श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२७ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १३ | ९३
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पूर्वकथा - शम्भु मल्लिक के साथ दानादि कर्मकाण्ड-सम्बन्ध में वार्तालाप
“शम्भु मल्लिक अस्पताल, दवाखाना, स्कूल, रास्ते, तालाब आदि बनवाने की बात कह रहा था। मैंने कहा, जो काम सामने आ पड़ा है, किए बिना नहीं चल सकता, उसी को निष्काम होकर करना चाहिए। जान-बूझकर ज्यादा कामों में उलझना ठीक नहीं – इससे ईश्वर का विस्मरण हो जाता है। कालीघाट में जाकर दान ही करने लग गए, काली के दर्शन हुए ही नहीं! (हास्य) पहले किसी तरह धक्काधुक्की खाकर भी कालीदर्शन कर लेना चाहिए, उसके बाद चाहे जितना दान करो या न करो, इच्छा हो तो खूब करो। ईश्वरलाभ के लिए ही कर्म है। इसीलिए शम्भु को कहा, अगर ईश्वर के दर्शन हों तो क्या तुम उनसे कहोगे कि कुछ अस्पताल और दवाखाने बनवा दो ? (हास्य) भक्त कभी इस प्रकार नहीं कहेगा। बल्कि वह तो कहेगा, 'प्रभो, मुझे अपने पादपद्मो में आश्रय दो, सदा अपने साथ रखो, अपने चरणकमलों के प्रति शुद्ध भक्ति दो'।
“कर्मयोग बड़ा कठिन है। शास्त्र में जिन कर्मों के बारे में कहा गया है, कलिकाल में उन्हें करना बड़ा कठिन है। लोग अन्नगतप्राण हैं – जीवन अन्न पर ही निर्भर है। अधिक कर्म करना सम्भव नहीं। बुखार होने पर यदि वैद्यजी से चिकित्सा करवाने जायें तो इधर रोगी खत्म हो जाता है। अधिक देरी सहन नहीं होती। आजकल डी. गुप्त का जमाना है। कलियुग में उपाय है भक्तियोग – भगवान् का नामगुणगान और प्रार्थना। भक्तियोग ही युगधर्म है। (ब्राह्मभक्तों के प्रति) तुम लोगों का मार्ग भी भक्तिमार्ग ही है, तुम लोग हरिनामसंकीर्तन करते हो, जगदम्बा का नामगुणगान करते हो, तुम धन्य हो! तुम्हारा भाव बहुत अच्छा है। वेदान्तवादियों की तरह तुम लोग संसार को स्वप्नवत् नहीं मानते। तुम उस तरह के ब्रह्मज्ञानी नहीं हो, तुम भक्त हो। तुम ईश्वर को व्यक्ति (Person) मानते हो, यह भी अच्छा भाव है। तुम लोग भक्त हो। व्याकुल होकर ईश्वर को पुकारने से उनके दर्शन अवश्य पाओगे।”
(१०)
सुरेन्द्र के मकान पर नरेन्द्र आदि के साथ
अब जहाज कोयलाघाट लौट आया। सब लोग उतरने की तैयारी करने लगे। कमरे से बाहर निकलते ही सब ने देखा, कोजागरी पूर्णिमा का पूर्णचन्द्र हँस रहा है, भागीरथी के जल पर मानो उसकी ज्योत्स्ना का लीलाविलास चल रहा है। श्रीरामकृष्ण के लिए गाड़ी मँगवायी गयी। कुछ देर बाद मास्टर और एक-दो भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण गाड़ी में बैठे। केशव के भतीजे नन्दलाल भी गाड़ी में बैठे, थोड़ी दूर तक साथ जाएँगे।
जब सब जन गाड़ी में बैठ गए तब श्रीरामकृष्ण ने पूछा, “वे कहाँ हैं?” अर्थात् केशव कहाँ हैं? देखते ही देखते केशव आ खड़े हुए। चेहरे पर मुस्कान थी। आकर
९४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ अक्टूबर, १८८२
पूछा, “कौन कौन साथ जा रहे हैं?” गाड़ी में सब के बैठ जाने पर केशव ने भूमिष्ठ होकर श्रीरामकृष्ण की पदधूलि ग्रहण की। श्रीरामकृष्ण ने भी स्नेहपूर्ण शब्दों में विदा ली।
