साधु मधुमक्खी की तरह होते है। गृही भक्त मानो साधारण मक्खियाँ हैं। मिठाई पर भी बैठती हैं और फिर सड़े घाव पर भी।

“तुम लोग इतना कष्ट करके यहाँ पर आए हो, तुम ईश्वर को ढूँढ़ते फिर रहे हो। अधिकांश लोग बगीचा देखकर ही सन्तुष्ट रहते हैं, मालिक की खोज बिरले ही लोग करते हैं। जगत् के सौन्दर्य को ही देखते हैं, इसके मालिक को नहीं ढूँढ़ते।”

श्रीरामकृष्ण (गानेवाले को दिखाकर) – इन्होंने षट्चक्र का गाना गाया। वह सब योग की बातें हैं। हठयोग और राजयोग। हठयोगी कुछ शारीरिक कसरतें करता है; सिद्धियाँ प्राप्त करना, लम्बी उम्र प्राप्त करना तथा अष्ट-सिद्धि प्राप्त करना, ये सब उद्देश्य हैं। राजयोग का उद्देश्य है भक्ति, प्रेम, ज्ञान, वैराग्य। राजयोग ही अच्छा है।

“वेदान्त की सप्तभूमि और योगशास्त्र के षट्चक्र आपस में बहुतकुछ मिलते-जुलते हैं। वेद की प्रथम तीन भूमियाँ और योगशास्त्र के मूलाधार, स्वाधिष्ठान तथा मणिपुर चक्र एक हैं। इन तीन भूमियों में – गुह्य, लिंग तथा नाभि में – मन का निवास है। जिस समय मन चौथी भूमि पर अर्थात् अनाहत पर उठता है, उस समय जीवात्मा का शिखा की तरह देदीप्यमान रूप में दर्शन होता है, और ज्योति का दर्शन होता है। साधक कह उठता है – ‘यह क्या! यह क्या!’

“मन के पाँचवीं भूमि में उठने पर केवल ईश्वर की ही बात सुनने की इच्छा होती है। यहाँ पर विशुद्ध चक्र है। षष्ठ भूमि और आज्ञा चक्र एक ही हैं। वहाँ पर मन के जाने से ईश्वर का दर्शन होता है। परन्तु वह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार लालटेन के भीतर रोशनी रहती है – छू नहीं सकते, क्योंकि बीच में काँच रहता है।

“जनक राजा पंचम भूमि पर से ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते थे। वे कभी पंचम भूमि पर और कभी षष्ठ भूमि पर रहते थे।

“षट्चक्रभेद के बाद सप्तम भूमि है। मन वहाँ जाने पर लीन हो जाता है। जीवात्मा परमात्मा एक हो जाते हैं; समाधि हो जाती है। देहबुद्धि चली जाती है, बाह्यज्ञान नहीं रहता, अनेकत्व का बोध नष्ट हो जाता है और विचार बन्द हो जाता है।

“त्रैलंग स्वामी ने कहा था, विचार करते समय ही अनेकता तथा विभिन्नता का बोध होता है। समाधि के बाद अन्त में इक्कीस दिन में मृत्यु हो जाती है।

“परन्तु कुण्डलिनी न जागने पर चैतन्य प्राप्त नहीं होता।

ईश्वर-दर्शन के लक्षण

“जिसने ईश्वर को प्राप्त किया है, उसके कुछ लक्षण हैं। वह बालक की तरह,

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२३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १० जून, १८८३

उन्मत्त की तरह, जड़ की तरह, या पिशाच की तरह बन जाता है और उसे सच्चा अनुभव होता है कि 'मैं यन्त्र हूँ और वे यन्त्री हैं। वे ही कर्ता हैं, और सभी अकर्ता हैं।' जिस प्रकार सिक्खों ने कहा था, पत्ता हिल रहा है, वह भी ईश्वर की इच्छा है। राम की इच्छा से ही सब कुछ हो रहा है - यह ज्ञान होता है। जैसे जुलाहे ने कहा था, 'राम की इच्छा से ही कपड़े का दाम एक रुपया छः आना है; राम की इच्छा से ही डकैती हुई; राम की इच्छा से ही डाकू पकडे गये; राम की इच्छा से ही पुलिसवाले मुझे ले गए और फिर राम की ही इच्छा से मुझे छोड़ दिया।"

सन्ध्या निकट थी, श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा भी विश्राम नहीं किया। भक्तों के साथ लगातार हरिकथा हो रही है। अब मणिरामपुर और बेलघर के तथा अन्य भक्तगण भूमिष्ठ होकर उन्हें प्रणाम कर देवालय में देवदर्शन के बाद अपने अपने स्थानों को लौटने लगे।

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परिच्छेद ४०

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परिच्छेद ४०

दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ

(१)

गृहस्थाश्रम के सम्बन्ध में उपदेश

आज गंगापूजा, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी, शुक्रवार का दिन है; तारीख १५ जून १८८३ ई.। भक्तगण श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में आए हैं। गंगापूजा के उपलक्ष्य में अधर और मास्टर को छुट्टी मिली है।

राखाल के पिता और पिता के ससुर आए हैं। पिता ने दूसरी बार विवाह किया है। ससुर महाशय श्रीरामकृष्ण का नाम बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं; वे साधक पुरुष हैं, श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें रुक-रुककर देख रहे हैं। भक्तगण जमीन पर बैठे हैं।

ससुर महाशय ने पूछा, "महाराज, क्या गृहस्थाश्रम में भगवान् का लाभ हो सकता है?"

श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – क्यों नहीं हो सकता? कीचड़ में रहनेवाली मछली की तरह रहो। वह कीचड़ में रहती है, पर उसके शरीर में कीचड़ नहीं लगता। और असती स्त्री की तरह रहो जो घर का सारा कामकाज करती है, पर उसका मन अपने उपपति की ओर ही रहता है। ईश्वर से मन लगाए रखकर गृहस्थी का सब काम करो। परन्तु यह है बड़ा कठिन। मैंने ब्राह्मसमाजवालों से कहा था कि जिस कमरे में इमली का अचार और पानी का मटका है, यदि उसी कमरे में सन्निपात का रोगी भी रहे तो बीमारी किस तरह दूर हो? फिर इमली की याद आते ही मुँह में पानी भर आता है। पुरुषों के लिए स्त्रियाँ इमली के अचार की तरह हैं। और विषय की तृष्णा तो सदा लगी ही है; यही पानी का मटका है। इस तृष्णा का अन्त नहीं है। सन्निपात का रोगी कहता है कि मैं एक मटका पानी पिऊँगा! बड़ा कठिन है। संसार में बहुत कठिनाईयाँ हैं। जिधर जाओ उधर ही कोई न कोई बला आ खड़ी हो जाती है। और निर्जन स्थान न होने के कारण भगवान् की चिन्ता नहीं होती। सोने को गलाकर गहना गढ़ाना है, तो यदि गलाते समय कोई दस बार बुलाए, तो सोना किस तरह गलेगा? चावल छाँटते समय अकेले बैठकर छाँटना होता है। हर बार चावल

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