श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२८ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९३ ६५१
२८ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९३ ६५१
निकलने लगते है, फिर और किसी तरह के फूल, मानो फुलझड़ियों का छूटना बन्द ही नहीं होता।
“एक तरह के अनार और हैं। आग लगाने से थोड़ी ही देर के बाद वह भुस्स से फूट जाते हैं। उसी तरह बहुत प्रयत्न करके साधारण आदमी अगर ऊपर चला भी जाता है तो फिर वह लौटकर खबर नहीं देता। जीवकोटि के जो हैं, बहुत प्रयत्न करने पर उन्हें समाधि हो सकती है, परन्तु समाधि के बाद न वे नीचे उतर सकते हैं और न उतरकर खबर ही दे सकते हैं।
“एक हैं नित्यसिद्ध की तरह। वे जन्म से ही ईश्वर की चाह रखते हैं, संसार की कोई चीज उन्हें अच्छी नहीं लगती। वेदों में होमापक्षी की कथा है। यह चिड़िया आकाश में बहुत ऊँचे पर रहती हैं। वहीं वह अण्डे भी देती है। इतनी ऊँचाई पर रहती है कि अण्डा बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते गिरते अण्डा फूट जाता है। तब बच्चा गिरता रहता है। बहुत दिनों तक लगातार गिरता रहता है। गिरते ही गिरते उसकी आँखें भी खुल जाती हैं। जब मिट्टी के समीप पहुँच जाता हैं, तब उसे ज्ञान होता हैं। तब वह समझ लेता है कि देह में मिट्टी के छू जाने से ही जान जायगी। तब वह चीख मारकर अपनी माँ की ओर उड़ने लगता है। मिट्टी से मृत्यु होगी, इसीलिए मिट्टी देखकर भय हुआ है। अब अपनी माँ को चाहता है। माँ उस ऊँचे आकाश में है। उसी ओर बेतहाशा उड़ने लगता है, फिर दूसरी ओर दृष्टि नहीं जाती।
“अवतारों के साथ जो आते हैं, वे नित्यसिद्ध होते हैं, कोई अन्तिम जन्मवाले होते हैं।
(विजय से) “तुम लोगों को दोनों ही है, योग भी है और भोग भी। जनक राजा को योग भी था और भोग भी था। इसीलिए उन्हें लोग राजर्षि कहते हैं। राजा और ऋषि दोनों ही। नारद देवर्षि हैं, और शुकदेव ब्रह्मर्षि।
“शुकदेव ब्रह्मर्षि हैं, शुकदेव ज्ञानी नहीं, पुञ्जीकृत ज्ञान की मूर्ति हैं। ज्ञानी किसे कहते हैं? जिसे प्रयत्न करके ज्ञान हुआ हैं। शुकदेव ज्ञान की मूर्ति हैं, अर्थात् ज्ञान की जमायी हुई राशि है। यह ऐसे ही हुआ है, साधना करके नहीं।”
बातें कहते हुए श्रीरामकृष्ण की साधारण दशा हो गयी है। अब भक्तों से बातचीत कर सकेंगे।
केदार से उन्होंने संगीत गाने के लिए कहा। केदार गा रहे हैं। उन्होंने कई गाने गाये। एक का भाव नीचे दिया जाता है -
“देह में गौरांग के प्रेम की तरंगें लग रही हैं। उनकी हिलोरों में दुष्टों की दुष्टता बह जाती है। यह ब्रह्माण्ड तलातल को पहुँच जाता है। जी में आता है, डुबकर नीचे बैठा रहूँ परन्तु वहाँ भी गौरांग-प्रेम-रूपी घड़ियाल से जी नहीं बचता, वह निगल जाता है। ऐसा
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सहानुभूतिपूर्ण और कौन है, जो हाथ पकड़कर खींच ले जाय?”
गाना हो जाने पर श्रीरामकृष्ण फिर भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। श्रीयुत केशव सेन के भतीजे नन्दलाल वहाँ मौजूद थे। वे अपने दो-एक ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण के पास ही बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (विजय आदि भक्तों से) – कारण (शराब) की बोतल एक आदमी ले आया था, मैं छूने गया, पर मुझसे छुई न गयी।
विजय – अहा!
श्रीरामकृष्ण – सहजानन्द के होने पर यों ही नशा हो जाता है। शराब पीनी नहीं पड़ती। माँ का चरणामृत देखकर मुझे नशा हो जाता है, ठीक उतना जितना पाँच बोतल शराब पीने से होता है।
ज्ञानी तथा भक्त की अवस्था
“इस अवस्था में सब समय सब तरह का भोजन नहीं खाया जाता।”
नरेन्द्र – खाने-पीने के लिए जो कुछ मिला, वही बिना विचार के खाना अच्छा है।
श्रीरामकृष्ण – यह बात एक विशेष अवस्था के लिए है। ज्ञानी के लिए किसी में दोष नहीं। गीता के मत से ज्ञानी खुद नहीं खाता, वह कुण्डलिनी को आहुति देता है।
“यह बात भक्त के लिए नहीं है। मेरी इस समय की अवस्था यह है कि ब्राह्मण का लगाया भोग न हो तो मैं नहीं खा सकता। पहले ऐसी अवस्था थी कि दक्षिणेश्वर के उस-पार से मुर्दों के जलने की जो बू आती थी, उसे मैं नाक से खींच लेता था – वह बड़ी मीठी लगती थी। पर अब सब के हाथ का नहीं खा सकता।
“और सचमुच नहीं खा सकता, यद्यपि कभी कभी खा भी लेता हूँ। केशव सेन के यहाँ मुझे नववृन्दावन नाटक दिखाने ले गये थे। पूड़ियाँ और पकौड़ियाँ ले आये। न मालूम धोबी ले आया था या नाई। (सब हँसते हैं।) मैंने खूब खाया। राखाल ने कहा, जरा और खाओ।
(नरेन्द्र से) “तुम्हारे लिए इस समय यह चल सकता है। तुम इधर भी और उधर भी हो। इस समय तुम सब खा सकते हो।
(भक्तों से) “शूकर-मांस खाकर भी अगर किसी का ईश्वर की ओर झुकाव हो, तो वह धन्य है और निरामिष-भोजन करने पर भी अगर किसी का मन कामिनी और कांचन पर लगा रहे, तो उसे धिक्कार है।
“मेरी इच्छा थी कि लोहारों के यहां की दाल खाऊँ बचपन की बात है। लोहार कहते थे, ब्राह्मण क्या खाना पकाना जाने? खैर, मैंने खाया, परन्तु उसमें लोहारी बू मिल रही थी। (सब हँसते हैं।)