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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

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DevanagariHindipublished711 pages

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२१८श्रीरामकृष्णवचनामृत४ जून, १८८३

जाएगा, तब क्या वह रास्ते में नाचता फिरेगा? वह फिर किसी आफिस की नौकरी ढूँढ़ लेगा, वही पुराना काम करता रहेगा। इसी तरह गुरु की कृपा से ज्ञानलाभ होने पर मनुष्य संसार में भी जीवन्मुक्त होकर रह सकता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने सांसारिक मनुष्यों को अभय प्रदान किया।

(४)

श्रीरामकृष्ण और निराकारवाद। विश्वास ही सब कुछ है।

मणिलाल (श्रीरामकृष्ण से) – उपासना के समय उनका ध्यान किस जगह करेंगे?

श्रीरामकृष्ण – हृदय तो खूब प्रसिद्ध स्थान है। वहीं उनका ध्यान करना।

मणिलाल निराकारवादी ब्राह्म हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें लक्ष्य कर कहते हैं, “कबीर कहते थे –

'निर्गुण तो है पिता हमारा और सगुण महतारी।
काकों निन्दौ काकों बन्दौ दोनों पल्ले भारी।।'

“हलधारी दिन में साकार भाव में और रात को निराकार भाव में रहता था। बात यह है कि चाहे जिस भाव का आश्रय करो, विश्वास पक्का होना चाहिए। चाहे साकार में विश्वास करो चाहे निराकार में, परन्तु वह ठीक ठीक होना चाहिए।

“शम्भु मल्लिक बागबाजार से पैदल अपने बाग में आया करते थे। किसी ने कहा था, 'इतनी दूर है, गाड़ी से क्यों नहीं आते? रास्ते में कोई विपत्ति हो सकती है।' उस समय शम्भु ने नाराज होकर कहा था, 'क्या मैं भगवान् का नाम लेकर निकला हूँ, फिर मुझे विपत्ति'?

“विश्वास से ही सब कुछ होता है। मैं कहता था यदि अमुक से भेंट हो जाय या यदि अमुक खजांची मेरे साथ बात करे तो समझूँ कि मेरी यह अवस्था सत्य है। परन्तु जो मन में आता, वही हो जाता था।”

मास्टर ने अंग्रेजी का न्यायशास्त्र पढ़ा था। उसमें लिखा है कि सबेरे के स्वप्न का सत्य होना लोगों के कुसंस्कार की ही उपज है। इसलिए उन्होंने पूछा, “अच्छा, कभी ऐसा भी हुआ है कि कोई घटना नहीं हुई?”

श्रीरामकृष्ण – “नहीं, उस समय सब हो जाता था। ईश्वर का नाम लेकर जो विश्वास करता था, वही हो जाता था। (मणिलाल से) पर इसमें एक बात है। सरल और उदार हुए बिना यह विश्वास नहीं होता। जिसके शरीर की हड्डियाँ दिखायी देती हैं, जिसकी आँखें छोटी और घुसी हुई हैं, जो ऐंचाताना है, उसे सहज में विश्वास नहीं होता। इसी प्रकार और भी कई लक्षण हैं।”