गाड़ी चलने लगी। यह अंग्रेजों का मुहल्ला है। सुन्दर राजमार्ग है। दोनों ओर सुन्दर सुन्दर इमारतें हैं। पूर्णचन्द्र उदित हुआ है; इमारतें मानो चन्द्र की विमल, शीतल किरणों में विश्राम कर रही हैं। दरवाजों पर गैसबत्तियाँ, कमरों के भीतर दीपमालाएँ जगमगा रही हैं। जगह जगह पर हारमोनियम-पियानो के साथ अंग्रेज महिलाएँ गा रही हैं। श्रीरामकृष्ण आनन्द से मृदु हास्य करते हुए जा रहे हैं। एक जगह एकाएक बोल उठे, “मुझे प्यास लग रही है, क्या किया जाय?” नन्दलाल ने इण्डिया क्लब के पास गाड़ी रुकवायी और ऊपर जाकर काँच के गिलास में पानी ले आए। श्रीरामकृष्ण ने मुसकराते हुए पूछा, “गिलास धोया है न?” नन्दलाल के “हाँ” कहने पर श्रीरामकृष्ण ने उस गिलास का पानी पी लिया।
आपका बालक जैसा स्वभाव है। गाड़ी के चलने लगते ही बाहर झाँककर आसपास के मनुष्य, गाड़ी-घोड़े, चाँदनी आदि देखने लगे। हर एक बात में आनन्दित हो रहे हैं।
नन्दलाल कलुटोला में उतरे। श्रीरामकृष्ण की गाड़ी सिमुलिया स्ट्रीट में श्री सुरेश मित्र के मकान के सामने आ पहुँची। श्रीरामकृष्ण इन्हें सुरेन्द्र कहा करते थे। सुरेन्द्र श्रीरामकृष्ण के परम भक्त हैं।
परन्तु सुरेन्द्र घर में नहीं हैं। अपने नये बगीचे में गए हैं। घर के लोगों ने बैठने के लिए नीचे का कमरा खोल दिया। गाड़ी का किराया देना होगा। कौन देगा ? अगर सुरेन्द्र होते तो वे ही देते। श्रीरामकृष्ण ने एक भक्त से कहा, “किराया घर की स्त्रियों से माँग लो न! क्या वे नहीं जानतीं कि उनके पति वहाँ आया-जाया करते हैं?” (सब हँसते हैं।)
नरेन्द्र उसी मुहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को बुला लाने कहा। घरवालों ने श्रीरामकृष्ण को दूसरे मंजले पर ले जाकर बैठाया। कमरे की फर्श पर बिछायत बिछी हुई है, उस पर दो-चार तकिये रखे हैं। दीवार पर सुरेन्द्र के द्वारा विशेष प्रयत्नपूर्वक बनवावाया हुआ तैलचित्र है, जिसमें श्रीरामकृष्ण केशव को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध आदि सब धर्म तथा वैष्णव, शाक्त, शैव आदि सब सम्प्रदायों का समन्वय दिखला रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण प्रसन्न बैठकर मुसकराते हुए बातचीत कर रहे हैं। इतने में नरेन्द्र आ पहुँचे। अब तो श्रीरामकृष्ण का आनन्द मानो द्विगुणित हो उठा। आपने कहा, “आज केशव सेन के साथ जहाज में बैठकर घूमने गया था। विजय था, ये सब लोग थे।” मास्टर को निर्देशित करते हुए कहा, “इनसे पूछो, विजय और केशव को मैंने कैसे माँ-बेटी का मंगलवार, जटिला-कुटिला के बिना लीला की पुष्टि नहीं होती – ये सब बातें कहीं। (मास्टर से) क्यों जी?”
मास्टर – जी हाँ।
रात हो गयी पर अब भी सुरेन्द्र नहीं लौटे। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जाएँगे, अब
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२७ अक्टूबर, १८८२ परिच्छेद १३ ९५
अधिक देर नहीं की जा सकती, रात के साढ़े दस बज गए हैं। राह में चन्द्रमा का प्रकाश छाया है।
गाड़ी आयी। श्रीरामकृष्ण चढ़े। नरेन्द्र और मास्टर ने उन्हें प्रणाम किया और दोनों कलकत्ते में अपने अपने घर लौटे।
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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar