श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२५
१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२५
आँगन से जाते हुए श्रीरामकृष्ण ने जरा श्रीराधाकान्त की आरती देखी। फिर काली-मन्दिर की ओर जाने लगे। जाते ही जाते हाथ उठाकर जगन्माता को पुकारने लगे – “माँ – ओ – माँ – ब्रह्ममयी!” मन्दिर के चबूतरे पर मूर्ति के सामने पहुँचकर भूमिष्ठ हो माता को प्रणाम करने लगे। माता की आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण मन्दिर में प्रवेश कर चामर लेकर व्यजन करने लगे।
आरती समाप्त हो गयी। जो लोग आरती देख रहे हैं, सब ने एक ही साथ भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने मन्दिर के बाहर आकर प्रणाम किया। महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों ने भी प्रणाम किया।
आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण को पूर्ण मात्रा में भावावेश हो गया। बाबूराम का हाथ पकड़कर मतवाले की तरह झूमते हुए अपने कमरे में जा रहे हैं।
कमरे के पश्चिमवाले गोल बरामदे में एक बत्ती जला दी गयी है।
श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में जाकर जरा बैठे। ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ कहते हुए अनेक प्रकार के तन्त्रोक्त बीज-मन्त्रों का भी उच्चारण कर रहे हैं।
कुछ देर पश्चात् कमरे में अपने आसन पर पूर्वांस्य होकर बैठे। भाव अभी भी पूर्ण मात्रा में हैं।
दोनों मुखर्जी भाई, बाबूराम आदि भक्त जमीन पर आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में माता से बातचीत कर रहे हैं। कहते हैं – ‘माँ, मैं कहूँ तब तू करे, यह भी कोई बात हैं? बातचीत करना क्या है – इशारा ही तो है। – कोई कहता है ‘मैं खाऊँगा’ – कोई कहता है, ‘जा, मैं न सुनूँगा।’
“अच्छा माँ, मान लो मैंने भले ही प्रकट रूप में यह न कहा हो कि मुझे भूख लगी है, तो क्या मुझे असल में भूख नहीं लगी है? क्या यह सम्भव है कि तुम केवल उसी की प्रार्थना सुनो जो जोर जोर से पुकारता है और उसकी न सुनो जो भीतर ही भीतर व्याकुलतापूर्वक प्रार्थना करता रहता है?
“तुम जो हो सो हो, फिर मैं क्यों बोलता हूँ, क्यों प्रार्थना करता हूँ?
“हाँ! जैसा कराती हो, वैसा करता हूँ।
“लो! सब गोलमाल हो गया! – क्यों विचार कराती हो?”
श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। – भक्तगण आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।
अब भक्तों पर श्रीरामकृष्ण की दृष्टि पड़ी।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्हें प्राप्त करने के लिए संस्कार चाहिए। कुछ किये रहना चाहिए। तपस्या – वह इस जन्म में ही हो या उस जन्म में।
“द्रौपदी का जब वस्त्रहरण किया गया था तब उसका विकल होकर रोना
६२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
श्रीठाकुरजी ने सुना था, तभी उन्होंने दर्शन दिये। और कहा, तुमने अगर किसी को कभी वस्त्र दिया हो तो याद करो, उससे लज्जा का निवारण होगा। द्रौपदी ने कहा एक ऋषि नहा रहे थे, उनका कौपीन बह गया था, मैंने अपने कपड़े से आधा फाड़कर उन्हें दिया था। श्रीठाकुरजी ने कहा, तो अब तुम कोई चिन्ता न करो।”
मास्टर श्रीरामकृष्ण के आसन के पूर्व की तरफ पाँवपोश पर बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम यह समझे?
मास्टर – जी, संस्कार की बात।
श्रीरामकृष्ण – एक बार कह तो जाओ, मैंने क्या कहा।
मास्टर – द्रौपदी नहाने गयी थी – आदि।
(हाजरा आये।)
(५)
क्या ईश्वर प्रार्थना सुनते हैं? साधना
हाजरा महाशय यहाँ दो साल से हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की जन्म-भूमि कामारपुकुर के पास सिऊड़ ग्राम में पहले-पहल उनके दर्शन किये थे, सन् १८८० ई. में। इस मौजे में श्रीरामकृष्ण के भांजे श्रीयुत हृदय मुखोपाध्याय रहते हैं। उस समय श्रीरामकृष्ण हृदय के यहाँ रहते थे।
सिऊड़ के पास मरागोड़ मौजे में हाजरा महाशय रहते हैं। उनके कुछ जमीन-जायदाद भी हैं। स्त्री-परिवार और लड़के-बच्चे भी हैं। घरगृहस्थी का काम किसी तरह चल जाता है। कुछ ऋण भी है, लगभग हजार रुपया होगा।
यौवनकाल से ही उनमें वैराग्य का भाव है। साधु कहाँ है, भक्त कहाँ है, यही सब खोजते फिरते थे। जब पहले-पहल दक्षिणेश्वर काली-मन्दिर में आये और वहाँ रहना चाहा तब श्रीरामकृष्ण ने उनके भक्तिभाव को देखकर, और उन्हें अपने देश का परिचित मनुष्य जानकर, यत्नपूर्वक अपने पास रख लिया।
हाजरा का ज्ञानियों जैसा भाव है। श्रीरामकृष्ण का भक्तिभाव और लड़कों के लिए उनकी व्याकुलता उन्हें पसन्द नहीं। कभी कभी वे श्रीरामकृष्ण को महापुरुष सोचते हैं और कभी कभी साधारण आदमी।
वे श्रीरामकृष्ण के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में आसन लगाकर बैठे हैं। वहीं माला लेकर बड़ी देर तक जप किया करते हैं। राखाल आदि भक्त अधिक जप नहीं करते, इसलिए लोगों से वे उनकी निन्दा किया करते हैं।
वे आचार का पक्ष बहुत लेते हैं। ‘आचार-आचार’ करके उन्हें एक तरह शुचिता का रोग हो गया है। उनकी उम्र ३८ साल की होगी।