श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
परिच्छेद ८५
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ८५
पण्डित शशधर को उपदेश
(१)
काली ही ब्रह्म है। ब्रह्म और शक्ति अभेद
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ अपने कमरे में जमीन पर बैठे हैं। पास ही शशधर पण्डित हैं। जमीन पर चटाई बिछी है, उस पर श्रीरामकृष्ण, पण्डित शशधर तथा कई भक्त बैठे हैं। कुछ लोग खाली जमीन पर ही बैठे हैं। सुरेन्द्र, बाबूराम, मास्टर, हरीश, लाटू, हाजरा, मणि मल्लिक आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण पण्डित पद्मलोचन की बात कह रहे हैं। पद्मलोचन बर्दवान महाराज के सभापण्डित थे। दिन का तीसरा पहर है, चार बजे का समय होगा।
आज सोमवार है, ३० जून, १८८४। छः दिन हो गये, जिस दिन रथयात्रा थी, उस दिन कलकत्ते में पण्डित शशधर के साथ श्रीरामकृष्ण की बातचीत हुई थी। आज पण्डितजी खुद आये हैं। साथ में श्रीयुत भूधर चट्टोपाध्याय और उनके बड़े भाई हैं। कलकत्ते में इन्हीं के मकान पर पण्डित शशधरजी रहते हैं।
पण्डितजी ज्ञानमार्गी हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें समझा रहे हैं – “नित्यता जिनकी है, लीला भी उन्हीं की है – जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं, उन्होंने लीला के लिए अनेक रूपों को धारण किया है।” भगवत्प्रसंग करते करते श्रीरामकृष्ण बेहोश होते जा रहे हैं। पण्डितजी से कह रहे हैं – “भैया, ब्रह्म सुमेरुवत् अटल और अचल हैं, परन्तु जिसमें न हिलने का भाव है उसमें हिलने का भाव भी है।”
श्रीरामकृष्ण प्रेम और आनन्द से मस्त हो गये हैं। सुन्दर कण्ठ से गाने लगे। एक के बाद दूसरा, इस तरह कई गाने गाये।
(गीतों का भाव) –
(१) कौन जानता है कि काली कैसी है? षड्दर्शन भी उनके दर्शन नहीं पाते ...।
(२) मेरी माँ किसी ऐसी-वैसी स्त्री की लड़की नहीं है। उसका नाम लेकर महेश्वर हलाहल पीकर भी बच गये। उसके कटाक्षमात्र से सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डों को वह अपने पेट में डाली हुई है। उसके चरणों की शरण लेकर देवता संकट
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
५४६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० जून, १८८४
से उद्धार पाते हैं। देवों के देव महादेव उसके पैरों के नीचे लोटते हैं।
(३) मेरी माँ में यह इतना ही गुण नहीं है कि वह शिव की सती है, नहीं, काल के काल भी उसे हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। नग्न होकर वह शत्रुओं का संहार करती है। महाकाल के हृदय में उसका वास है। अच्छा मन! कहो तो सही, भला वह कैसी है जो अपने पति के हृदय में भी पाद-प्रहार करती है! रामप्रसाद कहते हैं! माता की लीलाएँ समस्त बन्धनों से परे हैं। मन! सावधानी के साथ प्रयत्न करते रहो, इससे तुम्हारी मति शुद्ध हो जायगी।
(४) यह मैं सुरापान नहीं कर रहा हूँ, काली का नाम लेकर मैं सुधापान करता हूँ। वह सुधा मुझे ऐसी मस्त कर देती है कि लोग मुझे मतवाला कहते हैं। गुरु के दिये हुए बीज को लेकर, उसमें प्रवृत्ति का मसाला डाल, ज्ञानरूपी कलवार जब शराब खींचता है, तब मेरा मतवाला मन उसका पान करता है। यन्त्रों से भरे हुए मूल मन्त्र का शोधन करके वह 'तारा-तारा' कहा करता है। रामप्रसाद कहता है, ऐसी सुरा के पीने से चतुर्वर्गों की प्राप्ति होती है।
(५) श्यामा-धन क्या कभी सब को थोड़े ही मिलता है? बड़ी आफत है - यह नादान मन समझाने पर भी नहीं समझता। उन सुरंजित चरणों में प्राणों को सौंप देना शिव के लिए भी असाध्य है, तो साधारण जनों की बात ही क्या!
श्रीरामकृष्ण का भावावेश घट रहा है। गाना बन्द हो गया। वे थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे। फिर अपनी छोटी खाट पर जाकर बैठे।
पण्डितजी गाना सुनकर मुग्ध हो गये। बड़े ही विनयस्वर में श्रीरामकृष्ण से कहा - क्या और गाना न होगा?
श्रीरामकृष्ण कुछ देर बाद फिर गाने लगे -
(१) श्यामा के चरणरूपी आकाश में मेरे मन की पतंग उड़ रही थी। पाप की हवा के झोंके से वह चक्कर खाकर गिर गयी...।
(२) अब मुझे एक अच्छा भाव मिल गया है। यह भाव मैंने एक अच्छे भावुक से सीखा है। जिस देश में रात नहीं है, उसी देश का एक आदमी मुझे मिला है। मैं दिन और रात को कुछ नहीं समझता, सन्ध्या को तो मैंने वन्ध्या बना डाला है।
(३) तुम्हारे अभय चरणों में मैंने प्राणों को समर्पण कर दिया है। अब मैंने यम की चिन्ता नहीं रखी, न मुझे अब उसका कोई भय ही है। अपनी शिर-शिखा में मैंने काली-नाम के महामन्त्र की ग्रन्थि लगा ली है। भव की हाट में देह बेचकर मैं श्रीदुर्गा नाम खरीद लाया हूँ।
'श्रीदुर्गा-नाम खरीद लाया हूँ,' इस वाक्य को सुनकर पण्डितजी की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी। श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं -