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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ३९

५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ३९

ही निकल पड़े। राह में दामोदर नदी थी। नाव नहीं थी, - तैरकर ही उस पार चले गए। विवाह की रात्रि को गीले कपड़ों में माँ के सामने जा पहुँचे, कहा, 'माँ, मैं आ गया।'

विद्यासागर के साथ श्रीरामकृष्ण का वार्तालाप

श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हो रहे हैं और थोड़ी देर के लिए उसी दशा में खड़े हैं। भाव सम्हालने के लिए बीच बीच में कहते हैं कि पानी पीऊँगा। इस बीच में घर के लड़के और आत्मीय बन्धु भी आकर खड़े हो गए।

श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट होकर बेंच पर बैठते हैं। एक सत्रह-अठारह वर्ष का लड़का उस पर बैठा है - विद्यासागर के पास सहायता माँगने आया है। श्रीरामकृष्ण भावाविष्ट हैं - ऋषि की अन्तर्दृष्टि लड़के के सब मनोभाव ताड़ गयी। आप कुछ सरककर बैठे और भावावेश में कहने लगे, "माँ इस लड़के की संसार में बड़ी आसक्ति है, और तुम्हारे अविद्या के संसार पर! यह अविद्या का लड़का है।"

जो ब्रह्मविद्या के लिए व्याकुल नहीं है, केवल अर्थकरी विद्या का उपार्जन करना उसके लिए व्यर्थ है - कदाचित् आप यही कह रहे हैं।

विद्यासागर ने व्यग्र होकर किसी से पानी लाने को कहा और मास्टर से पूछा, "कुछ मिठाई लाऊँ, क्या ये खाएँगे?" मास्टर ने कहा, "जी हाँ, ले आइये।" विद्यासागर जल्दी से भीतर जाकर कुछ मिठाइयाँ ले आए और कहा कि ये बर्दवान से आयी हैं। श्रीरामकृष्ण को कुछ खाने को दी गयी; हाजरा और भवनाथ ने भी कुछ पायी। जब मास्टर की बारी आयी तो विद्यासागर ने कहा, "वह तो घर ही का लड़का है, उसके लिए चिन्ता नहीं।" श्रीरामकृष्ण एक भक्त लड़के के बारे में विद्यासागर से कह रहे हैं, जो सामने ही बैठा था। आपने कहा, "यह लड़का बड़ा अच्छा है, और इसके भीतर सार है, जैसे फल्गु नदी; ऊपर तो रेत है, पर थोड़ा खोदने से ही भीतर पानी बहता दिखायी देता है।"

मिठाई पा चुकने के बाद आप हँसते हुए विद्यासागर से बातचीत कर रहे हैं। देखते ही देखते कमरा दर्शकों से भर गया; कोई बैठा है, कोई खड़ा है।

श्रीरामकृष्ण - आज सागर से आ मिला। इतने दिन खाई, सोता और अधिक से अधिक हुआ तो नदी देखी, पर अब सागर देख रहा हूँ। (सब हँसते हैं।)

विद्यासागर - तो थोड़ा खारा पानी लेते जाइये। (हास्य)

श्रीरामकृष्ण - नहीं जी, खारा पानी क्यों? तुम तो अविद्या के सागर नहीं, विद्या के सागर हो! (सब हँसे।) तुम क्षीरसमुद्र हो! (सब हँसे।)

विद्यासागर - आप जो चाहें कह सकते हैं।

सात्त्विक कर्म। दया और सिद्धपुरुष

विद्यासागर चुप रहे। श्रीरामकृष्ण फिर कहने लगे -

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४०श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

“तुम्हारा कर्म सात्त्विक कर्म है। यह सत्त्व का रजस् है। सत्त्वगुण से दया होती है। दया से जो कर्म किया जाता है, वह है तो राजसिक कर्म सही, पर यह रजोगुण सत्त्व का रजोगुण है, इसमें दोष नहीं है। शुकदेव आदि ने लोकशिक्षा के लिए दया रख ली थी – ईश्वर के विषय में शिक्षा देने के लिए। तुम विद्यादान और अन्नदान कर रहे हो – यह भी अच्छा है। निष्काम रीति से कर सको तो इससे ईश्वर-लाभ होगा। कोई करता है नाम के लिए, कोई पुण्य के लिए – उनका कर्म निष्काम नहीं।

“फिर सिद्ध तो तुम हो ही।”

विद्यासागर – महाराज, यह कैसे?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – आलू-परवल सिद्ध होने से (पक जाने से) नरम हो जाते हैं – सो तुम भी बहुत नर्म हो। तुम्हारी ऐसी दया! (हास्य)

विद्यासागर (सहास्य) – पीसा उरद तो सिद्ध होने पर सख्त हो जाता है। (सब हँसे।)

श्रीरामकृष्ण – तुम वैसे क्यों होने लगे? खाली पण्डित कैसे हैं – मानो एक पके फल का अंश जो अन्त तक कठिन ही रह जाता है। वे न इधर के हैं न उधर के। गीध खूब ऊँचा उड़ता है, पर उसकी नजर हड़वार पर ही रहती है। जो खाली पण्डित हैं, वे सुनने के ही हैं, पर उनकी कामिनी-कांचन पर आसक्ति होती है – गीध की तरह वे सड़ी लाशें ढूँढ़ते हैं। आसक्ति का घर अविद्या के संसार में है। दया, भक्ति, वैराग्य – ये विद्या के ऐश्वर्य हैं।

विद्यासागर चुपचाप सुन रहे हैं। सभी टकटकी बाँधे इस आनन्दमय पुरुष को देख रहे हैं, उनका वचनामृत पान कर रहे हैं।

(३)

श्रीरामकृष्ण : ज्ञानयोग अथवा वेदान्त-विचार

विद्यासागर बड़े विद्वान् हैं। जब संस्कृत कालेज में पढ़ते थे तब अपनी श्रेणी के सब से अच्छे छात्र थे। हरएक परीक्षा में प्रथम होते और स्वर्णपदक आदि अथवा छात्रवृत्तियाँ पाते थे। होते होते वे संस्कृत कालेज के प्रधान अध्यापक तक हुए थे। संस्कृत व्याकरण तथा काव्य में उन्होंने विशेष ज्ञान प्राप्त किया था। स्वयं के प्रयत्न से अंग्रेजी सीखी थी।

विद्यासागर किसी को धर्मशिक्षा नहीं देते थे। वे दर्शनादि ग्रन्थ पढ़ चुके थे। मास्टर ने एक दिन उनसे पूछा, “आपको हिन्दू दर्शन कैसे लगते हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “मुझे यही मालूम होता है कि वे जो चीज समझाने गए उसे समझा न सके।” वे हिन्दुओं की भाँति श्राद्धादि सब धर्मानुष्ठान करते थे, गले में जनेऊ धारण करते थे, अपनी भाषा में जो पत्र लिखते थे, उनमें सब से पहले “श्रीश्रीहरिः शरणम्” यह ईश्वरवन्दनात्मक

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar